सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-५, ब्राह्मण-८

भि॒षज्य॒त्याभ्या॑ꣳ संद॑धाति ॥७॥ अथो॑ऽअ॒भ्येव॑ मृ॒शेत् । देवा॒न्दिव॑मगन्म॒ज्ञस्ततो॑
मा द्रवि॑णमष्टु मनु॒ष्यान॒न्तरि॑क्षमगन्म॒ज्ञस्ततो॑ मा द्रवि॑णमष्टु पि॒तॄन्पृ॑थि॒वीमग॑न्म-
ज्ञस्ततो॑ मा द्रवि॑णमष्टु यं कं च लो॒कमग॑न्म॒ज्ञस्ततो॑ मे भ॒द्रम॑भूदि॒त्येवैतदा॑ह ॥८॥
तद् स्मैतदा॑रु॒णिरा॑ह । किं स य॒ज्ञेत॒ यो य॒ज्ञस्य॒ व्यृ॑द्धा पापी॑यान्म॒न्येत॒ यज्ञ॑स्य
वाऽऋ॒द्धं व्यृ॑द्धा श्रेयान्भवा॒मीत्ये॒तद्व स्म स त॒दभ्या॑ह॒ यदे॒ता आ॒शिष॒ उप॑गृह्णाति
॥ १ ॥ ब्राह्मणम् ॥ ८ [५. ७.] ॥ ॥
तद्य॒त्रैतत्त्रि॑रा॒त्रे स॒हस्रं॑ ददा॑ति । तदे॒षा सा॒हस्री क्रियते॒ स प्रथ॒मेऽह॑ꣳस्त्री॒णि च
शता॑नि नयति त्रय॑स्त्रिꣳशतं चैवमे॒व द्विती॒येऽह॑ꣳस्त्री॒णि चैव शता॑नि नयति त्र॒-
यस्त्रिꣳशतं चैवमे॒व तृती॒येऽह॑ꣳस्त्री॒णि चैव शता॑नि नयति त्रय॑स्त्रिꣳशतं चयै॒षा
सा॒हस्र्य॑ति॒रिच्य॑ते ॥१॥ सा वै त्रिरू॑पा स्यादित्याहुः । ए॒तद्द्यास्यै॑ रू॒पतम॑मि॒वेति॑
रो॒हिणी॑ तु॒ त्वे॒वोप॑धस्ता स्यादे॒तद्द्वैवा॒स्यै रूप॑तममिव ॥२॥ सा स्यादप्रवीता ।
वाग्वाऽए॒षा निदा॑नेन यत्साहस्र्य्यातायाम्नी वाग्ध्यं वाग्यातायाम्न्यप्रवीता त-
स्मादप्रवीता स्यात् ॥३॥ तां प्रथ॒मेऽह॑न्नयेत् । वाग्वाऽए॒षा निदा॑नेन यत्सा॒हस्री॑
तस्या ए॒तत्सहस्रं वाचः प्रजा॑तं पूर्व्वा॒ ह्येषैति॑ पश्चादेनां प्रजा॒तमन्वे॒त्युत्त॑मे वैनाम्-
अह॑न्नयेत्पूर्व्वम॒ह्लास्यै प्रजा॑तमेति पश्चादेषान्त्वेति॒ सोऽए॒षा मीमा॒ꣳसोत्त॑मऽए॒वैना-
मह॑न्नयेत्पूर्व्वम॒ह्लास्यै प्रजा॑तमेति पश्चादेषान्त्वेति ॥४॥ तामुत्त॑रेण ह॒विर्द्धाने । द-
क्षिणे॒नाग्नीध्रं॒ द्रोण॑कलशमव॒घ्राप॑यति य॒ज्ञो वै द्रोणकलशो य॒ज्ञमे॒वैनामे॒तद्दर्श॑य-
ति ॥५॥ आ॒जिघ्र॑ कलश॒म् । मह्या त्वा॑ विश॒न्त्विन्द॑व॒ इति॑ रिचिचा॒न इ॑व वा
ऽए॒ष भ॑वति यः स॒हस्रं॑ ददा॑ति तमे॒वैतद्रिरिचा॒नं पुन॒राप्या॑ययति॒ यदा॒हाजि॑घ्र क-
ल॒शं म॒ह्या त्वा विश॒न्त्विन्द॑व॒ इति॑ ॥६॥ पुन॒रूर्जा निवर्त्त॑स्वेति । तद्वै॒व रि॑रि-
चा॒नं पुन॒राप्या॑ययति॒ यदा॑ह॒ पुन॒रूर्जा निवर्त्त॑स्वेति ॥७॥ सा नः॑ स॒हस्रं॑ धु॒क्ष्वेति॑ ।
त॒त्स॒हस्रे॑ण रिचिचा॒नं पुन॒राप्या॑ययति॒ यदा॑ह॒ सा नः॑ स॒हस्रं॑ धु॒क्ष्वेति॑ ॥८॥ ऊर्-

का० ४, अ० ५, ब्रा० ७-८, कं० ७-६ व १-८ शतपथब्राह्मण / ६४६
उसी के द्वारा वह इसको संयुक्त करता है ॥७॥
इस मन्त्र से स्पर्श करे—"दे॒वान् दि॒वम॑गन्॒ यज्ञस्ततो॒ मा द्रवि॑णमष्टु मनु॒ष्यान॒न्तरि॑क्ष-
मगन्॒ यज्ञस्ततो॒ मा द्रवि॑णमष्टु पि॒तॄन् पृ॑थि॒वीमग॑न् यज्ञस्ततो॒ मा द्रवि॑णमष्टु यं कं च॑ लो॒कमग॑न्
यज्ञस्ततो॒ मे भ॒द्रम॑भूत्" (यजु० ८।६०)—"यज्ञ देवों के पास द्यौलोक को गया। वहाँ से मुझे
धन मिले। यज्ञ मनुष्य के पास अन्तरिक्ष में गया। वहाँ से मुझे धन मिले। यज्ञ पितरों के पास
पृथिवी में गया। वहाँ से मुझे धन मिले। जिस किसी लोक में यज्ञ गया वहीं मेरा कल्याण हो।"
इसका तात्पर्य यह है कि यज्ञ जहाँ कहीं जाय, वहीं मेरा कल्याण हो ॥८॥
इस पर आरुणि ने कहा था कि 'वह क्यों यज्ञ करे जो यज्ञ की त्रुटि पर अपने को पापी
समझे। मैं तो यज्ञ की त्रुटि द्वारा अच्छा होता हूँ।' यह बात उसने आशीर्वाद को ध्यान में रखते
हुए कही थी ॥६॥
सहस्र-दक्षिणा
अध्याय ५—ब्राह्मण ८
जब वह उस त्रिरात्र यज्ञ में सहस्र गायें देता है तो गायें सहस्री होती हैं। पहले दिन
तीन सौ तैंतीस गायें लाता है। इसी प्रकार दूसरे दिन तीन सौ तैंतीस लाता है। तीसरे दिन भी
तीन सौ तैंतीस लाता है। अब हजारवीं रह गई ॥१॥
कुछ लोग कहते हैं कि वह तीन रंग की हो, क्योंकि यही इसका सबसे अच्छा रूप है।
परन्तु वह रोहिणी (लाल) और उपध्वस्त (धब्बेदार) हो, यही उसका सबसे अच्छा रूप
है ॥२॥
वह अप्रवीत (अक्षत योनि) होनी चाहिए। यह जो साहस्त्री है वह वस्तुतः वाणा है।
यह वाणी आतयाम्नी (पूर्ण शक्तिवाली) है। जो अक्षतयोनि है वह पूर्ण शक्तिवाली है। इसलिए
इसको अप्रवीत होना चाहिए ॥३॥
उसको पहले दिन ही ले आवे, क्योंकि यह साहस्त्री वस्तुतः वाणी है। यह जो सहस्र सन्तान
(प्रजात) है वह इसी वाणी की है। वह आगे-आगे चलती है और उसकी सन्तति पीछे-पीछे।
या अन्तिम दिवस लावे। उस दिन आगे-आगे उसकी सन्तति चले और पीछे-पीछे वह। परन्तु
यह तो मीमांसा मात्र है। उसको अन्तिम दिवस ही लाना चाहिए और आगे-आगे उसकी सन्तति
हो और वह पीछे ॥४॥
हविर्धान के उत्तम और आग्नीध्र के दक्षिण को वह द्रोण कलश को सुंघवाता है। द्रोण-
कलश यज्ञ है। इस प्रकार वह उसको यज्ञ के दर्शन कराता है—॥५॥
इस मन्त्र से—"आ जि॒घ्र क॒लश॑म् । म॒हा त्वा॑ वि॒शन्त्विन्द॑वः" (यजु० ८।४२)—"कलश
को सूंघ। इस तुझ महान् में सोम की बूँदें प्रवेश करें।" यह जो एक हजार गायें दान करता है
वह खाली-सा हो जाता है। इसी खाली को फिर भरता है। जब वह कहता है कि 'हे बड़ी गाय!
कलश को सूंघ, जिससे ये सोम की बूँदें तुझमें प्रवेश करें' ॥६॥
"पुन॒रूर्जा नि व॑र्त्तस्व" (यजु० ८।४२)—"ऊर्ज के साथ फिर आ।" ऐसा कहने से वह
मानो खाली चीज को भरता है ॥७॥
"सा नः॑ स॒हस्रं॑ धुक्ष्व" (यजु० ८।४२)—"हजार गुना हमारे लिए दूध दे।" ऐसा कहने
से मानो वह खाली को भरता है ॥८॥

धारा॒ पय॑स्वती॒ पुन॒र्मावि॑शताद्र॒यिरिति॑ । तद्दे॒व रि॑रिचा॒नं पुन॒राप्या॑ययति॒ यदा॑ह॒
पुन॒र्मावि॑शताद्र॒यिरिति॑ ॥ ९॥ अथ द॒क्षिणे कर्णेऽआ॒जप॑ति । इडे॒ रन्ते॒ रव्ये॒ काम्ये॒
च॒न्द्रे ज्योति॑ऽअदिते॒ सर॑स्वति॒ महि॑ वि॒श्रुति॑ । ए॒ता ते॑ऽअघ्न्ये॒ नामा॑नि दे॒वेभ्यो॑ मा
सु॒कृतं॑ ब्रूता॒दिति॒ वोचे॒रिति॒ वैतानि॒ ह वा॒ऽअघ्न्यै॑ देव॒त्रा नामा॑नि॒ ता यानि॒ तै
देव॒त्रा नामा॑नि॒ तैरै॑नां दे॒वेभ्यः॑ सु॒कृतं॑ ब्रूता॒दित्ये॒वैतदा॑ह ॥ १०॥ तामन्वार॑भते । सा
यद्यु॑पुरु॒षाभि॑वीता प्राची॑या॒त्तन्न वि॑द्याद॒रात्सीद॒यं यज॑मानः कल्या॒णं लो॒कम॑जेषी-
दिति॒ यद्युदी॑चीया॒च्छ्रेया॒नस्मिँल्लो॒के यज॑मानो भवि॒ष्यती॑ति वि॑द्या॒द्यदि॑ प्र॒तीची॑या-
द्द्विष्य॑तिल्ब्वल-इव धा॒न्य॑तिल्ब्वलो भवि॒ष्यती॑ति वि॑द्या॒द्यदि॑ द॒क्षिणे॑यात्क्षि॒प्रे
ऽस्मा॒ल्लोका॒द्यज॑मानः प्रे॒ष्यती॑ति वि॑द्यादे॒तानि विज्ञाना॑नि ॥ ११॥ तस्या एतास्ति॒-
स्रस्तिस्रस्त्रि॒ंशत्य॑धि भवन्ति । तास्वे॒तामुप॑समाकुर्व्वन्ति॒ वि वा॒ऽए॒तां वि॒राजं॑ वृश्च-
न्ति यां व्याकुर्व्वन्ति॒ विच्छि॑न्नो॒ऽए॒षा वि॒राज्ञा विवृ॑क्ता दशाक्षरा॒ वै वि॒राट्त्कृ॒त्स्नां॑
वि॒राजं॒ संद॑धाति॒ ताꣳ होत्रे॑ दद्याद्धोता॒ हि सार्द्धम॒स्तस्मा॒त्ताꣳ होत्रे॑ दद्यात्
॥ १२॥ द्वौ वोन्नेता॒रौ कुर्वीत॑ । तयो॒र्यत॑रो ना॒न्नाव॑ये॒त्तस्मा॑ऽए॒नां दद्या॑द्वृ॒द्धो वा
ऽए॒ष उन्ने॒ता य ऽऋक्सन्नान्नाव॑यति॒ वृद्धो॒ऽए॒षा वि॒राज्ञा विवृ॑क्ता तद्वृ॒द्धऽए॒वै-
तद्वृ॒द्धं द॑धाति ॥ १३॥ तदा॑हुः । न स॒हस्रे॒ऽधि किं चन दद्यात्सङ्कलेण ह्येव स॒-
र्व्वान्कामाना॒प्नोती॑ति॒ तदु॒ होवा॑चासुरिः काम॒मेव॑ दद्यात्सङ्कलेनाह॒ सर्व्वान्कामा-
ना॒प्नोति का॒मिनो॒ऽअस्येतर॒द्दत्तं॑ भवती॑ति ॥ १४॥ अथ॒ यदि॒ रथं॑ वा यु॒क्तं दास्य-
न्त्स्यात् । यद्वा॑ वशा॒यै वा वपा॒याꣳ हुतायां॑ दद्याद॒दव॑सानीयायां वेष्टौ ॥ १५॥ स
वै द॑क्षिणा नयन् । अन्यूना दशतो नयेद्यस्माऽएकां दास्यन्त्स्याद्दशभ्यस्तेभ्यो दश-
तमुपावर्तयेद्यस्मै द्वे दास्यन्त्स्यात्पञ्चभ्यस्तेभ्यो दशतमुपावर्तयेद्यस्मै तिस्रो दास्य-
न्त्स्यात्त्रिभ्यस्तेभ्यो दशतमुपावर्तयेद्यस्मै पञ्च दास्यन्त्स्याद्द्वाभ्यां ताभ्यां दशतमुपा-
वर्त्तयेदेवम् शतात्तथो हास्यैषान्यूना विराडुमुष्मिंल्लोके कामदुघा भवति ॥ १६॥

का० ४, अ० ५, ब्रा० ८, क० ६-१६ शतपथब्राह्मण ६५१
“उरुधारा पयस्वती पुनर्माविशताद्रयिः” (यजु० ८।४२)–“हे बड़ी धार वाली और
दूधवाली ! मुझे फिर धन मिले।” ऐसा कहने से वह खाली को फिर भरता है ॥६॥
अब वह उसके दाहिने कान में जपता है–“इडे रन्ते हव्ये काम्ये चन्द्रे ज्योतिरदिते सर-
स्वति महि विश्रुति । एता ते ऽअघ्न्ये१ नामानि देवेभ्यो मा सुकृतं ब्रूतात्” (यजु० ८।४३)–“हे
गाय, तेरे इतने नाम हैं—इडा, रन्ता, हव्या, काम्या, चन्द्रा, ज्योति, अदिति, सरस्वती, मही,
विश्रुती। तू देवताओं से मेरे पुण्य को कह दे।” वस्तुतः देवों में इसके यही नाम हैं। इसका यही
तात्पर्य है कि देवों में तेरे जो-जो नाम प्रचलित हैं उनके द्वारा मेरे पुण्य को देवलोक में पहुँचा
दे ॥१०॥
उसको छोड़ देते हैं। यदि वह किसी पुरुष की प्रेरणा के बिना ही पूर्व की ओर चल दे
तो समझना चाहिए कि यह यजमान सफल हो गया; उसने कल्याणलोक को जीत लिया। यदि
उत्तर को जाय तो समझना चाहिए कि यजमान इस लोक में ही यशस्वी होगा। यदि पश्चिम की
ओर जाय तो समझना चाहिए कि धन-धान्य आदि से पूर्ण होगा। यदि दक्षिण की ओर जाय तो
समझना चाहिए कि यजमान शीघ्र ही इस लोक से चल बसेगा। ऐसी सूचनायें हैं ॥११॥
ये जो गायें तीस से तीन-तीन हजार ऊपर होती हैं, उनमें इसको मिला देते हैं। जब
विराट् छन्द को लेते हैं और उसका विश्लेषण करते हैं तो वह विच्छिन्न हो जाता है, अर्थात् उस
विराट् छन्द के टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं। यह जो दश अक्षर का विराट् है वह पूरा-पूरा है। इस
प्रकार दस अक्षर पूरा करने से विराट् छन्द पूरा हो जाता है। इस गाय को होता के अर्पण
करना चाहिए। होता साहस्र (हजारवाँ) है, इसलिए इसको होता को देना चाहिए ॥१२॥
दो उन्नेताओं की नियुक्ति करनी चाहिए। इनमें से जो श्रौषट् न पढ़े उसी को इस गाय
को दे। वह उन्नेता अपूर्ण है जो ऋत्विज् होता हुआ भी श्रौषट् नहीं पढ़ता। जिस विराट् छन्द
का विश्लेषण कर दिया गया वह भी तो अपूर्ण है। इस प्रकार अपूर्ण में अपूर्ण को रखता है ॥१३॥
इस पर कुछ लोगों का कहना है कि हजार गायों से अधिक कुछ न देना चाहिए, क्योंकि
हजार गायों का दान ही सब कामनाओं की पूर्ति कर देता है। परन्तु आसुरि का मत है कि
जितनी इच्छा हो उतना देवे। अवश्य ही सहस्र गायों के दान से सब कामनायें पूर्ण हो जाती हैं।
परन्तु जो अधिक दिया जाय अपनी इच्छा से दिया जाय ॥१४॥
अब यदि घोड़े जुते हुए रथ को देना हो तो या तो उसकी वशा की वपा की आहुति के
पश्चात् देना चाहिए या अन्तिम आहुति के पीछे ॥१५॥
जब दक्षिणा के लिए (गायें) लावे तो दस-दस करके लावे; कम न हों। यदि किसी को
एक गाय देनी हों तो दस गायें दस को दे देवे। यदि किसी को दो-दो देनी हों तो पाँच को दे
देवे। यदि तीन-तीन देनी हों तो दस गायों को तीन को दे देवें। यदि पाँच-पाँच देनी हों तो उन
दस को दो को दे देवे। इस प्रकार सौ तक। इस प्रकार यह पूर्ण विराट् परलोक में उसके लिए
कामधेनु हो जाती है ॥१६॥
१. मंत्र में गाय का 'अघ्न्या' नाम भी है, किन्तु मांसाहारियों ने व्याख्या में इसलिए छोड़ दिया
है कि (उनके द्वारा प्रक्षिप्त) पशु-बलि के प्रसंग झूठे न पड़ जायें।
—स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती