शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-८, ब्राह्मण-४
समे॑तु॒ सुलद्मा यद्वि॒षुरूपं॒ भवा॒तीति॑ कृ॒त्स्नावृत॒मेवैतत्क॑रोति दे॒वत्रा यन्त॒मव॑से स-
खायो॒ऽनु वा मातापि॒तरो॑ मद॒न्विति॑ तद्यत्रैनमम॑हीषी॒त्तदेनं॑ कृ॒त्स्नं कृ॒त्वानुसम॑स्य-
ति॒ सोऽस्य कृ॒त्स्नोऽमुष्मिंल्लो॒कऽआ॒त्मा भ॑वति ॥ ३७॥ ब्राह्मणम् ॥ ४ [८. ३] ॥ ॥
त्रीणि ह॒ वै प॑शोरेकाद॒शानि॑ । एकादश प्रया॒जा एकादशानुया॒जा एकादशो-
पय॒जो दश॒ पाण्या अ॒ङ्गुलयो॒ दश॑ पा॒द्या दश॑ प्रा॒णाः प्रा॒ण उ॑दा॒नो व्या॑न इत्ये-
तावा॒न्वै पु॑रुषो यः परा॒र्ध्यः पशू॒नां य᳭ सर्वेऽनु पशवः ॥ १॥ तदा॒हुः । किं त-
द्य॒ज्ञे क्रि॑यते येन प्रा॒णाः सर्वे᳭भ्यो॒ऽङ्गेभ्यः शि॒व इति॑ ॥ २॥ य॒द्वेव॒ गुदं॑ त्रे॒धा करो॑-
ति । प्रा॒णो वै गु॒दः सोऽयं प्रा॒ङाततस्तमयं॒ प्राणो॒ऽनुसं॑चरति ॥ ३॥ स य॒द्वेव गु-
दं॒ त्रेधा॒ करो॑ति । तृतीयमुपय॒ड्भ्यस्तृतीयं॑ गु॒ल्दां तृतीयमुपभृ॑ति॒ तेन॑ प्रा॒णाः सर्वे᳭-
भ्यो॒ऽङ्गेभ्यः शि॒वः ॥ ४॥ स ह॒ त्वेव प॑शुमा॒लभेत॑ । य एनं॑ मे॒धमु॑पनये॒द्यदि॑ कृ॒शः
स्या॒द्यद्य॒स्य मेद॑सः परि॒शिष्यत तद्गुदे॑ न्यषे॒त्प्राणो॒ वै गु॒दः सोऽयं प्रा॒ङाततस्त-
मयं॒ प्राणो॒ऽनुसं॑चरति प्रा॒णो वै प॒शुर्या॒वद्ध्वेव॒ प्राणे॑न॒ प्राणिति॒ तावत्यशुरथ य-
दास्मात्प्रा॒णोऽपक्रा॑मति दार्वि॑व त॒र्हि भूतो॒ऽनर्थ्यः शेते ॥ ५॥ गु॒दो वै प॒शुः । मे-
दो वै मेध॒स्तदेनं॑ मे॒धमु॑पनयति॒ यद्यु॒ऽअच॑त्तलो॒ भव॑ति स्वयमुपै॒त एव त॒र्हि मेधं॑
भव॑ति ॥ ६॥ अथ पृषदा॒ज्यं गृ॑ह्णाति । द्वयं॒ वा॒ऽइद᳭ सर्पि॑श्चैव दधि॑ च द्वन्द्वं॒ वै
मिथु॒नं प्र॒जन॑नं मिथु॒नमे॒वैतत्प्र॒जन॑नं क्रियते ॥ ७॥ तेना॑नुया॒जेषु चरति । प॒शवो
वा॒ऽअनु॑या॒जाः पयः पृषदा॒ज्यं तत्पशू॒ष्वेवैतत्पयो दधाति तदि॒दं प॒शुषु॒ पयो हि॒तं
प्रा॒णो हि पृषदाज्यमन्नं॑ हि पृषदाज्यमन्नं॑ हि प्रा॒णाः ॥ ८॥ तेन पु॒रस्ता॑दनुया॒जे-
षु चर॑ति । स यो॒ऽयं पु॒रस्ता॑त्प्रा॒णस्तमे॒वैतद्द॑धाति॒ तेन पश्चा॒दुप॑र्यङ्क्ते॒ स यो॒ऽयं
प॒श्चात्प्रा॒णस्तमे॒वैतद्द॑धाति तावि॒मा॒ऽउभयतः॑ प्रा॒णौ हि॒तौ यश्चायमु॒परि॑ष्टाद्यश्चाध-
स्ताात् ॥ ९॥ तद्वा॒ऽएतदेकौ द्वाभ्यां॒ वष॑ट्करोति । अध्व॒र्यवे च यश्चैष उपय॒जत्य॑थ
यद्यज॑न्तमुपय॒जति॒ तस्मा॑डुपय॒जो नामा॑थ यदुपय॒जति॒ प्रैवैतञ्जन॑यति प॒श्चाद्ध्युपय॒ज-
कां० ३, अ० ८, ब्रा० ३-४, कं० ३७ व १-१० शतपथब्राह्मण / ४९५
“देव त्वष्टर्भूरि ते संँ समेतु सलक्ष्मा यद् विषुरूपं भवाति” (यजु० ६।२०)—“हे त्वष्टा देव,
तेरी शक्ति संयुक्त हो जिससे जो अलग-अलग रूप की चीज है वह एकरूप हो जाय।” इस
प्रकार वह इसको पूरा चारों ओर से घेर देता है। “देवत्रा यन्तमवसे सखायोऽनु त्वा माता
पितरो मदन्तु” (यजु० ६।२०)—“तेरे सखा, माता-पिता, देवलोक में जाते हुए तुझसे प्रसन्न
हों।” जहाँ-जहाँ इसके अंगों की आहुति दी है वहाँ-वहाँ इसको पूरा करके समन्वय करता है
जिससे परलोक में उसको पूरा शरीर मिले ॥३७॥
अध्याय ८—ब्राह्मण ४
पशुयाग में ग्यारह-ग्यारह के तीन होते हैं—ग्यारह प्रयाज, ग्यारह अनुयाज और ग्यारह
उपयाज। दस हाथ की अंगुलियाँ, दस पैर की, दस प्राण, प्राण, व्यान और उदान। इतने मिल-
कर पुरुष होता है जो पशुओं में सबसे श्रेष्ठ है और पशु जिसके पीछे हैं ॥१॥
इस पर कहते हैं कि यज्ञ में क्या किया जाता है जिससे प्राण सब अंगों के लिए कल्याण-
कारी हो ॥२॥
गुदा के तीन भाग करता है। गुदा प्राण है (प्राण निकलने का स्थान है)। वहाँ से यह
(पशु) फैलता है और यह प्राण उसका संचार करता है ॥३॥
वह गुदा के तीन भाग करता है—एक-तिहाई उपयाज, एक-तिहाई जुहू में और एक-
तिहाई उपभृत् में। इस प्रकार प्राण सब अंगों के लिए कल्याणकारी होता है ॥४॥
केवल वही पशु का आलभन करे जो उसे मेध्ययुक्त कर सकता हो। यदि दुबला हो तो
जो कुछ चर्बी बची वह गुदा में भर दे। गुदा प्राण है। वहाँ से यह (पशु) फैलता है और यह प्राण
उसका संचार करता है। प्राण ही पशु है। जब तक प्राण रहता है तब तक वह पशु है। जब उससे
प्राण निकल जाता है तो लकड़ी के समान वह व्यर्थ पड़ा रहता है ॥५॥
गुदा पशु है। चर्बी मेध है। इसमें मेध देता है। यदि यह पतली हो तो स्वयं ही मेध हो
जाता है ॥६॥
अब पृषदाज्य को लेता है। यह दो प्रकार का है, घी भी और दही भी। द्वन्द्व का नाम है
जोड़ा। प्रजनन का नाम भी जोड़ा है। इस प्रकार प्रजनन करता है ॥७॥
उससे अनुयाज में काम लेता है। पशु अनुयाज हैं। पृषदाज्य दूध है। इस प्रकार वह
पशुओं में दूध धारण कराता है और इस प्रकार पशुओं में दूध रखा जाता है। प्राण पृषदाज्य
है। अन्न पृषदाज्य है। अन्न प्राण है ॥८॥
इनको अनुयाज, में आहवनीय के सम्मुख काम में लाता है। इस प्रकार यह जो आगे
प्राण है उसको (पशु में) रखता है। (प्रतिप्रस्थाता) इसी से पीछे की ओर उपयाज करता है।
इसके द्वारा यह जो पीछे प्राण है उसको (पशु में) धारण कराता है। इस प्रकार दो प्राणों की
प्रतिष्ठा होती है, एक ऊपर, दूसरी नीचे ॥६॥
यह एक (होता) दो के लिए वषट्कार करता है—एक तो अध्वर्यु के लिए और दूसरे
उसके लिए जो उपयाज करता है (अर्थात् प्रतिप्रस्थाता के लिए)। और चूंकि यजन के बाद दी
जाती है इसलिए इसका नाम उपयाज है। उपयाज करने में पीछे से उत्पत्ति होती है। स्त्रियों के