शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-२, ब्राह्मण-४
न्त्वित्येव॑ प्रयाजानाꣳ रू॒पं व॒सुव॑ने वसुधेयस्येत्य॑नुयाजा॒नाम् ॥ २७ ॥ तस्य॒ हिर॑ण्यं
दक्षि॑णा । आ॒ग्ने॒यो वाऽए॒ष य॒ज्ञो भव॑त्य॒ग्ने रेतो॒ हिर॑ण्यं॒ तस्मा॑द्धिर॒ण्यं दक्षि॑णान्व-
॒डन्वा स हि वृ॒द्धेनाग्ने॒योऽग्नि॒र्ह्यमिव॑ ह्यस्य व॒ह् भ॑वति दे॒वानाꣳ हव्यवा॒हनो
ऽग्नि॒रिति॒ वह्वति वाऽए॒ष म॑नु॒ष्येभ्य॒स्तस्मा॑दन्व॒ङ्गान्दक्षि॑णा ॥ २८ ॥ ब्राह्म॒णम् ॥ १
[२.३.] ॥ ॥
प्रजाप॑तिर्ह॒ वाऽइ॒दमग्र॑ऽएक॑ ए॒वास॑ । स ऐक्षत क॒थं नु प्र॒जाये॒येति॒ सोऽश्रा-
म्यत्स तपो॑ऽतप्यत॒ सो॒ऽग्निमे॒व मु॒खाज्जन॑यां चक्रे तद्यदे॒नं मु॒खादज॑नयत॒ तस्मा॑द-
न्ना॒दोऽग्निः स यो हॆव॑मेत॒मग्निम॒न्नादं॑ वे॒दान्ना॑दो हैव भ॑वति ॥ १ ॥ तद्वाऽए॒भ्येत॒
द्ये दे॒वाना॒मज॑नयत । तस्मा॑दग्नि॒रग्रि॒र्ह वै नामैतद्यद॒ग्निरिति॒ स जा॒तः पूर्व्व॑: प्रे-
याय॒ यो वै पूर्व्व ए॒त्यग्र॒ऽएतीति॒ वै तमा॑हुः सो॒ऽस्याग्निता ॥ २ ॥ स ऐक्षत
प्र॒जाप॑तिः । अ॒न्नादं॒ वाऽइ॒ममा॒त्मनो॒ऽजीज॑ने॒ यदि॒मं न वाऽइ॒ह म॒दन्य॒दन्न॑मस्ति॒ यं
वाऽअ॒यं नाद्यादिति॑ काल्वालीकृ॒ता हैव त॒र्हि पृ॑थि॒व्या॑स॒ नौष॑धय आ॒सुर्न वन॒-
स्प॒तय॒स्तदे॑वास्य॒ मन॒स्या॑स ॥ ३ ॥ अथैनम॒ग्निव्या॑त्तेनोप॒पर्य्या॑ववर्त्त । तस्य॒ भीत॒स्य
स्वो म॑हि॒माप॑चक्राम वाग्वाऽअ॒स्य स्वो म॑हि॒मा वाग॑स्यापचक्राम॒ स आ॒त्मन्ने॒वा-
ऽहुतीमीषे॒ स उ॑द॒मृष्ट॒ तद्यदु॑द॒मृष्ट॒ तस्मा॑दि॒दं चा॑लोम॒कमि॒दं च॒ तत्र॑ विवेद घृ॒ता-
हुतिं वैव॒ पय॑आहुतिं॒ वोभयꣳ॑ ह॒ वेव॒ तत्पय॑ ए॒व ॥ ४ ॥ सा हैनं॑ नाभि॒राध्यां॑
चकार । केशमिश्रेव ह्वास॒ तां व्यौक्ष॒द्दोष॒ धयेति॒ तत॒ ओष॑धयः॒ सम्भ॑वं॒स्तस्मा॑दो-
षधयो॒ नाम॒ स द्वि॒तीय॒मुद॑मृष्ट॒ तत्राप॑रामा॒हुतिं॑ विवेद घृ॒ताहु॑तिं चै॒व पय॑आहुतिं॒
वोभयꣳ॑ ह॒ वेव तत्पय॑ ए॒व ॥ ५ ॥ सा हैनम॒भिराध्वां॑ चकार । स व्य॑चिकित्स-
ज्जुहुवानी३ मा हौ॒षामी॒३ति तꣳ स्वो म॑हि॒माभ्यु॑वाद जु॒हुधीति॒ स प्र॒जाप॑तिर्विदां॑
चकार॒ स्वो वै मा म॑हि॒माहेति॒ स स्वाहेत्ये॒वाजु॑हो॒त्तस्मा॑दु॒ स्वाहे॒त्येव हू॒यते॒ तत॒
एष उद॑ियाय॒ य ए॒ष तप॑ति॒ ततोऽयं प्रब॑भूव॒ योऽयं प॑वते॒ तत॒ ए॒वाग्निः परा॑ङ्
कां० २, अ० २, ब्रा० ४, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / २२५
कहते हैं 'वसुवने वसुधेयस्य' ॥२७॥
इसकी दक्षिणा है स्वर्ण। यह यज्ञ अग्नि का है और स्वर्ण अग्नि का रेत अर्थात् वीर्य है।
इसलिए स्वर्ण दक्षिणा है, या बैल, क्योंकि बैल का कन्धा अग्नि का होता है। इसका कन्धा
अग्नि से दग्ध-सा होता है। दूसरे, अग्नि देवों का ढोनेवाला है, और बैल मनुष्यों का बोझ ढोने-
वाला है। इसलिए बैल दक्षिणा (में दिया जाता है) ॥२८॥
अग्निहोत्रम्
अध्याय २—ब्राह्मण ४
यहाँ पहले एक प्रजापति ही था। उसने सोचा, मैं कैसे उत्पन्न (प्रकट) होऊँ? उसने
श्रम और तप किया। उसने मुख से अग्नि को उत्पन्न किया। चूंकि उसको मुख से उत्पन्न किया
इसलिए अग्नि अन्न का खानेवाला है। जो इस प्रकार अग्नि का अन्न को खानेवाला जानता
है वह अन्न का खानेवाला होता है ॥१॥
इस अग्नि को देवों से पहले उत्पन्न किया, इसलिए अग्नि का अग्रि नाम है। अग्नि
और अग्रि एक बात है। वह उत्पन्न होकर पूर्व की ओर अर्थात् आगे गया। जो पहले (पूर्व)
जाता है उसको कहते हैं आगे (अग्रे) गया। यही अग्नि की अग्रिता है ॥२॥
प्रजापति ने सोचा कि मैंने इस अग्नि को अपना अन्न खानेवाला बनाया है, और मुझे
छोड़कर और कोई अन्न तो है ही नहीं; और मुझे वह खायेगा नहीं। उस समय पृथिवी गंजी थी।
न ओषधियाँ थीं, न वनस्पतियाँ। उसको इसी बात का सोच था ॥३॥
अब (अग्नि) उसकी ओर मुंह फाड़कर दौड़ा। वह डर गया और उसकी महिमा चली
गई। वाणी ही उसकी महिमा है। यह वाणी ही चली गई। उसने अपने में ही आहुति की इच्छा
की, और (हाथ) मले। चूंकि हाथ मले, इसीलिए ये (हथेलियाँ) लोभरहित होती हैं। अब
उसने घी की आहुति या दूध की आहुति ली। ये दोनों दूध ही तो हैं ॥४॥
वह उसे पसन्द न आई क्योंकि वह केशमिश्रित (बालों से मिली हुई) थी। उसने उसे
(आग में) डाल दिया यह कहकर—'ओषं धय' (जलते हुए खा)। इससे 'ओषधि' उत्पन्न हुई।
इसीलिए उनका नाम 'ओषधि' है। अब फिर उसने हथेलियाँ मलीं। तब दूसरी आहुति मिली।
घी की आहुति या दूध की आहुति, ये दोनों दूध ही तो हैं ॥५॥
वह उसको पसन्द आ गई। उसे संकोच हुआ, 'इसे (आग में) छोड़ूँ या न छोड़ूँ।' उसकी
महिमा ने कहा, 'आहुति दे।' प्रजापति ने जाना कि यह तो मेरी ही (स्व) महिमा है जो कह रही
है (आह)। इसलिए उसने 'स्वाहा' कहकर आहुति दे दी। इसलिए 'स्वाहा' कहकर आहुति दी
जाती है। अब वह निकला जो तपता है अर्थात् सूर्य, और वह आया जो बहता है अर्थात् वायु।
२२६ शतपथ ब्राह्मण
पर्या॑ववर्त ॥ ६॥ स हु॒त्वा प्र॒जाप॑तिः । प्र चा॒जायत॒ाऽऽत्म॒नश्चा॒ग्नेर्मृ॒त्योरा॒त्मान॑मत्रायत
स यो है॒वं वि॒द्वान॒ग्निहो॒त्रं जु॒होत्ये॒ताꣳ हे॑व प्र॒जातिं॑ प्र॒जाय॑ते॒ यां प्र॒जाप॑तिः प्रा-
जा॑य॒तैवं ह्ये॒वाऽत्मन॑स्तो॒ऽग्नेर्मृ॒त्योरा॒त्मानं॑ त्रायते ॥७॥ स यत्र॒ म्रिय॑ते । यत्रै॑नम॒ग्ना-
व॒भ्याद॑धति॒ तदे॒षो॑ऽग्ने॒रधि॒जाय॑ते॒ऽथास्य शरी॑रमे॒वा॒ग्निर्दह॑ति॒ तद्यथा॑ पि॒तुर्वा मा॒तुर्वा
जा॒य॑तैवमे॒षो॑ऽग्ने॒रधि॒जाय॑ते॒ शश्व॑द्ध वा॒ऽए॒ष न सम्भ॑वति॒ यो॑ऽग्निहो॒त्रं न जु॒होति॑ ।
तस्मा॒द्वाऽग्निहो॒त्रꣳ हो॑त॒व्यम् ॥८॥ तद्वाऽए॒तत् । ए॒व वि॑चिकित्सि॒त्ये॒ जन्म॒ य-
त्प्र॒जाप॑तिर्व्यचि॑कित्स॒त्स वि॑चिकित्सञ्छ्रेय॒स्य॑ध्रियत॒ यः प्र चा॒जायत॒ाऽऽत्म॒नश्चा॒ग्नेर्मृ-
त्योरा॒त्मान॑मत्रायत स यो॒ है॒वमे॒तद्वि॑चिकित्सि॒त्ये॒ जन्म॑ वे॒द ग्रह॒ किं च विचि॑कि-
त्सति॒ श्रेय॑सि॒ हैव॑ ध्रियते ॥ ९॥ स हु॒त्वा न्य॑मृष्ट । ततो विकङ्क॒तः सम॑भव॒त्तस्मा-
दे॒ष य॒ज्ञियो॑ य॒ज्ञपा॑त्रीयो वृ॒क्षस्तत॒ ए॒ते दे॒वानां॑ वी॒रा अ॑जायन्ता॒ग्निर्वा॒ऽयं पव॑ते
सूर्य्यः॑ स यो॒ है॒वैतान्वे॒वानां॑ वी॒रान्वे॒दाहा॑स्य वी॒रो जा॑यते ॥ १०॥ तऽउ॒ हैत॒
ऽऊचुः । व॒यं वै प्र॒जाप॑तिं पि॒तर॒मनु॑ स्मो ह॒न्त व॒यं तत्सृ॑जामहै॒ यद॒स्मानन्वस॒दि-
ति ते परि॑श्रित्य गाय॒त्रेणा॒पहिं॑कारिण तुष्टुविरे तद्य॒त्पर्य॑श्रयꣳस्तत्समु॒द्रोऽभ॑वदियमे॒व
पृ॑थि॒व्यास्ता॒वः ॥११॥ ते स्तु॒त्वा प्राञ्च॒ उच्च॑क्रमुः । पुन॑रे॒म इति॑ दे॒वा ए॒डाꣳ सम्भू-
ताꣳ सा हैना॒नुदी॑क्ष्य हिं॑चकार ते दे॒वा वि॒दां च॑क्रुरेष साम्नो हिंकार इत्युपहिं-
कारꣳ हैव पुरा ततः॒ सामा॑स॒ स ए॒ष गवि साम्नो हिंकार॒स्तस्मा॑दे॒षोप॑जी॒वनीयो-
पजी॒वनी॑यो ह॒ वै भ॑वति॒ य ए॒वमे॒तं गवि साम्नो हिंकारं वेद॑ ॥ १२॥ ते हो॑चुः ।
भ॒द्रं वा॒ऽइ॒दमजी॑जनामहि॒ ये गा॒मजी॑जनामहि य॒ज्ञो ह्ये॒वेयं नो॑ कॢप्तिर्गोर्य्यज्ञास्ता-
यते॒ऽन्नꣳ ह्ये॒वेयं यदि॒ किं चात्नं॑ गौरे॒व तदिति॑ ॥ १३॥ तद्वाऽए॒तद्दे॒वता॑सां॒ नाम॑ ।
ए॒तद्य॒ज्ञस्य॒ तस्मा॑देतत्परिह॒रेत्साधु पु॒ण्यमिति॑ ब्रू॒याद्यो ह वाऽअ॒स्यैता॑ भव॒त्युपना-
मुक॑ एनं य॒ज्ञो भ॑वति॒ य ए॒वं वि॒द्वानेतत्परि॑हरति साधु पु॒ण्यमिति॑ ॥ १४॥ ता॒मु
हा॒ग्निर॑भिद॒ध्यौ । मिथु॒न्यन॑या स्या॒मिति॑ ताꣳ सम्ब॑भूव॒ तस्याꣳ रेतः॒ प्रासि॑ञ्चत्तत्प-
का० २, अ० २, ब्रा० ४, कं० ६-१५ शतपथब्राह्मण / २२७
अब अग्नि चला गया ॥६॥
प्रजापति ने आहुतियां देकर अपने को फिर उत्पन्न कर लिया, और अग्नि-रूपी मृत्यु से
अपने को बचा लिया जो उसको खाना चाहती थी। इसलिए जो आदमी समझकर अग्निहोत्र
करता है वह प्रजा-रूप में अपने को उत्पन्न करता है जैसे प्रजापति ने किया, और खानेवाली अग्नि
से अपने को बचा लेता है ॥७॥
और जब वह मरता है और जब उसको अग्नि में रखते हैं तो वह अग्नि से फिर उठता
है। अग्नि उसके शरीर को ही जलाता है। जैसे वह मा या बाप से उत्पन्न होता है उसी प्रकार
अग्नि से उत्पन्न होता है। और जो अग्निहोत्र नहीं करता वह उत्पन्न होता ही नहीं। इसलिए
अग्निहोत्र अवश्य करना चाहिए ॥८॥
संकोच के द्वारा जन्म के विषय में यह बात है कि जब प्रजापति ने संकोच किया तो न
संकोच करते हुए भी श्रेय पर आरूढ़ रहा, यहाँ तक कि उसने अपने को उत्पन्न किया और अपने
को मृत्युरूपी अग्नि से बचाया जबकि वह उसे खाना चाहता था; इसी प्रकार वह भी जो
संकोच से जन्म को जानता है, यदि कभी संकोच करता है तो भी श्रेय पर आरूढ़ रहता है ॥९॥
आहुति देकर उसने (हथेलियां) मलीं। तब विकङ्कत वृक्ष उत्पन्न हुआ। इसीलिए यह
यज्ञ-सम्बन्धी वृक्ष है और यज्ञ-सम्बन्धी पात्र इससे बनाये जाते हैं। अब देवों में जो वीर हैं वे
उत्पन्न हुए, अर्थात् अग्नि, वायु और सूर्य। सचमुच जो इन वीर देवों को जानता है उसके वीर
उत्पन्न होता है ॥१०॥
उन्होंने कहा, 'हम पिता प्रजापति के पीछे हुए हैं। अब हम प्रजा उत्पन्न करें जो हमारे
पीछे हो।' उन्होंने एक घेरा घेरकर गायत्री से हिङ्कार छोड़कर प्रार्थना की । जिससे उन्होंने
घेरा था वह समुद्र था; और पृथिवी आस्ताव (अर्थात् प्रार्थना की) जगह हो गई ॥११॥
वे स्तुति करके पूर्व को गये, यह कहकर कि 'हम लौटे जाते हैं।' देव एक गाय के पास
आये जो उत्पन्न हो गई थी। उसने उनकी ओर देखकर 'हिंकार' किया। देवों ने जाना कि यह
सामवेदीय हिंकार है। पहले वह हिंकार-शून्य था। अब ठीक शाम हो गया। यह सामवेदीय
हिंकार गाय के मध्य में थी। इसलिए यह (गाय) जीविका का साधन हो गई। जो कोई गाय में
इस सामवेदीय हिंकार के भेद को जानता है, वह जीविका का साधन हो जाता है ॥१२॥
उन्होंने कहा, 'यह जो हमने उत्पन्न किया वह भद्र है, यह जो हमने गाय उत्पन्न की;
इसलिए कि यह तो यज्ञ ही है, क्योंकि गाय के बिना यज्ञ हो ही नहीं सकता। यह अन्न भी है,
क्योंकि जो भी कुछ अन्न है वह गाय ही है ॥१३॥
यह ('गो' नाम) उन (गौओं) का भी है और यज्ञ का भी। इसलिए उसको दुहराना
चाहिए यह कहकर 'साधु है, पुण्य है।' जो कोई इस रहस्य को समझकर 'साधु, पुण्य' दुहराता
है, (गायँ) उसके लिए बहुतायत देती हैं और यज्ञ उसकी ओर झुकता है ॥१४॥
अब अग्नि ने उससे प्रेम किया कि मैं इसके साथ मैथुन करूँ। उसने उसके साथ मैथुन