शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-४, ब्राह्मण-१
६६ शतपथ ब्राह्मण
द्वेव॒ भवति पापीयान्वा यस्यै॒वं विदुष एता अन्वाहु॒ः सोऽर॒णा मीमा॒ꣳसैवै न
त्वे॒वैता अनूच्य॑न्ते ॥ १२॥ त्रिरे॒व प्रथ॒मां त्रिरुत्तमाममवानन्ननुब्रूयात् । त्रयो वा
ऽइ॒मे लोका॒स्तदिमाने॒वैतल्लो॒कांत्संतनोतीमांल्लो॒कांत्स्पृणुते त्रय इमे पुरुषे प्राणा
ए॒तने॒वास्मिन्ने॒तत्संततमव्यवच्छिन्नं दधात्ये॒तदनुवचन॑म् ॥ १३॥ स यावदस्य वर्चः
स्यात् । ए॒वमे॒वानुविवञ्चेत्तस्यैतस्य परिचक्षाेत साम्यवान्यादनवानन्ननुविवञ्चेस्त-
त्कर्म विवृञ्चेत सा परिचक्षा ॥ १४॥ स यच्चेत्तन्नोदाश॒ꣳसित । अथै॒कैकामिवान-
वानन्ननुब्रूयात्तदे॒कैकयैवेमांल्लो॒कांत्संतनोत्ये॒कैकयेमांल्लो॒कांत्स्पृणुते॒ऽथ यत्प्राणं द-
धाति गायत्री वै प्राणः स यत्कृत्स्नां गायत्रीमन्वाह॒ तत्कृत्स्नं प्राणं दधाति तस्मा-
दे॒कैकमेवानवानन्ननुब्रूयात् ॥ १५॥ ता वै संतत॒मव्यवच्छिन्ना अन्वाह । संव-
त्स॒रस्यैवैतदहोरात्राणि संतनोति तानीमानि संवत्सरस्याहोरात्राणि संततान्यव्य-
वच्छिन्नानि परिलुवन्ते द्विषन्तं॒ड चैवैतद्भातृव्याय नोपस्थानं करोत्युपस्थानं ह
कुर्याद्यद्संतता अनुब्रूयात्तस्माद्वि संतता अव्यवच्छिन्ना अन्वाह ॥ १६॥ ब्राह्मणम्
॥२[५.]॥ अध्यायः ॥३॥ ॥
हिंकृत्यान्वाह । नासामा य॒ज्ञोऽस्तीति वाऽआहुर्म वाऽअहिंकृत्य साम गी-
यते म य॒द्धिंकरोति तद्धिंकार॒स्य रूपं क्रियते प्रणवे॑नैव साम्नो रूपमुपगहृत्यो३म्
ओ३मित्येतेनो हास्यैष सर्व एव ससामा य॒ज्ञो भवति ॥ १॥ यद्वेव हिंकरोति ।
प्राणो वै हिंकार॒ः प्राणो हि वै हिंकारस्तस्मादपिगृह्य नासिके न हिंकर्तुꣳ श-
क्नोति वाचा वाऽऋचमन्वाह वाक्क वै प्राणश्च मिथुनं तदे॒तत्पुरस्तान्मिथुनं प्रज-
ननं क्रियते सामिधेनीनां तस्मा॒द्धि हिंकृत्यान्वाह ॥ २॥ स वाऽउपाꣳशु हिंकरो-
ति । अथ यदुच्चैर्हिंकुर्यादन्यतर॒द्वि कुर्याद्वाचमेव तस्मादुपाꣳशु हिंकरोति ॥ ३॥
स वाऽर्ऋति च प्रेति चान्वा॒ह । गायत्रीमेवैतदर्वाचीं च पराचीं च युनक्ति परा-
च्यह देवेभ्यो यज्ञं वह॒त्यर्वाची मनु॒ष्यानवति तस्माद्वाऽर्ऋति च प्रेति चान्वा॒ह
कां० १, अ० ४, ब्रा० १, कं० १-४ शतपथब्राह्मण / ६७
समझता है उसी के लिए वे (इक्कीस मंत्र) बोलते हैं। परन्तु यह तो मीमांसा मात्र है। इक्कीस
मंत्र बोले नहीं जाते ॥१२॥
पहले मंत्र को तीन बार और पिछले को तीन बार एक साँस में पढ़ना चाहिए। तीन ही
ये लोक हैं। अतः वह इन तीनों लोकों को तानता है। पुरुष में तीन प्राण होते हैं। ऐसा करने
से उसका जीवन बढ़ जाता है। (मृत्यु) उसको बीच से काटता नहीं ॥१३॥
होता को चाहिए कि बिना बीच में तोड़े हुए जितनी-भर उसकी शक्ति हो उससे मंत्रों
को पढ़ता रहे। बीच में साँस तोड़ देने का अर्थ यह है कि यज्ञ का अनादर किया गया। बिना साँस
तोड़े लगातार पढ़ने से यह पाप नहीं लगता ॥१४॥
यदि वह ऐसा करना न चाहे तो एक-एक मंत्र को ही बिना साँस तोड़े बोले। इस प्रकार
वह एक-एक करके लोकों की प्राप्ति करेगा। वह साँस इसलिए लेता है कि गायत्री प्राण है। पूरी
गायत्री पढ़कर मानो वह यजमान के लिए पूरे प्राण का सम्पादन करता है। इसलिए उसको
एक-एक मंत्र बिना साँस तोड़े पढ़ने चाहिएँ ॥१५॥
उनको बराबर बिना तोड़े हुए पढ़ना चाहिए, इस प्रकार वह सम्वत्सर के दिन और
रातों को लगातार कर देता है। वर्ष के दिन और रात बिना अन्तर के ही गुजरते हैं। इस प्रकार
वह द्वेषी शत्रु को अवसर नहीं देता। यदि बीच में तोड़कर पढ़ेगा तो अपने शत्रु को अवकाश दे
देगा। इसलिए वह बिना तोड़े हुए लगातार पढ़ता है ॥१६॥
अध्याय ४-ब्राह्मण १
मंत्र बोलने से पहले 'हिङ्' बोलना चाहिए। ऐसा कहते हैं कि बिना सामगान के यज्ञ
नहीं होता और साम बिना हिङ्कार के गाया नहीं जाता। हिङ्कार से हिङ् का रूप होता है और
प्रणव या ओङ्कार से साम का रूप। 'ओ३म्' कहने से समस्त यज्ञ सामरूप हो जाता है ॥१॥
हिङ्कार क्यों कहता है? इसलिए कि प्राण हिङ्कार है। प्राण हिङ्कार इसलिए है कि नाक
के नथने बन्द करने पर हिङ्कार नहीं बोल सकते। ऋचाओं को वाणी से बोलता है। वाणी और
प्राण का जोड़ा है। हिङ्कार बोलकर सामिधेनियां पढ़ने का तात्पर्य यह है कि सामिधेनियों में
सन्तान का प्रजनन करा देता है (जोड़ा मिलाकर) ॥२॥
हिङ्कार मन्द स्वर में बोला जाता है। हिङ्कार उच्च स्वर से बोलेगा तो हिङ्कार और
वाणी एक ही हो जाएगी। अतः हिङ्कार को मन्द स्वर से बोलना चाहिए ॥३॥
'आ' और 'प्र' कहकर बोलता है। इस प्रकार वह उधर जानेवाली गायत्री को इधर
आनेवाली गायत्री से जोड़ देता है। उधर जानेवाली गायत्री देवों के लिए यज्ञ को ले जाती है।
इधर आनेबाली गायत्री मनुष्यों की रक्षा करती है। इसलिए 'आ' और 'प्र' का प्रयोग करता
है ॥४॥
६८ शतपथ ब्राह्मण
॥४॥ य॒द्ध्येवेति॑ च प्रेति॑ चान्वा॒ह । प्रेति॒ वै प्रा॒ण ऽत्युदा॒नः प्रा॒णोदा॒नावे॒वैत॒द्द-
धाति॒ तस्मा॑द्द्वा॒ऽइति॑ च प्रेति॑ चान्वा॒ह ॥५॥ य॒द्ध्येवेति॑ च प्रेति॑ चान्वा॒ह । प्रेति॑
वै रेतः॑ सिच्यत॒ऽइति॑ प्र॒जाय॑ते॒ प्रेति॑ प॒शवो॒ विति॑ष्ठन्त॒ऽइति॑ समा॒वर्त॑न्ते॒ सर्वं॒ वा
ऽइ॒दमेति॑ च प्रेति॑ च॒ तस्मा॑द्द्वा॒ऽइति॑ च॒ प्रेति॑ चान्वा॒ह ॥६॥ सो॒ऽन्वाह॑ । प्र वो॑
वाजा॑ अभि॒द्यव॒ इति॒ तन्नु॒ प्रेति॑ भवत्य॒ग्नऽआया॑हि वी॒तय॒ऽइति॒ तद्ध्येति॑ भवति
॥७॥ तदु॒ हैक॒ऽआहुः॑ । उ॒भयं॒ वाऽए॒तत्प्रेति॑ संपद्यत॒ऽइति॒ तदु॒ तदा॑ति॒विज्ञा॒न्य-
मिव॒ प्र वो॑ वा॒जा अ॑भि॒द्यव॒ऽइति॒ तन्नु॒ प्रेत्य॒ग्नऽआया॑हि वी॒तय॒ऽइति॒ तद्ध्येति॑ ॥८॥
सो॒ऽन्वाह॑ । प्र वो॑ वाजा॑ अभि॒द्यव॒ इति॒ तन्नु॒ प्रेति॑ भवति॒ वाजा॒ इत्यन्नं॒ वै वा-
जा॒ अन्न॑मे॒वैतद॒भ्यनू॒क्तम॑भि॒द्यव॒ इत्य॑र्धमासा॒ वाऽअ॑भि॒द्यवो॒ऽर्धमा॒साने॒वैतद॒भ्यनू॒क्तꣳ
ह॒विष्म॑न्त॒ इति॑ प॒शवो॒ वै ह॒विष्म॑न्तः प॒शूने॒वैतद॒भ्यनू॒क्तम् ॥१॥ घृ॒ताच्या॒इति॑ । वि॒-
देघो॑ ह॒ माथ॒वोऽग्निं वै॑श्वान॒रं मुखे॑ बभार॒ तस्य॒ गोत॑मो राहू॒गण॒ ऋषिः॑ पुरो-
हित॑ आस॒ तस्मै॑ ह॒ स्मामन्त्र्य॑माणो न॒ प्रति॑शृणोति॒ नेन्मे॒ऽग्निर्वे॑श्वान॒रो मु॒खान्नि-
ष्पद्याता॒ऽइति॑ ॥१०॥ तमृ॒ग्भिर्ह्वयि॑तुं दध्रे । वी॒तिहो॑त्रं त्वा कवे द्यु॒मन्तꣳ॑ स॒मिधी-
महि॑ । अग्ने॑ बृ॒हन्त॑मध्व॒रे वि॒देधेति॑ ॥११॥ स न प्रति॑शुश्राव । उद॑ग्ने॒ शुच॑यस्तव॒
शुक्रा भ्रजि॑न्त॒ ईर॑ते । तव॒ ज्योतिꣳ॒ष्यर्चयो॒ विदे॒धाऽइति॑ ॥१२॥ स ह॒ नैव प्रति॑-
शुश्राव । तं त्वा॑ घृ॒तस्नवीमहे॒ऽइत्ये॒वाभि॒व्याह॑र॒दथा॑स्य घृ॒तकी॑र्त्तावेवा॒ग्निर्वे॑श्वान॒रो
मुखा॒दुज्ज॑ज्वाल॒ तं न॑ शशाक धार॒यितुꣳ॒ सो॒ऽस्य मु॒खान्निष्पे॑दे॒ स इ॒मां पृ॑थि॒वीं
प्रापा॑दः ॥१३॥ तर्हि॑ वि॒देघो माथ॒व आस॑ । स॒रस्व॑त्याꣳ स तत॑ ए॒व प्राङ॒द्दह॑न्न-
भीयाये॒मां पृ॑थि॒वीं तं गोत॑मश्च राहू॒गणो॑ वि॒देघश्च॑ माथ॒वः प॒श्चाद्दह॑न्त॒मन्वी॑यतुः
स इ॒माः सर्वा॑ नदी॒रति॑ददाह स॒दानी॑रेत्युत्त॒राद्गिरेर्निर्धाव॑ति॒ ताꣳ॒ हैव॒ नाति॑ददाह
ताꣳ ह॒ स्म तां पु॒
कां० १, अ० ४, ब्रा० १, कं० ५-१५ शतपथब्राह्मण / ६६
'आ' और 'प्र' कहने का एक कारण और भी हो सकता है। 'प्र' प्राण है और 'आ'
उदान। इस प्रकार प्राण और उदान को धारण कराता है। इसलिए 'आ' और 'प्र' का प्रयोग
करता है ॥५॥
'आ' और 'प्र' कहने का एक कारण और भी हो सकता है। 'प्र' से वीर्य सींचा जाता
है, 'आ' से सन्तान उत्पन्न होती है। 'प्र' से पशु चरने के लिए जाते हैं, 'आ' से घर लौटते
हैं। वस्तुतः संसार में हर एक वस्तु आती और जाती है। इसलिए 'आ' और 'प्र' का प्रयोग
करता है ॥६॥
वह कहता है 'प्र वो वाजा अभिद्यवः'–“आपके अन्न द्यौलोक को जावें।” यह हुआ 'प्र'
या जाना। अब कहता है 'अग्न आ याहि वीतये'—‘‘हे अग्नि, वृद्धि के लिए आ !” इससे 'आ'
या आना हुआ ॥७॥
कुछ का कहना है कि इन दोनों से 'प्र' अर्थात् जाने का ही अर्थ निकलता है। परन्तु यह
तो साधारण बुद्धि में आता नहीं। वस्तुतः 'प्र वो वाजा अभिद्यवः' से जाना ही अभीष्ट है और
'अग्न आ याहि वीतये' से आना ॥८॥
वह (पहली सामिधेनी को) पढ़ता है, 'प्र वो वाजा अभिद्यवः', इससे जाना अभिप्रेत है।
वाज कहते हैं अन्न को। इसके पाठ से अन्न की प्राप्ति होती है। 'अभिद्यवः' से अर्द्धमास का अर्थ
निकलता है, क्योंकि अर्द्धमास द्यौलोक को जाते हैं। अब कहता है, 'हे हवि वालो !' हवि वाले
पशु होते हैं। इस प्रकार पशुओं की प्राप्ति कराता है ॥६॥
अब वह कहता है 'घृताची'। विदेघ का राजा माथव अपने मुख में वैश्वानर अग्नि
रखता था। उसका राहूगण गौतम पुरोहित था। पुरोहित ने पुकारा तो वह न बोला कि कहीं
मेरे मुख से अग्नि निकल न पड़े ॥१०॥
तब उस पुरोहित ने उसका (ऋग्वेद ५।२६।३) से आह्वान किया—'वीतिहोत्रं त्वा कवे
द्युमन्तं समिधीमहि । अग्ने बृहन्तमध्वरे'—'हे बुद्धिमान्, बड़े, प्रकाशवाले और हवन में प्रिय
अग्नि ! हम तुझको यज्ञ में बुलाते हैं' हे विदेघ ! ॥११॥
राजा ने कुछ उत्तर नहीं दिया, तब उसने आगे पढ़ा (ऋ० ८।४४।१७) —'उदग्ने शुच-
यस्तव शुक्रा भ्राजन्त ईरते। तव ज्योतींष्यर्चयः' विदेघ इति-'हे अग्नि, अपनी चमकीली, प्रकाश-
युक्त ज्योतियों को ऊपर को फेंक !' ओ विदेघ ! ॥१२॥
वह तब भी न बोला। तब पुरोहित ने आगे पढ़ा—'तं त्वा घृतस्नवीमहे चित्र भानो
स्वर्दृशं देवाँ आ वीतये वह।' यह मंत्र पूरा पढ़ने भी न पाया, 'घृत' शब्द तक ही आया था कि
अग्नि वैश्वानर जल उठा। वह अपने मुख में न रख सका। अग्नि उसके मुंह से निकलकर पृथिवी
पर आ पड़ा ॥१३॥
विदेघ माथव उस समय सरस्वती के किनारे पर था। उस समय अग्नि जलते-जलते पूर्व
की ओर बढ़ा। गौतम राहूगण और विदेघ माथव उस जलते हुए अग्नि के पीछे-पीछे चले।
अग्नि ने इन सब नदियों को सुखा दिया। एक नदी सदानीरा उत्तरी पहाड़ से निकलती है। उसे
वह न सुखा सका। ब्राह्मण लोग पहले इस नदी को पार नहीं करते थे, यह सोचकर कि अग्नि
वैश्वानर ने इसको नहीं जलाया ॥१४॥
परन्तु आजकल बहुत-से ब्राह्मण इस नदी के पूर्व की ओर रहते हैं। उस समय सदानीरा
के पूर्व की भूमि ऊसर पड़ी थी। उसमें दलदल बहुत था, क्योंकि अग्नि वैश्वानर ने उसका
ना वैश्वानरे॒णेति॑ ॥ १५॥ तद्ध॒ हैतर्हि॑ । क्षेत्र॒तरमिव ब्राह्मणा उ हि॑ नून॒मेनम॑-
ज्ञैर॒सिषदं॒त्सापि॑ ज॒घन्ये॑ नैदा॒घे स॒मिवा॑ कोपयति ताव॒हीतानति॑दग्धा ह्य॒ग्निना॑
वैश्वान॒रेण॑ ॥ १६॥ स॒ होवा॑च । विदे॒घो माथ॒वः क्वाहं॑ भवानी॒त्यत॑ ए॒व ते प्रा-
चीने॒ भुव॑न॒मिति॒ होवा॑च॒ सैषार्ये॒तर्हि॑ कोसलविदे॒हानां॑ मर्यादा ते हि माथ॒वाः॑
॥ १७॥ अथ॒ होवा॑च । गौत॑मो राहू॒गणः॑ क॒थं नु म॒ऽआम॒न्त्र्यमा॑णो न॒ प्रत्य॒श्रौ-
षीरि॒ति स॒ होवाचा॒ग्निर्मे॑ वैश्वान॒रो मुखे॒ऽभूत्स नेन्मे॒ मुखान्नि॒ष्पद्या॑तै॒ तस्मा॑त्ते॒ न
प्रत्य॒श्रौष॒मिति॑ ॥ १८॥ तद्ध॒ कथम॑भू॒दिति॑ । यत्रै॒व त्वं घृ॒तस्म॑वी॒मक्व॒ऽइत्य॒भिव्याहा॑-
र्षी॒स्तदे॒व मे॑ घृतकी॒र्त्ताव॒ग्निर्वैश्वान॒रो मुखा॒दुद॑ज्वाली॒त्तं ना॑शकं धारयि॒तुं स मे॑
मुखा॒न्निष्व॑पादी॒ति ॥ १९॥ स य॑त्सामिधे॒नीषु॑ घृ॒तव॑त् । सामिधे॒नमेव॒ तत्स॒मैवेनं॑
तेनै॒न्धे वी॒र्य्यम॑वास्मिन्दधाति ॥ २०॥ तद्ध॑ घृ॒ताचेति॑ । दे॒वाञ्जि॑गाति सु॒म्नयुरिति॑
यज॑मानो॒ वै सु॑म्न॒युः स हि दे॒वाञ्जि॑गीषति॒ स हि दे॒वाञ्जि॑घा॒ꣳसति॒ तस्मा॑दाह
दे॒वाञ्जि॑गाति सु॒म्नयुरिति॑ सै॒षाग्रेयी स॒त्यनि॑रुक्ता॒ सर्व्वं॒ वाऽअ॒ग्निरु॒क्तꣳ सर्व्वे॑णैवैत-
त्प्रति॑पद्यते ॥ २१॥ अग्न॒ऽआया॑हि वी॒तय॒ऽइति॑ । तदे॑ति भवति वी॒तय॒ऽइति॑ स॒-
मत्क्रमिव ह वा॒ऽइमे॒ऽग्रे लो॒का आ॑सुरित्युन्मृ॒श्या हैव द्यौरा॑स ॥ २२॥ ते दे॒वा
अ॑कामयन्त । क॒थं नु न इ॒मे लो॒का वित॑रा॒ꣳ स्युः क॒थं न इ॒दं वरी॑य॒ऽइव स्या-
दिति॒ तानि॑तेरे॒व त्रि॒भिर॒क्षरै॒र्व्यन॑यन्वी॒तय॒ऽइति॒ तऽइ॒मे वित॑रं लो॒कास्ततो दे॒वे-
भ्यो॒ वरी॑योऽभव॒द्वरी॑यो ह वा॒ऽअस्य॑ भवति॒ यस्यै॒वं वि॒दुष॑ ए॒तामन्वा॒हुर्व्वीत॑य॒-
ऽइति॑ ॥ २३॥ गृ॒णानो॑ ह॒व्यदात॑य॒ऽइति॑ । यज॑मानो॒ वै ह॒व्यदा॑तिर्गृणानो यजमा॑-
नाये॒त्यैवैत॑दाह॒ नि होता॑ सत्सि ब॒र्हिषीत्य॒ग्निर्वै होता॑यं लो॒को ब॒र्हिर॒स्मिन्नेवै-
तल्लो॒केऽग्निं॑ दधाति॒ सो॒ऽयम॒स्मिँल्लो॒केऽग्नि॒र्हितः॑ सैषेममे॒व लो॒कम॒भ्यनू॒क्तेममे॒वैत॑-
या लो॒कं जय॑ति॒ यस्यै॒वं वि॒दुष॑ ए॒तामन्वा॒हुः ॥ २४॥ तं त्वा॑ स॒मिद्भि॑र॒ङ्गिर॒ इति॑ ।
स॒मिद्धि॑र्व्वे॒तम॒ङ्गिरस॒ ऐन्ध॒ताङ्गिर॒ इत्या॒ङ्गिरा उ॒ ह्यग्नि॑र्वृतेन वर्धयामसीति॒ तत्सामि-
का० १, अ० ४, ब्रा० १, क० १५-२५ शतपथब्राह्मण / ७१
आस्वादन नहीं किया था ॥१५॥
अब तो यह बहुत उपजाऊ है क्योंकि ब्राह्मणों ने यज्ञ करके उसको अग्नि को चखा दिया
है। गर्मी के अगले दिनों में भी (वह नदी) खूब बहती है। अग्नि वैश्वानर ने इससे दग्ध नहीं
किया था। अतः यहाँ ठण्डक बहुत होती है ॥१६॥
विदेघ माथव ने अग्नि से पूछा—"मैं कहाँ रहूँ ?"—"इस नदी के पूर्व की ओर तेरा घर
हो", ऐसा अग्नि ने उत्तर दिया। अब तक यह नदी कोसल और विदेह देशों के बीच की सीमा
है। क्योंकि यह माथव की सन्तान हैं ॥१७॥
अब गोतम राहूगण ने राजा से पूछा—"मैंने तुमको बुलाया। तुम क्यों नहीं बोले ?"
उसने कहा—"मेरे मुंह में अग्नि वैश्वानर था। कहीं यह गिर न पड़े, इसलिए मैं नहीं
बोला" ॥१८॥
गोतम ने पूछा—"फिर यह क्या हुआ ?" राजा ने उत्तर दिया—"जब तुमने मंत्र पढ़े
और घी का नाम ही लिया कि अग्नि वैश्वानर जल उठा और मैं उसको मुख में न रख सका।
वह पृथिवी पर निकल पड़ा" ॥१९॥
इसलिए सामिधेनियों में जो घृत शब्द है वह अग्नि जलाने के लिए बड़ा उपयुक्त है।
इन्हीं सामिधेनियों को पढ़कर वह अग्नि को जलाता है और यजमान को शक्ति देता है ॥२०॥
अब (वह शब्द) है 'घृताच्या', अर्थात् घी से भरे (चमचे) से। 'देवान् जिगाति सुम्नयुः'—
'शान्ति का इच्छुक वह देवों के पास आता है'; यजमान सुम्नयुः (शान्ति का इच्छुक) है। वह
देवों के पास आना चाहता है। इसीलिए कहा 'देवान् जिगाति सुम्नयुः'। यह आग्नेयी ऋचा
अनिरुक्त (अनियत) है। 'सब' भी अनियत होता है। अतः अनिरुक्त ऋचा पढ़कर 'सब' का
सम्पादन करता है ॥२१॥
अब कहता है कि, 'अग्न आ याहि वीतये'—'अग्नि, यज्ञ की वृद्धि के लिए आ' (यह
दूसरी सामिधेनी है) वृद्धि या फैलाव के लिए। पहले लोक मिले हुए थे। हम आकाश को इस
प्रकार (हाथ बढ़ाकर) छू सकते थे ॥२२॥
देवों ने चाहा—"ये लोक दूर-दूर कैसे हों ? कैसे हमको अधिक आकाश मिले ?" यह
कहकर उन्होंने ये तीन अक्षरों का 'वीतये' शब्द उच्चारण किया। यह कहते ही लोक दूर-दूर हो
गए। देवों को दूर-दूर जगह मिल गई। जो इस रहस्य को समझकर 'वीतये' कहता है, उसके
लिए भी दूर-दूर अवकाश मिल जाता है ॥२३॥
जब वह कहता है 'गृणानो हव्य दातये'—'हव्य देनेवाले के लिए' तो हव्य देनेवाला
यजमान है। यजमान के लिए ही यह कहा गया। 'निहोता सत्सि बर्हिषि'—'होता आसन पर
बैठता है।' 'होता' अग्नि है। बर्हि से आच्छादित वेदी आसन है। यह जगत् बर्हि है। अग्नि को
इस जगत् में स्थापित करता है। जगत् के कल्याण के लिए अग्नि यहाँ स्थापित की जाती है।
जो इस रहस्य को समझता है और जिसके लिए यह सामिधेनी पढ़ी जाती है, उसकी इस लोक में
विजय होती है ॥२४॥
(अब तीसरी सामिधेनी) 'तं त्वा समिद्भिङ्गिरः'—'अङ्गिरस, तेरे लिए समिधाओं
से'; आंगिरस अग्नि है; 'घृतेन वर्द्धयामसि'—घी से हम बढ़ाते हैं। 'घृत' अग्नि जलाने के लिए
७२ शतपथ ब्राह्मण
धे॒नं पद॒ꣳ समै॑वेनं॒ तेने॒न्धे वी॒र्य॑मेवास्मिन्दधाति ॥ २५॥ ॥ शतम ३०० ॥ ॥ बृह॒-
च्छोचा॒ यवि॑ष्ठ्येति । बृ॒हद्ध्येष शोच॑ति॒ समि॑द्धो॒ यवि॑ष्ठ्येति॒ यवि॑ष्ठो॒ ह्य॒ग्निर॒स्तस्मा-
दा॒ह यवि॑ष्ठ्येति॒ सैषैतमे॒व लो॒कम॑भ्यनू॒क्तान्त॑रिक्षलो॒कमे॒व तस्मा॑दाग्ने॒यी स॒त्यनि॑रु-
क्तानिरु॒क्तो ह्येष लो॒क ए॒तमे॒वैतया लो॒कं ज॑यति॒ यस्यै॒वं वि॒दुष ए॒तामन्वा॒हुः
॥ २६॥ स नः॑ पृ॒थु श्रवाय्य॒मिति॑ । अ॒दो वै पृ॒थु यस्मि॑न्दे॒वा ए॒तच्छ्रवाय्यं॒ यस्मि॑न्दे॒वा
अ॒हा दे॒व वि॑वाससीत्य॒ह दे॒व वि॑वासस्ये॒तन्नो॑ गमये॒त्येवैतदा॑ह ॥ २७॥ बृ॒हद्र॑ये सु॒-
वीर्य॒मिति॑ । अ॒दो वै बृ॒हद्यस्मि॑न्दे॒वा ए॒तत्सु॒वीर्यं॒ यस्मि॑न्दे॒वाः सैषैतमे॒व लो॒कम॑-
भ्यनू॒क्ता दि॒वमे॒वैतमे॒वैतया लो॒कं जय॑ति॒ यस्यै॒वं वि॒दुष ए॒तामन्वा॒हुः ॥ २८॥ सो
ऽन्वा॑ह । ई॒डेन्यो॒ नम॑स्य॒ इतीडे॒न्यो॑ ह्येष नम॑स्यो॒ ह्येष ति॒रस्तमाꣳसि दर्शत
इति॒ तिर्-इ॑व॒ ह्येष तम॒ाꣳसि समि॑द्धो ददृशे समि॒धिरि॑ध्यते॒ वृषेति॒ स॒ꣳ ही॑ध्य॑ते॒ वृ-
षा वृषो॒ऽग्निः समिध्यत॒ऽइति॒ स॒ꣳ ही॑ध्य॑ते ॥ २९॥ अश्वो॒ न दे॑व॒वाह॑न॒ इति॑ ।
अश्वो॑ ह वा॒ऽएष भू॒त्वा दे॒वेभ्यो॑ य॒ज्ञं वह॑ति॒ य॑द्वे ने॒त्यृचो॒मिति॒ तत्त॑स्मादाहा॒श्वो
न दे॑व॒वाह॑न॒ इति॑ ॥ ३०॥ तꣳ ह॒विष्म॑न्त ईडत॒ऽइति॑ । ह॒विष्म॑न्तो॒ ह्येनं॑ मनु॒ष्या
ईड॑ते॒ तस्मा॑दाह॒ तꣳ ह॒विष्म॑न्त ईडत॒ऽइति॑ ॥ ३१॥ वृष॑णं त्वा व॒यं वृष॒न्वृष॑णः
स॒मिधी॑महीति॑ । स॒ꣳ ह्ये॑नमिन्द्धे॒ऽग्ने दी॒द्यतं॑ बृह॒दिति दीद्ये॒व ह्येष बृ॒हत्समि॑द्धः
॥ ३२॥ तं वा॒ऽए॒तम् । वृषण्व॑न्तं॒ त्रिच॒मन्वा॑हाग्ने॒य्यो वा॒ऽएताः सर्वाः सा॑मिधे॒न्यो
भव॑न्तीन्द्रो॒ वै य॒ज्ञस्य॑ देव॒तेन्द्रो॒ वृषैते॒नो ह्वास्येताः सेन्द्राः सा॑मिधे॒न्यो भव॑न्ति
तस्मा॑द्वृषण्व॑न्तं॒ त्रिच॒मन्वा॑ह ॥ ३३॥ सो॒ऽन्वाह॑ । अ॒ग्निं दू॒तं वृ॑णीमह॒ऽइति॑ दे॒-
वाश्च॒ वा॒ऽअसु॑राश्चो॒भये॑ प्राजाप॒त्याः पस्पृ॑धिरे॒ तांस्पृ॒र्धमानान्गाय॒त्र्यन्त॒रा त॑स्थौ या
वै सा गाय॒त्र्यासी॑दि॒यं वै सा पृ॑थि॒व्ये॑त॒द् धै॑व तदन्त॒रा त॑स्थौ त॒ऽउभय॑ऽए॒व वि-
दां च॒क्रुर्यतरा॒न्वै न इयमुपाव॑र्त्स्यति॒ ते भवि॑ष्यन्ति॒ परे॑तरे भवि॒ष्यन्ती॑ति॒ तामु॑भय
ऽए॒वोप॑मन्त्रयां चक्रिरे॒ऽग्निरि॑व दे॒वानां॑ दूत आस॒ सह॑रक्षा इत्य॒सुररक्षसमसुराणाꣳ
का० २, अ० ४, ब्रा० १, कं० २५-३४ शतपथब्राह्मण / ७३
बहुत उपयुक्त शब्द है। उसी अग्नि को प्रज्वलित करते हैं, और यज्ञ को शक्ति देते हैं ॥२५॥
'बृहच्छोचा यविष्ठ्य'—'तू सबसे छोटी, बहुत चमकदार है।' समिधा बहुत चमकती है।
वह ही सबसे कम आयु की अग्नि है। इसीलिए उसको 'यविष्ठ्य' कहा। यह ऋचा उस लोक
अर्थात् अन्तरिक्ष के लिए कही गई। अतः आग्नेयी होते हुए अनिरुक्त है। जो इस रहस्य को
समझता है और जिसके लिए यह सामिधेनी पढ़ी जाती है, उसको इस लोक में विजय प्राप्त होती
है ॥२६॥
(अब चौथी सामिधेनी) 'स नः पृथु श्रवाय्यम्'—'वह तू हमारे लिए चौड़ा-चकला और
प्रकाशयुक्त अवकाश प्राप्त कर।' वह लोक जिसमें देवता रहते हैं चौड़ा-चकला और चमकदार
है। 'अच्छा देव विवाससि' अर्थात् 'मैं उस लोक को जाऊं' ॥२७॥
'बृहदग्ने सुवीर्यम्'—'हे अग्नि, वह बड़ा और शक्तिशाली है।' वह बड़ा लोक है जिसमें
देव रहते हैं। वह शक्तिशाली लोक है जिसमें देव निवास करते हैं। इसी लोक के अभिप्राय से
यह कहा गया। जो इस रहस्य को समझता है और जिसके लिए सामिधेनी पढ़ी जाती है, उसको
इस लोक में विजय प्राप्त होती है ॥२८॥
(पाँचवीं सामिधेनी) 'ईडेन्यो नमस्य'—'स्तुति और नमस्कार के योग्य'। यह स्तुत्य
भी है और नमस्य भी। 'तिरस्तमांसि दर्शंत'—अन्धकार में होकर चमकता है'। अग्नि जब
जलता है तो अन्धकार में होकर चमकता है। 'समग्निरिध्यते वृषा'—'बलवान अग्नि प्रज्वलित
होता है।' बलवान् अग्नि है यह, प्रज्वलित भी होता है (समग्नि—यहाँ से छठी सामिधेनी
आरम्भ होती है) ॥२९॥
'अश्वो न देववाहन'—'वह अग्नि अश्व या घोड़ा होकर देवों को हवि ले जाता है।'
यहाँ 'न' का अर्थ है 'ओइम्'। इसका अर्थ है कि वस्तुतः वह अश्व बनकर हवि को ले जाता
है ॥३०॥
'तं हविष्मन्त ईडत'—'उसको हवि वालो, पूजो !' मनुष्य हवि वाले हैं। वे अग्नि को
पूजते हैं। इसलिए कहा 'तं हविष्मन्त ईडत' ॥३१॥
(सातवीं सामिधेनी) 'वृषणः त्वा वयं वृषन् वृषणः समिधीमहि...अग्ने दीद्यतं बृहत्'-
'हम शक्तिशाली तुझ शक्तिशाली को प्रज्वलित करते हैं...हे अग्ने, तू बहुत चमकनेवाला है !'
क्योंकि जब वह प्रज्वलित किया गया, वह वस्तुतः बहुत चमका ॥३२॥
इस तृच् (तीन ऋचाओं के समूह) को पढ़ता है जिसमें 'वृषण्' (बलवान्) शब्द आया
है। ये सब सामिधेनिय अग्नि देवता की होती हैं। परन्तु यज्ञ का देवता 'इन्द्र' है और वह
'वृषण्' (बलवान्) है। अतः वृषण् शब्द आने से यह तृच् इन्द्र देवता का हो जाता है। इसलिए
'वृषण्' वाली तीन ऋचाओं को पढ़ता है ॥३३॥
(अब आठवीं सामिधेनी को) 'अग्निं दूतं वृणीमहे'—'अग्नि दूत का वरण करते हैं।'
प्रजापति की सन्तान देव और असुर प्रभुत्व के लिए लड़ पड़े। गायत्री बीच में पड़ गई। जो
गायत्री थी वही यह पृथिवी है। यही पृथिवी उन देवों के बीच में थी। वे जानते थे कि जिधर
को यह रहेगी, वही पक्ष जीत जायगा, और दूसरा पक्ष पराजित होगा। अतः उन दोनों दलों ने
चुपके-चुपके उसको अपनी ओर मिल जाने के लिए निमंत्रण दिया। देवों का दूत बनी अग्नि,
और असुर राक्षसों का एक राक्षस जिसका नाम था 'सहरक्ष', वह गायत्री (या पृथिवी) अग्नि के
७४ शतपथ ब्राह्मण
सा॒ग्निमि॒वानु॑प्रेयाय॒ तस्मा॒दन्वा॒हाग्निं दू॒तं वृ॑णीमह॒ऽइति॑ स हि दे॒वानां॑ दू॒त आ॑-
सीद्धो॒तारं॑ वि॒श्ववे॑दसमिति ॥ ३४॥ तडु॒ हैके॑ऽन्वाहुः । होता यो वि॒श्ववे॑दस इति
नेद॒रमि॒त्यात्मा॑नं ब्रवा॒णीति॒ नडु॒ तथा॒ न ब्रू॑यान्मानु॒षँ ह॒ ते य॒ज्ञे कुर्वन्ति॒ व्यृद्धं॑
वै तद्य॒ज्ञस्य॒ यन्मानु॑षं नेद्व्यृ॒द्धं य॒ज्ञे करवाणीति॒ तस्मा॒द्यथै॒वार्चा॒नूक्त॑मेवा॒नुब्रूयाद्धो-
तारं॑ वि॒श्ववे॑दसमित्ये॒वास्य॑ य॒ज्ञस्य॑ सुक्रतु॒मित्येष हि॒ य॒ज्ञस्य॑ सुक्रतुर्य॑दमू॒दस्तस्मा॒दा-
ह्वास्य॑ य॒ज्ञस्य॑ सुक्रतु॒मिति॒ सेयं दे॒वानुपाव॑वर्त॒ ततो॑ दे॒वा अ॑भवन्परा॒ऽसुरा॒ भव॑ति
ह॒ वाऽऽत्मना॒ परा॑स्य स॒पत्नौ भवन्ति॒ यस्यै॒वं विदु॑ष ए॒तामन्वा॒हु ॥ ३५॥ तां
वाऽऽष्ट॒मीमनु॑ब्रूयात् । गाय॒त्री वाऽए॒षा नि॒दाने॒नाष्टाक्ष॑रा वै गाय॒त्री तस्मा॑दष्ट॒-
मीमनु॑ब्रूयात् ॥ ३६॥ तद्वैके । पु॒रस्ता॑द्धा॒य्ये दध॒त्यन्नं॒ धाय्ये॒ मुखत॒ऽइद॒मन्नाद्यं॑ दध्म
इति॒ वद॑न्त॒स्तडु॒ तथा॒ न कु॒र्याद॑नवक्लृ॒प्ता तस्यै॒षा भव॑ति॒ यः पु॒रस्ता॑द्धा॒य्ये दधा॑ति
दश॒मी वा हि तस्यै॑काद॒शी वा संपद्य॑ते॒ तस्यो॒ द्वैवैषाव॑क्लृप्ता भव॑ति॒ यस्यैताम॒ष्ट-
मीमन्वा॒हुस्तस्मा॑दुपरि॒ष्टादे॒व धा॒य्ये द॑ध्यात् ॥ ३७॥ स॒मिध्य॑मानोऽअध्वर॒ऽइति॑ । अ॒-
ध्व॒रो वै य॒ज्ञः स॒मिध्य॑मानो य॒ज्ञऽइत्ये॒वैतदा॑हा॒ग्निः पाव॒क ईड्य॒ इति॑ पाव॒को ह्येष
ईड्यो॒ ह्येष शो॒चिष्के॑श॒स्तमी॑मह॒ऽइति॑ शो॒चिन्तीव॒ ह्ये॑तस्य॒ केशाः समि॑द्धस्य स॒मि-
द्धोऽअ॒ग्नऽआहु॑तेत्यन्तः प्राचीनँ सर्वमिध्ममभ्यादध्याद्यदन्यत्समिधोऽपवृङ्क्तऽइव॒ हि
तद्धोता॒ यद्धाऽअन्यत्स॑मिध॒ इध्म॒स्याति॑रिच्येतै॒वाति॑रिक्तं॒ तद्यद्वै य॒ज्ञस्याति॑रिक्तं द्विष-
न्तँ ह्वास्य तद्भ्रातृ॑व्यम॒भ्यति॑रिच्यते॒ तस्माद॒न्तः प्राची॒नँ सर्व॑मिध्मम॒भ्याद॑ध्याद्यद॒न्य-
त्समिधः ॥ ३८॥ दे॒वान्य॑क्षि स्व॒ध्वरेति॑ । अ॒ध्व॒रो वै य॒ज्ञो दे॒वान्य॑क्षि सुय॒ज्ञियित्ये॒वैत-
दाहा॑ वो॒ढ् हि ह॒व्यवा॑ऽउसीत्येष हि ह॒व्यवाडुद॑मू॒दस्तस्मा॑दाहा वो॒ढ् हि ह॒व्यवा॑-
सीत्या॒ जुहो॑ता दु॒वस्य॑ता॒ग्निं प्रय॒त्यध्व॒रे । वृणी॒ध्वं ह॒व्यवाह॑न॒मिति॒ संप्रेष्य॒त्येवै-
तया॑जुहु॒त च॒ यज॑त च॒ यस्मै॒ कामा॑य समे॒न्धिध्वं तत्कु॑रुतेत्ये॒वैतदा॑हा॒ग्निं प्रय॒त्यध्व॑रे
ऽइत्यध्व॒रो वै य॒ज्ञोऽग्निं प्रय॑ति य॒ज्ञऽइत्ये॒वैतदा॑ह॒ वृणी॒ध्वं ह॒व्यवाह॑न॒मित्येष हि
कां० १, अ० ४, ब्रा० १, कं० ३४-३६ शतपथब्राह्मण / ७५
साथ चली गई। इसलिए कहते हैं 'हम अग्नि दूत का वरण करते हैं'; अग्नि ही दूत था। इसलिए
कहा, 'होतारं विश्ववेदसम्' अर्थात् 'अग्नि होता को जो सब-कुछ जाननेवाला है।।३४।।
कुछ लोग मंत्र में थोड़ा-सा परिवर्तन करके ऐसा कहते हैं 'होता यो विश्ववेदसः',
अर्थात् 'होता जो सब-कुछ जाननेवाला है। इसका कारण यह है कि वह 'होतारं' के दो टुकड़े
कर देते हैं 'होता +अरम्', 'अरम्' का अर्थ 'अलम्' (बस इतना ही) भी होता है। (याज्ञवल्क्य
का कहना है कि) ऐसा नहीं करना चाहिए। वेदमंत्र में परिवर्तन कर देने से भाषा मानुषी
हो जाती है। यज्ञ में मानुषी भाषा को अशुभ समझा जाता है, अतः जैसा वेदमंत्र में आया है
वैसा ही बोलना चाहिए, अर्थात् 'होतारं विश्ववेदसम्'।
अब आगे कहता है—'अस्य यज्ञस्य सुक्रतुः'—'इस यज्ञ को अच्छी प्रकार करनेवाला',
क्योंकि अग्नि यज्ञ का सुक्रतुः है।
गायत्री ने देवों का साथ दिया था। वे जीत गए। असुर हार गए। जो इस रहस्य को
समझता है और जिसके लिए यह ऋचा पढ़ी जाती है वह जीत जाता है और शत्रु उसका
पराजित हो जाता है ।।३५।।
इसीलिए वह इस (आठवीं सामिधेनी) को पढ़ता है। यह विशेष रीति से गायत्री है
क्योंकि गायत्री में आठ अक्षर होते हैं। इसीलिए वह इस आठवीं सामिधेनी का पाठ करता
है ।।३६।।
कुछ लोग आठवीं सामिधेनी से पहले दो 'धाय्य' पढ़ देते हैं। वे कहते हैं कि धाय्य अन्न
हैं, हम अन्न को मुख में रख देते हैं; परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से
आठवीं सामिधेनी का स्थान हट जाता है और आठवीं और नवमी सामिधेनी दसवीं और
ग्यारहवीं हो जाती है। यह आठवीं सामिधेनी का ही उचित स्थान है। इसलिए दो धाय्यों को
नवमी सामिधेनी के पीछे रखना चाहिए ।।३७।।
(अब नवमी सामिधेनी पढ़ता है) 'समिध्यमानो अध्वरः'—'यज्ञ में जलती हुई'। अध्वर
यज्ञ को कहते हैं। उसमें जो प्रज्वलित होता है वह अग्नि है। 'पावकः ईड्यः'—'यह पवित्र भी
है और स्तुत्य भी।' 'शोचिष्केशस्तमीमहे'—'चमकदार केश वाले तुझको हम बुलाते हैं।' इसके
केश चमकते हैं। दसवीं सामिधेनी अर्थात् 'समिद्धस्य समिद्धोऽअग्ने' ऐसा कहने से पूर्व सब
समिधाओं को अग्नि पर रख दे, सिवाय एक के। क्योंकि यहाँ होता अग्नि-प्रज्वालन काम
समाप्त करता है। अब जो एक समिधा बच रही, इसका नियम यह है कि जो यज्ञ से बच रहे
वह शत्रु का होता है। इसलिए इस सामिधेनी से पहले-पहले एक बचाकर अन्य सब समिधायें रख
देनी चाहिएँ ।।३८।।
अब वह कहता है 'देवान्यक्षि स्वध्वर'—'हे अच्छे अध्वर्यु, देवों की पूजा कर।' 'अध्वर'
का अर्थ है यज्ञ। तात्पर्य यह है कि 'अच्छे अध्वर, देवों की पूजा कर।' 'त्वं हि हव्यवाडसि'—'तू
हव्य का ले जाने वाला है।' अब अन्तिम सामिधेनी पढ़ता है—'आ जुहोता दुवस्यताग्निं
प्रयत्यध्वरे। वृणीध्वं हव्यवाहनम्'—'यज्ञ में अग्नि की पूजा करो। हव्य ले जानेवाले का वरण
करो।' अग्नि वस्तुतः हव्यवाट् है। इसीलिए कहा 'अग्नि तू हव्यवाट् है'। वह अन्तिम सामिधेनी
को पढ़ता है—'आ जुहोता दुवस्यताग्निं प्रयत्यध्वरे। वृणीध्वँ हव्यवाहनम्'—'आहुति दो।
अग्नि की पूजा करो, जब यज्ञ हो रहा हो। हव्य को ले जाने वाले का वरण करो।' इसका अर्थ
यह है कि आहुति दो, पूजा करो अर्थात् जिस कामना के लिए यज्ञ रचा है उसकी पूर्ति करो।