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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-२, ब्राह्मण-१

न्नादं॒ : svarita over जु, anudatta under दं.

  • वाऽए॒तमा- : anudatta under ए.

Line L19:
त्म॒नो ज॑नयते॒ यद॒ग्निं तस्मा॑ऽए॒तद॒न्नाद्य॒मपि॑दधाति॒ यथा कुमा॒राय॑ वा जा॒ताय॑ व-

  • त्म॒नो : anudatta under त्म.
  • ज॑नयते॒ : svarita over ज, anudatta under ते.
  • यद॒ग्निं : anudatta under द.
  • तस्मा॑ऽए॒तद॒न्नाद्य॒मपि॑दधाति॒ : svarita over मा, anudatta under ए, anudatta under द, anudatta under न्ना, anudatta under द्य, svarita over पि, anudatta under ति.
  • यथा कुमा॒राय॑ : anudatta under मा, svarita over रा.
  • वा जा॒ताय॑ : anudatta under ता, svarita over या.
  • व-

Line L20:
त्सा॑य वा स्त॒नमपि॑दध्यादे॒वमस्मा॑ऽए॒तद॒न्नाद्य॒मपि॑दधाति ॥ १॥ स ए॒तेनान्ने॑न शा-

  • त्सा॑य : svarita over त्सा.
  • स्त॒नमपि॑दध्यादे॒

का० २, अ० १-२, ब्रा० ४-१, कं० २७-३० व १-३ शतपथब्राह्मण / २०६
इसमें कोई व्यथा अर्थात् आपत्ति नहीं होती। आसुरि, पाञ्चि और माधुकि इस अग्नि को कुछ
पश्चिम की ओर हटाकर रखते थे। उनका कथन था कि (अग्नि के छूने से) सब चीजें कुछ हट
जाती हैं, इसलिए पहले ही उठाकर ‘भूर्भुवः स्वः’ से आधान करना चाहिए। परन्तु जैसा चाहे
करे ॥२७॥
अब (यजमान) (अग्नि के) पूर्व की ओर मुड़ता है और जलती हुई समिधाओं का
पूर्वार्ध पकड़कर कहता है—‘‘द्यौरिव भूम्ना पृथिवीव वरिम्णा’’ (यजु० ३।५)—‘‘द्यौ के समान
बहुत और पृथिवी के समान विस्तृत।‘‘ ‘द्यौरिव भूम्ना’ कहने से तात्पर्य यह है कि जैसे द्यौलोक
में बहुत-से नक्षत्र हैं, इसी प्रकार मैं भी बहुत हो जाऊँ। और ‘पृथिवीव वरिम्णा’ कहने से
तात्पर्य यह है कि जैसे पृथिवी बड़ी है वैसे ही मैं भी हो जाऊँ। अब कहता है—‘‘तस्यास्ते पृथिवि
देवयजनि पृष्ठे’’ (यजु० ३।५)—‘हे देव-यज्ञ के योग्य पृथिवि, उस तेरी पीठ पर।‘‘ क्योंकि इसी
की पीठ पर आधान करता है। अब कहता है—‘‘अग्निमन्नादमन्नाद्यायादधे’’ (यजु० ३।५)—
‘‘अन्न के खानेवाले अग्नि को अन्न की प्राप्ति के लिए रखता हूँ।’’ अग्नि अन्न का खानेवाला
है। ऐसा कहने से तात्पर्य यह है कि मैं अन्न को खानेवाला होऊँ। यह आशीर्वाद है। चाहे तो
जपे और चाहे तो छोड़ दे ॥२८॥
अब सर्प-राज्ञी वाली (तीन) ऋचाओं को पढ़कर खड़ा रखता है—‘‘आयं गौः पृश्निर-
क्रमीदसद्न्मातरं पुरः। पितरं च प्रयन्त्स्वः ॥१॥ अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणदपानती। व्यख्यन्
महिषो दिवम् ॥२॥ त्रिंशद्धाम विराजति वाक् पतङ्गाय धीयते। प्रति वस्तोरह द्युभिः ॥३॥
(यजु० ३।६,७,८ या ऋग्वेद १०।१८९।१,२,३) ।
[टिप्पणी—इन मन्त्रों की ऋषिका सर्पराज्ञी है)—‘‘यह पृश्नि (चितकबरी) गौ आई
और मा के आगे खड़ी हो गई। और पिता के आगे स्वर्लोक को हुई’’ ॥१॥ ‘‘इसके प्राण से साँस
लेती हुई चमकनेवाले अन्तरिक्ष के बीच में चलती है। बड़े (पदार्थ) द्वारा द्यौलोक की व्याख्या
करती हुई’’ ॥२॥ ‘‘तीन सौ धामों के ऊपर विराजती है। वाणी पतङ्ग (सूर्य) के लिए धारण
की जाती है। प्रातःकाल प्रकाशों के द्वारा’’] ॥३॥
वह इन सर्पराज्ञीवाली ऋचाओं को खड़े-खड़े इसलिए पढ़ता है कि जिस वस्तु की प्राप्ति
उसको यज्ञ की तैयारी से, या नक्षत्रों से, या ऋतुओं से, या अग्न्याधान से न हो सकी, वह सब
इससे हो जाती है ॥२९॥
परन्तु कुछ लोगों का कहना है कि सर्पराज्ञीवाली ऋचाओं को खड़े-खड़े पढ़ने की
आवश्यकता नहीं, क्योंकि यह पृथिवी ही सर्पराज्ञी है। जब पृथिवी में अग्न्याधान किया जाता है तो
सब कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। इसलिए सर्पराज्ञीवाली ऋचाओं को खड़े-खड़े पढ़ने की
आवश्यकता नहीं ॥३०॥
अध्याय २—ब्राह्मण १
आहवनीय अग्नि को निकालकर पूर्ण आहुति देता है। पूर्ण आहुति इसलिए देता है कि
वह अपने लिए (अग्नि को) अन्न का खानेवाला बनाता है। इसलिए वह उसको अन्न देता है।
जैसे उत्पन्न हुए कुमार या बछड़े के लिए स्तन पिलाते हैं, उसी प्रकार वह इसको अन्न देता है ॥१॥
इस अन्न से शान्त होकर (अग्नि) आनेवाली हवियों के पकाने की प्रतीक्षा करता है।
यदि उस (अग्नि) में यह आहुति न दी जाय तो वह अध्वर्यु को या यजमान को जला दे क्योंकि
यही उसके पास होकर चलते हैं। इसीलिए वह उसको यह आहुति देता है ॥२॥
इस आहुति को (चमसे में) पूरा भरकर देता है। पूर्ण का अर्थ है ‘सब’। इस प्रकार

स्वाहा॒कारे॑ण जु॒होत्य॑नि॒रु॒क्तो वै स्वाहा॑कारः॒ सर्वं॑ वाऽअ॒निरु॑क्तꣳ सर्वै॑णे॒वैन॑मे-
त॒च्छम॑यति ॥३॥ यां वै प्र॒जाप॑तिः । प्र॒थ॒मामाहु॑तिमजुहो॒त्स्वाहेति॑ वै ता॒म॑जुहो-
त्सो स्वि॑दे॒षा नि॒दाने॑न॒ तस्मा॒त्स्वाहेति॑ जुहोति॒ तस्यां॒ वरं॑ ददाति॒ सर्वं॒ वै वरः॒
सर्वै॑णे॒वैन॑मे॒तच्छम॑यति ॥४॥ तदा॑हुः । ए॒तामे॒वाहु॑तिं हु॒त्वाथोत्त॑राणि ह॒वीꣳ॑षि
नाद्रि॑येतै॒तयै॑व॒ तं काम॑माप्नोति॒ यम॑भि॒काम॒मुत्त॑राणि ह॒वीꣳ॑षि॒ निर्व॑पतीति ॥५॥
स वा॒ऽअ॒ग्नये॑ पवमानाय॒ निर्व॑पति । प्रा॒णो वै प॑वमानः प्रा॒णमे॒वास्मि॑न्ने॒तद्द॑धाति
तद्धे॑त॒यैवास्मि॑ꣳस्तद्दधा॒त्यन्नꣳ॑ हि प्रा॒णोऽन्न॑मे॒षाऽऽहु॑तिः ॥६॥ अथा॒ग्नये॑ पाव॒काय॒ नि-
र्व॑पति । अन्नं॒ वै पा॑वक॒मन्न॑मे॒वास्मि॒न्नेत॒द्दधा॑ति त॒द्धेतयै॒वास्मिं॑स्तद्द॑धात्ये॒षा ह्ये॒व
प्रत्य॒क्षमन्न॑मा॒हुतिः॑ ॥७॥ अथा॒ग्नये॑ शुच॑ये॒ निर्व॑पति । वी॒र्यं॑ वै शुचि॒ यदा॒ऽअस्यै॑त-
दुज्ज्व॑लत्ये॒तद॑स्य वी॒र्यं॑ शुचि॒ वी॒र्य॑मे॒वास्मि॑न्ने॒तद्द॑धाति त॒द्धेतयै॒वास्मिं॑स्तद्दधाति य-
दा ह्ये॑वा॒स्मिन्ने॒तामाहु॑तिं जु॒होत्यथा॑स्यै॒तद्वी॒र्यं॑ शुच्युज्ज्व॑लति ॥८॥ तस्मा॑दाहुः॒ ।
ए॒तामे॒वाहु॑तिꣳ हु॒त्वाथोत्त॑राणि ह॒वीꣳ॑षि नाद्रि॑येतैतयै॒व तं काम॑माप्नोति॒ यम॑भि-
का॒ममुत्त॑राणि ह॒वीꣳ॑षि॒ निर्व॑पतीति॒ तन्न॑ निर्व॑पेदे॒वोत्त॑राणि ह॒वीꣳ॑षि परो॒ऽक्ष-
मिव वा॒ऽए॒तद्यद॒दस्तदि॑द॒मिती॑व ॥९॥ स यद॒ग्नये॑ पवमानाय॒ निर्व॑पति । प्रा॒णा
वै प॑वमानो॒ यदा॒ वै जाय॑ते॒ऽथ प्रा॒णोऽथ॒ याव॒न्न जाय॑ते मा॒तुरे॒वैव ताव॑त्प्रा॒णम॑नु
प्रा॒णिति॒ यथा॑ वा तज्जा॒तऽए॒वास्मि॑न्ने॒तत्प्रा॒णं द॑धाति ॥१०॥ अथ॒ यद॒ग्नये॑ पाव-
काय॒ निर्व॑पति । अन्नं॒ वै पा॑वकं तज्जा॒तऽए॒वास्मि॑न्ने॒तदन्नं॑ दधाति ॥११॥ अथ॒ य-
द॒ग्नये॑ शुच॑ये॒ निर्व॑पति । वी॒र्यं॑ वै शुचि॒ यदा॒ वाऽअन्ने॑न॒ वर्ध॑ते॒ऽथ वी॒र्यं॒ तदन्ने॑नै-
वैन॑मे॒तद्व॑र्धयि॒त्वाथास्मि॑न्ने॒तद्वी॒र्यं॑ शुचि॑ दधाति॒ तस्मा॑द॒ग्नये॑ शुच॑ये ॥१२॥ तद्धै॒तदे॑व
सद्वि॑प॒र्यस्त॑मिव । अ॒ग्निर्ह॒ यत्र॑ दे॒वेभ्यो॑ मनु॒ष्यान॒भ्युपा॑ववर्त॒ तद्धै॒क्षां च॑क्रे॒ मैव सर्वै॑-
णे॒वात्म॑ना मनु॒ष्यान॒भ्युपा॑वृ॒तमिति॑ ॥१३॥ स ए॒तास्ति॒स्रस्त॒नूरे॒षु लो॒केषु॒ विन्य॑-
धत्त । यद॑स्य पव॒मानꣳ॑ रू॒पमा॑सी॒त्तद॑स्यां पृथि॒व्यां न्य॑धत्ताथ॒ यत्पा॑वक

कां० २, अ० २, ब्रा० १, कं० ३-१४ शतपथब्राह्मण / २११
वह 'सब' से उसको शान्त करता है। 'स्वाहा' कहके वह यह आहुति देता है। 'स्वाहा' अनिरुक्त
अर्थात् अपरिमित है। 'सब' भी अपरिमित है। इस प्रकार 'सब' से इसको शान्त करता है ॥३॥
प्रजापति ने जो पहली आहुति दी वह 'स्वाहा' कहकर दी। निदान से यह आहुति भी
वैसी ही है, इसलिए स्वाहा कहके देता है। इसमें वह वर देता है। 'वर' का अर्थ है 'सब', इसलिए
'सब' के द्वारा उसको शान्त करता है ॥४॥
इस पर कुछ लोग कहते हैं कि इस आहुति को देकर अब पीछे से कोई आहुतियां न दी
जावें, क्योंकि जो इच्छा उन आहुतियों के देने से पूरी होती, वह इसी आहुति के देने से पूरी हो
जाती है ॥५॥
अब वह 'अग्नि पवमान' के लिए आहुति निकालता है। प्राण ही पवमान है। इसलिए
वह इस प्रकार उस (यजमान) में प्राण धारण कराता है, और वह इस (आहुति) के द्वारा
उसमें धारण कराता है। अन्न ही प्राण है और अन्न ही यह आहुति है ॥६॥
अब वह 'अग्नि पावक' के लिए आहुति देता है। अन्न ही पावक है। उस (यजमान) में
वह इस प्रकार अन्न को धारण कराता है। वह इसी (आहुति) के द्वारा उसमें धारण कराता
है। और वह इस आहुति के द्वारा ऐसा करता है क्योंकि प्रत्यक्ष रूप से यह आहुति अन्न है ॥७॥
अब 'शुचि अग्नि' के लिए वह आहुति देता है। शुचि वीर्य है। यह जो उसकी ज्वाला है
वही वीर्य है। इस प्रकार वह यजमान में वीर्य (पराक्रम) धारण कराता है। वह इस आहुति के
द्वारा उसमें वीर्य धारण कराता है, क्योंकि जब वह आहुति देता है तो वीर्य (अर्थात् शुचि)
प्रज्वलित होता है ॥८॥
इसलिए कहते हैं कि इस आहुति को देकर पीछे की आहुतियां न दी जायें, क्योंकि जो
काम पीछे की आहुतियां देने से चलता है वह इसी आहुति के देने से चल जाता है। परन्तु उसको
पिछली आहुतियां भी देनी चाहिएँ क्योंकि (पूर्ण आहुति में) जो परोक्ष-सा था वह इससे प्रकट
हो जाता है ॥९॥
अग्नि पवमान के लिए आहुति इसलिए देता है कि प्राण ही पवमान है। जब बच्चा
उत्पन्न होता है तब प्राण (का संचार) होता है, और जब तक उत्पन्न नहीं होता तब तक मा के
प्राण से सांस लेता है और जब वह उत्पन्न होता है तो उसमें प्राण आता है ॥१०॥
अग्नि पावक के लिए आहुति इसलिए देता है कि अन्न ही पावक है। इस प्रकार जब
बच्चा उत्पन्न होता है तब उसमें अन्न धारण कराया जाता है ॥११॥
अग्नि-शुचि के लिए आहुति इसलिए देता है कि शुचि वीर्य है। जब अन्न से बढ़ता है तो
वीर्य होता है। अन्न से ही इसकी वृद्धि कराके उसमें शुचि अर्थात् वीर्य को धारण कराता है।
इसलिए अग्नि-शुचि के लिए आहुति दी जाती है ॥१२॥
दूसरी प्रथा (केवल पूर्ण आहुति देने की) ठीक नहीं। जब अग्नि देवों से चलकर मनुष्यों
तक आया तो उसने चाहा कि मैं अपनी सम्पूर्ण आत्मा से मनुष्यों के पास न आऊँ ॥१३॥
तब उसने इन लोकों में अपने तीन शरीर रखे। उसका जो पवमान रूप था वह पृथिवी
में रक्खा. जो पावक रूप था वह अन्तरिक्ष में और जो 'शुचि' रूप था वह द्यौलोक में। जो ऋषि

२१२ शतपथ ब्राह्मण

ऽथ यच्छुचि तद्दि॒वि तद्धाऽऋषयः प्रति॑बुबुधिरे यऽउ त॒र्च्यृषय आसु॒रस॑र्वेण वै न
ऽआ॒त्मना॒ग्निर॒भ्युपा॑वृ॒तइति॒ तस्मा॑ऽए॒तानि ह॒वीꣳषि॒ निर्व॑पन् ॥ १४ ॥ स यद॒ग्नये॑
प॒वमा॑नाय॒ निर्व॑पति । यद्दे॒वास्या॒स्यां पृ॑थि॒व्याꣳ रू॒पं तद्दे॒वास्यैते॒नाप्नो॒त्यथ यद॒ग्नये॑
पावक॒ाय निर्व॑पति यद्दे॒वास्या॒न्तरि॑क्षे रू॒पं तद्दे॒वास्यैते॒नाप्नो॒त्यथ यद॒ग्नये॒ शुच॑ये॒ नि-
र्व॑पति यद्दे॒वास्य॑ दि॒वि रू॒पं तद्दे॒वास्यैते॒नाप्नो॒त्येव॒मु कृ॒त्स्नमे॒वाग्निमन॑पनिहितमा-
धत्ते॒ तस्मा॑ऽ निर्व॑पेदे॒वोत्त॑राणि ह॒वीꣳषि ॥ १५ ॥ केव॑लबर्हिः प्रथ॒मꣳ ह॒विर्भव॑-
ति । समा॒नब॑र्हिषी॒ऽउत्त॑रे॒ऽअ॒यं वै लो॒कः प्रथ॒मꣳ ह॒विर्य॑दे॒तद॒न्तरि॑क्षं द्वि॒तीयं॑ द्यौ-
र्वेव तृ॒तीयं॑ बङ्गुलेव वा॒ऽइयं पृ॑थि॒वी ले॑लयेवा॒न्तरि॑क्षं ले॒लये॑वासी॒द्द्यौरु॑भे चिदे-
नां प्रत्युद्या॑मिनी स्ता॒मिति॒ तस्मा॑त्समान॒बर्हिषी ॥ १६ ॥ अ॒ष्टाक॑पालाः सर्व्वे पु॒रो-
डाशा भव॑न्ति । अ॒ष्टाक्ष॑रा वै गाय॒त्री गा॑य॒त्रम॒ग्नेश्छन्दः॒ स्वेनै॒वैन॑मेत॒च्छन्द॑साधत्ते॒
तानि॒ सर्वा॑णि चतुर्विꣳशतिः कपा॒लानि॒ सम्प॑द्यन्ते चतुर्विꣳशत्यक्षरा वै गाय॒त्री
गा॑य॒त्रम॒ग्नेश्छन्दः॒ स्वेनै॒वैन॑मेत॒च्छन्द॑साधत्ते ॥ १७ ॥ अथा॑दि॒त्ये च॒रुं निर्व॑पति । प्र॒-
च्यवत॒ऽइव वा॒ऽए॒षो॒ऽस्माल्लो॒काद्य ए॒तानि ह॒वीꣳषि॒ निर्व॑पती॒मान्त्सु लो॒का-
न्त्समारो॒क्तेति॑ ॥ १८ ॥ स यदा॑दि॒त्ये च॒रुं निर्व॑पति । इ॒यं वै पृ॑थि॒व्यदि॑तिः सेयं प्र॒-
तिष्ठा तद॒स्यामे॒वैतत्प्रति॑ष्ठायां॒ प्रति॑तिष्ठति॒ तस्मा॑दादि॒त्ये च॒रुं निर्व॑पति ॥ १९ ॥ त॒-
स्ये वि॒राजी॒ संया॒ज्ये स्यातामित्या॑हुः । वि॒राड्ढीयमित्यथो त्रि॒ष्टुभौ त्रि॒ष्टुब्भीयमित्य-
थो जग॒त्यौ जग॒ती ह्यीयमिति वि॒राजा॑वित्येव॒ स्याताम् ॥ २० ॥ तस्यै धेनुर्दक्षि॑णा ।
धे॒नुरि॑व वा॒ऽइयं म॑नु॒ष्येभ्यः॒ सर्वान्कामान्दुग्धे मा॒ता धे॒नुर्म॑तिव वा॒ऽइयं म॑नु॒ष्या-
न्बिभ॑र्ति॒ तस्मा॑द्धेनुर्द॒क्षिणैत॒द्ध्येक॑मयनम् ॥ २१ ॥ अथे॒दं द्वि॒तीयम् । आ॒ग्नेय॑मे॒वाष्टाक॑-
पालं पु॒रोडाशं॒ निर्व॑पति परो॒ऽक्षमिव वा॒ऽए॒तद्यद॒ग्नये॑ प॒वमा॑नाया॒ग्नये॑ पाव॒काया-
ग्नये॒ शुचय॒ऽइती॑वाथा॒ङ्गिरसै॒वेन॑मेतत्प्र॒त्यक्ष॑माधत्ते॒ तस्मा॑दग्नये॒ऽथा॑दि॒त्ये च॒रुं निर्व॑पति
स य एव च॒रोर्बन्धुः॑ स ब॒न्धुः ॥ २२॥ ब्राह्मणम् ॥५[२.१.]॥ ॥

कां० २, अ० २, ब्रा० १, कं० १४-२२ शतपथब्राह्मण / २१३
उस समय थे उन ऋषियों को यह मालूम हो गया कि अग्नि सम्पूर्ण आत्मा से हमारे पास नहीं
आया। इसलिए उन्होंने अग्नि के लिए वे आहुतियां तैयार कीं ॥१४॥
अब वह अग्नि-पवमान के लिए आहुति देता है तो वह उस रूप को प्राप्त करता है जो
इस पृथिवी में रक्खा हुआ है; अब अग्नि-पावक के लिए आहुति देता है तो उस रूप को प्राप्त
करता है जो अन्तरिक्ष में रक्खा हुआ है; और अग्नि-शुचि के लिए आहुति देता है तो उस रूप
को प्राप्त करता है जो द्यौ में रक्खा हुआ है। इस प्रकार वह सम्पूर्ण अग्नि को बिना बिगाड़े हुए
रख देता है। इसलिए भी उसको पिछली आहुतियां देनी चाहिएँ ॥१५॥
पहली आहुति में केवल बर्हि (कुश) होता है। बाद की दो आहुतियों में एक ही बर्हि
होता है। पहली हवि इस लोक को, दूसरी अन्तरिक्ष को, तीसरी द्यौलोक को (प्रकट करती है)।
यह पृथिवी बहुला-(दृढ़ या ठहरी हुई)-सी है। अन्तरिक्ष लेलया अर्थात् कांपता-सा है, द्यौ भी
लेलया अर्थात् काँपता-सा है। ये दोनों उस पृथिवी के समान हो जायें, इसलिए उन दोनों के लिए
एक ही बर्हि होता है ॥१६॥
सब पुरोडाश आठ कपालों में होते हैं। गायत्री में आठ अक्षर होते हैं। गायत्री अग्नि का
छन्द है। इस प्रकार वह अग्नि को उसी के छन्द के द्वारा रखता है। कुल कपाल २४ होते हैं।
गायत्री में भी चौबीस अक्षर होते हैं। गायत्री अग्नि का छन्द है। वह अग्नि को उसी के छन्द के
द्वारा रखता है ॥१७॥
अदिति के लिए चरु (उबला भात) देता है। जो इन हवियों को देता है वह इस लोक
से उठता-जैसा है अर्थात् वह इन लोकों को चढ़ता है ॥१८॥
जब वह अदिति के लिए चरु (भात) देता है तो यही पृथिवी अदिति है। यही ठहरी हुई
है। इस प्रकार वह इस ठहरी हुई पृथिवी में स्थित होता है, इसलिए अदिति के लिए चरु (भात)
देता है ॥१९॥
कुछ लोग कहते हैं कि उस (अदिति) के लिए दो विराज् छन्द संयाज्य होवें। क्योंकि
विराज् ही पृथिवी है; या त्रिष्टुभ् क्योंकि त्रिष्टुभ् यह पृथिवी है; या जगती क्योंकि जगती यह
पृथिवी है परन्तु विराज् छन्द ही होने चाहिएँ ॥२०॥
इसके लिए दक्षिणा धेनु है। धेनु जैसी ही यह पृथिवी है। वह मनुष्यों की सब कामनाओं
को दूध के समान देती है। धेनु मा है, यह पृथिवी भी मा है क्योंकि मनुष्यों का पालन करती
है। इसलिए इसकी दक्षिणा धेनु है। यह (आहुतियों की) एक विधि हुई ॥२१॥
अब दूसरी। आठ कपालों के पुरोडाश को केवल अग्नि के लिए अर्पण कर देता है। मानो
परोक्ष रीति से अग्नि-पवमान के लिए, अग्नि-पावक के लिए और अग्नि-शुचि के लिए और इसके
पश्चात् ही वह अग्नि का प्रत्यक्ष रूप से आधान कर देता है। इसलिए वह पहले अग्नि के लिए,
फिर अदिति के लिए चरु देता है। चरु के साथ वैसा ही करता है (जैसा पूर्व-विधि में) ॥२२॥