शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-८, ब्राह्मण-५
४६६ शतपथ ब्राह्मण
ति पश्चाद्धि योषायै प्रजाः प्र॒जाय॑न्ते ॥ १०॥ स उ॑पय॒न्नति॑ । स॒मु॒द्रं गङ् स्वाहेत्या॑-
पो वै॑ स॒मुद्र आ॒पो रेतो॒ रेत॒ ऽए॒वैतत्सिञ्चति ॥ ११॥ अ॒न्तरि॑क्षं गङ् स्वाहेति॑ ।
अ॒न्तरि॑क्षं वा॒ऽअनु॒ प्रजाः प्र॒जाय॑न्ते॒ऽन्तरि॑क्षमे॒वैतद॒नु प्र॒जन॑यति ॥ १२॥ दे॒वं स॑वि॒-
ता॒रं गङ् स्वाहेति॑ सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता स॑वितृप्रसूत॒ ऽए॒वैतत्प्र॒जन॑यति
॥ १३॥ मि॒त्रावरु॑णौ गङ् स्वाहेति॑ । प्रा॒णो॒दा॒नौ वै मि॒त्रावरु॑णौ प्रा॒णो॒दा॒नावे॒वै-
तत्प्र॒जासु॑ दधाति ॥ १४॥ अ॒हो॒रा॒त्रे गङ् स्वाहेति॑ । अ॒हो॒रा॒त्रे वा॒ऽअनु॒ प्रजाः प्र॒-
जाय॑न्ते॒ऽहोरा॒त्रेऽए॒वैतद॒नु प्र॒जन॑यति ॥ १५॥ छन्दां॑सि गङ् स्वाहेति॑ । स॒प्त वै
छन्दां॑सि स॒प्त ग्राम्याः॑ प॒शवः॑ स॒प्तार॑ण्या॒स्ताने॒वैतदु॑भ॒यान्प्र॒जन॑यति ॥ १६॥ द्यावा॑-
पृथि॒वी गङ् स्वाहेति॑ । प्र॒जाप॑ति॒र्वै प्र॒जाः सृ॒ष्ट्वा ता द्या॑वापृथि॒वीभ्यां॒ पर्य॑गृह्णा॒त्ता
इ॒मा द्या॑वापृथि॒वीभ्यां॒ परि॑गृहीता॒स्तद्यो॒ऽहैवैष ए॒तत्प्र॒जाः सृ॒ष्ट्वा ता द्या॑वापृथि॒वी-
भ्यां॒ परि॑गृह्णाति ॥ १७॥ अथा॑त्युपय॒न्नति॑ । स यन्नात्यु॑पय॒न्नेद्याव॑त्यो ह्यै॒वाग्रे॑ प्र॒जाः
सृ॒ष्टास्ताव॑त्यो ह्यै॒व स्युर्न प्र॒जाये॑र॒न्नथ॒ यदत्यु॑पय॒न्नति॑ प्रैवैतज्ज॑नयति॒ तस्मा॑दि॒माः
प्र॒जाः पुन॑र॒भ्याव॑र्तं प्र॒जाय॑न्ते ॥ १८॥ ब्राह्मणम् ५ [८.४] ॥ ॥ षष्ठः प्रपाठकः ॥
कण्डिकासंख्या ११२ ॥ ॥
सोऽत्यु॑पय॒न्नति॑ । य॒ज्ञं गङ् स्वाहेत्या॑पो॒ वै य॒ज्ञ आपो॒ रेतो॒ रेत॒ ऽए॒वैत॒त्सि-
ञ्चति ॥ १॥ सोमं॑ गङ् स्वाहेति॑ । रे॒तो वै सोमो॒ रेत॒ ऽए॒वैतत्सि॑ञ्चति ॥ २॥ दि॒व्यं
नभो॑ गङ् स्वाहेति॑ । आ॒पो वै दि॒व्यं नभ॒ आपो॒ रेतो॒ रेत॒ ऽए॒वैतत्सि॑ञ्चति ॥ ३॥
अ॒ग्निं वै॑श्वान॒रं गङ् स्वाहेति॑ । इ॒यं वै पृ॑थि॒व्य॒ग्निर्वै॑श्वान॒रः सेयं प्रति॑ष्ठे॒मामे॒वैतत्प्र-
ति॒ष्ठाम॒भिप्र॒जन॑यति ॥४॥ अथ॒ मुखं॑ वि॒मृष्टे॑ । मनो॑ मे॒ हार्दि॒ यच्छेति॒ तथो॑ ह्योप-
य॒ष्टाऽऽत्मा॒नं नानु॒प्रवृ॑णक्ति ॥५॥ अथ जघन्यया पत्नीः संयाजयन्ति । जघनार्धो वै
ज॒घनी जघनार्द्धाद्धि योषायै प्रजाः प्रजायन्ते तत्प्रैवैतज्जनयति यज्जघन्यया पत्नीः सं-
या॒जय॑न्ति ॥ ६॥ अ॒न्तर॒तो दे॒वानां॑ पत्नी॒भ्योऽव॑द्यति । अ॒न्तर॒तो वै यो॒षायै॑ प्र॒जाः
कां० ३, अ० ८, ब्रा० ४-५, कं० १०-१८ व १-७ शतपथब्राह्मण / ४६७
भी सन्तान पीछे से ही उत्पन्न होती है ॥१०॥
वह उपयाज को इस मन्त्र से देता है—"समुद्रं गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२२) जल
समुद्र है। जल वीर्य है। यह वीर्य ही है जिसको सींचते हैं ॥११॥
"अन्तरिक्षं गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) अन्तरिक्ष में ही सन्तान उत्पन्न होती हैं।
अन्तरिक्ष में ही वह उत्पत्ति करता है ॥१२॥
"देवं सवितारं गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) देवों का प्रेरक सविता है। सविता से
प्रेरित होकर जीवों को प्रेरित कर रहा है ॥१३॥
"मित्रावरुणौ गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) प्राण और उदान मित्र और वरुण हैं।
इस प्रकार प्रजाओं में प्राण और उदान धारण कराता है ॥१४॥
"अहोरात्रे गच्छ स्वाहा" (यजु० ६।२१) दिन-रात में ही सन्तान उत्पन्न होती है।
दिन-रात में ही वह जीवों को उत्पन्न कराता है ॥१५॥
"छन्दाँ७सि गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१)। सात छन्द हैं—सात घर के (ग्राम्य)
और सात वन के (आरण्य) पशु हैं। इन दोनों को वह उत्पन्न कराता है ॥१६॥
"द्यावापृथिवी गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) प्रजापति ने प्रजा को रचकर द्यौ और
पृथिवी के बीच में भर दिया, इसलिए वह द्यौ और पृथिवी के बीच में है। इसी प्रकार यह आहुति
देनेवाला भी प्राणियों को उत्पन्न करके उनको द्यौ और पृथिवी के बीच में रख देता है ॥१७॥
अब वह अन्य उपयाज करता है। यदि इन अन्य उपयाजों को न करे तो उतने ही पशु
रहें जितने आरम्भ में उत्पन्न हुए थे। और न उत्पन्न हों। परन्तु अधिक उपयाजों को करके वह
सन्तान को बढ़ाता है, जिससे इस पृथिवी पर फिर-फिर उत्पन्न हो ॥१८॥
अध्याय ८—ब्राह्मण ५
वह उपयाज करता है—"यज्ञं गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) जल यज्ञ है, जल वीर्य
है। इसके द्वारा वीर्य को सींचता है ॥१॥
"सोमं गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) वीर्य सोम है। वीर्य को इससे सींचता है ॥२॥
"दिव्यं नभो गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) जल 'दिव्य नभ' है। जल वीर्य है। वीर्य
को इससे सींचता है ॥३॥
"अग्निं वैश्वानरं गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) यह पृथिवी अग्नि वैश्वानर है। यही
प्रतिष्ठा है। इस प्रकार इस प्रतिष्ठा को उत्पन्न करता है ॥४॥
अब इस मन्त्र से मुख का स्पर्श करता है—"मनो मे हार्दि यच्छ" (यजु० ६।२१)—
"मुझे मन और हृदय दे।" इस प्रकार उपयाज करनेवाला अपने को नहीं आहुति देता ॥५॥
अब (पशु की) पूंछ से 'पत्नी-संयाज' करते हैं। पूंछ पिछला भाग है। स्त्रियों के पिछले
भाग से ही सन्तान की उत्पत्ति होती है। इसलिए पूंछ से 'पत्नी-संयाज' करके सन्तान की उत्पत्ति
करता है ॥६॥
देवों की पत्नियों के लिए भीतर से भाग काटता है; स्त्रियों के अन्दर से ही सन्तान