शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-६, ब्राह्मण-२
११२ शतपथ ब्राह्मण
ङ्गः । किं दे॒वत्या॒न्या॒ज्यानी॑ति प्रा॒जाप॑त्यानीति ह ब्रूया॒दनिरु॑क्तो॒ वै प्र॒जाप॑ति॒रनि॑-
रु॒क्तान्या॒ज्यानि॒ तानि॒ हैता॒नि य॒जमान॑दे॒वत्या॒न्येव य॒जमानो॒ ह्ये॑व॒ स्वे य॒ज्ञे प्र॒जा-
प॑ति॒स्तेन॒ व्युक्ता ऋ॒त्विज॒स्तन्व॑ते॒ तं ज॑नयन्ति ॥ २०॥ सो ऽआ॒ज्यस्योपस्तीर्य॑ । द्विर्ह-
वि॒षोऽव॑दा॒याथोपरि॒ष्टादा॒ज्यस्या॒भिघा॑रयति॒ सैषाऽऽज्येन॑ मिश्रा॒हुति॑र्ह्रूयते यजमानेन
ह्ये॒वैषैतन्मिश्रा॒ हूयते॒ यदि॑ ह॒ वाऽअपि॑ दू॒रे स॒न्यज॑ते॒ यद्यन्ति॑के॒ यथा॒ हैवा॑न्ते॒ सत॑
इ॒ष्टꣳ स्या॒देवꣳ॒ है॒वैवं॒ वि॒दुष॒ इ॒ष्टं भ॑वति॒ यद्यु॒ ह्यापि॒ ब॒ह्विव॒ पापं॒ करो॑ति॒ नो
है॒व ब॒र्हिर्धा य॒ज्ञाद्भवति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥ २१॥ ब्राह्मणम् ॥ ६ [६. १.] ॥ ॥ चतुर्थः
प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या १२१ ॥ ॥
य॒ज्ञेन॒ वै दे॒वाः । इ॒मां जि॒तिं जिग्युर्यैषा॑मि॒यं जि॒तिस्ते होचुः क॒थं न इ॒दं मनु॑-
ष्यैरन॒भ्यारो॒ह्यꣳ स्या॒दिति॒ ते य॒ज्ञस्य॒ रसं॑ धी॒त्वा यथा॒ मधु॑ मधु॒कृतो॒ निर्ध॑येयु॒र्विदु॑-
ग्व्य य॒ज्ञं यूपेन॑ योपयि॒त्वा तिरो॒ऽभवंन्नथ॒ यदेने॒नायो॑पयं॒स्तस्मा॒द्यू॒पो नाम॒ तदृष॑-
षीणामनु॑श्रुतमास ॥ १॥ य॒ज्ञेन ह॒ वै दे॒वाः । इ॒मां जि॒तिं जि॑ग्यु॒र्यैषा॑मि॒यं जि॒तिस्ते
होचुः क॒थं न इ॒दं मनु॑ष्यैरन॒भ्यारो॒ह्यꣳ स्या॒दिति॒ ते य॒ज्ञस्य॒ रसं॑ धी॒त्वा यथा॒ मधु॑
मधु॒कृतो॒ निर्ध॑येयु॒र्विदु॑ग्ध्य य॒ज्ञं यूपेन॑ योपयि॒त्वा तिरो॒ऽभवन्निति॒ तमन्वे॑ष्टुं दधिरे
॥ २॥ ते॒ऽर्च॑न्तः श्राम्य॑न्तश्चेरुः । श्रमे॑ण ह॒ स्म वै तद्दे॒वा जय॑न्ति॒ यदे॑षां जय्यमा॒सूर्ष॑-
यश्च॒ तेभ्यो॑ दे॒वा वैव॒ प्ररो॑चयां चक्रुः स्व॒यं वैव द॑धिरे॒ प्रेत॒ तदि॑ष्यामो॒ यतो॑ दे॒वाः
स्व॒र्गं लो॒कꣳ स॒माश्नु॑व॒तेति॒ ते किं प्ररो॑चते॒ किं प्ररो॑चत॒ऽइति॑ चेरु॒रेत्पुरोडाश॑मेव॒
कू॒र्मं भू॒त्वा सर्प॑न्तं ते॒ ह सर्व॑ऽएव॒ मेनि॑रि॒दं वै य॒ज्ञ इति॑ ॥ ३॥ ते होचुः । अ॒श्वि-
भ्यां तिष्ठ॒ सर॑स्वत्यै तिष्ठेन्द्रा॑य तिष्ठेति॒ स स॒र्पन्नेवाग्रे॑ तिष्ठेति तत॒स्तस्थावग्रे॑
वा॒ऽअस्यादिति॒ तमग्रा॑वे॒व परि॑गृह्य॒ सर्व॑ङ्गतमङ्गुरु॒राहु॑तिर्हि दे॒वानां तत एभ्यो
य॒ज्ञः प्रारो॑चत॒ तम॑सृजन्त॒ तम॑तन्वत॒ सोऽयं प॒रोऽव॑रं य॒ज्ञोऽनूच्य॑ते पि॒तैव पु॒त्राय॑
ब्रह्मचारि॑णे ॥४॥ स वा॒ऽए॒भ्यस्तत्पुरो॒डाशायत॒ । य ए॒भ्यो य॒ज्ञं प्रारो॑चयत्तस्मा-
का० १, अ० ६, ब्रा० २, कं० १-५ शतपथब्राह्मण / ११३
यदि कोई पूछे कि आज्य आहुतियां किस देव के लिए हैं तो उत्तर देना चाहिए—'प्रजा-
पति के लिए।' क्योंकि प्रजापति अनिरुक्त (अस्पष्ट) है और ये आहुतियां भी अनिरुक्त हैं।
यजमान ही उनका देवता है। अपने यज्ञ में यजमान ही प्रजापति है, क्योंकि इसी के कहने से
ऋत्विज लोग यज्ञ को फैलाते और उत्पन्न करते हैं ॥२०॥
हवि के ऊपर घी लगाकर उसमें से दो टुकड़े काटकर उन पर घी डालता है। इस प्रकार
घी से मिश्रित आहुति दी जाती है, मानो यजमान से ही मिश्रित आहुति दी जाती है। चाहे वह
दूर हो या निकट, यज्ञ इसी प्रकार किया जाता है मानो वह निकट ही है। यदि वह इस रहस्य को
समझता है, यदि वह इसको जानता है तो वह यज्ञ से कभी बाहर नहीं होता है चाहे कितना ही
पाप क्यों न करे ॥२१॥
अध्याय ६—ब्राह्मण २
यज्ञ से ही देवों ने यह (स्वर्गलोक) जीता। जब जीत चुके तो कहने लगे कि इसको
मनुष्य के न प्राप्त करने योग्य कैसे बनाया जाय ? उन्होंने यज्ञ के रस को ऐसे चूस लिया जैसे मधु-
मक्खी मधु को चूसती है। यज्ञ को दूह अर्थात् चूसकर, यूप से छिपाकर छिप गये। चूंकि उन्होंने
इसे यूप से छिपाया (आयोपयन्), अतः इसका 'यूप' नाम पड़ा। अब ऋषियों ने सुना—॥१॥
'यज्ञ से ही देवों ने (स्वर्गलोक) को जीता और जीतने पर उन्होंने कहा किस प्रकार हम
इसको मनुष्य से प्राप्त न करने योग्य बनावें ? उन्होंने यज्ञ के रस को ऐसे चूस लिया जैसे मधु-
मक्खी मधु को, और यज्ञ को दुहकर उसे छिपा दिया और आप छिप गये।' (ऋषि लोग) उसको
ढूंढ़ने लगे ॥२॥
उन्होंने पूजा और श्रम करना आरम्भ किया। श्रम से ही देवों ने जो कुछ जीतना चाहा
जीता, और ऋषियों ने भी। या तो इनको देवों ने आकर्षित किया या ये स्वयं ही चले। उन्होंने
कहा, 'आओ' उस स्थान को चलें जहाँ देवों ने स्वर्गलोक को प्राप्त किया था।' वे यह कहकर
फिरने लगे, 'यह क्या चमकता है ? यह क्या चमकता है?' पुरोडाश को कूर्म (कछुआ) के रूप
में रेंगते देखकर उन्होंने समझा कि यही यज्ञ है ॥३॥
उन्होंने कहा, 'अश्विनों के लिए ठहर ! सरस्वती के लिए ठहर ! इन्द्र के लिए ठहर !'
वह चलता ही गया। जब उन्होंने कहा, 'अग्नि के लिए ठहर' तो वह ठहर गया। यह समझकर
कि यह अग्नि के लिए ठहर गया, उन्होंने उसे अग्नि में लपेटकर सबकी आहुति दे दी। क्योंकि देवों
के लिए यह आहुति थी, उनको यज्ञ रोचक मालूम हुआ। उन्होंने यज्ञ को किया, उसको फैलाया।
यह यज्ञ परम्परा से कहा जाता है। पिता ब्रह्मचारी पुत्र के लिए उपदेश करता है ॥४॥
उन्होंने उनके लिए इसे 'पुरो' अर्थात् आगे 'अदाशयत्' अर्थात् रक्खा, जिसने इनके लिए