शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-२, ब्राह्मण-२
३५४ शतपथ ब्राह्मण
अ॒न॒ग्ने॒व वा॒ऽअस्या॑तः पु॒रा जा॒या भ॑वती॒दꣳ स्या॒द्रु रु॒त्ना॑क्षसि योषि॑त॒मनु॒सच॑न्ते॒ तद्य॑त
रु॒त्ना॑त्स्येव॒ रेत॒ आ॒दध॑तीत्यथाय॑त्रा॒दा जा॑यते॒ यो ब्रा᳡ह्म॒णो यो य॒ज्ञाञ्जाय॑ते॒ तस्मा॒द्-
पि रा॒ज॒न्यं॑ वा वै॒श्यं॑ वा ब्राह्म॒ण इत्ये॑व ब्रूयाद्ब्राह्म॒णो हि जा॑यते॒ यो य॒ज्ञाञ्जाय॑ते
तस्मा॒दाहु॒र्न स॑वन॒कृतꣳ॑ रुन्द्यादिन्स्वी॑ ह्येव स॑वन॒कृतेति॑ ॥४०॥ ब्राह्म॒णम् ॥५
[२.१] ॥ ॥ प्रथमः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या १२४ ॥ ॥
वाचं यच्छति । स वाचंयम आस्त॒ऽआस्त॒मया॒द्यद्वाचं॑ यच्छ॑ति ॥१॥ य॒ज्ञेन॒ वै
दे॒वाः । इ॒मां जि॑तिं जि॒ग्युर्येषामियं॑ जि॒तिस्ते॑ कोचूः कथं न इ॒दं मनु॒ष्यै॒रन्व॒भ्यारो॒-
ढ्ꣳ स्या॒दिति॑ ते य॒ज्ञस्य॒ रसं॑ धी॒त्वा यथा॒ मधु॑ मधु॒कृतो॒ निर्ध॑येयु॒रेवं॑ङ्क्त्वा य॒ज्ञं यूपे॒-
न योपयि॒त्वा तिरो॒ऽभवं॒स्तद्यदे॒नेनायोपयं॒स्तस्मा᳡द्यू॒पो नाम॑ ॥२॥ तद्वा᳡ऋषीणा-
म॑नु॒श्रुत॑मास । ते य॒ज्ञꣳ स॑मभ॑र॒न्यथायं॑ य॒ज्ञः सं॑भृत ए॒वं वा॒ऽए॒ष य॒ज्ञꣳ स॑म्भर॑ति
यो दीक्ष॑ते वाग्वै य॒ज्ञः ॥३॥ तामस्त॑मिते वाचं विसृ॑जते । सं॒वत्स॒रो वै प्र॒जाप॑-
तिः॒ प्र॒जाप॑तिर्य॒ज्ञो॒ऽहोरात्रे॒ वै सं॑वत्स॒र् ए॒ते ह्ये॑नं परि॒प्लव॑माने कुरुतः सो॒ऽह्न-
र्दीक्षि॒त स रात्रिं प्राप॑त्स यावा॒नेव॑ य॒ज्ञो याव॑त्यस्य मा॒त्रा ताव॑न्तमे॒वैतदा॒त्ना वाचं॑
विसृ॑जते ॥४॥ तद्वे॑के । नक्ष॑त्रं दृष्ट्वा वाचं॑ विस॒र्ज॑यन्त्यत्रानु॒ध्यास्त॑मितो भवतीति॑
वद॑न्त॒स्तदु॒ तथा॒ न कु॒र्यात्स्वा॒ ते स्यु॒र्यन्मे॒धः स्यात्तस्मा॒द्द्मत्रेवानु॒ध्यास्त॑मितं म॒न्येत॒
तदै॒व वाचं॑ विसर्जयॆत् ॥५॥ अने॑नो ह्वैके वाचं॑ विसर्जयन्ति । भूर्भुवः॒ स्वरिति॑
य॒ज्ञमाप्या॑ययामो य॒ज्ञꣳ संद॑ध्म इति॒ वद॑न्त॒स्तदु॒ तथा॒ न कु॒र्यान्न॒ ह्व स य॒ज्ञमाप्या॑य-
यति॒ न संद॑धाति॒ य ए॒तेन॒ वाचं॑ विसर्जयति॑ ॥६॥ अने॑नैव वाचं॑ विस॒र्जयेत्॑ ।
व्र॒तं कृ॑णुत व्र॒तं कृ॑णुता॒ग्निर्ब्रह्मा॒ग्निर्य॒ज्ञो वन॒स्पति॑र्य॒ज्ञिय॒ इत्ये॒ष ह्यास्या॒त्र य॒ज्ञो भ॑-
वत्येतद्ध॒विर्यथा पु॒राग्निहो॒त्रं तद्य॒ज्ञेनै॒वैतद्य॒ज्ञꣳ सं॒भृत्य॑ य॒ज्ञे य॒ज्ञं प्र॑तिष्ठापयति य॒-
ज्ञेन य॒ज्ञꣳ संत॑नोति संत॒तꣳ ह्येवा॒स्यैतद्द्तं भ॑वत्या सु॒त्यायै॑ त्रि॒ष्कृ॒त्व आ॒ह त्रि॒वृ-
द्धि य॒ज्ञः ॥७॥ अथा॒ग्निम॒भ्यावृ॑त्य वाचं॑ विसृ॑जते । न॒ ह्व स य॒ज्ञमाप्या॑ययति॒ न सं-
कां० ३, अ० २, ब्रा० १-२, कं० ४० व १-८ शतपथब्राह्मण / ३५५
कहा जाता है कि राक्षस लोग स्त्रियों के पीछे घूमा करते हैं और उनमें अपना वीर्य स्थापित कर
देते हैं। इसलिए सच्चा ब्राह्मण वही है जो यज्ञ से उत्पन्न होता है। इसलिए क्षत्रिय या वैश्य को
भी ब्राह्मण कहना चाहिए, क्योंकि जो यज्ञ से उत्पन्न होता है वह ब्राह्मण ही है। इसलिए
कहते हैं कि यज्ञ करनेवाले को कभी न मारे । ऐसा करना महापाप है ॥४०॥
अध्याय २—ब्राह्मण २
वह बोलता नहीं । सूर्यास्त तक मौन रखता है। न बोलने का कारण यह है ॥१॥
देवों को जो महत्ता प्राप्त है वह उनको यज्ञ से मिली है। उन्होंने कहा, 'कौन-सी विधि
हो कि जो लोक हमको प्राप्त हैं उसे मनुष्य न ले सकें ?' उन्होंने यज्ञ के रस को इस प्रकार चूस
लिया जैसे मधुमक्खी शहद को चूसती है, और चूसे हुए यज्ञ के फोक को यूप के पास फैलाकर
छिप गये। यूप को यूप इसलिए कहते हैं कि इसके पास उन्होंने यज्ञ को बिखेर दिया
(अयोपयन्) ॥२॥
ऋषियों ने इस बात को सुना। उन्होंने यज्ञ को इकट्ठा किया। जैसे वह यज्ञ इकट्ठा किया
गया, इसी प्रकार जो पुरुष दीक्षित हो जाता है वह भी यज्ञ को इकट्ठा करता है। वाणी ही यज्ञ
है ॥३॥
सूर्य के अस्त होने पर मौन तोड़ता है। प्रजापति सम्वत्सर है। प्रजापति यज्ञ है। रात-
दिन सम्वत्सर हैं, क्योंकि दोनों घूम-फिरकर सम्वत्सर बनाते हैं। वह दिन में दीक्षित हुआ और
अब उसने रात प्राप्त कर ली। जितना यज्ञ है, जितनी इसकी मात्रा है उतना ही प्राप्त करके वह
मौन को तोड़ता है ॥४॥
कुछ लोगों की राय है कि जब तारा दीख जाय तो मौन तोड़ दे, क्योंकि तभी सूर्य अस्त
हुआ समझा जाता है। परन्तु ऐसा न करे, क्योंकि यदि बादल हो तो कैसा होगा ? इसलिए जब
समझे कि सूर्य अस्त हो गया तभी मौन तोड़ दे ॥५॥
कुछ लोग 'भूर्भुवः स्वः' कहकर मौन तोड़ते हैं। क्योंकि इस प्रकार यज्ञ में बल आ जाता
है, यज्ञ चंगा हो जाता है। परन्तु ऐसा न करे, क्योंकि ऐसा करने से न तो यज्ञ में बल आता है न
वह चंगा ही होता है ॥६॥
इस मन्त्र से मौन तोड़े— "व्रतं कृणुत व्रतं कृणुताग्निर्ब्रह्माग्निर्यज्ञो वनस्पतिर्यज्ञियः"
(यजु० ४।२१)—"व्रत (व्रत का भोजन) करो क्योंकि अग्नि ब्रह्म है, अग्नि यज्ञ है, वनस्पति
यज्ञ के लिए है।" यही उसका इस समय का यज्ञ है। यही हवि है जैसे पहले अग्निहोत्र था। इस
प्रकार यज्ञ से यज्ञ को पुष्ट करता है, यज्ञ में यज्ञ की प्रतिष्ठा करता है, यज्ञ से यज्ञ को तानता
है। क्योंकि यह व्रत का भोजन सोम खींचने तक काम देता है। वह 'व्रतं कृणुत' को तीन बार
दुहराता है क्योंकि यह यज्ञ तीन भागोंवाला है ॥७॥
वह अग्नि की ओर घूमकर मौन तोड़ता है। जो और कुछ पढ़कर मौन तोड़ता है वह न
३५६ शतपथ ब्राह्मण
द॒धाति॒ योऽतोऽन्ये॑न॒ वाचं॑ विसृ॒जते॒ स प्र॑थ॒मं व्याह॑र॒त्सत्यं॒ वाचोऽभिव्या॑हरति
॥८॥ अ॒ग्निर्ब्रह्म॒ति । अ॒ग्निह्र्ये॑व॒ ब्रह्मा॒ग्निर्य॒ज्ञ इ॒त्य॒ग्निह्र्ये॑व य॒ज्ञो वन॒स्पति॑र्य॒ज्ञिय॒ इ-
ति॒ वन॒स्पत॑यो॒ हि य॒ज्ञिया॒ न हि मनु॑ष्या य॒जेर॒न्यद्वन॒स्पत॑यो॒ न स्यु॒स्तस्मा॑दाह
वन॒स्पति॑र्य॒ज्ञिय॒ इति॑ ॥९॥ अथास्मै॑ व्र॒तं श्रपयन्ति । दे॒वान्वाऽए॒ष उ॒पाव॑र्तते
यो दी॒क्षते॒ स दे॒वताना॒मेको॑ भवति शृतं वै दे॒वानाᳵ ह॒विर्ना॑शृ॒तं तस्मा॑च्छ्रपयन्ति
तद्य॑दे॒ष ए॒व व्रतय॑ति॒ नाग्नौ जु॒होति॒ तद्य॑दे॒ष ए॒व व्रतय॑ति॒ नाग्नौ जु॒होति॑ ॥१०॥
य॒ज्ञेन॒ वै दे॒वाः । इ॒मां जि॑तिं जिग्यु॒र्या॑मे॒षामि॒यं जि॑ति॒स्ते हो॑चुः क॒थं न इ॒दं मनु॑ष्यै-
रनभ्या॒रोह्यᳵ स्या॒दिति॒ ते य॒ज्ञस्य॒ रसं॑ धी॒त्वा य॒था मधु॑ मधुकृ॒तो निर्ध॑येयु॒रेवं॒ ऽह्य
य॒ज्ञं यूपे॑न यो॒पयि॒त्वा ति॒रोऽभ॑व॒न्नथ॒ यदे॑नेनायो॒पयं॒स्तस्मा॑द्यू॒पो नाम॑ ॥११॥ तद्वा
ऽऋषी॑णामनुश्रु॒तमा॑स । ते य॒ज्ञꣳ स॒मभ॑र॒न्यथायं य॒ज्ञः संभृ॑त ए॒ष वाऽअ॒त्र य॒ज्ञो
भ॑वति॒ यो दी॒क्षत॒ऽए॒ष ह्ये॑नं तनु॒तऽए॒ष एनं॑ जनयति॒ तद्य॑दे॒वात्र॑ य॒ज्ञस्य॒ निर्धी॑-
तं यद्विदु॑ग्धं॒ तद्दे॑वै॒तत्पुन॒राप्या॑ययति॒ यदे॒ष ए॒व व्रतय॑ति॒ नाग्नौ जु॒होति॒ न ह्याप्या॑-
पये॒द्यद॒ग्नौ जु॑हु॒याद्य॒ज्जुहु॑याद्वै॒व मन्येत॒ नाजु॑ह्वत् ॥१२॥ इ॒मे वै प्रा॒णाः । मनो॒ज्ञा-
ता मनोयुजो दूर्जनक्रतवो वागेवाग्निः प्रा॒णोदा॒नौ मि॒त्रावरु॑णौ॒ चक्षु॑रादि॒त्यः श्रोत्रं॑
विश्वे॑ दे॒वा ए॒तासु॒ है॒वास्यै॒तद्दे॑वतासु हु॒तं भ॑वति ॥१३॥ तद्धैके । प्र॒थमे॒ व्रत॒ऽउ-
भौ व्री॒हिय॒वावाव॑पन्त्युभाभ्याᳵ र॒साभ्यां॒ यदे॑वा॒त्र य॒ज्ञस्य॒ निर्धी॑तं॒ यद्विदु॑ग्धं॒ तत्पुन॒-
राप्या॑ययाम॒ इति॒ वद॑न्तो॒ यद्यु॑ व्रतदु॒घा न दु॒हीत॒ यस्यै॒वातः॒ काम॑येत॒ तस्य॑ व्र॒तं
कुर्यादित्यु॒ ह्येवा॑स्यैता॒ऽउभौ व्री॒हिय॒वावन्वा॑रब्धौ भवत॒ इति॒ तदु॒ तथा॒ न कु॒र्यान्न
ह स य॒ज्ञमाप्या॑ययति॒ न संद॑धाति॒ य उ॒भौ व्री॒हिय॒वावाव॑पति॒ तस्मा॑दन्यत॒रमे॒वा-
वपेद्य॒दिर्वा॒ऽऽग्र॒स्यैता॒ऽउभौ व्री॒हिय॒वौ भ॑वतः स॒ यदे॒वास्यैतौ॑ ह॒विर्भव॑त॒स्तदे॑वास्ये-
तावन्वा॑रब्धौ भवतो॒ यद्यु॑ व्रतदु॒घा न दु॒हीत॒ यस्यै॒वातः॒ काम॑येत॒ तस्य॑ व्र॒तं कु-
र्यात् ॥१४॥ तद्धैके । प्र॒थमे॑ व्र॒ते सर्वौ॑षधꣳ सर्व॑सुर॒भ्याव॑पन्ति॒ यदि॑ दीक्षि॒तमा॑र्ति-
का० ३, अ० २, ब्रा० २, कं० ८-१५ शतपथब्राह्मण / ३५७
यज्ञ को प्रबल बनाता है और न यज्ञ को चंगा करता है। पहला वाक् बोलकर वह सच बोलता
है ॥८॥
वह कहता है—'अग्निर्ब्रह्म' क्योंकि अग्नि ही ब्रह्म है। 'अग्निर्यज्ञः' क्योंकि अग्नि ही
यज्ञ है। 'वनस्पतिर्यज्ञियः' क्योंकि वनस्पतियां ही यज्ञ है। यदि वनस्पतियां न हों तो मनुष्य यज्ञ
कैसे करें ? इसलिए कहा, 'वनस्पतिर्यज्ञियः' ॥९॥
अब वह उसके लिए 'व्रत के भोजन' को पकाते हैं। जो दीक्षित होता है वह देवों के समीप
हो जाता है, देवों में से एक हो जाता है। देवों का खाना पका होना चाहिए, न कि बे-पका।
इसलिए पकाते हैं। वह इस दूध (व्रत-भोजन) को पीता है, आहुति नहीं देता। वह स्वयं खा लेता
है, और आहुति क्यों नहीं देता इसका कारण यह है—॥१०॥
देवों को जो विजय प्राप्त है वह उन्होंने यज्ञ के द्वारा प्राप्त की है। उन्होंने कहा कि कौन-
सी विधि हो कि इसको मनुष्य न पा जायें ? उन्होंने यज्ञ के रस को ऐसे चूस लिया जैसे शहद की
मक्खियाँ शहद को, और बचे हुए यज्ञ के फोक को यूप के द्वारा बिखेरकर छुप गये। चूंकि इसके
द्वारा यज्ञ के फोक को बिखेरा (अयोपयन्), इसलिए इसका यूप नाम पड़ा ॥११॥
इसको ऋषियों ने सुना। उन्होंने यज्ञ को इकट्ठा किया। जैसे वह यज्ञ इकट्ठा किया गया,
उसी प्रकार वह जो दीक्षित होता है यज्ञ ही हो जाता है, क्योंकि यही उसको तानता है और
उत्पन्न करता है। यज्ञ का रस चूस लिया गया था, उस रस से वह फिर यज्ञ को युक्त कर
देता है जब वह व्रत-भोजन (दूध) को पीता है और आहुतियाँ नहीं देता। यदि वह इसकी आहुति
देवे तो यज्ञ को इससे युक्त न कर सके। परन्तु उसको सोचना चाहिए कि मैं आहुति ही दे रहा हूँ
न कि आहुति नहीं दे रहा ॥१२॥
यह प्राण (मनोजाता) मन से ही उत्पन्न हुए हैं। और (मनोयुजः) मन से युक्त और
(दक्ष ऋतवः) ज्ञान से युक्त हैं। अग्नि वाणी है। मित्र और वरुण प्राण और उदान हैं। आदित्य
चक्षु है और सब देव श्रोत्र हैं। इन्हीं देवताओं को वह आहुति देता है (दूध पान करना मानो इन
देवताओं के लिए आहुति देना है) ॥१३॥
कुछ लोग पहले दिन के व्रत-भोज में चावल और जौ मिला लेते हैं। उनका कहना है कि
यज्ञ का जो भाग चूस लिया गया, उसको हम इन दोनों पदार्थों के द्वारा फिर प्राप्त कराते हैं।
और यदि व्रत की गाय दूध न दे तो इन्हीं पदार्थों से व्रत का भोजन बना ले। इस प्रकार चावल
और जौ दोनों अन्वारब्ध हो जाते हैं। लेकिन ऐसा न करना चाहिए, क्योंकि जो चावल और
जौ दोनों मिलाता है वह न तो यज्ञ को रस से युक्त करता है न उसे चंगा करता है। इसलिए
इनमें से एक ही मिलाना चाहिए। चावल और जौ (दर्शपूर्णमास में तो) हवि के काम में आते
हैं। और उस समय उनका आरब्ध हो ही जाता है। यदि व्रत की गौ दूध न दे तो इन दोनों
पदार्थों में से किसी एक से अपनी इच्छानुसार व्रत-भोज बना ले ॥१४॥
कुछ लोग प्रथम दिवस के व्रत-भोज में सब औषध और सब सुगन्धित पदार्थ मिला लेते
३५८ शतपथ ब्राह्मण
वि॒न्देद्ये॒नैवा॑तः कामयेत तेन॑ भिषज्ये॒द्यथा॑ व्र॒तेन॑ भिषज्ये॒दिति॒ तदु॒ तथा॒ न कुर्या-
न्मानु॒षँ ह॒ ते य॒ज्ञे कुर्व॒न्ति व्यृ॑द्धं वै तद्य॒ज्ञस्य॒ यन्मानु॑षं नेदृ॒द्धं य॒ज्ञे करवाणी॑ति
यदि॑ दीक्षि॒तमार्ति॑र्वि॒न्देद्ये॒नैवा॑तः कामयेत॒ तेन॑ भिषज्येत्स॒माप्ति॒र्ह्येव पु॑ण्या ॥ १५॥
अथास्मै॑ व्र॒तं प्रय॑च्छति । अतिनीय॒ मानु॑षं का॒लं साय॑न्दुग्धमपररा॒त्रे प्रात॑र्दुग्धमप-
राह्ने व्या॒कृत्या॒ऽएव दे॒वं चै॒वैतन्मानु॑षं च व्याक॑रोति ॥ १६॥ अथास्मै॑ व्र॒तं प्रदा-
स्यन्न॒प उप॑स्पर्शयति । दे॒वीं धियं॑ मनामहे सु॒मृडी॒काम॒भिष्ट॑ये वर्चो॒धां य॒ज्ञवाह॑सँ
सु॒ती॒र्था नो॒ऽअसद्द्द्रश॒ऽइति मानु॒षाय॒ वाऽए॒ष पुराश॒नायाव॑नेनिक्तेऽथैवात्र॑ दे॒व्यै धि-
ये तस्मादाह दे॒वीं धियं॑ मनामहे सु॒मृडी॒काम॒भिष्ट॑ये वर्चो॒धां य॒ज्ञवाह॑सँ सु॒ती॒र्था
नो॒ऽअसद्द्द्रश॒ऽइति स याव॑त्कियच्च व्र॒तं व्र॑तयिष्य॒न्नप॒ उप॑स्पृशे॒त्तेनै॒वोप॑स्पृशेत् ॥ १७॥
अथ व्र॒तं व्र॑तयति । ये दे॑वा मनो॒जाता मनो॒युजो॒ दक्ष॑क्रतवस्ते नो॑ऽवन्तु॒ ते नः॑
पान्तु॒ तेभ्यः॒ स्वाहेति॒ तद्यथा॒ वष॑ट्कृतँ हु॒तमे॒वमस्यै॒तद्भवति ॥ १८॥ अथ व्र॒तं
व्रतयित्वा॒ नाभि॒मुप॑स्पृशति । श्वा॒त्राः पी॒ता भ॑वत यू॒यमापो॒ऽअस्माकम॒न्तरुदरे॑ सु॒-
शेवाः॑ । ता अ॒स्मभ्यमयक्ष्मा॒ अन॑मीवा॒ अना॑गसः स्वद॑न्तु दे॒वीर॒मृता॑ ऋता॒वृध॒ इ-
ति दे॒वान्वाऽए॒ष उपाव॑र्तते यो दीक्षते॒ स दे॒वताना॒मेको॑ भवत्यनुत्सिक्तं॒ वै दे॒-
वानाँ॑ ह॒विर्यद्ये॑तद्व्रतप्र॒दो मिथ्य करो॑ति व्र॒तमुपो॑त्सिश्चेन्व्रतं॑ प्रमीणाति तस्यै॒ है-
षा प्राय॑श्चित्तिस्तथो हास्यैत॒न्न मिथ्या॑कृतं भव॑ति॒ न व्र॒तं प्रमी॑णाति॒ तस्मा॑दाह
श्वा॒त्राः पी॒ता भ॑वत यूयमापो॒ऽअस्माकम॒न्तरुदरे॑ सु॒शेवाः॑ । ता अ॒स्मभ्यमय॑क्ष्मा॒ अन॑-
मीवा अना॑गसः स्वद॑न्तु देवीर॒मृता ऋता॒वृध॒ इति स याव॑त्कियच्च व्र॒तं व्र॑तयि-
त्वा नाभि॒मुप॑स्पृशेदे॒तेनै॒वोप॑स्पृशेत्कस्तद्दिद यद्व्रतप्र॒दो व्र॒तमुपो॑त्सिश्चेत् ॥ १९॥ अथ
यत्र॑ मेद्ध्यन्भव॑ति । तत्कृ॒ष्णविषाणा॑या लो॒ष्टं वा किंचि॒द्द्द्रोप॑हृत्यै॒यं ते॑ य॒ज्ञिया त॒-
नूरिती॒यं वै पृ॑थि॒वी दे॒वी दे॑वय॒जनी सा दीक्षि॒तेन॒ नाभि॑मृश्या तस्या ए॒तद॒ङ्गच्छे-
व॒ य॒ज्ञियां॑ तनू॒मपा॑यञ्छियँ शरी॑रमभिमे॒हृत्यपो॑ मुञ्चामि॒ न प्रजा॒मित्यु॒भयं वाऽअत
कां० ३, अ० २, ब्रा० २, कं० १५-२० शतपथब्राह्मण./ ३५६
हैं कि यदि दीक्षित पुरुष को कोई रोग हो जाय तो जिस पदार्थ की इच्छा हो उसके द्वारा चंगा हो
जाय, जैसे व्रत-भोज से चंगा हो जाता है। परन्तु ऐसा न करना चाहिए, क्योंकि यह अशुभ है।
यह मानुषी प्रवृत्ति है, और जो मानुषी है वह यज्ञ के लिए अशुभ होती है। यदि दीक्षित पुरुष को
रोग हो जाय तो वह जिससे चाहे उससे अपने को चंगा कर सकता है। पूर्णता होनी चाहिए
(अर्थात् रोग की अवस्था में जो उपचार हो उसको यज्ञ का अंश क्यों बनाया जाय) ।।१५।।
मानुषी काल को बिताने के पश्चात् अध्वर्यु उसे व्रत-भोज देता है-शाम का दूध रात के
पिछले पहर में और प्रातः का दूध दोपहर के बाद। यह व्याकृति (Distinction) के लिए। इस
प्रकार वह दैवी कार्य को मानुषी कार्य से अलग करता है ।।१६।।
जब वह उसको व्रत-भोज देता है तो उससे जल छुआता है इस मन्त्र को पढ़कर-
“दैवी धियं मनामहे सुमृडीकामभिष्टये. वर्चोधां यज्ञवाहसं सुतीर्था नोऽअसद्वशे” (यजु० ४।११)
“अपने सुख की पूर्ति के लिए हम सुख देनेवाली, ब्रह्मवर्चस् को बढ़ानेवाली, यज्ञ को धारण करने-
वाली दैवी बुद्धि को चाहते हैं। वह हमारे लिए सुतीर्थ और वश में रहनेवाली हो जाय ।” इससे
पहले वह मानुषी भोजन के लिए अपने-आपको पवित्र बनाता था, अब दैवी भोजन के लिए
इसीलिए यह ऊपर का मन्त्र पढ़ता है। जब-जब व्रत-भोज ग्रहण करने के लिए वह कोई विधि
करे तो यह मन्त्र पढ़ना चाहिए ।।१७।।
अब वह व्रत-भोज को इस मन्त्र से ग्रहण करता है-“ये देवा मनोजाता मनोयुजो दक्ष-
क्रतवस्ते नोऽवन्तु ते नः पान्तु तेभ्यः स्वाहा” (यजु० ४।११)-“जो मनोजाता, मनोयुजः और
दक्षक्रतु देव हैं, वे हमारी रक्षा करें, हमको सुरक्षित रखें। उनके लिए स्वाहा ।” इस प्रकार ग्रहण
किया हुआ व्रत-भोज वषट्कार की आहुति के समान हो जाता है ।।१८।।
व्रत-भोज को ग्रहण करने के अनन्तर वह नाभि को इस मन्त्र से छूता है—“स्वात्राः पीता
भवत यूयमापोऽअस्माकमन्तरुदरे सुशेवाः । ताऽअस्मभ्यमयक्ष्माऽअनमीवाऽअनागसः स्वदन्तु देवी-
रमृताऽऋतावृधः” (यजु० ४।१२)-“हे जलो, जो तुम पिये गये हो वह हमारे पेट में जाकर
अच्छी सेवा करनेवाले होओ। ये पवित्र दिव्य और अमृतरूपी जल हमको नीरोग और बलिष्ठ
करें ।” जो दीक्षित होता है वह देवों के समीप हो जाता है और देवों में से एक हो जाता है। देवों
की हवि किसी बाह्य वस्तु से मिली नहीं होती। अब यदि व्रत-भोज में कुछ मिल जाय तो ऐसा
समझना चाहिए मानो देवों की हवि मिलावट कर दी गई। इस पाप का यह प्रायश्चित्त है जो
ऊपर का मन्त्र पढ़ा गया (अर्थात् यजु० ४।१२), क्योंकि सम्भव है कि व्रत-भोज बनाने में कुछ
मिलावट हो गई हो। जब व्रत-भोज पीने के पश्चात् नाभि-स्पर्श करें तो इस मन्त्र को पढ़कर
करना चाहिए ।।१९।।
जब पेशाब करे तो काले मृग के सींग से मिट्टी का ढेला उठावे और पढ़े—“इयं ते
यज्ञिया तनूः” (यजु० ४।१३)—“यह तेरा यज्ञ-सम्बन्धी शरीर है ।” क्योंकि यह पृथिवी देवी है
और यज्ञ की स्थली है। दीक्षित को चाहिए कि इसे दूषित न करे। उस (पृथिवी) के इस यज्ञ-
सम्बन्धी शरीर को (अर्थात् ढेले को) उठाकर इस अ-यज्ञ-सम्बन्धी शरीर द्वारा लघुशंका से अपने
को पवित्र करता है यह कहकर—“अपो मुंचामि न प्रजांम्” (यजु०४।१३)—“जलों को छोड़ता
हूँ, न कि सन्तान को ।” इस स्थान से दोनों निकलते हैं, जल भी और वीर्य भी। यहाँ वह जल को
३६० शतपथ ब्राह्मण
इत्याप॑श्च॒ रेत॑श्च॒ स ए॒तद॒प ए॒व मुञ्च॑ति॒ न प्र॒जाम॑ꣲहोमुचः स्वाहाकृता इत्यु॑ल्बस-
इव॒ ह्ये॑ता मुञ्च॑ति यद्दु॒द्रे गुष्टिं॒ भव॑ति॒ तस्मा॑दाहाꣲहोमुच॒ इति॒ स्वाहा॑कृताः
पृथि॒वीमावि॑श॒तेत्याहु॑तयो भूत्वा शा॒न्ताः पृ॑थि॒वीमावि॑श॒तित्ये॒वैतदा॑ह ॥२०॥ अथ॑
पुन॒र्लोष्टं॒ न्यस्य॑ति । पृथि॒व्या सम्भ॑वेती॒यं वै पृ॑थि॒वी दे॒वी दे॑वयज॒नी सा दी॒क्षिते॑न॒
नाभि॑मृश्या त॒स्या ए॒तद॒ङ्क्त्यैव य॒ज्ञियां॑ तनूम॒थाय॒ज्ञियं॒ शरीर॑मुभय॒मिव॒न्तामे॑वा-
स्याम॑तत्पुनर्य॒ज्ञियां॑ त॒नूं द॑धाति॒ तस्मा॑दाह पृथि॒व्या सम्भ॑वेति ॥२१॥ अथा॒ग्नये॑ प-
रि॒दाय॑ स्वपिति । दे॒वान्वाऽए॒ष उ॒पाव॑र्तते॒ यो दी॒क्षते॒ स दे॒वताना॒मेको॑ भवति
न वै दे॒वाः स्वप॑न्त्यनव॒रुद्धो वाऽए॒तस्या॑स्व॒प्नो भव॑त्य॒ग्निर्वै दे॒वानां॑ व्रत॒पति॒स्त-
स्मा॑ऽए॒वैतत्प॑रि॒दाय॑ स्वपि॒त्यग्ने॒ त्वꣳ सु जा॑गृ॒हि व॒यꣳ सु म॑न्दिषीमहीत्यग्ने॒ त्वं जा॑-
गृ॒हि व॒यꣳ स्वप्स्याम इत्ये॑वै॒तदा॑ह॒ रक्षा॒ णोऽप्र॑युच्छ॒न्निति॑ गोपाय नोऽप्रमत्त इ-
त्ये॒वैतदा॑ह प्रबु॒धे नः॒ पुन॑स्कृधी॒ति यथे॒तः सु॒प्त्वा स्व॒स्ति प्रबु॑ध्यामहाऽए॒वं नः॒ कु-
र्वित्ये॒वैतदा॑ह ॥२२॥ अथ॒ यत्र॑ऽसु॒प्त्वा पुन॒र्नाव॑दा॒स्यन्भव॑ति । तदा॒ह्वय॑ति पुन॒र्मनः॒
पुन॒रायु॑र्मऽआगन्पुनः॑ प्रा॒णः पुन॑रा॒त्मा मऽआग॑न्पुन॒श्चक्षुः॒ पुनः॒ श्रोत्रं॑ मऽआगन्नि-
ति॒ सर्वे॑ ह॒ वाऽए॒ते स्वप॑तोऽप॒क्राम॑न्ति प्रा॒ण ए॒व न तैरे॒वैतत्सु॒प्त्वा पुन॑ः संगृह्ते
तस्मा॑दाह॒ पुन॒र्मनः॒ पुन॒रायु॑र्मऽआगन्पुनः॑ प्रा॒णः पुन॑रा॒त्मा मऽआग॑न्पुन॒श्चक्षुः॒ पुनः॒
श्रोत्रं॑ मऽआगन् । वैश्वान॒रोऽअद॑ब्धस्तनू॒पा अ॒ग्निर्नः॑ पातु दुरि॒तादव॑द्या॒दिति॑ त-
द्य॑दे॒वात्र॑ स्वप्ने॒न वा॒ येन॑ वा मिथ्याक॑र्म॒ तस्मान्नः॒ सर्व॑स्माद॒ग्निर्गोपायत्वित्ये॒वैतदा॑ह
तस्मा॑दाह वैश्वान॒रो अद॑ब्धस्तनू॒पा अ॒ग्निर्नः॑ पातु दुरि॒तादव॑द्या॒दिति॑ ॥ २३॥ अथ॒
यद्दी॒क्षितः॑ । अ॒व्रत्यं॒ वा व्याह॒रति॒ क्रुध्य॑ति वा॒ तन्मिथ्या॑करोति व्र॒तं प्रमी॑णात्य-
क्रोधो॒ ह्ये॑व दी॒क्षितस्या॒ग्निर्वै दे॒वानां॑ व्रत॒पति॒स्तमे॒वैतदुप॑धावति त्वम॑ग्ने व्रतपा अ-
सि दे॒वऽआ मर्त्ये॒ष्वा । त्वं य॒ज्ञेष्वीद्य॒ऽइति॒ तस्यो॑ है॒षा प्राय॑श्चित्तिस्तथो॒ हास्यैतन्न॑
मि॒थ्याकृ॑तं भव॑ति॒ न व्र॒तं प्रमी॑णाति॒ तस्मा॑दाह॒ त्वम॑ग्ने व्रतपा॒ असि दे॒वऽआ म॒-
कां० ३, अ० २, ब्रा० २, कं० २०-२४ शतपथब्राह्मण / ३६१
छोड़ता है, न कि प्रजा को। अब कहता है—‘‘अं॒होमुचः स्वाहाकृताः’’ (यजु० ४।१३)—
अर्थात् ‘‘(यह जल) कष्ट को दूर करनेवाले और स्वाहा से पवित्र किये गये हैं’’ अर्थात् पहले दूध
के रूप में पान किये गये थे। क्योंकि उदर में जो कष्ट-युक्त जल (मूत्र) होता है उसको दूर करते
हैं। अब कहता है—‘‘पृथिवीमाविशत’’ (यजु० ४।१३)—‘‘पृथिवी में प्रवेश करो’’ (मूत्र को
सम्बोधन करके)। अर्थात् यह कहता है कि ‘आहुति बनकर शान्त होकर पृथिवी में प्रवेश
करे’ ॥२०॥
अब फिर ढेले को फेंक देता है यह कहकर—‘‘पृथिव्या संम्भव’’ (यजु० ४।१३)—‘‘पृथिवी
से मिल जा।’’ यह पृथिवी देवी और यज्ञ की स्थली है। दीक्षित को चाहिए कि उसे मूत्र से अपवित्र
न करे। उसके इस यज्ञ-सम्बन्धी शरीर को उठाकर उस अ-यज्ञ-सम्बन्धी शरीर में मूत्र छोड़ा।
अब उसको फिर यज्ञ-सम्बन्धी शरीर में रख देता है। इसलिए कहता है—‘‘पृथिव्या संभव’’ (यजु०
४।१३)—‘‘पृथिवी में मिल जा’’॥२१॥
अब अपने-आपको अग्नि के सुपुर्द करके सो रहता है। जो दीक्षित होता है वह देवों के
समीप खिंच आता है। वह देवों में एक हो जाता है। देव तो सोते नहीं। परन्तु वह सोये बिना
रह नहीं सकता। अग्नि देवों में व्रतपति है। इसलिए वह अपने को अग्नि के समर्पण करके सोता
है यह पढ़कर—‘‘अग्ने॒ त्वं॑ सु॒ जागृ॑हि व॒यं॑ सु म॑न्दिषीमहि’’ (यजु० ४।१४)—‘‘हे अग्नि !
तू जाग और हम भली-भांति आराम कर लें।’’ अर्थात् वह अग्नि से कहता है कि तू जाग और
हम सोवें। फिर वह कहता है—‘‘रक्षा णोऽअप्रयुच्छन्’’ (यजु० ४।१४)—‘‘हमारी निरन्तर रक्षा
कर।’’ अर्थात् प्रमादरहित होकर रक्षा कर। ‘‘प्रबुधे नः पुनस्कृधि’’ (यजु० ४।१४)—‘‘हम
अच्छी तरह जागें।’’ अर्थात् हमको इस योग्य बना कि हम जब जागें तो स्वस्थ हों ॥२२॥
अब सो चुकने के पश्चात् फिर उसे आलस्य न आ जाय, इसलिए (अध्वर्यु) उससे यह
मन्त्र बुलवाता है—‘‘पुनर्मनः पुनरायुर्मऽआगन्पुनः प्राणः पुनरात्मा मऽआगन् पुनश्चक्षुः पुनः श्रोत्रं
मऽआगन्’’ (यजु० ४।१५)—‘‘मेरा मन फिर आ गया। मेरी आयु फिर आ गई। मेरे प्राण
फिर आ गये। मेरा आत्मा फिर आ गया। मेरी आंख फिर आ गई। मेरे कान फिर आ गये।’’
सोनेवाले के ये सब उससे दूर हो जाते हैं; केवल प्राण रह जाता है। इसलिए कहा—‘‘पुनर्मनः
पुनरायुर्मऽआगन् पुनः प्राणः पुनरात्मा मऽआगन् पुनश्चक्षुः पुनः श्रोत्रं मऽआगन् । वैश्वानरोऽ-
अदब्धस्तनूपाऽअग्निर्नः पातु दुरितादवद्यात्’’ (यजु० ४।१५)—‘‘वैश्वानर अर्थात् सब पुरुषों का
हितकारक और ‘अदब्ध’ अर्थात् किसी से न सताया हुआ अग्नि हमको निन्दित (नाम न लेने
योग्य) पाप से बचावे।’’ उसके कहने का तात्पर्य यह है कि जो सोने में या अन्यथा पाप हो सकते
हों उनसे ईश्वर हमारी रक्षा करे। इसलिए यह मन्त्र पढ़ता है, ‘‘पुनर्मनः...दुरितादवद्यात् (यजु०
४।१५) ॥२३॥
जो पुरुष दीक्षित हुआ है वह यदि व्रत के विरुद्ध आचरण करता है या क्रोध करता है तो
वह पाप करता है और व्रत को भंग कर देता है। दीक्षित पुरुष को क्रोध नहीं करना चाहिए।
अग्नि देवों का व्रतपति है। इसलिए उसी का आश्रय लेता है यह मन्त्र पढ़कर—‘‘त्वमग्ने व्रत-
पाऽअसि देवऽआ मर्त्येष्वा। त्वं यज्ञेष्वीड्यः’’ (यजु० ४।१६)—‘‘हे अग्निदेव ! आप व्रत के पालने-
वाले हैं, मनुष्यों के बीच में। आप यज्ञों में प्रशंसा के योग्य हैं।’’ यह उस पाप का प्रायश्चित्त है।
ऐसा पढ़ने से वह यह दोष नहीं करता और न उसका व्रत भंग होता है। इसलिए वह कहता है