शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-४, ब्राह्मण-३
८० शतपथ ब्राह्मण
यो ह॒ वाऽग्नि॑ः सामिधेनीभिः॒ समि॑द्धः । अति॒रात्रं॒ ह वै स इ॒तरस्माद॒ग्ने-
स्तप॑त्यनवधृष्यो हि॒ भव॒त्यनवमृ॒श्यः ॥ १॥ स यथा॒ हैवाग्निः। सामिधेनीभिः॒ स-
मि॑द्धस्तप॑त्येव॒ᳪ॒ हैव ब्राह्मणः॒ सामि॑धेनीर्विदा॒नोनु॑ब्रुवंस्तप॑त्यनवधृ॒ष्यो हि॒ भव॒त्य-
नवमृ॒श्यः ॥ २॥ सोऽन्वाह् । प्र॒व इति॑ प्रा॒णो वै प्र॒वान्प्रा॒णमे॒वैतया॒ समि॑न्द्धे॒ऽग्न
ऽआया॑हि वी॒तय॒ऽइत्य॑पानो वाऽए॒तवानपा॒नमे॒वैतं॒ समि॑न्द्धे बृ॒हच्छोचा यवि-
ष्ठ्येत्यु॑दानो वै बृ॒हच्छोचा उदानमे॒वैतया समि॑न्द्धे ॥ ३॥ स नः॑ पृ॒थु श्र॒वाय्य॒मिति॑ ।
श्रोत्रं॒ वै पृ॒थु श्र॒वाय्यंᳵ श्रोत्रे॑ण॒ हीदमु॑रु पृ॒थु शृणो॑ति श्रोत्र॑मे॒वैतया समि॑न्द्धे ॥ ४॥
ई॒डेन्यो॒ नम॑स्य॒ इति॑ । वाग्वाऽई॒डैन्या वाग्घीदं॒ सर्वमी॑ट्टे॒ वाचेदं॒ सर्वमी॑डितं
वाच॑मे॒वैतया समि॑न्द्धे ॥ ५॥ अश्वो॒ न दे॒ववा॑हन॒ इति॑ । मनो॒ वै दे॒ववा॑हनं॒ मनो॒
हीदं॒ मन॑स्विनं॒ भूयि॑ष्ठं वनीवाक्य॑ते मन ए॒वैतया समि॑न्द्धे ॥ ६॥ अ॒ग्निं दी॒द्यतं बृ॒-
हदि॑ति । चक्षु॒र्वे दी॒द्येव चक्षु॑रे॒वैतया॒ समि॑न्द्धे ॥ ७॥ अ॒ग्निं दूतं वृणीमहे॒ऽइति॑ ।
य ए॒वायं मध्य॑मः प्रा॒ण ए॒तमे॒वैतया समि॑न्द्धे सा है॒षात॒स्था प्रा॒णानामतो॒ ह्यन्य॒
ऽऊ॒र्ध्वाः प्रा॒णा अतो॒ऽन्येऽवाञ्चो॒ऽस्तस्था ह॒ भवत्यतस्थामिनं मन्यन्ते यऽए॒वमेताम-
तस्थां॑ प्रा॒णानां वेद॑ ॥ ८॥ शोचि॒ष्केशस्तमीमह॒ऽइति॑ । शिश्नं॒ वै शोचि॒ष्केशᳵ
शिश्नं॒ हीदं॒ शिश्नि॑नं॒ भूयि॑ष्ठं॒ शोच॑यति शिश्न॑मे॒वैतया समि॑न्द्धे ॥ ९॥ समिद्धो
ऽअग्न॒ऽआहु॑तेति । य ए॒वायमवाङ्प्रा॒ण ए॒तमे॒वैतया समि॑न्द्ध॒ऽश्रा जुहोता दुवस्य-
तेति सर्वमात्मानं॒ समि॑न्द्ध॒ऽआ नखेभ्यो॒ऽथो लोम॑भ्यः ॥ १०॥ स यद्येनं॑ प्रथमा-
यां॒ सामिधेन्यामनुव्याह॑रेत् । तं प्रति॑ ब्रूयात्प्राणं वाऽए॒तदात्मनो॒ऽग्रावाधाः प्रा-
णेनात्मन आर्त्तिमारिष्यसीति तथा॒ हैव स्यात् ॥ ११॥ यदि॑ द्वितीया॑याम॒नुव्याहृ॑-
रेत् । तं प्रति॑ ब्रूयादपानं वाऽए॒तदात्मनो॒ऽग्रावाधा अपानेनात्मन॒ आर्त्ति॑मारिष्य-
सीति तथा॒ हैव स्यात् ॥ १२॥ यदि॑ तृतीया॑याम॒नुव्याहृ॑रेत् । तं प्रति॑ ब्रूयादुदानं
वाऽ - - उदानेना॑ - - स्यात् ॥ १३॥ यदि॑ चतुर्थी॒मन्व्याहृ॑रेत् । तं प्रति॑ब्रूयाच्छ्रोत्रं
कां० १, अ० ४, ब्रा० ३, कं० १-१४ शतपथब्राह्मण / ८१
अध्याय ४—ब्राह्मण ३
जो अग्नि सामिधेनियों द्वारा जलाई जाती है वह अन्य अग्नियों से अधिक चमकती है,
क्योंकि वह ‘अनवधृष्य’ है अर्थात् उस पर कोई आक्रमण नहीं कर सकता, और वह ‘अनवमृश्य’
है अर्थात् उसे कोई बुझा नहीं सकता ॥१॥
जैसे सामिधेनियों द्वारा जलाई गई अग्नि चमकती है, इसी प्रकार वह ब्राह्मण भी चमकता
है जो सामिधेनियों को जानता और बोलता है, क्योंकि वह ‘अनवधृष्य’ और ‘अनवमृश्य’ हो जाता
है, (अर्थात्) कोई उस पर आक्रमण नहीं कर सकता और न उसे पराजित कर सकता है ॥२॥
अब वह कहता है ‘प्र व’ (पहली सामिधेनी) । ‘प्राण’ शब्द में ‘प्र’ अक्षर आता है । इस
सामिधेनी द्वारा वह ‘प्राण’ को ही प्रज्वलित करता है। अब कहा—‘अग्नऽआयाहि वीतये’
(दूसरी सामिधेनी) । ‘अपान’ ऐसा ही है। इससे वह ‘अपान’ को प्रज्वलित करता है। अब कहा—
‘बृहच्छोचा यविष्ठ्य’ (तीसरी सामिधेनी) । ‘उदान’ ही बृहच्छोचा है। इससे वह ‘उदान’ को
प्रज्वलित करता है ॥३॥
अब कहा—‘स नः पृथु श्रवाय्यम्’ (चौथी सामिधेनी) । कान ही ‘पृथु श्रवाय्य’ है ।
क्योंकि कान से ही निकट और दूर का सुनते हैं। इससे कान को ही प्रज्वलित करता है ॥४॥
अब कहा—‘ईडेन्यो नमस्य’ (पाँचवीं सामिधेनी) । वाणी ही ‘ईडेन्य’ है । वाणी ही इस
सबकी स्तुति करती है । वाणी ही से इस सबकी स्तुति की जाती है। इससे वाणी को ही प्रज्वलित
करता है ॥५॥
अब कहा—‘अश्वो न देववाहनः’ (छठवीं सामिधेनी) । मन ही देववाहन है, क्योंकि
मन ही देवों तक विद्वानों को ले जाता है। इससे मन को ही प्रज्वलित करता है ॥६॥
अब कहता है—‘अग्ने दीद्यतं बृहत्’ (सातवीं सामिधेनी) । आँख ही चमकनेवाली है ।
आँख को ही इससे प्रज्वलित करता है ॥७॥
अब कहा—‘अग्निं दूतं वृणीमहे’ (आठवीं सामिधेनी) । यह जो मध्यम प्राण है उसी को
इससे प्रज्वलित करता है। यह प्राणों में अन्तस्थ (अर्थात् भीतर से प्रेरणा करनेवाली) है । इसी
से और प्राण ऊपर को चलते हैं और इसी से अन्य प्राण नीचे को चलते हैं, क्योंकि यह अन्तस्थ
है। जो प्राणों की इस अन्तस्थ शक्ति को समझता है उसे अन्तस्थ मानते हैं ॥८॥
अब कहा—‘शोचिष्केशस्तमीमहे’ (नवीं सामिधेनी) । ‘शिश्न’ (उपस्थेन्द्रिय) ही शोचिष्केश
है। यह इन्द्रिय ही इस इन्द्रिय वाले को जलाती है। इससे शिश्न को ही प्रज्वलित करता है ॥९॥
अब कहा—‘समिद्धोऽअग्न ! आहुत’ (दसवीं सामिधेनी) । यह जो नीचे का प्राण है उसी
को इससे प्रज्वलित करता है। अब कहा—‘आ जुहोता दुवस्यत’ (ग्यारहवीं सामिधेनी) । इससे
समस्त शरीर को नख से लेकर रोम-रोम तक प्रज्वलित करता है ॥१०॥
और यदि पहली सामिधेनी के पढ़ते समय कोई उसे बुरा कहे तो उसके प्रति कहना
चाहिए कि तूने अपना प्राण अग्नि में डाल दिया। इस अपने प्राण से तुझे दुःख होगा और ऐसा
ही होगा भी ॥११॥
और अगर दूसरी सामिधेनी के समय बुरा कहे तो उससे कहे कि तूने अपने अपान को
अग्नि में डाल दिया। तुझे अपने इस अपान से पीड़ा होगी और ऐसा ही होगा भी ॥१२॥
और अगर तीसरी सामिधेनी के समय बुरा कहे तो उसको कहना चाहिए कि तूने अपने
उदान को अग्नि में डाल दिया। इस अपने उदान से तुझे पीड़ा होगी और ऐसा ही होगा भी ॥१३॥
और अगर चौथी सामिधेनी के समय कोई बुरा कहे तो उसको कहना चाहिए कि तूने