शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 411, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंका० ३, अ० ३-४, ब्रा० ४-१, क० २३-३१ व १ शतपथब्राह्मण / ३६३
पशु दो रूप का होता है, क्योंकि दो देवताओं का होता है। कुछ का कथन है कि इन
दोनों का मेल करने के लिए कृष्ण सारंग होना चाहिए, क्योंकि यही उन दोनों देवताओं के
समानतम है। यदि कृष्ण-सा रंग न मिले तो लोहित सारंग (लाल धब्बेवाला) होना
चाहिए ॥२३॥
अब यह मन्त्र पढ़वाता है— “नमो मित्रस्य वरुणस्य चक्षसे महो देवाय तदृतं॒ सपर्यत।
दूरेदृशे देवजाताय केतवे दिवस्पुत्राय सूर्याय शं॒सत” (यजु० ४।३५)—“मित्र और वरुण की
आँख के लिए नमस्कार। बड़े देव के लिए इस पूजा को करो। इस दूरदर्शी देवोत्पन्न, केतु, द्यौ
के पुत्र, सूर्य के लिए प्रशंसा करो।” इस प्रकार पशु की अर्चना करता है और उसकी मित्रता का
चिह्न बनाता है ॥२४॥
अब अध्वर्यु कपड़े को कटाता है। “वरुणस्योत्तम्भनमसि” (यजु० ४।३६)—“वरुण का
खम्भा है तू।” इससे गाड़ी में खम्भा लगाता है। “वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थः” (यजु० ४।३६)—
“तुम दोनों वरुण की खूंटी हो।” इससे खूंटियाँ निकालता है। ‘वरुण की तुम दोनों खूंटियां हो’
इसलिए कहता है कि सोम ही अब वरुण है ॥२५॥
अब चार आदमी सोम राजा के तख्त को उठाते हैं। मनुष्य राजा के तख्त को दो
आदमी उठाते हैं। सोम राजा के तख्त को चार उठाते हैं क्योंकि यह सबके ऊपर
है ॥२६॥
यह तख्त उदुम्बर की लकड़ी का होता है, उदुम्बर रस और अन्न है। रस और अन्न
के लिए। इसलिए यह उदुम्बर की लकड़ी का होता है ॥२७॥
यह नाभि के बराबर ऊँचा होता है। क्योंकि नाभि तक ही अन्न पहुंचता है। सोम अन्न
है, इसलिए यह नाभि के बराबर ऊँचा होता है। यहीं वीर्य रहता है, सोम वीर्य है। इसलिए
नाभि के बराबर होता है ॥२८॥
अब वह तख्त को छूता है यह पढ़कर-‘वरुणस्य ऽ ऋतसदन्यसि’ (यजु० ४।३६)-‘तू
वरुण की उचित बैठक है।” अब वह उस पर काला मृग-चर्म बिछाता है यह पढ़कर—“वरुणस्य
ऋतसदनमासीद”(४।३६)—“वरुण के उचित स्थान पर बैठ।” सोम अब वरुण जैसा हो गया।
इसलिए कहा ‘वरुण के उचित स्थान पर बैठ’ ॥२६॥
अब सोम को शाला में ले जाता है। और ले जाते हुए यजमान से यह कहलवाता है—
“या ते धामानि हविषा यजन्ति ता ते विश्वा परिभूरस्तु यज्ञम्। गयस्फानः प्रतरणः सुवीरोऽवीरहा
प्रचरा सोम दुर्यान्” (यजु० ४।३७)—“हवि से ये लोग तेरे जिन धामों की अर्चना करें वे सब
धाम यज्ञ को चारों ओर से घेर लें। हे सोम, हमारे घरों में आ जा !” गृहस्थ की सम्पत्ति को देने-
वाला, आपत्तियों का भगानेवाला, वीर और वीरों का हनन न करनेवाला, (ये चार विशेषण
सोम के हैं) ‘दुर्यान्’ का अर्थ है घर। इसके कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे घर शुभ और
शान्त तथा पापरहित होवें ॥३०॥
कुछ लोग जल के पात्र से जल उंड़ेलते हैं और कहते हैं कि जब राजा आता है तो उसके
लिए भी जल-सिंचन किया जाता है; परन्तु ऐसा न करे। यह तो मानुषी क्रिया है, यज्ञ में मानुषी
क्रिया करना ठीक नहीं। इसलिये जल-सिंचन न करे, क्योंकि ऐसा करना अनुचित है ॥३१॥
अध्याय ४-ब्राह्मण १
आतिथ्य (मेहमान का सत्कार) यज्ञ का सिर है। प्रायणीय और उदयनीय बाहू हैं।