शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-६, ब्राह्मण-२
ᳬन्त्काह्विषा ह॒ वै दे॒वा वृ॒त्रं ज॑घ्नुः । तेनो॑ऽए॒व व्य॑जयन्त॒ येय॑मेषां वि॒जिति॒स्ता-
मथ॒ याने॑वेषां तस्मिन्त्स॑ङ्ग्रामेऽशव॒ आर्च्छंस्ताने॒तेरे॒व शल्या॑न्निर॑हर॒न्त॒ तान्व्य॑वृञ्ज्त
यत्त्र्य॑म्ब॒कैर॒यज॑न्त ॥१॥ अथ॒ यदे॒ष ए॒तैर्यज॑ते । तन्मा॒नू ष्ये॑वैतस्य तथा कं चनेषु-
र्ऋच्छतीति॑ दे॒वा अ॑कुर्व॒न्निति॒ त्वेवैष ए॒तत्क॑रोति॒ याश्च॒ त्वे॒वास्य॑ प्र॒जा जा॒ता याश्चा-
जा॑तास्ता॒ उभयी॑ रु॒द्रिया॒त्प्रमु॑ञ्चति ता अ॒स्यानमी॒वा अ॑किल्वि॒षाः प्र॒जाः प्र॒जाय॑न्ते
तस्मा॒द्वाऽए॒ष ए॒तैर्यज॑ते ॥२॥ ते वै रौ॒द्रा भव॑न्ति । रु॒द्रस्य॒ ही॑षू॒त्तस्मा॑द्रौ॒द्रा भव॑-
न्त्ये॑ककपाला भव॒न्त्ये॑कदे॒वत्या॒ अस॒न्निति॒ तस्मा॑देककपाला भव॑न्ति ॥३॥ ते वै
प्र॒तिपु॑रुषं । याव॑न्तो गृ॒ह्याः स्युस्ताव॑न्त एके॒नाति॑रिक्ता भव॑न्ति तत्प्र॒तिपु॑रुषमे॒-
वैतदे॒कैकेन॒ या अ॒स्य प्र॒जा जा॒तास्ता रु॒द्रिया॒त्प्रमु॑ञ्चत्येके॒नाति॑रिक्ता भव॑न्ति तया॑
ह॒वास्य प्र॒जा अ॑जा॒तास्ता रु॒द्रिया॒त्प्रमु॑ञ्चति॒ तस्मा॑देके॒नाति॑रिक्ता भव॑न्ति ॥४॥ स
ज॒घने॑न गार्ह॑पत्यं । य॒ज्ञोप॑वी॒ती भू॒त्वोद॒ङ्ङासी॑न ए॒तान्गृ॑ह्णाति॒ स तत ए॒वोत्था॑-
योद॒ङ्तिष्ठ॒न्नवे॑क्ष्य॒दीचौ॑ दृष॒दुप॑लेऽउपदधात्युत्तरार्धे गार्हपत्यस्य कपा॒लान्युप॑दधा-
ति तद्य॑दे॒व ता॒मुत्त॑रां दिश॑ꣳ सच॑त॒ऽए॒षा ह्ये॑तस्य दे॒वस्य॒ दिक्स्तस्मा॑देता॒मुत्त॑रां दि॒-
शंꣳ सच॑न्ते ॥५॥ ते वा॒ अक्ताः स्युः । अ॒क्तꣳ हि ह॒विस्त्व॑ऽउ वाऽअन॑क्ता ए॒व
स्यु॒रभि॑मानुको ह रु॒द्रः प॒शून्त्स्याद्यद॒ञ्ज्यात्तस्मा॑दन॒क्ता ए॒व स्युः ॥६॥ तान्त्सार्धं पा-
त्राꣳ समुद्रा॑स्य । अन्वा॒हार्य॑पचनादु॒ल्मुकमादा॑योदङ् परे॒त्य जु॑होत्ये॒षा ह्ये॑तस्य
दे॒वस्य॒ दिक् पथि॑ जुहोति पथा हि स दे॒वश्च॑रति चतुष्पथे जुहोत्येतद्द् वा॒ऽअस्य
शथि॑तं प्रज्ञातमवसानं यच्चतुष्पथं तस्माच्चतुष्पथे जुहोति ॥७॥ पलाशस्य पला-
शेन मध्यमेन जुहोति । ब्रह्म वै पलाशस्य पलाशं ब्रह्म॑णैवैतज्जु॑होति स सर्वे-
वानेवावद्यत्येकस्यैव नावद्यति य एषोऽतिरिक्तो भवति ॥८॥ स जुहोति । एष
ते रुद्र भागः सह॒ स्वस्रा॑म्बिकया॒ तं जु॑षस्व स्वाहेत्य॑म्बिका ह॒ वै ना॒मास्य॒ स्वसा
तया॒स्यैष॒ सह॒ भागस्तद्यदेष॒ स्त्रिया॒ सह॒ भागस्तस्मा॒त्त्र्य॑म्बका नाम तथा॒ अस्य
कां० २, अ० ६, ब्रा० २, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / ३१५
अध्याय ६-ब्राह्मण २
देवों ने महाहवि के द्वारा ही वृत्र को मारा था। उसी से उनको वह विजय मिली जो
उनको प्राप्त है। उनमें से जिनके शरीर में उस युद्ध में वाण लगे थे उनको निकाला। उनको
उन्होंने त्र्यम्बक यज्ञ करके निकाला ॥१॥
इसलिए जो कोई इस प्रकार यज्ञ करता है वह या तो इसलिए करता है कि उसके लोगों
के कोई तीर न लगेगा; या इसलिए कि देवताओं ने ऐसा किया था। इस प्रकार वह उस सन्तान
को जो उत्पन्न हो चुकी है और उस सन्तान को भी जो अभी उत्पन्न नहीं हुई, रुद्र के फन्दे से छुड़ा
देता है और उसकी सन्तान रोगरहित और दोषरहित उत्पन्न होती है। इसीलिये वह यज्ञ
करता है ॥२॥
(त्र्यम्बक यज्ञ) रुद्र के लिए किया जाता है। वाण रुद्र के ही हैं। इसलिए रुद्र की ही
आहुतियाँ होती हैं। यह एक कपाल (का पुरोडाश) होता है। एक देवता के लिए ही होती है,
इसलिए वे एक कपाल की ही होती हैं ॥३॥
प्रति पुरुष के लिए एक-एक। जितने घर के लोग हों उनके लिए एक-एक और एक
अधिक। एक-एक के लिए एक-एक। इससे वह उत्पन्न हुई सन्तान को रुद्र के वश से छुड़ाता है।
और जो एक अधिक हुई उसके सहारे से जो सन्तान अभी उत्पन्न नहीं हुई उसको रुद्र के वश से
छुड़ाता है। इसीलिए वे इतने होते हैं और एक अधिक ॥४॥
यह यज्ञोपवीत धारण किये हुए उत्तराभिमुख गार्हपत्य के पीछे बैठकर (पुरोडाश के
लिए चावलों को) निकालता है। वहाँ से वह उठता है और उत्तराभिमुख खड़ा होकर पछोरता
है। अब दृषद और उपल (चक्की के पाट) उत्तर की ओर रखता है और गार्हपत्य के उत्तरार्द्ध
में कपालों को रखता है। उत्तर की ओर ही क्यों रखता है? इसलिए कि उत्तर देव की दिशा है।
इसलिए उत्तर की दिशा में रखते हैं ॥५॥
(कुछ की राय में) उनमें घी मिलाना चाहिए। हवि में घी मिला होता है, परन्तु घी न
मिलाना ही अच्छा है। यदि घी मिला दिया जायगा तो रुद्र यजमान के पशुओं के पीछे पड़ेगा।
इसलिए घी नहीं मिलाना चाहिए ॥६॥
एक पात्र में सब (पुरोडाश) को करके दक्षिणाग्नि से एक जलती लकड़ी लेकर उत्तर
की ओर जाकर आहुति दे देता है, क्योंकि उत्तर की दिशा इस देव की है। मार्ग में ही आहुति
देता है, क्योंकि वह देव (रुद्र) मार्ग में ही चलता है। चौराहे पर ही देता है, क्योंकि चौराहे पर
ही (रुद्र का) प्राचीन स्थान है। इसलिए चौराहे पर ही आहुति देता है ॥७॥
पलाश पत्र के बीच के पत्ते से आहुति देता है। पलाश ब्रह्म है। इसलिए ब्रह्म के द्वारा
ही आहुति देता है। वह सब (पुरोडाशों में से) एक-एक टुकड़ा काटता है, केवल अधिक पुरोडाश
(जो एक अधिक था) में से नहीं काटता ॥८॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर आहुति देता है—"एष ते रुद्र भागः सह स्वस्राम्बिकया तं जुषस्व
स्वाहा” (यजु० ३।५७)—"हे रुद्र, तेरी बहिन अम्बिका के साथ यह तेरा भाग है, तू इसे ग्रहण
कर; स्वाहा ।" उसकी बहिन का नाम अम्बिका है। उसके साथ मिला हुआ उसका यह भाग है।
और चूंकि एक स्त्री उस भाग में शरीक है, अतः उन आहुतियों का नाम पड़ा 'अम्बिका'। इन
३१६ शतपथ ब्राह्मण
प्रजा जातास्ता रु॒द्रिया॒त्प्रमु॑ञ्चति ॥ ९॥ अथ॒ य ए॒ष एको॑ऽतिरिक्तो॒ भव॑ति । तमा-
खूत्क॒रऽउ॑पकिरत्ये॒ष ते॑ रुद्र भा॒गऽआ॒खुस्ते॑ प॒शुरि॑ति॒ तद॒स्मा॒ऽआखु॑मे॒व प॑शूना॒म-
न्वि॑दिशति तेनो॒ऽइतरा॒न्पशू॒न्न हि॑नस्ति तद्य॒दुप॑किरति ति॒र् इ॑व॒ वै गर्भास्ति॒र् इ-
वैतद्यदुपकीर्णं त॒स्मादा॒ऽउप॑किरति त॒या ए॒वास्य॑ प्र॒जा अ॒जाता॑स्ता रु॒द्रिया॒त्प्रमु॑-
ञ्चति ॥ १०॥ अथ॒ पुन॒रेत्य॑ जपन्ति । अव॑ रु॒द्रम॑दीम॒ह्यव॑ दे॒वं त्र्य॑म्बकम् । य॒था
नो॒ वस्य॑सस्क॒रद्यथा॑ नः॒ श्रेय॑सस्क॒रद्यथा॑ नो॒ व्यवसा॑ययात् ॥ भेष॒जम॑सि भेष॒जं ग-
वे॒ऽश्वाय॒ पुरु॑षाय भेष॒जं सु॒खं मे॒षाय॑ मे॒ष्या॒ऽइत्या॒शीरे॒वैषैतस्य॒ कर्म॑णः ॥ ११॥
अथापसलवि त्रिः प॑रियन्ति । स॒व्यानूरूनुपघ्नाना॒स्त्र्य॑म्बकं यजामहे सुग॒न्धिं पु॑ष्टि-
वर्ध॑नम् । उ॒र्वा॒रु॒कमि॑व॒ बन्ध॑नान्मृ॒त्योर्मु॑क्षीय॒ मामृता॒दित्या॒शीरे॒वैषैतस्य॒ कर्म॑ण
आ॒शिष॑मे॒वैतदाशा॑सते तद्य॒ क्षेव॒ शमिव॒ यो॑ मृत्योर्मुच्य॑ते॒ नामृ॒तात्तस्मा॑दाह म्-
त्योर्मु॑क्षीय॒ मामृता॒दिति॑ ॥ १२॥ तडु हापि कुमा॒र्यः प॑रीयुः । भग॑स्य भजामहा॒ऽइ-
ति या ह॒ वै सा रु॒द्रस्य॒ स्वसा॑म्बिका॒ नाम॒ सा ह॒ वै भग॒स्येष्टे॒ तस्मा॑दु ह्वापि कु-
मार्यः॒ परी॑युर्भग॑स्य भजामहा॒ऽइति॑ ॥ १३॥ तासा॑मुतासां॒ नल्लो॒ऽस्ति॑ । त्र्य॑म्बकं य-
जामहे सुग॒न्धिं प॑तिवे॒दन॑म् । उ॒र्वा॒रु॒कमि॑व॒ बन्ध॑नादितो॑ मुक्षीय॒ मामुत॒ इति॑ सा
यदि॑त॒ इत्या॑ह ज्ञातिभ्य॒स्तदा॑ह॒ मामुत॒ इति॒ पति॑भ्यस्तदाह॒ पत॑यो॒ ह्येव॒ स्त्रिये॑ प्र-
ति॒ष्ठा तस्मा॑दाह॒ मामुत॒ इति॑ ॥ १४॥ अथ॒ पुनः॑ प्रसल॒वि त्रिः प॑रियन्ति । द॒क्षि-
णानूरूनुपघ्नाना॒ ए॒तेनै॑व॒ मन्त्रे॑ण तद्यत्पुनः॑ प्रसल॒वि त्रिः प॑रियन्ति प्रसल॒वि न॒
इदं कर्मानु॒संत॑तिष्ठाता॒ऽइति॒ तस्मा॑त्पुनः प्रसल॒वि त्रिः प॑रियन्ति ॥ १५॥ अथैतान्य्-
ज॑मानो॒ऽञ्जलौ॑ समो॒प्य । ऊ॒ध्वानुदस्यति यथा गौर्नीदाद्युपात्तादात्मभ्य ए॒वैतत्कल्या-
णम॒भिमि॑मीते तान्विलिप्सन्त उप॒स्पृश॑न्ति भेष॒जमे॒वैतत्कुर्वते तस्मा॑द्विलिप्सन्त उप॒स्पृ-
शन्ति ॥ १६॥ तान्द्र्योर्मुत्क॒योरुप॑नह्य । वेणुय॒ष्ट्यां वा कूपे वोभयत आबध्योदङ्
परे॒त्य यदि॑ वृ॒क्षं वा स्थाणुं॑ वा वे॒णुं वा वल्मी॒कं वा विन्दे॒त्तस्मि॒न्नास॑ञ्जयत्ये॒ते
कां० २, अ० ६, ब्रा० २, कं० ६-१७ शतपथब्राह्मण / ३१७
आहुतियों के द्वारा, उसके जो सन्तान हुई है उसको रुद्र के पंजे से छुड़ा देता है ॥६॥
और एक जो (पुरोडाश की टिकिया) उसको चूहे के बिल में गाड़ देती है, यह मन्त्र
पढ़कर— “एष ते रुद्र भागऽआखुस्ते पशुः” (यजु० ३।५७)— “हे रुद्र ! यह भाग है और चूहा तेरा
पशु है।” इस प्रकार वह चूहे को ही (रुद्र का पशु) नियत कर देता है और वह (रुद्र) किसी
अन्य पशु को नहीं सताता । गाड़ता क्यों है ? इसलिए कि गर्भ गुप्त होते हैं। और जो गड़ा हुआ
होता है वह भी गुप्त होता है। इसीलिए वह उसको गाड़ता है। इसके द्वारा वह अपनी उस
सन्तान को जो अभी उत्पन्न नहीं हुई रुद्र के पंजे से छुड़ा देता है ॥१०॥
अब वे लौटकर यह मन्त्र जपते हैं— “अव रुद्रमदीमह्यव देवं त्र्यम्बकम् । यथा नो वस्य-
सस्करद्यथा नः श्रेयसस्करद्यथा नो व्यवसाययात् ॥ भेषजमसि भेषजं गवेऽश्वाय पुरुषाय
भेषजम् । सुखं मेषाय मेष्यै” (यजु० ३।५८, ५६)— “हम त्र्यम्बक देव रुद्र को सन्तुष्ट करते हैं कि
वह हमको घर आदि से युक्त करे, हमको कल्याण दे, और हमको व्यवसायी बनावे” (यजु०
३।५८)— “हे रुद्र ! आप औषध हैं— गाय, घोड़े, पुरुष के लिए औषध हैं। भेड़ और भेड़ी के
लिए सुख हैं (अर्थात् सब प्राणियों के लिए सुख के दाता हैं), इस यज्ञ में यह आशीर्वाद है”
(यजु० ३।५६) ॥११॥
अब वे तीन बार वेदी के चारों ओर (बाईं ओर से) फिरते हैं, बाईं जांघों को पीटते हुए
और यह मन्त्र जपते हुए— “त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्यो-
र्मुक्षीय माऽमृतात्” (यजु० ३।६०) — “सुगन्धयुक्त और पुष्टि को बढ़ानेवाले त्र्यम्बक की हम
स्तुति करते हैं कि वह हमको मौत के बन्धन से इस प्रकार छुड़ा ले जैसे उर्वारुक (लौकी) अपने
डण्ठल से; परन्तु मोक्ष से नहीं” ॥१२॥
कुमारियां भी परिक्रमा करें, इसलिए कि उनका कल्याण हो । रुद्र की बहिन अम्बिका
भाग्य की अधिष्ठात्री है। इसलिए कुमारियों को भी परिक्रमा देनी चाहिए, इस इच्छा से कि
उनका भाग्य जागे ॥१३॥
उनके लिए यह मन्त्र है — “त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम् । उर्वारुकमिव बन्धना-
दितो मुक्षीय मामुतः” (यजु० ३।६०) — “हम सुगन्धयुक्त पतियों को प्राप्त करानेवाले त्र्यम्बक
की स्तुति करती हैं कि वह हमको इस (लोक) से लौकी के डण्ठल की भाँति छुड़ा दे, न कि उस
(लोक) से” (यजु० ३।६०) । 'इस (लोक) से' का तात्पर्य है 'मेरे माता-पिता आदि से ।' 'वहाँ
से नहीं' का तात्पर्य है — 'पति से नहीं' । (अर्थात् वधू अपने माँ-बाप को छोड़कर पति के घर में
नित्य रहने की प्रार्थना करती है) पति ही स्त्री की प्रतिष्ठा है । इसलिए कहती है 'वहाँ से
नहीं' ॥१४॥
अब वे फिर वेदी के चारों ओर दाहिनी ओर से फिरते हैं, दाहिनी जांघों को पीटते हुए
और वही मन्त्र जपते हुए । वे दाहिनी ओर घूमकर तीन बार क्यों फिरते हैं ? इसलिए कि वे
समझते हैं कि ऐसा करने से हमारे दाहिनी ओर काम सिद्ध होगा । इसलिए वे तीन बार दाहिनी
ओर से परिक्रमा देते हैं ॥१५॥
अब यजमान इन बचे हुए पुरोडाश की टिकियों को अंजलि में लेकर ऊपर को इस
प्रकार फेंकता है कि गौ न छू सके, और फिर हाथ में लेता है। जो पकड़ में नहीं आते और गिर
पड़ते हैं उनको केवल छू लेता है। इस प्रकार वे उनको औषध के समान बनाते हैं। इसलिए
यदि वे पकड़ में नहीं आते तो छू लेता है ॥१६॥
अब इनको दो टोकरियों में रखकर और या तो बाँस के दो सिरों से या तराजू की डण्डी
के दो सिरों से बाँधकर उत्तर की ओर चलता है । और रास्ते में कोई वृक्ष, ठूंठ, बाँस या चिटोहर