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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

०१-प्रथम काण्ड-०१

ओम् । व्रतमु॒पैष्यन्॑ । अ॒न्तरे॒णाह॑वनी॒यं च॑ गा॒र्हप॑त्यं च॒ प्रा-
ङ्तिष्ठ॑न्नप॒ उप॑स्पृशति॒ तद्यदप॒ उप॑स्पृश॒त्यमे॑ध्यो॒ वै पूरु॑षो॒ यदनृ॑तं व॒दति॒ तेन॑ पूति॒-
रन्तर॑तो मे॒ध्या वाऽआपो॑ मे॒ध्यो भू॒त्वा व्र॒तमु॒पाया॒नीति॑ प॒वित्रं॒ वाऽआपः॑ प॒वित्र॑पू-
तो व्र॒तमु॒पाया॒नीति॒ तस्मा॑द्वा॒ऽअप॒ उप॑स्पृशति ॥ १॥ सोऽग्नि॒मिवा॒भीक्ष॑माणो व्र॒त-
मुपै॑ति । अग्ने॒ व्रतपते व्र॒तं च॑रिष्यामि॒ तच्छ॑केयं॒ तन्मे॑ राध्यतामित्य॒ग्निर्वै दे॒वानां॑
व्र॒तप॑ति॒स्तस्मा॑ ऽए॒वैतत्प्रा॒ह व्र॒तं च॑रिष्यामि॒ तच्छ॑केयं॒ तन्मे॑ राध्यता॒मिति॒ नात्र॑ ति॒-
रोहि॑तमिवास्ति ॥ २॥ अथ॒ सꣳस्थि॑ते विसृ॒जते । अग्ने॒ व्रतपते व्र॒तम॑चारिषं॒
तद॑शकं॒ तन्मे॑ ऽराधीत्यश॒कꣳह्ये॑त॒द्यो य॒ज्ञस्य॒ सꣳस्थामग॒न्नरा॑धि॒ ह्य॑स्मै॒ यो य॒ज्ञस्य॒
सꣳस्थामग॒न्नेति॒ न्वे॑व भूयि॑ष्ठा-इव व्रतमु॒पयन्त्यने॑न॒ त्वे॒वोपे॑यात् ॥ ३॥ द्वयं॒ वाऽइ॒दं
न तृ॒तीय॑मस्ति । स॒त्यं चै॒वानृ॑तं च स॒त्यमे॒व दे॒वा अनृ॑तं मनु॒ष्या इ॒दम॒हमनृ॑तात्स॒-
त्यमु॒पैमीति॒ तन्मनु॑ष्येभ्यो दे॒वानुपै॑ति ॥ ४॥ स वै॑ स॒त्यमे॒व व॑देत् । ए॒तद्वै दे॒वा
व्र॒तं च॑रन्ति॒ यत्स॒त्यं तस्मा॑त्ति॒ यशो॒ यशो॑ ह भवति॒ य ए॒वं वि॒द्वांस॒त्यं व॑दति ॥ ५॥
अथ॒ सꣳस्थि॑ते विसृ॒जते । इ॒दम॒हं य ए॒वास्मि॒ सोऽस्मी॒त्यमानुष॒-इव॒ वाऽए॒तद्-
र्भव॑ति॒ यद्व्र॒तमुपै॑ति न हि॒ तद॑वकल्पते॒ यद्ब्रू॑यादि॒दम॒हꣳ स॒त्यद॑नृ॒तमु॒पैमीति॒ तद्
खलु॒ पुनर्म्मानु॑षो भवति॒ तस्मा॑दि॒दम॒हं य ए॒वास्मि॒ सोऽस्मीत्ये॒वं व्र॒तं विसृ॑जेत
॥ ६॥ अथातोऽशनानशनस्यैव । तदु॑ह्याषा॒ढः सा॑वय॒सोऽन॒शनमे॒व व्र॒तं मे॑ने
म॒नो ह॒ वै दे॒वा मनु॑ष्यस्या॒जान॑न्ति त॒ऽएन॑मे॒तद्व्र॒तमु॑पय॒न्तं वि॒दुः प्रात॒र्नो य॑क्ष्यत

अध्याय १-ब्राह्मण १
(दर्शपूर्णमास इष्टि करने का) व्रत करनेवाला मनुष्य आहवनीय और गार्हपत्य
अग्नियों के बीच पूर्वाभिमुख खड़ा होकर जल का स्पर्श करता है। जल क्यों छूता है ? इसलिये
कि मनुष्य अपवित्र है, वह झूठ बोलता है। जल के स्पर्श से उसकी शुद्धि हो जाती है। जल
वस्तुतः पवित्र है। प्रयोजन यह है कि 'पवित्र होकर व्रत करूँ'। जल वस्तुतः पवित्र है। 'पवित्र
के द्वारा पवित्र होकर मैं व्रत करूँ' ऐसा सोचता है। इसीलिये जल का स्पर्श करता है ॥१॥
आहवनीय अग्नि की ओर देखकर वह व्रत करता है इस मंत्र से (यजु० १।५) -
"हे व्रत के पालक अग्नि, मैं व्रत करना चाहता हूँ। मैं व्रत का पालन कर सकूँ। मैं इस योग्य हो
जाऊँ।" अग्नि देवों का व्रतपति है। इसीलिये अग्नि को सम्बोधन करके कहता है कि "मैं व्रत
करना चाहता हूँ। मैं व्रत का पालन कर सकूँ। मैं इस योग्य हो जाऊँ"। शेष स्पष्ट है ॥२॥
इष्टि के समाप्त होने पर व्रत को समाप्त करता है (यजु० २।२८ से) - "हे व्रतपते
अग्नि ! मैंने व्रत किया। मैं उसको कर सका। मैं इस योग्य हो सका।" वस्तुतः जिसने यज्ञ को
समाप्त किया वह व्रत को पाल सका। वह व्रत-पालन के योग्य हो सका। प्रायः यज्ञ करनेवाले
इसी प्रकार व्रत करते हैं। इस प्रकार भी व्रत करे ॥३॥
दो ही बातें होती हैं, तीसरी नहीं- एक सत्य और दूसरी अनृत - देव सत्य हैं, मनुष्य
अनृत। यह जो मंत्र में कहा कि 'झूठ से सत्य को प्राप्त होऊँ' उसका तात्पर्य यह है कि 'मनुष्यों
में से एक था, देवों में से एक हो जाऊँ' (मनुष्यत्व छूटकर देवत्व आ जावे) ॥४॥
उसे सत्य ही बोलना चाहिये । देव सत्यरूपी व्रत का पालन करते हैं। इसी से उनको
यश मिलता है। जो इस रहस्य को समझकर सत्य बोलता है उसको यश मिलता है ॥५॥
यज्ञ की समाप्ति पर वह व्रत को समाप्त करता है इस मंत्र से (यजु० २।२८) 'मैं जो
था वही हो गया'। जब उसने व्रत किया था तो वह अमानुष अर्थात् देव हो गया था। ऐसा
कहना तो उसको उचित नहीं था कि 'मैं सत्य से अनृत को प्राप्त हो जाऊँ'। इसलिये यज्ञ करते
हुए देव की कोटि में होकर यज्ञ की समाप्ति पर जब वह मनुष्य की कोटि में आता है तो केवल
इतना कहता है, "मैं जो पहले था नहीं, अब हूँ" इस प्रकार व्रत को समाप्त करता है ॥६॥
अब प्रश्न है कि व्रत के मध्य में खावे या न खावे ? आषाढ सावयस मुनि का मत था कि
व्रत में खाना नहीं चाहिये । देव मनुष्य के मन को जानते हैं। वे जानते हैं कि जब उसने आज
व्रत किया है तो कल वह यज्ञ करेगा। वे सब देव उसके घर आते हैं। वे उसके घर में उपवास

४ | शतपथ ब्राह्मण

ऽइ॒ति ते॒ऽस्य॒ विश्वे॑ दे॒वा गृ॒हाना॒गच्छ॑न्ति ते॒ऽस्य गृ॒हेषू॑पवसन्ति स उपवस॒थः ॥७॥
तन्त्वे॒वानव॑कॢप्तम् । यो म॒नु॒ष्ये॑घ्न॒न्नत्सु पूर्वो॑ऽश्नीया॒दथ॒ किमु॒ यो दे॒वेष्व॑न॒श्नत्सु
पूर्वो॑ऽश्नीया॒त्तस्मा॑दु नैवाश्नीयात् ॥८॥ तदु॑ होवाच याज्ञव॒ल्क्यः । यदि॒ नाश्ना॑ति
पि॒तृ॒दे॒व॒त्यो भ॑वति॒ यद्यु॑ऽअ॒श्नाति॑ दे॒वानत्य॑श्नातीति॒ स यद॑शितमनशितं॒ तद॑-
श्नीया॒दिति॒ यस्य॒ वै ह॒विर्न गृह्ण॑न्ति॒ तद॑शितमनशितꣳ स यद॑श्नाति॒ तेना॑पितृदेव-
त्यो भ॑वति॒ यद्यु॒ तद॑श्नाति॒ यस्य॑ ह॒विर्न गृह्ण॑न्ति॒ तेनो॑ दे॒वान्नात्य॑श्नाति ॥९॥ स
वाऽआ॑र॒ण्यमे॒वाश्नी॑यात् । या वा॑र॒ण्या ओष॑धयो॒ यद्वा॑ वृ॒क्ष्यं तदु॑ ह स्माह्यापि ब॒र्कु-
र्वाष्णो॑ मा॒षान्मे॑ पचत॒ न वा॒ऽए॒तेषाꣳ॑ ह॒विर्गृह्ण॒न्तीति॒ तदु॒ तथा॒ न कु॑र्याद्ब्री॒हि-
य॒वयो॒र्वाऽए॒तद्रू॒पं यन्मी॑धान्यं॒ तद्ब्री॒हिय॒वावे॒वैते॑न भूयाꣳसौ क॒रोति॒ तस्मा॑दा-
र॒ण्यमे॒वाश्नी॑यात् ॥१०॥ स आ॑हवनीयागा॒रे वैताꣳ॑ रा॒त्रिꣳ श॑यीत । गा॒र्हप॑त्यागा॒रे
वा दे॒वान्वा॒ऽए॒ष उ॑पाव॒र्तते॒ यो व्र॒तमुपै॑ति॒ स याने॒वोपा॒वर्त॑ते॒ तेषा॑मे॒वैतन्म॑ध्ये
शेते॒ऽधः श॑यीताध॒स्तादि॑व॒ हि श्रेय॑स उपचा॒रः ॥११॥ स वै प्रा॒तर॒प ए॑व । प्र॒थ-
मे॑न॒ कर्म॑णाभि॒पद्य॑ते॒ऽपः प्र॑णयति य॒ज्ञो वा॒ऽआपो॑ य॒ज्ञमे॒वैतत्प्र॑थ॒मेन॒ कर्म॑णाभि-
पद्य॑ते॒ ताः प्र॑णयति य॒ज्ञमे॒वैतद्वि॑तनोति ॥१२॥ स प्र॑णयति । क॒स्त्वा यु॑नक्ति॒ स
त्वा यु॑नक्ति॒ कस्मै॑ त्वा यु॑नक्ति॒ तस्मै॑ त्वा युनक्तीत्ये॒ताभि॑रनिरु॒क्ताभि॑र्व्या॒हृति॑भिरनि-
रु॒क्तो वै प्र॒जाप॑तिः प्रजाप॑तिर्य॒ज्ञस्तत्प्र॒जाप॑तिमे॒वैतद्य॒ज्ञं यु॑नक्ति ॥१३॥ यद्वे॑वा॒पः
प्र॑णय॑ति । अ॒द्भिर्वा॒ऽइदꣳ॑ सर्व॑मा॒प्तं तत्प्र॑थ॒मेनै॒वैतत्कर्म॑णा॒ सर्व॑माप्नोति ॥१४॥ य-
द्वे॑वा॒स्त्यात्र॑ । होता॑ वाध्व॒र्युर्वा॒ ब्रह्मा॑ वा॒ग्नीध्रो॑ वा स्व॒यं वा यज॑मानो॒ नाभ्या॒पद्य॑ति
तद्देवा॒स्यैते॑न॒ सर्व॑मा॒प्तं भ॑वति ॥१५॥ यद्वे॑वा॒पः प्र॑णय॑ति । दे॒वान्ह॒ वै य॒ज्ञेन॒ यज॑-
मानां॒स्तानसु॑ररक्ष॒सानि॑ ररक्षु॒र्न यक्ष्य॑ध॒ इति॒ तद्यदुर॑क्षं॒स्तस्मा॒द्रक्षां॑सि ॥१६॥ ततो॑
दे॒वा ए॒तं वज्रं॑ ददृशुः । यदपो॑ व॒ज्रो वा॒ऽआपो॑ व॒ज्रो हि वा॒ऽआप॒स्तस्मा॒द्येने॑-
ता य॑न्ति॒ निघ्नं॑ कु॒र्वन्ति॒ यत्रो॑पति॒ष्ठन्ते॒ निर्द॑हन्ति॒ तत॑ ए॒तं वज्र॑मुद्यच्छं॒स्तस्या॑भये

कां० १, अ० १, ब्रा० १, कं० ७-१७ शतपथब्राह्मण / ५
करते हैं (उप+वास, किसी के घर में आकर बैठना)। इसीलिये इस दिन का नाम है 'उपवसथ'
(उपवास का दिन) ॥७॥
यह तो सर्वथा अनुचित है कि आगन्तुक मनुष्यों को खिलाने से पहले घरवाला स्वयं
खा ले। और यह तो और भी अनुचित है कि देवों को खिलाने से पहले खा लेवे। इसलिए नहीं
खाना चाहिए ॥८॥
इस विषय में याज्ञवल्क्य का कहना है कि—यदि नहीं खाता है तो पितृदेवत्य होता है;
और यदि खाता है तो देवों से पहले खाने का दोषी होता है। इसलिये इतना खावे कि न खाने में
उसकी गणना हो सके ॥६॥
जो हवि में नहीं डाला जाता उसका खाना न खाने के बराबर है। यदि उसको खा लेगा
तो उसे पितृदेवत्य का दोष न लगेगा। जिस चीज की हवि नहीं दी जाती उसके खा लेने से देवों
से पहले खा लेने का दोष भी नहीं लगता।
उसे वन में उपजी हुई चीज खानी चाहिये—ओषधि या वनस्पति। बर्कु वार्ष्ण ने कहा—
'मुझे माष (उड़द) पकाकर दे दो क्योंकि माष की हवि नहीं दी जाती।' परन्तु ऐसा नहीं करना
चाहिये। जौ या चावल के साथ उड़द खाये जाते हैं। उड़द जौ या चावल की वृद्धि करते हैं।
इसलिये वन की उपजी हुई चीज ही खावे ॥१०॥
उस रात को वह आहवनीय अग्नि के घर में सोवे या गार्हपत्य अग्नि के। जो व्रत करता
करता है वह देवों के निकट होता है। अतः वह वहीं सोता है जिनके निकट होना चाहता है।
नीचे (धरती पर) सोना चाहिये, क्योंकि जो सेवा करता है वह नीचे से ही करता है ॥११॥
दूसरे दिन प्रातःकाल अध्वर्यु पहला काम यह करता है कि वह जल के पास जाता है।
जल को लाता है। जल यज्ञ है। अतः इस प्रकार वह यज्ञ के पास जाता है। जल को आगे लाने
का अर्थ यह है कि वह यज्ञ को आगे लाता है ॥१२॥
वह यह मंत्र पढ़कर जल का प्रणयन करता है— (यजु० १।६) 'कौन'१ तुझको जोड़ता
है ? या प्रजापति तुझको जोड़ता है। वह तुझको जोड़ता है। किसके लिए तुझको जोड़ता है ?
या प्रजापति के लिए तुझको जोड़ता है। उसके लिए तुझको जोड़ता है। इन अनिरुक्त
(रहस्यमय) वचनों को बोलता है। प्रजापति रहस्यमय है। प्रजापति यज्ञ है। इस प्रकार
प्रजापति अर्थात् यज्ञ की योजना करता है ॥१३॥
जलों के प्रणयन का हेतु यह है कि जल से ही यह सब सृष्टि व्याप्त है। इस प्रकार इस
पहले कर्म से ही वह जगत् की प्राप्ति करता है ॥१४॥
इसका यह भी तात्पर्य है कि होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा, अग्नीध्र या स्वयं यजमान भी जिसकी
प्राप्ति नहीं कर सकता उसकी इस प्रकार प्राप्ति हो जाती है ॥१५॥
जल के प्रणयन का एक हेतु यह भी है। जब देव यज्ञ करने लगे तो असुरों, राक्षसों ने
उनको रोका—'यज्ञ मत करो।' उन्होंने रोका (ररक्षुः) इसलिये उनका नाम 'राक्षस' २ हुआ ॥१६॥
तब देवों ने इस वज्र को खोज निकाला, जो जल है। जल वज्र है। निस्सन्देह जल
वज्र है। जल जहाँ जाता है गड्ढा कर देता है। जिस चीज पर आक्रमण करता है उसका नाश
१. 'क' व्यंजनों में पहला अक्षर है। प्रजापति भी पहला व्यक्त करनेवाला है।
२. 'रक्ष' धातु का अर्थ है 'रोकना'। उन्होंने देवों को शुभ काम से रोका, इसलिये उनका
नाम राक्षस हुआ।