शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-६, ब्राह्मण-४
३२२ शतपथ ब्राह्मण
यु॒ञ्जा॒नस्य॑ ॥ १३॥ अथातः॑ । प॒रि॒वर्त॑नस्यैव॒ सर्व॑तोमुखो वाऽअ॒सावा॑दि॒त्य ए॒ष वा॒-
ऽइ॒दꣳ सर्वं॒ निर्द॑हति॒ यदि॒दं किं च॒ शुष्य॑ति॒ तेनै॑ष॒ सर्व॑तोमुखस्तेनान्ना॒दः ॥ १४॥
सर्व॑तोमुखोऽय॒मग्निः॑ । यतो॒ ह्ये॑व कुत॑श्चा॒ग्नाव॒भ्याद॑धति॒ त्तन॑ ए॒व प्र॒दह॑ति॒ तेनै॑ष॒
सर्व॑तोमुखस्तेनान्ना॒दः ॥ १५॥ अ॒थायमन्य॒तोमु॑खः पु॒रुषः॑ । स ए॒तत्सर्व॑तोमुखो भ॒-
वति॒ यत्प॒रिव॑र्तयते॒ स ए॒वमे॒वान्ना॒दो भ॑वति॒ यथै॒तावे॒तद् य ए॒वं वि॒द्वान्प॒रिव॑र्तयते॒
तस्मा॑द्वि॒ परिव॑र्तयेत ॥ १६॥ त॒द् हो॒वाचा॑सुरिः॑ । किं नु तत्र॑ मु॒खस्य॒ यदपि॒ सर्वा॑-
ण्येव॒ लोमा॑नि वपे॒त यद्वे त्रिः सं॑वत्स॒रस्य॒ यज॑ते॒ तेनै॑व॒ सर्व॑तोमुखस्तेनान्ना॒दस्त॒-
स्मान्ना॑द्रियेत प॒रिव॑र्तयितु॒मिति॑ ॥ १७॥ ब्राह्म॒णम् ॥ ४ [६. ३.] ॥ ॥
तद्यदाहुः॑ । सा॒क॒मे॒धैर्दे॒वा वृ॒त्रम॑घ्नꣳस्तै॒र्विश्व॒ व्य॑जयन्त॒ येय॑मे॒षां वि॒जिति॒स्तामि॒-
ति॒ सर्वै॒र्ह त्वे॑व दे॒वाश्चा॑तुर्मा॒स्यैर्वृ॒त्रम॑घ्नन्स॒र्वैर्विश्व॒ व्य॑जयन्त॒ येय॑मे॒षां वि॒जिति॒स्ताम्
॥ १॥ ते हो॑चुः । केन॒ राज्ञा॒ केनानी॑केन योत्स्याम॒ इति॒ स हा॒ग्निरु॑वाच॒ मया॒ रा-
ज्ञा मयानी॑के॒नेति॒ तेऽग्नि॑ना॒ राज्ञा॒ग्निनानी॑केन च॒तुरो॒ मासः॒ प्राज॑यंस्ता॒न्ब्रह्म॑णा च॒
त्रय्या॑ च वि॒द्यया॒ पर्य॑गृह्णन् ॥ २॥ ते हो॑चुः । केने॑व॒ राज्ञा॒ केनानी॑केन योत्स्याम
इति॒ स ह॒ वरु॑ण उवाच मया॒ राज्ञा॒ मयानी॑के॒नेति॒ ते वरु॑णेनैव॒ राज्ञा॒ वरु॑णेना-
नीके॒नाप॑राꣳश्च॒तुरो॒ मासः॒ प्राज॑यंस्ता॒न्ब्रह्म॑णा चैव॒ त्रय्या॑ च वि॒द्यया॒ पर्य॑गृह्णन् ॥ ३॥
ते हो॑चुः । केने॑व॒ राज्ञा॒ केनानी॑केन योत्स्याम॒ इति॒ स हेन्द्र॑ उवाच मया॒ राज्ञा॒
मयानी॑के॒नेति॒ तऽइन्द्रे॑णैव॒ राज्ञेन्द्रे॑णानीके॒नाप॑राꣳश्च॒तुरो॒ मासः॒ प्राज॑यंस्ता॒न्ब्रह्म॑णा
चैव॒ त्रय्या॑ च वि॒द्यया॒ पर्य॑गृह्णन् ॥ ४॥ स यद्वैश्र्व॑दे॒वेन॒ यज॑ते । अ॒ग्निने॒वैतद्राज्ञा॒ग्नि-
नानी॑केन च॒तुरो॒ मासः॒ प्रज॑यति॒ तच्छ्ये॒नी श॑ल॒ली भ॑वति लो॒हः क्षु॒रः सा या॒
श्ये॒नी श॑ल॒ली सा त्रय्यै॑ वि॒द्यायै॑ रू॒पं लो॒हः क्षु॒रो ब्रह्मणो॑ रू॒पम॒ग्निर्हि ब्रह्म॑
लो॒हित॑ इव॒ ह्यग्नि॑स्त॒स्माल्लो॒हः क्षु॒रो भ॑वति॒ तेन॑ प॒रिव॑र्तयते॒ तद्ब्रह्म॑णा चै॒वैन॑-
मे॒तत्त्रय्या॑ च वि॒द्यया॒ परि॑गृह्णाति ॥ ५॥ अथ॒ यद्व॑रुणप्रघा॒सैैर्यज॑ते । वरु॑णेनै॒वैतद्रा-
कां० २, अ० ६, ब्रा० ३-४, कं० १३-१७ व १-६ शतपथब्राह्मण / ३२३
जो चातुर्मास्य को फिर शुरू करना चाहता है ॥१३॥
अब सिर मुंडाना। यह सूर्य तो सब ओर मुख किये रहता है। वह जो कुछ सूखता है उसे
सूर्य ही तो पीता है। इसलिए यह (यजमान भी) (सिर मुंडाने से) सर्वतोमुख और अन्न पचाने-
वाला हो जाता है ॥१४॥
यह अग्नि भी सर्वतोमुख है। क्योंकि जो कुछ अग्नि में जिधर से भी डाला जाय भस्म
हो जाता है, इसलिए यह (यजमान) भी (सिर मुंडाने से) सर्वतोमुख और अन्न पचानेवाला हो
जाता है ॥१५॥
यह पुरुष तो एक ही ओर मुख रखता है। परन्तु सिर जो मुंडाता है वह सर्वतोमुख हो
जाता है। और जो इस रहस्य को समझकर सिर मुंडाता है वह दोनों (अग्नि और सूर्य) के समान
अन्न पचानेवाला होता है। इसलिए उसको बिल्कुल सिर मुंडाना चाहिए ॥१६॥
इस विषय में आसुरि की राय थी कि 'चाहे सब लोम मुंडा लें, तो भी इससे और मुख से
क्या सम्बन्ध ? वर्ष में तीन बार यज्ञ करने से ही सर्वतोमुख और अन्न पचानेवाला होता है।
इसलिए सिर मुंडाने की कोई आवश्यकता नहीं ॥१७॥
अध्याय ६-ब्राह्मण ४
यह जो कहा गया है कि देवों ने साकमेध यज्ञ के द्वारा वृत्र को मारा और उस विजय
को पा लिया जो उनको प्राप्त है, यह सभी चातुर्मास्य यज्ञों के द्वारा ऐसा हुआ कि देवों ने वृत्र
को मारा और जो विजय उनको प्राप्त है वह सभी के द्वारा हुई है ॥१॥
उन्होंने कहा, 'किस राजा के द्वारा और किस नेता की सहायता से हम लड़ेंगे ?' अग्नि ने
कहा- 'मुझ राजा और मुझ नेता की सहायता से।' अग्नि राजा और अग्नि नेता की सहायता
से उन्होंने चारों महीनों को जीता, और ब्रह्म तथा तीन विद्याओं की सहायता से उन (महीनों)
को घेरा ॥२॥
उन्होंने कहा- 'किस राजा और किस नेता की सहायता से हम लड़ेंगे ?' वरुण ने कहा-
'मुझ राजा और मुझ नेता की सहायता से।' उन्होंने वरुण राजा और वरुण नेता की सहायता
से दूसरे चार महीनों को जीता, और ब्रह्म तथा तीन विद्याओं की सहायता से उनको घेरा ॥३॥
उन्होंने कहा- 'किस राजा और किस नेता की सहायता से हम लड़ेंगे ?' इन्द्र ने कहा-
'मुझ राजा और मुझ नेता की सहायता से।' इन्द्र राजा और इन्द्र नेता की सहायता से उन्होंने
शेष चार महीनों को जीता, और उनको ब्रह्म तथा तीन विद्याओं की सहायता से घेरा ॥४॥
जब वह वैश्वदेव यज्ञ करता है तो इसी अग्नि राजा और अग्नि नेता की सहायता से
चारों महीनों को जीतता है। (सिर मुंडाने के लिए) त्र्येनी शलली (साही का कांटा जिसमें
तीन धब्बे हों) और तांबे का क्षुरा होता है। त्र्येनी शलली तीन विद्याओं का रूप है और क्षुरा
ब्रह्म का रूप है। अग्नि ब्रह्म है, अग्नि लाल है इसलिए तांबे का क्षुरा होता है। उससे चारों ओर
मुंडवाता है। इस प्रकार वह (अध्वर्यु को) ब्रह्म और तीन विद्याओं से घेरता है ॥५॥
जब वह वरुण-प्रघास यज्ञ करता है तो वरुण राजा और वरुण नेता के द्वारा दूसरे चार
३२४ शतपथ ब्राह्मण
ज्ञा व॒रुणेनानी॑केनापरांश्च॒तुरो॒ मासः॒ प्रण॑यति त॒त्त्येनी॑ शल॒ली भ॑वति लो॒हः
क्षु॒रस्तेन॑ परिवर्तयते तल्ल॒क्ष्णया चै॒वैन॑मेत॒त्त्रय्या॑ च वि॒द्यया॒ परि॑गृह्णाति ॥६॥ अथ
यत्साकमेधैर्यज॑ते । इन्द्रे॑णैवैतद्रा॒ज्ञेनेन्द्रा॒णानी॑केनापरांश्च॒तुरो॒ मासः॒ प्रण॑यति त॒त्त्येनी॑
शल॒ली भ॑वति लो॒हः क्षु॒रस्तेन॑ परिवर्तयते तल्ल॒क्ष्णया चै॒वैन॑मेत॒त्त्रय्या॑ च वि॒द्यया॒
परि॑गृह्णाति ॥७॥ स य॒द्वैश्वदेवेन यज॑ते । अ॒ग्निरेव तर्हि॑ भवत्य॒ग्नेरेव सायु॑ज्यꣳ स-
लो॒कतां जयत्यथ यद्वरुणप्रघासैर्यज॑ते वरु॑ण एव॒ तर्हि॑ भवति वरु॑णस्यैव॒ सायु॑ज्यꣳ
सलो॒कतां जयत्यथ यत्साकमेधैर्यज॑तऽइ॒न्द्र एव॒ तर्हि॑ भवतीन्द्र॑स्यैव सायु॑ज्यꣳ स-
लो॒कतां जयति ॥८॥ स य॒स्मिन्नृ॒ता॑वमुं लो॒कमे॑ति । स॒ एनमृतुः पु॒रस्मा॒ऽऋत-
वे॒ प्रय॑च्छति प॒र उ॑ पुरस्मा॒ऽऋत॑वे॒ प्रय॑च्छति स॒ पर॑मेव स्था॒नं प॑र॒मां ग॑तिं गच्छति
चातुर्मास्ययाजी तद्वा॒ऽअ॒न्नं चातुर्मास्ययाजिनमनुविन्दन्ति पर॒मꣳ ह्येव खलु स स्था-
नं पर॒मां ग॑तिं ग॒च्छतीति॑ ॥ १॥ ब्राह्मणम् ॥५[६.४.]॥ पञ्चमः प्रपाठकः ॥ क-
ण्डिकासंख्या १०४ ॥ षष्ठोऽध्यायः [१५.] ॥ अस्मिन्काण्डे कण्डिकासंख्या ५४१ ॥ ॥
इति माध्यन्दिनीये शतपथब्राह्मणे एकपादिकानाम द्वितीयं काण्डं
समाप्तम् ॥२॥
कां० २, अ० ६, ब्रा० ४, कं० ६-६ शतपथब्राह्मण / ३२५
महीनों को जीतता है। तब भी त्र्येनी शलली और तांबे का क्षुरा काम में आता है। उसी से
सिर मुंडवाता है। इस प्रकार ब्रह्म तथा तीन विद्याओं की सहायता से उसको घेरता है ॥६॥
जब वह साकमेध यज्ञ करता है तो इन्द्र राजा और इन्द्र नेता की सहायता से शेष चार
मासों को जीतता है। तब भी त्र्येनी शलली और तांबे के क्षुरे से मुण्डन होता है और ब्रह्म तथा
तीन विद्याओं की सहायता से उसको घेरता है ॥७॥
जब वह वैश्वदेव यज्ञ करता है तो अग्नि ही हो जाता है और अग्नि के सायुज्य और
सालोक्य को प्राप्त होता है। जब वह वरुण-प्रघास यज्ञ करता है तो वरुण हो जाता है और
वरुण के सायुज्य और सालोक्य को प्राप्त होता है। जब वह साकमेध यज्ञ करता है तो इन्द्र हो
जाता है और इन्द्र के ही सायुज्य और सालोक्य को प्राप्त होता है ॥८॥
वह जिस ऋतु में परलोक को जाता है वह ऋतु उसको दूसरे ऋतु के हवाले करता है,
और वह अपने से आगेवाले ऋतु के हवाले करता है। जो चातुर्मास्य यज्ञ करता है वह परम धाम
और परम गति को प्राप्त होता है, इसीलिए कहा है कि चातुर्मास्य यज्ञ करनेवाले को कोई नहीं
पाते क्योंकि वह परम धाम और परम गति को प्राप्त हो जाता है ॥६॥
माध्यन्दिनीय शतपथब्राह्मण की श्रीमत् पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय कृत 'रत्नकुमारी-दीपिका'
भाषा व्याख्या का एकपादिकानाम द्वितीय काण्ड समाप्त हुआ।
द्वितीय—काण्ड
प्रपाठक कण्डिका-संख्या
प्रथम [२. २. २] ११४
द्वितीय [२. ३. २] १०३
तृतीय [२. ४. ३] ११३
चतुर्थ [२. ५. ३] ११५
पञ्चम [२. ६. ४] १०४
योग ५४६
पूर्व के काण्ड का ८३८
पूर्णयोग १३८७