शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-३, ब्राह्मण-१
तीच्येधीति ॥ १७॥ मित्र॒स्या प॒दि ब॑ध्नीता॒मिति॑ । वरु॒ण्या वा॒ऽए॒षा यद्र॒ज्जुः सा
यद्र॒ज्ज्वा॒भिहि॑ता स्याद्वरु॑ण्या स्याद्यद्य॒नभि॑हिता स्यादय॑तेव स्यादितद्याऽश्र॑वरु॒ण्यं व्व-
न्मैत्रꣳ सा यथा॒ रज्ज्वा॒भिहि॑ता य॒तेवम॒स्यै तद्भवति॒ यदा॑ह मित्र॒स्या प॒दि ब॑ध्नीता-
मिति॑ ॥ १८॥ पू॒षाध्व॑नस्पा॒त्विति॑ । इ॒यं वै पृ॑थि॒वी पू॒षा य॒स्य वा॒ऽइ॒यम॑ध्वनोगो॒प्त्री
भ॑वति॒ तस्य॑ न का च॒न ह्वला भ॑वति॒ तस्मा॑दाह पू॒षाध्व॑नस्पा॒त्विति॑ ॥ १९॥ इ॒-
न्द्राया॑ध्यक्षायेति॑ । स्व॒ध्यक्ष्या॒सादित्ये॒वैतदा॑ह॒ यदा॒हेन्द्राया॑ध्यक्षायेत्यनु॑ त्वा मा॒ता म॑-
न्यता॒मनु॑ पि॒तानु॒ भ्राता॒ सगर्भ्योऽनु॒ सखा॒ सयूथ्य॒ इति॑ सा य॒त्ते जन्म॒ तेन॑ नो॒
ऽनु॑मता॒ सोम॑म॒च्छेहीत्ये॒वैतदा॑ह॒ सा दे॒वि दे॒वम॒च्छेहीति॑ दे॒वी ह्ये॑षा दे॒वम॑र्हति य-
द्धाक्सोमं॒ तस्मा॑दाह॒ सा दे॒वि दे॒वम॒च्छेहीतीन्द्रा॑य॒ सोम॒मितीन्द्रो॒ वै य॒ज्ञस्य॑ दे॒वता॒
तस्मा॑दाहेन्द्रा॑य॒ सोम॒मिति॑ रु॒द्रस्त्वा॒वर्त्तय॒त्वित्य॑प्रणाशा॒यैतदा॑ह रु॒द्रो हि नाति॑ प-
शव॑ः स्व॒स्ति सोम॑सखा॒ पुन॒रेहीति॑ स्व॒स्ति नः॒ सोमे॑न स॒ह पुन॒रेहीत्ये॒वैतदा॑ह
॥ २०॥ तां य॒थैवादो दे॒वाः । प्रा॒हिण्वन्त्सोम॑म॒च्छ सैना॑न्त्स॒ह सोमे॑नाग॒च्छदे॒वमे॒वै-
नामे॒ष ए॒तत्प्रहि॑णोति॒ 'सोम॑म॒च्छ सैना॑ꣳ स॒ह सोमे॑नाग॒च्छति॑ ॥ २१॥ तां य॒थैवादो
दे॒वाः । व्यभ॑जन्त गन्ध॒र्वैः सा दे॒वानुपावर्त्ततैवमे॒वैनामेतद्यज॑मानो वि॒क्रीणी॑ते सा
यज॑मानमुपाव॑र्त्तते ताम॒दीची॑म॒त्याकु॑र्वन्त्युदीची॒ हि मनु॑ष्याणां दि॒क्सोऽए॒व य॒ज्ञ-
मानस्य॒ तस्मा॑दुदीची॑म॒त्याकु॑र्वन्ति ॥ २२॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [२.४] ॥ द्वितीयोऽध्यायः
[१७.] ॥ ॥
स॒प्त प॒दान्यनु॑निष्क्रामति । वृ॒ङ्क्तेऽवैनामे॒तत्त्स्मात्स॒प्त प॒दान्यनु॑निष्क्रामति य॒त्र
वै वाचः॑ प्र॒जाता॑नि॒ छन्दा॑ꣳसि स॒प्तपदा वै तेषां॑ परा॒र्ध्या शक्वरी तामे॒वैतत्पु॒रस्ता-
दर्वाचीं॑ वृ॒ङ्क्ते तस्मा॑त्स॒प्त प॒दान्यनु॑निष्क्रामति ॥ १॥ स वै वाच॑ ए॒व रू॒पेणानु॑नि-
ष्क्रामति । व॒स्व्स्य॒दिति॑रस्यादि॒त्यासि॑ रु॒द्रासि॑ च॒न्द्रासीति॑ व॒स्वी ह्ये॑षादि॒तिर्व्वै-
षादि॒त्या ह्ये॑षा रु॒द्रा ह्ये॑षा च॒न्द्रा ह्ये॑षा बृह॒स्पति॑स्त्वा सु॒म्ने र॑म्णात्विति॒ ब्रह्म॑ वै
कां० ३, अ० २-३, ब्रा० ४-१, कं० १७-२२ व १-२ शतपथब्राह्मण / ३७३
आगे और पीछे शुभ हो' ॥१७॥
अब कहता है- "मित्रस्त्वा यदि बध्नीताम्" (यजु० ४।१६)-"मित्र तुझे पैर में बाँधे ।"
क्योंकि रस्सी वरुण की होती है। यदि वह रस्सी से बँधेगी तो वरुण की हो जायगी। और यदि
बाँधी न जायगी तो वश में न रहेगी। जो मित्र की है वह वरुण की नहीं है। जैसे गाय रस्सी से
बँधकर वश में रहती है इसी प्रकार यह है, इसलिए कहा कि 'मित्र तुझे पैर में बाँधे' ॥१८॥
अब कहता है-"पूषाऽध्वनस्पातु" (यजु० ४।१६)-"पूषा तेरे मार्ग की रक्षा करे।"
पूषा यह पृथिवी है। पृथिवी जिसकी मार्ग में रक्षा करती है वह विचलित नहीं होता। इसलिए
कहा-'पूषा तेरे मार्ग की रक्षा करे' ॥१९॥
अब कहता है- "इन्द्राय अध्यक्षाय" (यजु० ४।१६)-"अध्यक्ष इन्द्र के लिए।" इसका
अर्थ यह है कि 'वह सुरक्षित रहे।' अब कहता है-"अनु त्वा माता मन्यताम्, अनु पिता, अनु भ्राता
सगर्भ्योऽनु सखा सयूथ्यः" (यजु० ४।२०) - "तुझे तेरी माता अनुमति दे, तेरा पिता, तेरा भ्राता,
तेरा समूह में रहनेवाला सखा।" अर्थात् तेरे जो अपने सम्बन्धी हैं उनकी अनुमति से सोम को
ला। अब कहता है-"सा देवि देवमच्छेहि" (यजु० ४।२०)-'देवि, तू देव के पास जा।" अर्थात्
वाणी देवी है और सोम देव है। इसीलिये कहा कि 'देवि, तू देव के पास जा।' "इन्द्राय सोमम्"
(यजु० ४।२०)-"इन्द्र के लिए सोम के पास जा।" इन्द्र यज्ञ का देवता है। इसलिए कहा 'इन्द्र
के लिए सोम के पास जा।' "रुद्रस्त्वावर्त्तयतु" (यजु० ४।२०)-"रुद्र तुझे सुरक्षित लौटा लावे।"
यह उसकी रक्षा के लिए कहा, क्योंकि पशु रुद्र से आगे नहीं जा सकते। "स्वस्ति सोमसखा
पुनरेहि" (यजु० ४।२०) - "स्वस्ति हो। हे सोम-सखा, तू लौट आ।" इसका अर्थ है कि 'तू
सोम लेकर वापस आ' ॥२०॥
जैसे पहले देवों ने उसको सोम के पास भेजा और वह सोम को लेकर वापस आ गई,
इसी प्रकार वह सोम के पास जाती है और सोम लेकर वापस आ जाती है ॥२१॥
जैसे देवों ने गन्धर्वों के साथ उसका मोह न किया और वह देवों के पास आ गई, ऐसे ही
यजमान उसको विद्वान करता है और वह यजमान के पास लौट आती है। वे उसको उत्तर
की ओर ले जाते हैं। उत्तर मनुष्यों की दिशा है इसलिए यह यजमान की भी दिशा है। इसलिए
वे उसे उत्तर की दिशा में ले जाते हैं ॥२२॥
अध्याय ३- ब्राह्मण १
उस (सोम-गौ) के पीछे सात पग चलता है। सात पग चलने का तात्पर्य यह है कि वह
उस पर आधिपत्य प्राप्त करता है। जब वाणी से छन्द उत्पन्न हुए तो उनमें से अन्त का सात
पदवाला शक्वरी था। वह इस छन्द को ऊपर से अपनी ओर खींचता है, इसलिए सात पग
चलता है ॥१॥
वह वाणी के समान पग भरता है यह पढ़कर - "वस्व्यसि, अदितिरसि, आदित्यासि,
रुद्रासि, चन्द्रासि" (यजु० ४।२१)-' 'तू वस्वी है, तू अदिति है, तू आदित्या है, तू रुद्रा है, तू चन्द्रा
है।" यह वस्वी है, यह अदिति है, यह आदित्या है, यह रुद्रा है, यह चन्द्रा है। "बृहस्पतिष्ट्वा
सुम्ने रण्वातु" (यजु० ४।२१)-"बृहस्पति तुझको आनन्द में रक्खे।" बृहस्पति ब्रह्म है। इस
३७४ शतपथ ब्राह्मण
बृहस्पति॒र्बृह॒स्पति॑ष्ठा साधु॒नाव॑र्तयत्वित्ये॒वैत॒दाह॑ रु॒द्रो व॑सुभि॒राच॑क॒ऽइत्यप्र॑णाशा-
यै॒तदा॑ह रु॒द्रो हि ना॑ति प॒शवः॑ ॥ २॥ अथ॑ स॒प्तमं प॒दं पर्यु॑पविशन्ति । स हिर॑ण्यं
प॒दे नि॒धाय॑ जुहोति न वाऽअ॒नग्नावहुति॑र्हूयतॆ॒ऽग्निरे॒तसं॒ वै हिर॑ण्यं तथो हा-
स्यैषाग्निमत्ये॒वाहुति॒र्हुता भ॑वति वज्रो वाऽआज्यं॒ वज्रे॑णै॒वैतदा॒ज्येन स्पृणुते ताꣳ
स्पृ॒त्वा स्वीकुरुते ॥ ३॥ स जु॑होति । अदि॑त्यास्त्वा मूर्धन्नाजि॑घर्मीती॒यं वै पृथि॒व्य-
दि॑ति॒रस्यै॒ हि मूर्धन्जुहो॑ति देव॒यज॑ने पृथि॒व्याऽइति॑ देव॒यज॑ने हि पृथि॒व्यै जु॒हो-
तीडायास्प॒दम॑सि घृ॒तव॒त्स्वाहेति॒ गौर्वाऽइ॒डा गोर्हि प॒दे जुहो॑ति घृ॒तव॒त्स्वाहेति॑
घृ॒तव॒द्ध्येतद॒भिहु॑तं भ॑वति ॥ ४॥ अथ॑ स्फ्यमा॒दाय॑ प॒रिलि॑खति । वज्रो॒ वै स्फ्यो
वज्रे॑णै॒वैतत्प॒रिलि॑खति त्रिष्कृ॒त्वः प॑रिलिखति त्रिवृ॒त्तैवैतद्वज्रे॑ण समन्तं॒ परि॑गृह्णा-
त्यन॑तिक्रमाय ॥ ५॥ स प॑रिलि॒खति । अ॒स्मे रम॑स्वेति॒ यज॑माने रम॑स्वेत्ये॒वैत॒दा-
हायं समुल्लि॑ख्य प॒दꣳ स्था॒ल्याꣳ संव॑पत्यस्मे ते बन्धुरिति॒ यज॑माने ते बन्धुरित्ये॒-
वैत॒दाह॑ ॥ ६॥ अथाप॒ उप॑निनयति । यत्र॒ वाऽअ॒स्यै खन॑न्तः क्रू॒रीकु॒र्वन्त्यप॑प्र॒क्ति
र्शान्ति॒राप॒स्तद॒द्भिः शा॒न्त्या श॑मयति॒ तद॒द्भिः संद॑धाति॒ तस्मा॒दप॒ उप॑निनयति ॥ ७॥
अथ॒ यज॑मानाय प॒दं प्रय॑च्छति । मे राय॒ इति॑ प॒शवो॒ वै रा॒यस्त्वयि॑ प॒शव इत्ये॒वै-
तदा॑ह॒ तद्यज॑मानः प्रति॒गृह्णा॑ति मे राय॒ इति॑ प॒शवो॒ वै रा॒यो॒ मयि॑ प॒शव॒ इत्ये॒-
वैत॒दाह॑ ॥ ८॥ अथाध्व॒र्युरा॒त्मान॒मुप॑स्पृशति । मा वयꣳ रा॒यस्पोषे॑ण॒ वियो॑ष्मेति॒ त-
थो हाध्व॒र्युः प॒शुभ्य॑ आ॒त्मानं॒ नान्त॑रेति ॥ ९॥ अथ॒ पत्न्यै प॒दं प्रति॑प्र॒ाहर॑न्ति । गृ॒-
हा वै पत्नी॑ प्रति॒ष्ठा तद्गृहेष्वे॒वैन॑मेतत्प्रति॒ष्ठायां प्र॑तिष्ठापयति॒ तस्मा॒त्पत्न्यै प॒दं प्र-
ति॑प्र॒ाहर॑न्ति ॥ १०॥ तां नेष्टा वा॑चयति । तोतो राय॒ इत्ये॒नैनाꣳ सोमक्रयण्या
सं॒ख्याप॑यति वृषा॒ वै सोमो॒ योष॑ पत्नी॒ष वाऽअत्र॒ सोमो॑ भवति॒ यत्सोम॑क्रयणी
मिथु॒नमे॒वैतत्प्र॒जन॑नं क्रियते॒ तस्मा॑देनां सोमक्रयण्या सं॒ख्याप॑यति ॥ ११॥ स सं-
ख्यापय॑ति । स॒मख्ये दे॒व्या धिया सं दक्षि॑णयोरुचक्ष॑सा । मा म॒ऽआयुः प्रमो॑षी॒र्मी
का० ३, अ० ३, ब्रा० १, कं० २-१२ शतपथब्राह्मण / ३७५
कथन का तात्पर्य है कि 'बृहस्पति अच्छे काम के द्वारा तुझे यहाँ तक लौटा लेवे।' “रुद्रो वसुभि-
राचके” (यजु० ४।२१) - "रुद्र वसुओं के सहित तुझसे प्रसन्न हैं।" इस कथन से यह तात्पर्य
निकलता है कि 'वह गाय बिना किसी हानि के लौट आवे' क्योंकि पशु रुद्र के आगे नहीं जा
सकते ॥२॥
वे सातवें पद में बैठ जाते हैं। और पद-चिह्न पर सोना रखकर वह आहुति देता है।
आहुति अग्नि के सिवाय इतर स्थान में तो हो नहीं सकती। स्वर्ण अग्नि के वीर्य से उत्पन्न हुआ
है, इसलिए ऐसा करने से मानो वह अग्नि में ही आहुति देता है। घी वज्र है। इस वज्ररूपी घी
के द्वारा वह उसकी रक्षा करता है और रक्षा करके उसको स्वीकार करता है ॥३॥
वह इस मन्त्र से आहुति देता है- "अदित्यास्त्वा मूर्धन्नाजिघर्मि" (यजु० ४।२२) -
"मैं तुझको अदिति के सिर पर रखता हूँ।" यह पृथिवी अदिति है। उसी के सिर पर आहुति देता
है। “देवयजने पृथिव्याः" (यजु० ४।२२) - "पृथिवी के यज्ञ-स्थल पर आहुति देता है।" "इडाया-
स्पदमसि घृतवत् स्वाहा" (यजु० ४।२२) - "तू घृत-युक्त इडा का पद है।" गौ ही 'इडा' है। गौ
के पद पर आहुति देता है। 'घृत-युक्त' यों कहा कि जब आहुति देता है तो वह घी से भर जाता
है ॥४॥
अब स्फ्या से चारों ओर लकीर देता है। स्फ्या वज्र है, इसलिए वज्र से लकीर करता
है। तीन लकीरें करता है, जिससे तिहरे वज्र से घिर जाय और कोई उसको लाँघ न सके ॥५॥
वह लकीर खींचने के समय यह मन्त्र पढ़ता है- "अस्मे रमस्व” (यजु० ४।२२) - "हम
में रम” अर्थात् 'यजमान में रम।' अब वह पद के चिह्न को (स्फ्या से खुरचकर) थाली में रख
देता है। “अस्मे ते बन्धुः" (यजु० ४।२२) - "हम में तेरा सम्बन्ध है।" अर्थात् 'यजमान में' ॥६॥
अब (उस स्थान पर) पानी छिड़कता है। जहाँ कहीं खोदते या खुरचते हैं वहाँ घाव
हो जाता है। जल शान्ति देता है। जल से शान्त करता है। इसलिए जल को छिड़कता है ॥७॥
अब पैर (की रेणु) को यजमान को देता है। “त्वे रायः" (यजु० ४।२२) -- "तुझको धन
मिले।" पशु ही धन हैं। इससे तात्पर्य है कि तुझे पशु मिलें। यजमान यह कहकर लेता है- "मे
रायः” (यजु० ४।२२) - "मेरे लिए धन हो।" पशु ही धन हैं। इससे तात्पर्य है कि मुझे पशु
मिलें ॥८॥
अब अध्वर्यु इस मन्त्रांश को पढ़कर अपने (सीने) को छूता है- "मा वय्॒ रायस्पोषेण
वियौष्म" (यजु० ४।२२) - "हम धन से रहित न हों।" इस प्रकार अध्वर्यु अपने को भी पशुओं
से अलग नहीं करता ॥६॥
अब वे पद-रेणु को यजमान की पत्नी को दे देते हैं। पत्नी की प्रतिष्ठा घर है। इस
प्रकार उसको घर में स्थापित कर देते हैं। इसीलिए पद-धूलि को यजमान की पत्नी को दे देते
हैं ॥१०॥
नेष्टा उससे कहता है- “तो तो रायः” (यजु० ४।२२) -- "यह धन तेरा है, तेरा है।"
इस प्रकार वह सोम-गौ को उसे दिखाता है ॥११॥
इसको दिखाने में यह मन्त्र पढ़ता है- "समख्ये देव्या धिया सं दक्षिणयोरुचक्षसा । मा