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सर्वकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 415, कुल 699 में से

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पृष्ठ 415

कां० ३, अ० ४, ब्रा० १, कं० ११-२० शतपथब्राह्मण / ३६७
विष्णु के लिए।" यह उस (सोम) का भाग है। जैसे राजा का भाग अलग होता है, इसी प्रकार
छन्दों से अतिरिक्त यह सोम का भाग है ॥११॥
"श्येनाय त्वा सोमभृते विष्णवे त्वा" (यजु० ५।१) – "तुझे सोम लानेवाले श्येन के लिए।
तुझे विष्णु के लिए।" इस प्रकार गायत्री का भाग देता है, क्योंकि गायत्री श्येन होकर द्यौलोक
से सोम लाई। इसलिए गायत्री को सोम लानेवाला 'श्येन' कहते हैं। इस पराक्रम के लिए
उसको दूसरा भाग देता है ॥१२॥
"अग्नये त्वा रायस्पोषदे विष्णवे त्वा" (यजु० ५।२) - "अग्नि के लिए तुझको, धन और
पुष्टि के देनेवाले के लिए तुझको, विष्णु के लिए तुझको।" 'रायस्पोष' से यहाँ पशु से तात्पर्य है।
पशु जगती हैं। इस प्रकार जगती का भाग देता है ॥१३॥
पंचगुना इसलिये लेता है कि यज्ञ संवत्सर के तुल्य है। संवत्सर में ऋतुएँ पांच होती
हैं। संवत्सर के पाँच भाग हैं। इसलिए वह पंचगुना लेता है। 'विष्णु के लिए तुझको, विष्णु के
लिए तुझको' यह कहकर वह सामग्री इसलिए लेता है कि जो चीज यज्ञ के लिए ली जाती है वह
विष्णु के लिए ही ली जाती है ॥१४॥
पुरोडाश के नौ कपाल होते हैं। आतिथ्य यज्ञ का शिर है। गायत्री में नौ अक्षर होते
हैं। आठ तो वे हैं जो पढ़े जाते हैं और नवाँ प्रणव (ओ३म्) है। गायत्री यज्ञ का पूर्वार्ध है।
पुरोडाश भी यज्ञ का पूर्वार्ध है। इसलिए उसमें नौ कपाल होते हैं ॥१५॥
परिधि की समिधाएँ कार्ष्मर्य लकड़ी की होती हैं। देवताओं ने अनुभव किया कि वृक्षों
में यह वृक्ष राक्षसों का घातक है। आतिथ्य यज्ञ का सिर है। परिधियां कार्ष्मर्य की इसलिये होती
हैं कि राक्षस यज्ञ के सिर को हानि न पहुँचा सकें ॥१६॥
प्रस्तर आश्ववाल घास का होता है। एक बार यज्ञ देवताओं के पास से भाग गया। वह
घोड़ा बनकर भाग गया। देवों ने उसका पीछा किया और पूँछ के बाल तोड़ डाले, और उनको
तोड़कर एक जगह फेंक दिया। उसकी अश्वबाल घास उग खड़ी हुई। आतिथ्य यज्ञ का सिर है
और पूँछ के बाल पिछला भाग होते हैं। इस प्रकार अश्वबाल का प्रस्तर होने से वह यज्ञ को दोनों
ओर से घेर लेता है ॥१७॥
विधृतियाँ (बर्हि के ऊपर रखने के डंठल) गन्ने की होती हैं जिससे बर्हि और प्रस्तर
मिल न जायें। घी को शुद्ध करके सब-का-सब चार भागों में ले लेवे, क्योंकि इसमें अनुयाज नहीं
होते ॥१८॥
हवियों को रखकर अग्नि का मंथन करता है। आतिथ्य यज्ञ का शिर है। अग्नि के मन्थन
का अर्थ यह है कि यज्ञ को उत्पन्न किया जाय। जब बच्चा उत्पन्न होता है तो सिर की ओर से
उत्पन्न होता है, इस प्रकार वह यज्ञ को सिर की ओर से उत्पन्न करता है। इसके अतिरिक्त
अग्नि 'सब देवता' के अर्थ में आता है; अग्नि में सब देवताओं के लिए आहुति दी जाती है।
'आतिथ्य यज्ञ का सिर है' इस प्रकार सब देवताओं के द्वारा वह यज्ञ को सिर अर्थात् आरम्भ से
ही बढ़ाता है। इसलिये अग्नि का मंथन करता है ॥१९॥
अब अधिमंथन शकल को लेता है। (अधिमंथन शकल एक लकड़ी का टुकड़ा होता है
जो अधरारणि के ऊपर रक्खा जाता है।) इस मन्त्र से- "अग्नेर्जनित्रमसि" (यजु० ५।२) -
"तू अग्नि का जन्म-स्थान है।" क्योंकि यहीं तो अग्नि उत्पन्न की जाती है। इसलिए कहा कि 'तू