शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-६, ब्राह्मण-१
६५६ शतपथ ब्राह्मण
न्यै॒रेक॑धनैर॒भ्युन्नीय॑ यथाप्र॒भावं॑ प्रचरेयुः स यद्यनी॑तासु॒ दक्षि॑णासु कलशो दीर्ये॑त
तत्रा॒न्येका॑मेव॒ गां द॑द्यादथावभृ॒थादु॑वोदे॒त्य पुनर्दी॑क्षेत पुनर्य॒ज्ञो ह्ये॑व तत्र प्राय॑-
श्चित्ति॒रिति॒ नु कलशदिराम् ॥७॥ अथ सोमा॑तिरिक्तानाम् । यद्य॒ग्निष्टोम॑मतिरि-
च्ये॑त पूत॒भृत ऽव्वोक्थ्यं॑ गृह्णीया॒द्यद्यु॑क्थ्यमतिरि॒च्येत॑ षोड॒शिन॑मुपेयु॒र्यदि॑ षोड॒शि-
नम॑तिरि॒च्येत॒ रात्रि॑मुपेयु॒र्यदि॒ रात्रि॑मतिरि॒च्येता॑हूरा॒त्रमुपे॑यु॒र्नैह्वेवातीरे॒कोऽस्ति॑ ॥८॥
ब्रा॒ह्म॒णम् ॥२ [५.१०.] ॥ पञ्चमोऽध्यायः [२१.] ॥॥
प्र॒जाप॑तिर्वाऽए॒ष यदं॒शुः॑ । सोऽस्यै॒ष आ॒त्मैवात्मा ह्य॑यं प्रजा॒पति॒स्तद॒स्यैत॑मा-
त्मानं॑ कुर्व्वन्ति॒ यन्नैतं॑ गृह्णन्ति॒ तस्मि॑न्ने॒तान्प्रा॒णान्द॑धाति यथा॑ऽयथे॒ते प्रा॒णा ग्रहा॑
व्या॒ख्याय॑न्ते॒ स ह॒ सर्व्व॑तनूरेव यज॑मानोऽमु॒ष्मिंल्लो॒के सम्भ॑वति ॥१॥ तदा॑रम्भ-
णवत् । यन्नैतं गृह्णीयु॒र्यैत॑दनारम्भण॒मिव॒ यन्नैतं॒ न गृह्णन्ति॒ तस्मा॒द्वाऽअं॒शुं गृ॑-
ह्णाति॑ ॥२॥ तं वाऽऔदुम्ब॒रेण॒ पात्रे॑ण गृह्णाति । प्र॒जाप॑तिर्वा ए॒ष प्रा॑जाप॒त्य
उ॑दुम्बर॒स्तस्मा॒दौदु॑म्बरेण॒ पात्रे॑ण गृह्णाति ॥३॥ तं वै च॑तुःस्रक्तिना॒ पात्रे॑ण गृह्णा॑-
ति । त्रयो वाऽइ॒मे लो॒कास्तदि॒माने॑व लो॒कांस्ति॒सृभिरा॑प्नोति प्र॒जाप॑तिर्वाऽअ॒ती-
मांल्लो॒कांश्चतु॑र्थस्तत्प्र॒जाप॑तिमे॒व चतु॑र्थ्याप्नोति॒ तस्मा॑च्चतुःस्रक्तिना॒ पात्रे॑ण गृह्णाति
॥४॥ स वै तूष्णीमेव ग्रावा॑णमाद॒त्ते । तूष्णी॒मंशु॒न्निव॑पति तूष्णी॒मप॑ उपसृजति
तूष्णी॒मुन्नीय॑ सकृद॒भिषु॑णोति तूष्णी॒मन॑पानन्जुहोति॒ तदेनं॑ प्र॒जाप॑तिं करोति
॥५॥ अथास्या॑ऽछ हिर॒ण्यं बद्धं भ॑वति । तदुप॑जिघ्रति स यद्देवात्र क्षणु॒ते वा वि
वा॑ लिश॒तेऽमृ॑त॒मायु॒र्हिर॑ण्यं॒ तदमृ॑त॒मायु॑रा॒त्मन्ध॑त्ते ॥६॥ तडु॑ होवाच राम औ॑-
पतस्विनिः । काममेव प्राण्यात्काममुदन्याद्यद्वै तूष्णीं जुहोति तद्देवैनं प्रजापतिं
करोतीति ॥७॥ अथास्या॑ऽछ हिर॒ण्यं बद्धं भ॑वति । तदुप॑जिघ्रति स यद्देवात्र क्षणु-
ते॒ वा वि॑ वा लिश॒तेऽमृ॑त॒मायु॒र्हिर॑ण्यं॒ तदमृ॑त॒मायु॑रा॒त्मन्ध॑त्ते ॥८॥ तडु॑ होवाच
बुडिल आश्वतराश्विः । उद्यत्यैव गृह्णीयान्नाभिषुणयादभिषुण्वन्ति वाऽअन्यान्भ्यो
का० ४, अ० ५-६, ब्रा० १०-१, कं० ७-८ व १-६ शतपथब्राह्मण / ६५७
दक्षिणा की गायें लाने से पहले कलश टूट जाय तो एक गाय दान दे और अवभृथ स्नान के पीछे
फिर दीक्षित होवे, क्योंकि यह दूसरा यज्ञ ही इसका प्रायश्चित्त है। इतना उन लोगों के लिए
जिनसे कलश टूट जाय ॥७॥
अब उन लोगों के विषय में जिनसे सोम कुछ शेष रह जाय। यदि अग्निष्टोम के पीछे
कुछ सोम शेष रह जाय तो पूतभृथ में से उक्थ्य ग्रह को भर ले। यदि उक्थ्य भरने पर भी शेष
रहे तो षोडशी करे। यदि षोडशी पर भी बच रहे तो अतिरात्र यज्ञ करे। यदि अतिरात्र से भी
बच रहे तो दिन का यज्ञ (बृहत्साम या महाव्रत) करे। इसके पीछे तो अवश्य ही कुछ न
बचेगा ॥८॥
अंशुग्रहः
अध्याय ६--ब्राह्मण १
यह जो अंशु ग्रह है वह प्रजापति ही है। यह इस यज्ञ का आत्मा है, क्योंकि प्रजापति
आत्मा है। 'इस प्रकार जब वे इस ग्रह को निकालते हैं तो मानो यज्ञ के आत्मा को बनाते हैं।
इसमें प्राणों को स्थापित करता है, जैसे इन प्राणों अर्थात् ग्रहों की व्याख्या होती है। यजमान
अपने सम्पूर्ण शरीरसहित परलोक में जन्म लेता है ॥१॥
जब इस ग्रह को ग्रहण करते हैं तो यह आरम्भण है। जब नहीं ग्रहण करते तो आरम्भण
नहीं है। इसलिए अंशु ग्रह को ग्रहण करता है ॥२॥
वह उदुम्बर लकड़ी का होता है। यह प्रजापति है। उदुम्बर प्रजापति का है। इसलिए
उदुम्बर लकड़ी का पात्र होता है ॥३॥
यह चौकोर पात्र होता है। लोक तीन हैं। तीन कोनों से तीन लोकों की प्राप्ति होती
है। इन तीन लोकों के अतिरिक्त चौथा प्रजापति है। इस प्रकार चौथे कोने से प्रजापति की
प्राप्ति करता है। इसलिए चौकोर पात्र होता है ॥४॥
सिल-बटने (ग्रावाण) को चुपके से लेता है। चुपके ही सोम अंशु को उस पर रखता
है। चुपके से उस पर पानी छोड़ता है। चुपके से बटना उठाकर उसे एक बार पीसता है। चुपके
से बिना सांस लिये आहुति देता है। इस प्रकार यजमान को प्रजापति बना देता है ॥५॥
इसमें एक सोने का टुकड़ा रक्खा होता है। उसको सूंघता है। यदि कहीं खुजलाये या
घाव हो जाय तो सोना अमृत है। इस प्रकार अपने में अमृत को धारण करता है ॥६॥
राम औपतस्विनि का कहना है कि जितना जी चाहे सांस ले। चुपके से आहुति देने-मात्र
से ही यजमान प्रजापति बन जाता है ॥७॥
उसमें सोने का टुकड़ा होता है। उसको सूंघता है। यदि खुजलाये या घाव हो जाय तो
सोना अमृत है। इसलिए इसमें अमृत या दीर्घ जीवन की स्थापना करता है ॥८॥
बुडिल आश्वतराश्वि का कहना है कि केवल बटने को उठाकर इसको ले लेवे, पीसे न।