शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-५, ब्राह्मण-५
६४२ शतपथ ब्राह्मण
ए॒ष वै प्र॒जाप॑तिः । य ए॒ष य॒ज्ञस्ताय॑ते॒ यस्मा॑दि॒माः प्र॒जाः प्र॒जाता ऋ॒त्विजा-
ये॒तर्ह्य॑नु प्र॒जाय॑न्ते ॥ १॥ उपा॑ꣳशुपा॒त्रमे॒वान्व॒जाः प्र॒जाय॑न्ते । तद्धै तत्पु॒नर्य॒ज्ञे प्र-
युज्य॑ते॒ तस्मा॑दि॒माः प्र॒जाः पुन॑रभ्या॒वर्तं॑ प्र॒जाय॑न्ते ॥ २॥ अ॒न्तर्या॑मपा॒त्रमे॒वान्वव॑यः
प्र॒जाय॑न्ते । तद्धै तत्पु॒नर्य॒ज्ञे प्र॒युज्य॑ते॒ तस्मा॑दि॒माः प्र॒जाः पुन॑रभ्या॒वर्तं॑ प्र॒जाय॑न्ते ॥ ३॥
अथ॒ यदे॒तयो॑रु॒भयोः॑ । स॒ह स॒तो रु॒पा॑ꣳशुं पूर्वं जु॒होति॒ तस्मा॑त् स॒ह स॒तोऽजा॑वि-
क॒स्योभ॑यस्यैवा॒जाः पूर्वा॒ यन्त्यनूचो॒ऽवयः॑ ॥ ४॥ अथ यदुपा॑ꣳशुं हु
कां० ४, अ० ५, ब्रा० ५, कं० १-१२ शतपथब्राह्मण / ६४३
अध्याय ५-ब्राह्मण ५
यह जो यज्ञ किया जाता है यही प्रजापति है जिससे प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं या अब तक
उत्पन्न होती हैं ॥१॥
उपांशु पात्र के पीछे बकरियां लाई जाती हैं। इस उपांशु पात्र का प्रयोग यज्ञ में पुनः-पुनः
होता है। इसलिए ये प्रजा भी फिर-फिर लाई जाती हैं ॥२॥
अन्तर्याम पात्र के पीछे भेड़ें लाई जाती हैं। इस अन्तर्याम पात्र का प्रयोग यज्ञ में पुनः-
पुनः होता है। इसलिए ये प्रजा भी फिर-फिर लाई जाती हैं ॥३॥
अब चूंकि इन दोनों पात्रों के होते हुए उपांशु की आहुति पहले दी जाती है, इसी प्रकार
बकरियों और भेड़ों के साथ होते हुए बकरियाँ आगे चलती हैं, भेड़ें पीछे ॥४॥
अब चूंकि उपांशु की आहुति देकर उसको ऊपर से पोंछते हैं, इसलिए जिस प्रकार तेज
(गाड़ी के) आरे ऊपर को चलते हैं इसी प्रकार ये बकरियाँ भी बड़ी तेजी से चढ़ जाती हैं ॥५॥
और चूंकि अन्तर्याम की आहुति देकर उसको नीचे से पोंछते हैं, इसलिए भेड़ें नीचे को
सिर करके चलती हैं मानो खोद रही हैं। ये बकरियाँ और भेड़ें प्रजापति के सबके प्रत्यक्ष नमूने
हैं। इसलिए वर्ष में तीन बार बच्चा देती हैं और दो या तीन बच्चे देती हैं ॥६॥
शुक्र पात्र के पीछे मनुष्य लाये जाते हैं। चूंकि इस पात्र का यज्ञ में पुनः-पुनः प्रयोग
होता है, इसलिए प्रजा भी पुनः-पुनः लाई जाती हैं। शुक्र वही है जो तपता है (अर्थात् सूर्य);
यही इन्द्र है। मनुष्य पशुओं में इन्द्र है। इसलिए यह उनके ऊपर राज्य करता है ॥७॥
ऋतु-पात्र के पीछे एक खुरवाले (पशु) लाये जाते हैं। चूंकि यज्ञ में इस पात्र का प्रयोग
फिर-फिर होता है, इसलिए ये प्रजा भी फिर-फिर लाई जाती हैं। ऋतु-पात्र ऐसा होता है (हाथ
से बताकर) और एक खुरवाले पशुओं का सिर भी ऐसा होता है। आग्रयण पात्र, उक्थ्य पात्र
और आदित्य पात्र—इन पात्रों के पीछे गायें लाई जाती हैं। इन सबका यज्ञ में पुनः-पुनः प्रयोग
होता है, इसलिए प्रजायें बार-बार लाई जाती हैं ॥८॥
चूंकि बकरियाँ कनिष्ठ पात्रों के पीछे लाई जाती हैं, इसलिए ये साल में तीन बार बच्चा
देती हैं और दो या तीन बच्चे होते हैं, और कनिष्ठ होते हैं, क्योंकि ये कनिष्ठ पात्रों के पीछे लाई
जाती हैं ॥९॥
और गायें चूंकि भूयिष्ठ (पुष्कल) पात्रों के पीछे लाई जाती हैं, इसलिए साल में एक
बार एक ही बच्चा देकर भी वे पुष्कल होती हैं, क्योंकि भूयिष्ठ पात्रों के पीछे लाई जाती
हैं ॥१०॥
अब द्रोण कलश में अन्त को हारियोजन ग्रह निकालता है। द्रोण कलश प्रजापति है।
यह इन्हीं प्रजाओं का रूप हो जाता है। इनकी रक्षा करता है। इनको सूंघता है। यह इनको
उत्पन्न करता है अर्थात् इन्हीं का-सा रूप हो जाता है ॥११॥
ये पात्र पाँच हैं जिनके अनुसार प्रजायें लाई जाती हैं—उपांशु और अन्तर्याम (मिलकर)