शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-८, ब्राह्मण-२
[८. १.] ॥ ॥
(Note: ॥ ३ [८. १.] ॥ ॥ - numeral ३ is standard Devanagari ३)
L10: ते वा॒ऽएते॒ऽउल्मुके॒ऽउ॒द्धरन्ति । अनुय॒ज्ञेभ्यो यातयामिव वा॒ऽएतद॒ग्निर्भवति
L11: दे॒वेभ्यो हि यज्ञमूहिवान्वत्ययातयाम्न्यनुयाजांस्तन्नवामहा॒ऽइति॒ तस्मा॒द्वा॒ऽएते॒
L12: ऽउल्मुके॒ऽउ॒द्धरन्ति ॥ १ ॥ ते पुन॒रनु॒सꣳस्पृ॑र्शयन्ति । पुन॒रेवैतद॒ग्निमाप्याययन्त्ययात-
L13: यामानं कुर्वन्त्ययातयाम्नि यदत ऊर्ध्वमसꣳस्थितं यज्ञस्य त॒त्तनवामहा॒ऽइति॒ तस्मा-
L14: त्युन्तरनु॒सꣳस्पृ॑र्शयन्ति ॥ २ ॥ अथ समिधमभ्यादधाति । समिद्ध॒ऽए॒वैनमेतत्समिट्टे
L15: यदत ऊर्ध्वमसꣳस्थितं यज्ञस्य त॒त्तनवामहा॒ऽइति॒ तस्मात्समिध
कां० १, अ० ८, ब्रा० २, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / १६१
पृथिवी है, इसलिए वह इसे इस प्रकार खाता है ॥४१॥
जब होता आशीर्वाद देता है तब इस मन्त्र का जप करता है, “मयीदमिन्द्रऽइन्द्रियं
दधात्वस्मान् रायो मघवानः सचन्ताम्। अस्माकँ सन्त्वाशिषः सत्या नः सन्त्वाशिषः” (यजु०
२।१०)—“इन्द्र मुझमें इन्द्र की शक्ति दे। हमको बहुत-सा धन प्राप्त हो। आशिष हमारे लिए
हो। सच्चीं आशिषें हमारे लिए हों।” यह आशिष का परिग्रह (लेना) है। यहाँ ऋत्विज् जो
आशिष यजमान के लिए देता है वह उनको ग्रहण करके अपनी बना लेता है ॥४२॥
अब दोनों पवित्रों से मार्जन करते हैं, क्योंकि अब उन्होंने इडा को पाक-यज्ञिया दे दिया।
अब वे दोनों पवित्रों से इसलिए मार्जन करते हैं कि अब जो यज्ञ का भाग बच रहा है उसको हम
पवित्रों से मार्जन करके पूरा करेंगे ॥४३॥
वह (अध्वर्यु) दोनों पवित्रों को प्रस्तर पर छोड़ देता है। यजमान ही प्रस्तर है। प्राण
और अपान पवित्रे हैं। इस प्रकार वह यजमान में प्राण और अपान को धारण कराता है।
इसलिए उन पवित्रों को प्रस्तर पर छोड़ता है ॥४४॥
अध्याय ८—ब्राह्मण २
अब वे (आहवनीय अग्नि में से) दो जलती हुई समिधायें निकालते हैं। यह अग्नि अनुयाजों
के लिए व्यर्थ-सी हो जाती है, क्योंकि देवों के लिए यज्ञ को ले जाती है। (वे सोचते हैं कि) ऐसी
आग में अनुयाज करें जो यातयामा (बुझी या व्यर्थ-सी) न हो। इसलिए दो जलती हुई समिधाओं
को निकालते हैं ॥१॥
वे फिर उनको (आग के) पास लाते हैं। इस प्रकार वे आग को फिर बढ़ा देते और
ताजा कर देते हैं। (वे सोचते हैं कि) जो कुछ यज्ञ में से शेष रह गया है उसको ऐसी अग्नि में
करें जो यातयामा न हो। (जिस अग्नि से एक बार काम ले चुके वह मानो थक-सी गई। उसे
यातयामा कहा। अब दो समिधाओं को पहले निकालकर फिर उसी में रखने से मानो वह ताजा
हो गई।) इसीलिये वे उनको फिर पास लाते हैं ॥२॥
अब (अग्नीध्र) समिधा रखता है। इससे वह अग्नि को प्रज्वलित करता है। (वह
सोचता है कि) जो यज्ञ की शेष क्रिया रह गई है उसको प्रज्वलित अग्नि में करूँ। अतः वह
समिधा रखता है ॥३॥
होता इस मन्त्र को पढ़कर उसका अनुमन्त्रण (पवित्रीकरण) करता है, “एषा तेऽअग्ने समित्
तथा वर्द्धस्व चा च प्यायस्व। वर्द्धिषीमहि च वयमा च प्यासिषीमहि” (यजु० २।१४)—“हे अग्नि!
ये तेरी समिधा हैं। इनके द्वारा बढ़ और प्रज्वलित हो, और हम भी बढ़ें और प्रतापी हों।” जैसे
पहले समिधा लगाते हुए जिस प्रकार मन्त्र पढ़ा था, उसी प्रकार अब भी पढ़ता है। यह होता का
कर्म है। परन्तु यदि समझे कि होता नहीं जानता तो यजमान स्वयं ही अनुमन्त्रण करे ॥४॥
अब वह उसका सम्मार्जन करता है, अर्थात् उसे इकट्ठा कर देता है, जैसे इधर-उधर से
चिमटे द्वारा बुझती हुई आग को इकट्ठा करके फिर ताजा कर देते हैं। ‘इस प्रकार इकट्ठा
होकर यह जो कुछ यज्ञ में शेष रहा है उसको भी (देवताओं के लिए) ले जावे।'-इसलिए उसका
सम्मार्जन करता है। (प्रत्येक समिधा को) एक-एक बार सम्मार्जित करता है। इससे पहले देवों के
लिए उन्होंने फिर से तीन-तीन बार सम्मार्जन किया था। 'ऐसा न हो कि जैसा देवों के लिए किया
था वैसा ही हो जाय'-इसलिए एक-एक बार सम्मार्जन करता है। यदि तीन बार पहले करे, फिर
तीन बार करे तो दुहराने का दोष लगे। इसलिए एक-एक बार ही सम्मार्जन करता है ॥५॥
वह इस मन्त्र से सम्मार्जित करता है, “अग्ने वाजजिद् वाजं त्वा ससृवाꣲसं वाजजित्ँ,
सम्मार्ज्मि” (यजु० २।१४)—“हे अन्न को जीतनेवाले अग्नि, अन्न लिये हुए और अन्न को जीतने-
वाले, तुझको सम्मार्जित (इकट्ठा) करता हूँ।” पहले कहा था 'सरिष्यन्तम्' अर्थात् लेते हुए,
१६२ शतपथ ब्राह्मण
र्हि॒ तर्हि॑ भृत्यै॒यात्र॑ सम्वा॒ᳪस॒मिति॑ सम्भू॒तेव॒ ह्यत्र॑ भवति॒ तस्मा॑दाह सम्वा॒ᳪस-
मिति॑ ॥ ६॥ अथानुया॒जान्य॑जति । या वाऽए॒तेन॑ य॒ज्ञेन॑ दे॒वता॑ ह्व॒यति॒ याभ्य॑ ए॒ष
य॒ज्ञस्ताय॑ते॒ सर्वा॑ वै तत्ता॒ इष्टा॑ भवन्ति॒ तद्यत्तासु॒ सर्वा॑स्वि॒ष्टास्वथै॑तत्प॒श्वेवानु॒यज॑-
ति॒ तस्मा॑दनुया॒जा नाम॑ ॥७॥ अथ॒ यद॑नुया॒जान्यज॑ति । छन्दा॒ᳪसि॒ वाऽअनुया॒जाः
पश॒वो वै दे॒वानां॒ छन्दा॒ᳪसि॒ तद्यथे॒दं पश॑वो यु॒क्ता म॑नु॒ष्ये॑भ्यो वह॑न्त्ये॒वं छन्दा॒ᳪसि
यु॒क्तानि॑ दे॒वेभ्यो॑ य॒ज्ञं वह॑न्ति॒ तद्यत्र॒ छन्दा॒ᳪसि दे॒वाᳪस॑मतर्पयन्नथ॒ छन्दा॒ᳪसि दे॒वाः
सम॑तर्पयंस्तदतस्तन्नागभूद्यच्छन्दा॒ᳪसि यु॒क्तानि॑ दे॒वेभ्यो॑ य॒ज्ञम॒वानुर्य॒देनाᳪस॑मती-
तृपन् ॥ ८॥ अथ॒ यद॑नुया॒जान्यज॑ति । छन्दा॒ᳪसि॒ वाऽअनुया॒जाश्छन्दो॑भ्यै॒वैतत्संत॑र्प-
यति॒ तस्मा॑दनुया॒जान्यज॑ति॒ तस्मा॒द्येन॒ वाह॑नेन धावेयु॒स्तद्विमुच्य॑ ब्रूया॒त्पाय॑यतेन॒-
त्सुहितं॑ कुरु॒तेत्ये॒ष उ वाहनस्याप्या॒यः ॥ ९॥ स वै खलु ब॒र्हिः प्र॑थमं॒ यज॑ति ।
तद्वै॒ कनि॑ष्ठं॒ छन्दः॑ स॒द्गाय॑त्री प्रथमा॒ छन्द॑सां यु॒ज्यते॒ तद्यत्तद्वी॒र्येणे॑व य॒ज्ञेनो॒ भूत्वा॒
दि॒वः सोम॒माह॑रत्तद्यथाय॒थं म॑न्यन्ते॒ यत्कनि॑ष्ठं॒ छन्दः॑ स॒द्गाय॑त्री प्रथमा॒ छन्द॑सां यु॒-
ज्यते॒ऽथात्र॑ यथाय॒थं दे॒वाश्छन्दा॒ᳪस्यकल्प॑यन्ननुया॒जेषु॒ नेत्पापवस्यसमसदिति॑ ॥ १०॥
स वै खलु ब॒र्हिः प्र॑थमं॒ यज॑ति । अ॒यं वै लो॒को ब॒र्हिरोष॑धयो ब॒र्हिर॒स्मिन्ने॒वैत-
ल्लोक॒ऽओष॑धीर्दधाति॒ ता इ॒मा अ॒स्मिंल्लोक॒ऽओष॑धयः प्रति॑ष्ठिता॒स्तदि॒दᳪ सर्वं॑ ज॒-
गद॒स्यां तेने॒यं जग॑ती॒ तज्जग॑तीं प्रथ॒मामक॑ुर्वन् ॥ ११॥ अथ॒ नरा॒शᳪसं॑ द्वि॒तीयं॑ य-
ज॑ति । अ॒न्तरि॑क्षं॒ वै न॑रा॒शᳪसः॑ प्र॒जा वै न॑र॒स्ता इ॒मा अ॒न्तरि॑क्षम॒नु वावद्य॑मानाः
प्र॒जाश्चर॑न्ति॒ यदि॒ वद॑ति॒ शᳪसती॑ति वै तदा॒हुस्तस्मा॑द॒न्तरि॑क्षं नरा॒शᳪसो॒ऽन्तरि॑क्षमु
वै त्रि॒ष्टुप्त॑न्त्रि॒ष्टुभं॑ द्वि॒तीयामक॑ुर्वन् ॥ १२॥ अथा॒ग्निरु॑त्तमः । गाय॒त्री वा॒ऽअग्निस्तद्गा-
य॒त्रीमु॑त्त॒मामक॑ुर्वन्ने॒वं य॑थाय॒थेन॑ कॢ॒प्तेन॒ छन्दा॒ᳪसि॒ प्रत्य॑तिष्ठ॒ᳪस्तस्मा॑दि॒दम॑पापवस्य॒सम्
॥ १३॥ दे॒वान्य॑जे॒त्येवाध्व॑र्यु॒राह॑ । दे॒वं-॑दे॒वमिति॒ सर्वे॑षु होता दे॒वानां॒ वै दे॒वाः सन्ति॒
छन्दा॒ᳪस्येव प॒शवो॒ ह्ये॑षां गृ॒हा हि प॒शवः प्रति॑ष्ठो हि गृ॒हाश्छन्दा॒ᳪसि वा॒ऽअनु-
कां० १, अ० ८, ब्रा० २, कँ० ६-१४ शतपथब्राह्मण / १६३
क्योंकि उस समय लेने का काम जारी था। अब कहा, 'ससृवांसम्' अर्थात् लिये हुए, क्योंकि जब
लेने का काम पूरा हो चुका, इसलिए कहा 'ससृवांसम्' ॥६॥
अब वह अनुयाजों की आहुति देता है। इस यज्ञ द्वारा जिस-जिस देवता की आहुति दी
गई और जिस-जिस के लिए यज्ञ किया गया, उनके लिए आहुतियां दी जा चुकीं। अब उन्हीं इष्ट
देवों के लिए फिर आहुतियां देता है, इसलिए इसका नाम अनुयाज है। (जिस देवता के लिए यज्ञ
हो चुका उस देवता को 'इष्ट' कहते हैं। अनुयाज का अर्थ है अनु+याज-'जो आहुति पीछे से दी
जाय') ॥७॥
अनुयाज इसलिए किये जाते हैं। अनुयाज ही छन्द हैं। छन्द ही देवों के पशु हैं। जिस
प्रकार पशु जुतकर मनुष्यों के लिए बोझ ले जाते हैं, उसी प्रकार छन्द भी युक्त होकर देवताओं
के लिए यज्ञ को ले जाते हैं। जब छन्दों ने देवों को तृप्त किया और देवों ने छन्दों को तृप्त किया,
यह पहले था। अब युक्त छन्दों ने देवों तक यज्ञ को पहुँचाया और उनको तृप्त किया ॥८॥
और अनुयाज करने का यह भी कारण है—अनुयाज ही छन्द हैं। इस प्रकार वह इन
(छन्दों) को तृप्त करता है, इसलिए अनुयाज करता है। जिस वाहन से यात्रा की उसी वाहन
को छोड़कर कहते हैं—'इसको जल दो। इसको खाना दो।' और यही वाहन का तृप्त करना
है ॥९॥
वह पहले बर्हि-यज्ञ करता है। छन्दों में सबसे पहले छोटा छन्द गायत्री बोला जाता है।
छन्दों को पशु या वाहन कहा, इसलिए 'जोतना' शब्द प्रयुक्त हुआ, और यह है शक्ति (वीर्य) के
कारण, क्योंकि यह श्येन होकर सोम को देवों तक ले गया था। अब इसको यथार्थ नहीं समझते
कि छोटे-से गायत्री छन्द को छन्दों में सबसे पहले जोतें। इसीलिये अनुयाजों में देवों ने छन्दों
को ठीक-ठीक कर दिया जिससे भूल न हो जाय ॥१०॥
अब सबसे पहले बर्हि-यज्ञ करता है। यह लोक ही बर्हि है। ओषधि बर्हि है। इस प्रकार
इस लोक में ओषधियों को रखता है। वे ओषधियां इस लोक में स्थापित होती हैं। इस छन्द में
सब 'जगत्' प्रतिष्ठित है, इसलिए इसको 'जगती' कहा। इसलिए उन्होंने जगती छन्द को पहले
कहा ॥११॥
अब नराशंस-यज्ञ करता है। अन्तरिक्ष ही नराशंस है। प्रजा को नर कहते हैं। ये नर
(मनुष्य) अन्तरिक्ष में बोलते हुए विचरते हैं। जब मनुष्य बोलता है तो कहते हैं 'शंसति',
इसलिए अन्तरिक्ष को नराशंस कहा। अन्तरिक्ष ही त्रिष्टुप् है। इसलिए त्रिष्टुप् छन्द को दूसरा
दर्जा दिया ॥१२॥
अब अग्नि अन्तिम है। गायत्री ही अग्नि है। इसीलिये गायत्री को अन्तिम दर्जा दिया।
इस प्रकार उन्होंने छन्दों को यथार्थ दर्जों में प्रतिष्ठित कर दिया, जिससे भूल न हो ॥१३॥
अध्वर्यु कहता है, 'देवों के लिए यज्ञ करो', और होता इस प्रकार आरम्भ करता है,
'देवं, देवम्'। क्योंकि छन्द देवों के देव हैं, ये पशु हैं। पशु ही इनके घर हैं। घर ही प्रतिष्ठा हैं!