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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-४, ब्राह्मण-५

६२० शतपथ ब्राह्मण

धत्त॒ वसवो॒ वसूनि॒ स्वाहा॑ ॥ १०॥ याँ२॥ऽश्राव॑हः । उश॒तो दे॑व दे॒वाँस्तान्प्रेर॑य
स्वेऽअ॒ग्ने स॒धस्थ॒ऽइत्य॒ग्निं वाऽआ॒हामूंन्देव॒ानाव॑हा॒मूंन्देवा॒नाव॒हेति॒ तमे॒वैतदा॑ह
यान्दे॒वानावाक्षी॑स्तान्गमय॒ यत्र॒-यत्रे॑षां च॒रणं॒ तद॒न्विति॒ ज॒क्षिवाꣳसः॑ पपिवाꣳसश्च॑
विश्वे॑ऽइति॒ ज॒क्षिवाꣳसो॒ हि॒ प॒शुं पु॑रोडा॒शं भव॑न्ति पपिवाꣳस॒ इति॑ पपिवाꣳसो
हि॒ सोम॑ꣳ राजा॒नं भव॑न्ति॒ तस्मा॑दाह॒ ज॒क्षिवाꣳसः॑ पपिवाꣳसश्च॒ विश्वे॑ऽइ॒मं घ॒र्मꣳ
स्व॒राति॑ष्ठतानु॒ स्वाकृ॑ति॒ तद्ध्ये॑व दे॒वता॒ व्यव॑सृजति ॥ ११॥ व॒षट् हि वा । प्रय॑ति
य॒ज्ञेऽअ॒स्मिन्न॒ग्ने होता॑रमवृणीमही॒ति । अ॒धगया अ॒धगुताश॑मिष्ठाः प्र॒जान॒न्यज्ञमुप॑-
याहि वि॒द्वाꣳस्वाहेत्य॒ग्निमे॒वैतया॑ विमु॒च्यत्य॒ग्निं व्यव॑सृजति ॥ १२॥ दे॒वा गा॒तुविद॑
इति । गा॒तुविदो॒ हि दे॒वा गा॒तुं वि॒त्वेति॑ य॒ज्ञं वि॒त्त्वेत्ये॒वैतदा॑ह गा॒तमिती॑ति॒ तदे॑-
तेन॒ यथा॒यथं॒ व्यव॑सृजति॒ मन॑सस्पत॒ऽइमं दे॑व य॒ज्ञꣳ स्वाहा॒ वाते॑ धा॒ इत्य॒यं वै
य॒ज्ञो योऽयं प॑वते॒ तदि॒मं य॒ज्ञꣳ स॒म्भृत्यै॒तस्मि॑न्य॒ज्ञे प्र॑तिष्ठापयति य॒ज्ञेन॒ य॒ज्ञꣳ सं-
द॑धाति॒ तस्मा॑दाह॒ स्वाहा॒ वाते॑ धा॒ इति॑ ॥ १३॥ य॒ज्ञ य॒ज्ञं ग॑ह । य॒ज्ञप॑तिं गह॒
स्वां योनिं॑ गह॒ स्वाहेति॒ तत्प्रति॑ष्ठितमे॒वैतद्य॒ज्ञꣳ सन्तꣳ स्वायां॒ योनौ॒ प्रति॑ष्ठाप-
यत्येष ते॑ यज्ञो यज्ञपते सह॒सूक्तवाकः॒ सर्व॑वीर॒स्तं जु॑षस्व॒ स्वाहेति॒ तत्प्रति॑ष्ठित-
मे॒वैतद्य॒ज्ञꣳ सन्तꣳ सह॒सूक्तवाकꣳ सर्व॑वीरं यज॑मानेऽन्त॒तः प्रति॑ष्ठापयति ॥ १४॥
ब्राह्मणम् ॥ ६ [४. ४.] ॥ ॥ तृतीयः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या १२२ ॥ ॥
स वाऽअव॑भृथम॒भ्यवै॑ति । तद्यदव॑भृथम॒भ्यवै॑ति॒ यो वाऽअ॒श्वस्य॒ रसोऽभू॒दाहु॑ति-
भ्यो वाऽअ॒श्वस्य॒ तमजीजन॒द्यदेतच्छरीरं॒ तस्मि॑न्न॒ रसोऽस्ति॒ तन्न॒ परा॒स्यं तद॒पोऽभ्यव॑-
हरन्ति॒ रसो वाऽआप॒स्तद॒स्मिन्नेतꣳ॒ रसं॑ दधाति॒ तदे॑नमे॒तेन॒ रसे॑न॒ संग॑मयति॒ त-
देनमतो जनयति॒ स ए॒नं जा॒त ए॒व सञ्जन॑यति॒ तद्यद॒पोऽभ्यव॑हर॒न्ति तस्मा॑दव-
भृथः॒ ॥ १॥ अथ समिष्टयजूं॒षि जु॑होति । समिष्टयजूꣳ॒षि ह्य॑वान्तो य॒ज्ञस्य॒ स ह्वै-
वैष॒ समिष्टयजूꣳ॒षि यदे॒तमभि॑तो भव॑ति॒ तेन चावालमुपसमाय॑न्ति॒ स कृ॒ष्णविषा-

का० ४, अ० ४, ब्रा० ४-५, कं० १०-१४ व १-२ शतपथब्राह्मण / ६२१
'वहमाना' अर्थात् गाड़ियों में ले-जाते हुए । "अस्मे धत्त वसवो वसूनि स्वाहा" (यजु० ८।१६)-
"हे वसुओ, हमारे लिए धन दो" ॥१०॥
पाँचवीं इस मन्त्र से—"यां२ ऽ आवह ऽ उशतो देव देवाँस्तान् प्रेरय स्वे ऽ अग्ने सधस्थे"
(यजु० ८।१६)--- "हे देव, जिन इच्छुक देवों को तुम यहाँ लाये हो, हे अग्नि, तुम उनको अपने-
अपने घर पहुँचा दो।" पहले तो अग्नि से कहा था कि इन देवों को लाओ, इन देवों को लाओ।
अब अग्नि से कहता है कि जिन-जिन देवों को तुम लाये हो उन उनको अपने-अपने घर पहुँचा
दो। "जक्षिवाꣳसः पपिवाꣳसश्च विश्वे" (यजु० ८।१६)- "तुम सबने खा भी लिया और पी
भी लिया।" अर्थात् पशु पुरोडाश को खा लिया और सोम राजा को पी लिया। "असुं घर्मँ
स्वरातिष्ठतानु स्वाहा" (यजु० ८।१६)- "प्राण या वायु को, घर्म या आदित्य लोक को, स्व
अर्थात् द्यौलोक को जाओ" ऐसा कहकर उन देवों को विदा करता है ॥११॥
इससे छठी — "वयँ हि त्वा प्रयति यज्ञे ऽ अस्मिन्नग्ने होतारमवृणीमहीह । ऋधगया-
ऽऋधगुताशमिष्ठाः प्रजानन् यज्ञमुपयाहि विद्वान्त्स्वाहा" (यजु० ८।२०)- "हे अग्नि, इस यज्ञ से
आरम्भ में हमने तुमको होता बनाया है। तू समृद्धि के साथ आया और तूने समृद्धि के साथ
शयन किया। तू अपने अधिकार को जानते हुए यज्ञ में आ।" इससे वह अग्नि को छोड़ देता है,
उसका विसर्जन कर देता है ॥१२॥
सातवीं इस मन्त्र से—"देवा गातुविदः" (यजु० ८।२१)- "मार्ग जाननेवाले देवो।"
क्योंकि देव मार्ग को जानते हैं। "गातुं वित्त्वा" (यजु० ८।२१)- "मार्ग अर्थात् यज्ञ को मालूम
करके।" "गातुमित" (यजु० ८।२१) —"जाइये।" इससे वह उनको उचित रीति से विदा कर
देता है। "मनसस्पत ऽ इमं देव यज्ञँ स्वाहा वाते धाः" (८।२१)- "हे मन के पति देव, इस यज्ञ
को वायु में रख।" यह जो वायु है वही यज्ञ है। यज्ञ को समाप्त करके वह इसको इस प्रकार यज्ञ
में ही स्थापित करता है। यज्ञ को यज्ञ से मिला देता है, इसलिए कहता है यज्ञ को वायु में
रख ॥१३॥
आठवीं इस मन्त्र से—"यज्ञ यज्ञं गच्छ यज्ञपति गच्छ स्वां योनि गच्छ स्वाहा" (यजु०
८।२२)- "हे यज्ञ, यज्ञ को प्राप्त हो, यज्ञपति को प्राप्त हो, अपनी योनि को प्राप्त हो।" जब
यज्ञ प्रतिष्ठित हो गया तो फिर उसको उसी की योनि में प्रतिष्ठित करता है।" एष ते यज्ञो यज्ञपते
सहसूक्तवाकः सर्ववीरस्तं जुषस्व स्वाहा" (यजु० ८।२२)- "हे यज्ञपति, यह तेरा यज्ञ है, स्तोत्रों
सहित, सब वीरों से युक्त; इसको स्वीकार कर।" इस स्तोत तथा वीरयुक्त यज्ञ को यजमान में
स्थापित करता है ॥१४॥
अध्याय ४-ब्राह्मण ५
अब अवभृथ स्नान के लिए जाता है। अवभृथ स्नान के लिए इसलिए जाता है कि जो इस
(सोम) का रस था, वह इसकी आहुतियों के लिए उत्पन्न हुआ था। रहा उस (सोम) का शरीर,
उसमें तो रस नहीं है। उसे फेंकना तो चाहिए नहीं। अब उसको जलों के पास ले जाता है। इस
प्रकार वह उसको रस से युक्त करता है और उस (सोम) को रस में से ही उत्पन्न करता है।
इस प्रकार उत्पन्न हुआ सोम यजमान को उत्पन्न करता है। चूंकि सोम को जलों के पास ले जाते
हैं (अभि-अव-हरन्ति) इसलिए इसका नाम अवभृथ है ॥१॥
इसके पश्चात् समिष्ट-यजुओँ की आहुति देता है। समिष्ट-यजुः यज्ञ का अन्त है।
समिष्ट-यजुओँ की आहुतियाँ देने के पश्चात् जो कुछ उसके पास होता है उसको लेकर चात्वाल

६२२ शतपथ ब्राह्मण
णां॑ च मे॒खलां॑ च चा॒वाले॒ प्रास्य॑ति ॥ २॥ मा॒द्भिर्भूमी॒ पृथु॑क्पुरिति । अ॒सौ वा
ऽव॒भृथो॒ऽस्य स्वगाकारो॒ यदे॒नद॒पो॒ऽभ्यव॒हर॑न्त्येष ह्वैत॑स्य स्वगाकारो॒ रज्जु॑रिव
हि सर्पाः कूपा-इव॒ हि सर्पा॒णाम॒ायत॑ना॒न्यस्ति॑ वै मनु॒ष्याणां च सर्पा॒णां च वि-
भ्रातृ॒व्यमिव॒ नेत्तद॒तः सम्भ॑व॒दिति॒ तस्मादाह मा॒द्भिर्भूमी॒ पृथु॑क्पुरिति ॥ ३॥ अथ
वाच॑यति । उ॒रुँ हि राजा॒ वरु॑णश्च॒कार॒ सूर्या॑य॒ पन्था॒मन्वे॑त॒वा उ॑ऽइति॒ यथाय॒मु-
रु॒रभयो॒न्नाष्ट्रः सूर्या॑य॒ पन्था॑ ए॒वं मे॒ऽयमुरु॑र॒भयो॒न्नाष्ट्रः पन्था॑ अ॒स्त्वित्ये॒वैत॒दाह॒
॥४॥ अ॒पदे॒ पादा॒ प्रति॑धातवे॒ऽकरिति॑ । यदि॑ ह वा॒ऽअप्यपा॒द्वत्यल॒मेव प्रति॑क्र-
मणाय भवत्युतापवक्ता हृदयावि॒धश्चिदिति॒ तदेनं॒ सर्व॑स्माद॒घृश्यादे॑नसः पा॒प्मनः॑
प्रमु॑ञ्चति ॥ ५॥ अथा॒ह साम॑ गाये॒ति । साम॑ ब्रूही॒ति वा गाये॒ति त्वेव ब्रूया॒द्गाय-
न्ति हि साम॒ तद्यत्सा॒म गाय॑ति॒ नेदि॒दं ब॒र्हिर्या यज्ञाङ्गरी॒र्न नाष्ट्रा रक्षाँ॑सि हि-
न्सन्निति साम॒ हि नाष्ट्राणाँ रक्षसामपह॒न्ता ॥ ६॥ आग्नेय्यां॑ गायति । अ॒ग्निर्हि
रक्षसामप॒हन्ता॑ति॒च्छन्द॑सि गाय॒त्येषा वै सर्वा॑णि॒ छन्दाँसि यद॒तिच्छन्दा॒स्तस्मा॑दति-
च्छन्द॑सि गायति ॥ ७॥ स॒ गाय॑ति । अ॒ग्निष्ट्प॑ति॒ प्रति॑दृत्य॒ह्यावो॒ऽ३हावो॒ऽइति॒ त-
न्नाष्ट्रा ह्वैतद्रक्षाँ॒स्यतो॒ऽप॑हन्ति ॥ ८॥ तऽउदञ्चो निष्क्रामन्ति । जघनेन चावा-
लमग्रेणाग्नीध्रँ स यस्यां ततो दिश्यापो भवन्ति तद्यन्ति ॥ ९॥ स यः स्यन्द॑माना-
नाँ स्थावरो ह्रदः स्यात् । तमपो॒ऽभ्यवे॑यादेता वाऽअ॒पां व॑रु॒णगृ॑हीता याः स्य-
न्दमा॑नानां न स्यन्द॑न्ते वरु॒ण्यो वा॒ऽअव॑भृथो निर्वरुणतायै यद्यु ता न विन्देदपि
या एव काश्चापो॒ऽभ्यवे॑यात् ॥ १०॥ तम॒पो॒ऽवक्र॑म॒यन्वाच॑यति । नमो॒ वरु॑णाया-
भिष्टितो वरु॑णस्य॒ पाश॒ इति॒ तदेनं॒ सर्व॑स्माद्वरु॒णपाशा॒त्सर्व॑स्माद्वरुणपा॒त्यात्प्रमु॑ञ्चति
॥ ११॥ अथ चतुर्गृहीतमाज्यं॑ गृही॒त्वा । स॒मिधं॑ प्रा॒स्याभि॒जुहोत्यग्ने॒रनी॑कमप॒ आ-
विवेशा॒पां नपा॒त्प्रति॒रक्ष॑न्नसु॒र्यम् । दमे॑-दमे स॒मिधं॑ यक्ष्यग्ने॒ प्रति॑ ते जि॒ह्वा घृ॒तमु-
च्चर॒णत्स्वाहेति॑ ॥ १२॥ अ॒ग्नेर्ह वै देवाः । या॒वद्वा॒ यावद्वाप्सु प्रवेशयां चक्रुर्नेदतो

कां० ४, अ० ४, ब्रा० ५, कं० २-१३ शतपथब्राह्मण / ६२३
में जाते हैं। वह कृष्ण विषाण (हरिण के सींगों) और मेखला को चात्वाल में फेंक देता है इस
मन्त्र से—॥२॥
“माहिर्मूर्मा पृदाकुः” (यजु० ८।२३)—“न सर्प हो न पृदाकू ।” जब इस (सोम के
फोक) को अवभृथ के लिए ले जाते हैं तो यह उनका स्वगाकार (farewell or विदाई) है । यह
यजमान के लिए भी स्वगाकार है । सर्प रस्सी के समान होते हैं। सर्पों के घर कुयें के समान हैं।
मनुष्य सर्पों की लड़ाई है। वह ऐसा सोचता है कि 'कहीं वह उससे उत्पन्न न हो जावे', और
इसलिए वह कहता है, कि 'तू न तो अहि (adder, सर्पविशेष) बन, और न पृदाकू (viper)' ॥३॥
अब वह यजमान से कहलवाता है, “उरुँ हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थामन्वेतवाऽउ
(यजु० ८।२३; ऋ० १।२४।८) — “राजा वरुण के सूर्य के लिए बड़ा चौड़ा मार्ग बनाया है।”
इसका तात्पर्य यह है कि जैसे सूर्य के लिए भयरहित चौड़ा-चकला मार्ग है इसी प्रकार मेरे लिए
भयरहित चौड़ा-चकला मार्ग हो ॥४॥
“अपदे पादा प्रतिधातवेऽकः” (यजु० ८।२३; ऋ० १।२४।८)—“पैर-रहित लोगों के
पैर दिये हैं।” सूर्य यद्यपि पैर-रहित है तो भी वह चल सकता है। “उतापवक्ता हृदयाविधश्चित्”
(यजु० ८।२३; ऋ० १।२४।८) —“जो चीज हृदय को बेधनेवाली है उसका अपवाद करनेवाला
(निषेध करनेवाला) है।” इस प्रकार इसको सब हृदय के पाप से छुड़ा देता है ॥५॥
अब वह कहता है 'साम गाओ' या 'साम बोलो।' 'साम गाओ' ऐसा कहना चाहिए
क्योंकि साम को गाते हैं। गाने का तात्पर्य यह है कि यज्ञ से बाहर शरीर को दुष्ट राक्षस न
सतावें। क्योंकि साम दुष्ट राक्षसों का नाशक है ॥६॥
प्रस्तोता अग्निवाला मन्त्र बोलता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों का नाशक है। वह अतिछन्द
में गाता है। यह अतिछन्द सब छन्द हैं। इसलिए अतिछन्द में गाता है ॥७॥
वह इस मन्त्र को गाता है—“अग्निष्टपति प्रतिदहत्यहावोऽह्वावः” (?) “अग्नि तपता
है, अग्नि जलाता है—अहवः, आहावः ।” इस प्रकार दुष्ट राक्षसों को भगाता है ॥८॥
अब वे (वेदी से) उत्तर की ओर निकलते हैं, चात्वाल के पीछे और आग्नीध्र के आगे,
और जिस दिशा में जल होता है उसी दिशा में जाते हैं ॥६॥
उस यजमान को चाहिए कि जिधर बहते हुए जल का ठहरा हुआ तालाब हो उसके जल
में प्रवेश करे। बहते हुए जल के जो भाग स्थिर हैं वह वरुण-गृहीत (वरुण से पकड़े हुए हैं)।
अवभृथ वरुण है—वरुण से छुटकारा पाने के लिए। परन्तु यदि ऐसा जल न मिले तो किसी
जल में सही ॥१०॥
जब वह उसे जल में प्रवेश कराता है तो यह मन्त्र कहलवाता है, “नमो वरुणायभिष्ठितो
वरुणस्य पाशः ।”—“वरुण के लिए नमस्कार हो। वरुण का पाश तोड़ डाला गया।” इस प्रकार
वरुण के सब पाश से अर्थात् प्रत्येक वरुण्य (अपराध, guilt against Varuna--Eggeling)
से छुड़ा देता है ॥११॥
अब चार भाग में घी लेकर और समिधा को डालकर इस मन्त्र से आहुति देता है,
“अग्नेरनीकमप ऽ आविवेशापान्नपात् प्रतिरक्षन्नसुर्यम्। दमेदमे समिधं यक्ष्यग्ने प्रति ते जिह्वा
घृतमुच्चरण्यत् स्वाहा” (यजु० ८।२४)—“मैं अग्नि के मुख अर्थात् जलों में घूसा हूँ। हे अपां
नपात् (जलों की सन्तान) ! राक्षसों से बचने के लिए। प्रत्येक घर में हे अग्नि ! समिधा जला।
तेरी जीभ घी की ओर लपके” '॥१२॥
एक बार देवों ने जितना-जितना सम्भव हो सका अग्नि को जलों में प्रवेश करा दिया

नाष्ट्रा रक्षाꣳस्युपोत्तिष्ठानित्यग्निर्हि रक्षासामपहन्ता तमेतया च समिधै॒तया चाहु॒-
त्या॒ समिन्द्धे॒ समिद्धे दे॒वेभ्यो जुहुवानीति ॥ १३॥ अथापरं चतुर्गृहीतमाज्यं गृ-
हीत्वा । आश्राव्याह समिधो यजेति सोऽपबर्हिषश्चतुरः प्रयाजान्यजति प्रजा वै
बर्हि॒र्वरुण्यो वा॒ऽश्ववभृथो नेत्प्रजा वरुणो गृह्णादिति तस्मादपबर्हिषश्चतुरः प्र-
याजा॒न्यजति ॥ १४॥ अथ वारुण एककपालः पुरोडाशो भवति । यो वा॒ऽश्वस्य
रसो॒ऽभ्युदक्रामत्तियो वा॒ऽश्वस्य तमक्षीन्नदध्येत्तच्छरीरं तस्मिन् रसो॒ऽस्ति रसो वै
पुरोडाशस्तदस्मिन्नेतꣳ रसं दधाति तदेनमेतेन रसेन संगमयति तदेनमतो जन-
यति स एनं जात एव संजनयति तस्माद्वारुण एककपालः पुरोडाशो भवति
॥ १५॥ स आज्यस्योपस्तीर्य । पुरोडाशस्यावद्यन्नाह वरुणायोनुब्रूहीत्यत्र हैक
ऽवभृथस्य द्विरवद्यन्ति तदु तथा न कुर्याच्छरीरं वा॒ऽएतद्वति नालमाहुत्यै द्वि-
रवद्यति सकृदभिघारयति प्रत्यनक्त्यवदाने॒ऽआश्राव्याह वरु॑णं यजेति वषट्कृते
जुहोति ॥ १६॥ अथाज्यस्योपस्तीर्य । पुरोडाशमवदधात्याग्नीवरुणाभ्यामनुब्रूहीति
तत्स्विष्टकृते स यन्नाग्नयऽइत्याह नेदग्निं वरुणो गृह्णादिति स यद्यमुत्रा॒ऽपबर्हिष्य
द्विरवद्येद्यात्र सकृद्यद्यु न नाद्रियेताथोपरिष्टाद्विराज्यस्याभिघारयत्याश्राव्याहाग्नी-
वरु॑णौ यजेति वषट्कृते जुहोति ॥ १७॥ ता वा॒ऽएताः । षडाहुतयो भवन्ति ष-
ड्वा॒ऽऋतवः संवत्सरस्य संवत्सरो वरुणस्तस्मात्षडाहुतयो भवन्ति ॥ १८॥ एतदा-
दित्यानामयनम् । आदित्यानीमानि यजूंष्यीत्याहुः स यावदस्य वशः स्यादेवमेव
चिकीर्षेद्यद्यु॒ऽएनमितरथा यजमानः कर्तवे ब्रूयादितरथो तर्हि कुर्यादेतानेव चतुरः
प्रयाजानपबर्हिषो यजेद्वावाज्यभागौ वरुणमग्नीवरुणौ द्वावनुयाजावपबर्हिषौ
तद्दश दशाक्षरा वै विराड्विराडु यज्ञस्तद्विराजमेवैतद्यज्ञमभिसम्पादयति ॥ १९॥ ए-
तदङ्गिरसामयनम् । अतोऽन्यतरत्कृत्वा यस्मिन्कुम्भे॒ऽवभृथं भवति तं प्लावयति
समुद्रे ते हृदयमप्स्वन्तरित्यापो वै समुद्रो रसो वा॒ऽआपस्तदस्मिन्नेतꣳ रसं दधाति

कां० ४, अ० ४, ब्रा० ५, कं० १३-२० शतपथब्राह्मण / ६२५
जिससे राक्षस उनमें से उठने न पावें। अग्नि राक्षसों का विनाशक है। समिधा से और आहुति से
वह इसी अग्नि को प्रज्वलित करता है इसलिए कि 'मैं देवों के लिए आहुति दूं' ॥१३॥
अब फिर चार भागों में घी लेकर और (आग्नीध्र से) श्रौषट् कहलवाकर कहता है—
'समिधाओं की स्तुति कर।' अब वह बर्हि की आहुति को छोड़कर शेष चारों आहुतियां दे डालता
है। बर्हि प्रजा है। अवभृथ वरुण का है। ऐसा न हो कि सन्तान वरुण-गृहीत हो जाय। इसीलिए
बर्हि को छोड़कर शेष चार आहुतियां दे डालता है ॥१४॥
वरुण का एक कपाल का पुरोडाश बनता है। क्योंकि (सोम में) जो कुछ रस था वह तो
आहुतियों के लिए निकाला जा चुका। अब जो शरीर (भाग) बच रहा उसमें रस है ही नहीं।
पुरोडाश रस है। इस प्रकार उसमें रस डालता है। इस प्रकार वह उसको रस से युक्त कर देता
है। इस प्रकार वह उसको रस में से उत्पन्न करता है। यह सोम उत्पन्न होकर यजमान को उत्पन्न
करता है। इसलिए वरुण के लिए एक कपाल का पुरोडाश होता है ॥१५॥
वह घी चुपड़कर पुरोडाश को काटते समय कहता है—'वरुण के लिए अनुवाक पढ़।'
कुछ लोग इस अवसर पर सोम के फोक के दो भाग करते हैं। परन्तु ऐसा न करे, क्योंकि यह तो
खाली शरीर है। आहुतियों के लिए काफी नहीं है। वह दो टुकड़े करता है और घी चुपड़ता
है, अर्थात् जहाँ-जहाँ काटा था वहाँ घी लगा देता है। श्रौषट् कहलवाकर वह कहता है—
'वरुण के लिए अनुवाक पढ़।' और वषट्कार के साथ आहुति दे देता है ॥१६॥
अब घी की एक तह लगाकर और (चमचे में) पुरोडाश के टुकड़े को रखकर कहता है
कि 'अग्नि और वरुण के लिए अनुवाक कह।' यह अग्नि स्विष्टकृत् के लिए है। केवल अग्नि के
लिए यों नहीं कहता कि कहीं वरुण पकड़ ले। यदि सोम के फोक के दो भाग किये हों तो एक
भाग करे। न किये हों तो न सही। अब वह ऊपर की ओर दो बार घी लगाता है और श्रौषट्
कहलाकर कहता है 'अग्नि और वरुण के लिए अनुवाक पढ़' और वषट्कार से आहुति दे देता
है ॥१७॥
ये छः आहुतियां होती हैं। संवत्सर में छः ऋतुएँ होती हैं। संवत्सर वरुण है। इसलिए
छः आहुतियाँ होती हैं ॥१८॥
यह आदित्यों का अयन है। और 'यजुः आदित्य के हैं' ऐसा कहा जाता है। (अध्वर्यु को
चाहिए) कि जितना (यजमान) कहे उतना करे। यजमान अन्यथा कहे तो अन्यथा करे। बर्हि
की आहुति को छोड़कर शेष चारों आहुतियाँ दे देवे। दो आज्यभाग अग्नि और अग्नि-वरुण के
लिए और दो अनुयाज; बर्हि को छोड़कर। ये दस हो गये। विराट् में दस अक्षर होते हैं। यज्ञ
विराट् है। इस प्रकार यज्ञ को विराट् के समान कर देता है ॥१९॥
यह अयन अंगिराओं का है। (ऊपर कही हुई दोनों विधियों में से) किसी प्रकार (आहुति
देकर) जिस पात्र में फोक होता है उसको (अध्वर्यु) इस मन्त्र से पानी पर तैराता है—'समुद्रे
ते हृदयमप्स्वन्तः' (यजु० ८।२५)—'तेरा हृदय समुद्र में जलों के भीतर है।' जल समुद्र हैं।
जल रस है। इस (फोक) में इस प्रकार रस रखता है। इसको इस रस से युक्त करता है। इसमें