शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-१, ब्राह्मण-१
का० ४, अ० १, ब्रा० १, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / ५२७
चतुर्थ काण्ड
अथ ग्रह नामकं चतुर्थ काण्डम्
उपांशुग्रहः क्षुल्लकाभिषवश्च
अध्याय १—ब्राह्मण १
उपांशु यज्ञ का प्राण है। उपांशु सवन व्यान है और अन्तर्याम ग्रह उदान है ॥१॥
इसको उपांशु क्यों कहते हैं? अंशु नामी ग्रह प्रजापति है। यह ग्रह उसका प्राण है।
चूंकि वह इसका प्राण है इसलिए उपांशु हुआ ॥२॥
इसको पवित्रे के विना लेता है। उससे परांच प्राण (दूर जाते हुए प्राण) को धारण
करता है। उसका यह बाहर की ओर जाता हुआ निकलता है। उसको सोम के अंशु या डालियों
से पवित्र करता है, क्योंकि ये पवित्र होती हैं। छः डालियों से पवित्र करता है। छः ऋतुएँ हैं।
इस प्रकार ऋतुओं से पवित्र करता है ॥३॥
इस पर कुछ लोग कहते हैं कि उपांशु ग्रह को तो सोम की डालियों से पवित्र करते हैं
और अन्य सोम पवित्रे से पवित्र किये जाते हैं, तो ये डालियाँ किससे पवित्र होती हैं ? ॥४॥
उन (डालियों) को इस मन्त्र को पढ़कर (सोम पर) डाल देता है या उपवपन करता
है—“यत् ते सोमादाभ्यं नाम जागृवि तस्मै ते सोम सोमाय स्वाहा” (यजु० ७।२)—“हे सोम,
तेरा जो दमन करने योग्य जगानेवाला नाम है उस तुझ सोम के लिए स्वाहा।” इस स्वाहाकार
से ही ये डालियाँ पवित्र हो जाती हैं। यह ग्रह सब-कुछ है, क्योंकि यह सब सवनों का रूप
है ॥५॥
जब देवों ने यज्ञ ताना तो वे राक्षसों के आक्रमण से भयभीत हो गए। उन्होंने कहा कि
पहले हम यज्ञ की स्थापना कर लें, फिर यदि राक्षस आक्रमण भी करेंगे तो हमारा यज्ञ तो
स्थापित रहेगा ही ॥६॥
उन्होंने प्रातः-सवन में ही सम्पूर्ण यज्ञ स्थापित कर दिया—इसी (उपांशु) ग्रह में यजुः
से, पहले स्तोत्र में साम से, पहले शस्त्र में ऋक् से। इसी पूर्णतया स्थापित यज्ञ के द्वारा उन्होंने
अर्चन किया। यह भी इसी प्रकार यज्ञ को स्थापित करता है,—पहले इसी ग्रह में यजुः से, पहले
स्तोत्र में सोम से, प्रथम शस्त्र में ऋक् से। उसी स्थापित यज्ञ से वह अर्चन करता है ॥७॥
यह सोम आठ बार कुचला जाता है। आठ अक्षर की गायत्री होती है। प्रातः-सवन
गायत्री-सम्बन्धी है। इस प्रकार यह प्रातः-सवन होता है ॥८॥
वह इस मन्त्र से लेता है—“वाचस्पतये पवस्व” (यजु० ७।१)—“वाचस्पति के लिए
पवित्र हो।” वाचस्पति प्राण है। यह ग्रह भी प्राण है। इसलिए कहा कि वाचस्पति के लिए
पवित्र हो। “वृष्णोऽअ॑ंशुभ्यां गभस्तिपूतः” (यजु० ७।१) सोम की दो डालियों से इसे पवित्र
करता है, इसलिए कहा कि “शक्तिशाली के दो अंशुओं से।” ‘गभस्ति’ का अर्थ है हाथ। हाथ से
५२८ शतपथ ब्राह्मण
ग॒भ॒स्ति॒पूत॒ इति॑ पा॒णी वै ग॒भस्ती॑ पा॒णिभ्या॑ꣳ ह्ये॑नं पाव॒यति॑ ॥ ९॥ अथेकादश
कृत्वो॒ऽभिषु॑णाति । एकादशाक्षरा वै त्रि॒ष्टुब्त्रैष्टु॑भं माध्यन्दिनꣳ सवनं माध्यन्दिनमे-
वैतत्सव॑नं क्रियते ॥१०॥ स गृह्णाति । दे॒वो दे॒वेभ्यः॑ पव॒स्वेति॑ दे॒वो ह्येष॑ दे॒वे-
भ्यः॑ पव॑ते॒ येषां॑ भागो॒ऽसीति॒ तेषाम॒ ह्येष भागः॑ ॥ ११॥ अथ द्वादश कृत्वो॒ऽभिषु॑-
णोति । द्वादशाक्षरा वै जगती जागतं तृतीयसवनं तृतीयसवनमेवैतत्क्रियते ॥१२॥
स गृह्णाति । मधु॑मतीर्न इ॒षस्कृ॑धीति॒ रस॑मे॒वास्मिन्नेतद्द॑धाति स्वदयत्येवैनमेतद्देवे-
भ्यस्तस्मादेष शृतो न पूयत्यथ यज्जु॒होति॑ सꣳस्थापयत्येवैनमेतत् ॥ १३॥ अष्टाव-
ष्टौ कृत्वः । ब्रह्मवर्चसकामस्याभिषुणुयादित्याहुरष्टाक्षरा वै गायत्री ब्रह्म गायत्री
ब्रह्मवर्चसी हैव भवति ॥ १४॥ तच्चतुर्विꣳशतिं कृत्वो॒ऽभिषु॑तं भवति । चतुर्विꣳ-
शतिर्वै संवत्सर॒स्यार्धमासाः॑ संवत्सरः प्रजापतिः प्रजापतिर्यज्ञः स यावानेव यज्ञो
यावत्यस्य मात्रा तावतमेवैतत्संस्थापयति ॥ १५॥ पञ्च-पञ्च कृत्वः । पशुकाम
स्याभिषुणुयादित्याहुः पाङ्क्ताः पशवः पशूने॒वाव॑रुन्द्धे पञ्च वा॒ऽऋतवः॑ संवत्सर॒स्य
संवत्सरः प्रजापतिः प्रजापतिर्यज्ञः स यावानेव यज्ञो यावत्यस्य मात्रा तावन्तमे-
वैतत्संस्थापयति सोऽऽएषा मीमाꣳसैवैतरं त्वेव क्रियते ॥ १६॥ तं गृहीत्वा परि-
मार्ष्टि । नेह्यवश्चोतदिति तं न सादयति प्राणो ह्यस्यैष तस्मादयमसन्नः प्राणः सं-
चरति यदीद्यभिचरेद्येनꣳ सादयेदमुष्य वा प्रा॒णं सादयामीति तथाह तस्मिन्न
पुनरस्ति यन्नानुमृशति तेनोऽऽअध्वर्युश्च यजमानश्च ज्योग्जीवतः ॥ १७॥ अथोऽऽअप्ये-
वेनं दध्यात् । अमुष्य वा प्राणमपिदधामीति तथाह तस्मिन्न पुनरस्ति यन्न साद॒-
यति तेनो प्राणा॒न्न लो॑भयति ॥ १८॥ स वाऽऽअन्तरेव सꣳस्वाहा॒कृति॑ करोति । दे॒-
वा ह॒ वै बिभयां चक्रुर्यद्वै नः पुरो॒वाक्य॑ ग्र॒हस्य॑ होमादसुररक्षसानीमं ग्रहं न
हन्युरिति॒ तमन्त॑रेव सन्तः स्वाहाका॒रेणाजु॑हवुस्तꣳ शृतमेव सन्तमग्नावजुहवुस्त-
थो॒ऽएवैनमेष एतदन्तरेव सन्तस्वाहाकारेण जुहोति तꣳ शृतमेव सन्तमग्नौ जुहो-
कां० ४, अ० १, ब्रा० १, कं० ९-१६ शतपथब्राह्मण / ५२६
उसको पवित्र करता है, इसलिए कहा 'गभस्तिपूतः' ॥९॥
अब वह ग्यारह बार कुचलता है। त्रिष्टुप् में ग्यारह अक्षर होते हैं। त्रिष्टुप् दोपहर का
सवन है। इस प्रकार यह दोपहर का सवन हो जाता है ॥१०॥
वह इस मन्त्र से ग्रहण करता है—"देवो देवेभ्यः पवस्व" (यजु० ७।१)—"देव देवों के
लिए पवित्र हो ।" यह (सोम) देव है और देवों के लिए पवित्र होता है। "येषां भागोऽसि"
(यजु० ७।१)—वस्तुतः यह उनका भाग है ॥११॥
अब बारह बार कुचलता है । जगती बारह अक्षर की होती है। तीसरा सवन जगती का
है । इस प्रकार यह तीसरा सवन हो जाता है ॥१२॥
वह इस मन्त्र के द्वारा ग्रहण करता है—"मधुमतीर्नऽइषस्कृधि" (यजु० ७।२)—
"हमारे अन्नों की मीठा कर ।" इस प्रकार इसमें रस डालता है और देवों के चखने योग्य बनाता
है। इस प्रकार मारा जाकर वह सड़ता नहीं। और जब वह इस ग्रह की आहुति देता है तो
उसकी वहाँ स्थापना करता है ॥१३॥
ब्रह्मवर्चस् की इच्छावाला आठ बार कुचले । गायत्री में आठ अक्षर होते हैं। गायत्री
ब्रह्मवर्चसी है ॥१४॥
इस प्रकार चौबीस चोटों से कुचलना हो जाता है। वर्ष के अर्ध मास चौबीस होते हैं।
संवत्सर प्रजापति हैं, प्रजापति यज्ञ है। वह यज्ञ जितना है और जितनी उसकी मात्रा है उतनी
ही उसकी संस्थापना हो जाती है ॥१५॥
पशु की कामनावाला पाँच बार कुचले । कहते हैं कि पशु पांचवाले हैं। इस प्रकार
पशु की प्राप्ति करता है। संवत्सर में पाँच ऋतुएँ होती हैं। संवत्सर ही प्रजापति है। प्रजापति
यज्ञ है। जितना यह यज्ञ है, जितनी इसकी मात्रा है उतनी ही इसकी संस्थापना है। यह केवल
मीमांसा (कल्पना) है। दूसरी क्रिया इस प्रकार है—॥१६॥
ग्रह को लेकर पोंछता है कि कुछ टपके न। वह इसको रखता नहीं है। यह उसका प्राण
है। इस प्रकार उसका प्राण निरन्तर चलता है। यदि इसको रोकना चाहे तो इसको रख दे
और कहे 'मैं अमुक के तुम प्राण को रोकता हूँ।' चूंकि अध्वर्यु उसको छोड़ता नहीं, अतः वह
(प्राण) उस (शत्रु) में नहीं रहता । इस प्रकार अध्वर्यु और यजमान दीर्घ जीवन को प्राप्त
होते हैं ॥१७॥
या उसको हाथ से दबाकर कहे कि 'मैं अमुक के तुझ प्राण को दबाता हूँ।' चूंकि वह
उसको रखता नहीं, अतः वह (प्राण) शत्रु में नहीं रहता । इस प्रकार वह प्राणों को नष्ट नहीं
करता ॥१८॥
जब वह हविर्धान के भीतर ही होता है तभी 'स्वाहा' कहता है। देवों को डर था कि
होम से पहले जो कुछ इस ग्रह का अंश है उसको असुर राक्षस नष्ट न कर दें। इसलिए जब
वे हविर्धान के भीतर थे तभी उन्होंने स्वाहा कह दिया, और जो कुछ आहुति दी उससे अग्नि
में फिर आहुति दे दी। इस प्रकार यह भी जब हविर्धान के भीतर है तभी स्वाहा करके आहुति
देता है, और जो कुछ आहुति दी जाती है उसी को फिर आग में छोड़ देता है ॥१९॥
५३० शतपथ ब्राह्मण
ति ॥१९॥ अथोप॒निष्क्रामति । उ॒र्वन्तरि॑क्षमन्वेमीत्य॒न्तरि॑क्षं वाऽअनु॒ रक्ष॑श्चरत्य-
मूलमुभयतः परिच्छिन्नं यथायं पुरुषोऽमूल उभयतः परिच्छिन्नोऽन्तरिक्षमनुचरत्येतद्वै
यजुर्ब्रह्म रक्षोहा स ए॒तेन॒ ब्रह्म॑णान्तरि॑क्षमभयमना॒ष्ट्रं कुरुते ॥२०॥ अथ॒ वरं॑ वृ-
णीते । बलवद्ध॒ वै दे॒वा ए॒तस्य॒ ग्रह॑स्य होमं प्रेप्सन्ति तेऽस्मा॒ग्दतं वर॒ सम॑र्ध-
यन्ति क्षिप्रे न इमं ग्रहं जुहुव॒दिति॒ तस्मा॒द्द्वरं॑ वृणीते ॥२१॥ स जु॑होति । स्वां-
कृतो॒ऽसीति प्राणो वाऽअ॒स्यैष ग्रह॑ः स स्व॒यमे॒व कृतः स्वयं॑ जातस्तस्मादाह॒ स्वां-
कृतो॒ऽसीति॒ विश्वे॑भ्य इन्द्रिये॑भ्यो दि॒व्येभ्यः॒ पार्थि॑वेभ्य इति॒ सर्वाभ्यो ह्येष प्रजा॑-
भ्यः स्वयं॑ जातो मन॑स्त्वाष्ट्विति प्रजापति॒र्वै मन॑ः प्रजापति॑ष्ट्वाश्नुतामित्ये॒वैतदा॑ह॒ स्वा-
हा वा सुभव॒ सूर्या॑येति तद्वर॒॰ स्वाहाकार॒ करोति परां॑ दे॒वताम् ॥२२॥ अ॒मु-
ष्मिन्वाऽए॒तमगृह्णीत् । य ए॒ष तपति॒ सर्वं वाऽए॒ष तदेन॑ सर्व॒स्यैव परार्ध्यं क-
रोत्यथ यद्वरं दे॒वतां॑ कुर्यात्पर॒॰ स्वाहाकार॑ स्या॒ड्ढैवामुष्मादादित्यात्परं॒ त-
स्माद्वर॒॰ स्वाहाकारं करोति परां॑ दे॒वताम् ॥२३॥ अथ ध्रुवोर्ध्वं ग्रह॒मुन्मा॑ष्टि॑ ।
परा॒ञ्चमे॒वास्मिन्नेतत्प्राणं॑ दधात्यथोत्ताने॑न पाणि॑ना मध्यमे॑ परिधौ प्रागुप॑माष्टिं प॒-
रा॒ञ्चमे॒वास्मिन्नेतत्प्राणं॑ दधाति दे॒वेभ्य॑स्त्वा मरीचि॒पेभ्य॒ इति ॥ २४॥ अ॒मुष्मिन्वा
ऽए॒तं मण्डलेऽगृह्णीत् । य ए॒ष तपति तस्य॒ ये र॒श्मय॒स्ते दे॒वा मरीचिपास्ताने॒-
वैतत्प्रीणाति तऽएनं॑ दे॒वाः प्रीताः स्वर्गं लो॒कम॒भिव॑हन्ति ॥ २५॥ तस्य॒ वाऽए॒-
तस्य॒ ग्रह॑स्य । नानुवाक्या॑स्ति न या॒ज्या तं मन्त्रे॑ण जुहोत्येतेनो हास्यैषोऽनुवा॒-
क्यवान्भवत्येतेन या॒ज्यावानथ॒ यद्य॒भिचरे॒द्योऽस्या॑ऽप्रियः स्याद्धाल्लो॒र्वीरेमि वा
वाससि वा तं जु॑हुयाद्दिवा॒॰शो यस्मै॑ वेडे तत्सत्यमुप॑रिप्लुता भङ्गेन हतो॒ऽसौ फ-
डिति यथा ह॒ वै हन्यमानानामपधाविदे॒वमेषो॒ऽभिषूय॑माणाना॒॰ स्कन्दति तथा
ह॒ तस्य॒ नैव धावन्नापधावत्परिशिष्यते यस्मा॒ऽएवं करोति त॒॰ सादयति प्राणाय
त्वेति प्राणो ह्यस्यैषः ॥ २६॥ दक्षिणार्धे हैके सादयन्ति । ए॒ता॒॰ ह्येष दिश॒मनु
कां० ४, अ० १, ब्रा० १, कं० २०-२७ शतपथब्राह्मण / ५३१
अब वह 'हविर्धान' से बाहर आता है यह कहता हुआ कि मैं अन्तरिक्ष में होकर आता
हूँ। अन्तरिक्ष में राक्षस दोनों ओर से स्वच्छन्द मूलरहित फिरता है। इसी प्रकार यह पुरुष भी
दोनों ओर से स्वच्छन्द मूलरहित अन्तरिक्ष में फिरता है। यह यजुः है, राक्षस को मारनेवाली
स्तुति । इसी स्तुति के द्वारा वह अन्तरिक्ष को निर्भय और राक्षस से मुक्त कर देता है ॥२०॥
अब वर मांगता है—देव इस ग्रह के होम को अत्यन्त चाहते हैं। और वे इसके लिए
उसको वर देते हैं कि शीघ्र ही यह होम हमारे लिए दे देवे। इसलिए वर को माँगता है ॥२१॥
वह इस मन्त्र से आहुति देता है—"स्वां कृतोऽसि" (यजु० ७।३)—"यह ग्रह इसका
प्राण है।" वह उसी का किया हुआ स्वयं उत्पन्न हुआ है, इसलिए कहा कि 'स्वांकृतः' अर्थात्
अपने-आप बना हुआ है। "विश्वेभ्य ऽ इन्द्रियेभ्यो दिव्येभ्यः पार्थिवेभ्यः" (यजु० ७।३)—"सब
प्रजाओं के लिए यह स्वयं ही बना है।" "मनस्त्वाष्टु" (यजु० ७।३)—"तुझको मन प्राप्त
करे।" मन प्रजापति है, इसलिए इसका अर्थ हुआ कि प्रजापति तुझको पावे। "स्वाहा त्वा
सुभव सूर्याय" (यजु० ७।३)—"हे भलीभाँति उत्पन्न तुझ सूर्य के लिए स्वाहा।" इस प्रकार
वह दूसरे देवता के लिए स्वाहाकार करता है ॥२२॥
यह जो तपता है अर्थात् सूर्य, उसी में उसने आहुति दी है। यही सब-कुछ है। इसलिए
वह उस (सूर्य) को सर्वोपरि बनाता है। यदि वह दूसरे स्वाहाकार को पहले देवता के लिए
करता तो वह सूर्य से भी बड़ा हो जाता। इसलिए दूसरे स्वाहाकार को उसी देवता के लिए
करता है ॥२३॥
अब आहुति देकर ग्रह को पोंछता है। इसमें वह जाते हुए प्राण को फिर रखता है।
अब हथेली से मध्यपरिधि में वह पोंछा हुआ सोम लगाता है। इस प्रकार उसमें जाते हुए प्राण
को धारण कराता है इस मन्त्र से —"देवेभ्यस्त्वा मरीचिपेभ्यः" (यजु० ७।३)—"किरणों को
पीनेवाले देवों के लिए तुझको" ॥२४॥
उसी (सूर्यमंडल) में उसने आहुति दी है, जो कि तपता है। उसी की किरणें
'मरीचिपा' (प्रकाश का पान करनेवाली) हैं। उन्हीं को वह प्रसन्न करता है। उसी से प्रसन्न
होकर देव उसे स्वर्गलोक को ले जाते हैं ॥२५॥
इस ग्रह के लिए न कोई अनुवाक्य है न याज्य । वह एक मन्त्र से आहुति देता है, इसी
से वह अनुवाक्य और याज्य दोनों से युक्त हो जाता है। यदि वह कोई अभिचार करना चाहे तो
सोम की डाली को चिपका ले, बाहों से, छाती से या कपड़े से, और इस मन्त्र से आहुति देवे—
'देवाऽशो यस्मै त्वेडे तत् सत्यमुंपरिप्लुता भङ्गेन हतोऽसौ फट्"—"हे दिव्य सोम ! जिस काम के
लिए मैं तेरी स्तुति करता हूँ, वह पूरा होवे। और अमुक पुरुष (मेरा शत्रु) नष्ट हो जाय।" जिस
प्रकार मारे जानेवाले शत्रुओं में से कोई भाग जाता है, इसी प्रकार सोम की कुचली जानेवाली
शाखाओं में से यह एक बच सकती है। जो इस प्रकार करता है उसका कोई शत्रु भागकर बचने
नहीं पाता। इस मन्त्र से वह ग्रह को रख देता है—"प्राणाय त्वा" (यजु० ७।३) क्योंकि यह
ग्रह इस यज्ञ का प्राण है ॥२६॥
कुछ लोग इसको दक्षिण की ओर रखते हैं। वे कहते हैं कि इसी दिशा में सूर्य चलता