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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-९, ब्राह्मण-४

५१६ शतपथ ब्राह्मण
ङ्गः प्रतितिष्ठति यद्युऽअतिरात्रो वा षोडशी वा स्यान्नैव जुहुयान्मध्यं परिधि
मुपस्पृशेत्समुद्यैव तूष्णीमेत्य प्रपद्येत तथायथं यज्ञक्रतून्व्यावर्तयति ॥ ३३ ॥ अयु-
ङ्गा-अयुङ्गा ऽएकधना भवन्ति । त्रयो वा पञ्च वा पञ्च वा सप्त वा सप्त वा नव
वा नव वैकादश वैकादश वा त्रयोदश वा त्रयोदश वा पञ्चदश वा द्वन्द्वमूहू
मिथुनं प्रजननमय य ऽएष ऽएकोऽतिरिच्यते स यजमानस्य श्रियमभ्यतिरिच्यते स
वाऽएषाᳪ सधनं यो यजमानस्य श्रियमभ्यतिरिच्यते तद्यदेषाᳪ सधनं तस्मादेक-
धना नाम ॥ ३४ ॥ ब्राह्मणम् ॥ ४ [१. ३] ॥ ॥
अथाधिषवणे पर्युपविशन्ति । अथास्याᳪ हिरण्यं बध्नीते द्वयं वाऽइदं न तृ-
तीयमस्ति सत्यं चैवानृतं च सत्यमेव देवा अनृतं मनुष्या अमृतेरसं वै हिरण्यᳪ
सत्येनाऽमृतेनोपस्पृशानि सत्येन सोमं पराहणानीति तस्माद्वाऽअस्याᳪ हिरण्यं ब-
ध्नीते ॥ १॥ अथ ग्रावाणामादत्ते । ते वाऽएतेऽश्ममया ग्रावाणो भवन्ति देवो वै
सोमो दिवि हि सोमो वृत्रो वै सोम आसीत्तस्यैतच्छरीरं यद्गिरयो यदश्मानस्तच्छ-
रीरेणैवेनमेतत्समर्धयति कृत्स्नं करोति तस्मादश्ममया भवन्ति घ्नन्ति वाऽएनमे-
तद्यदभिषुण्वन्ति तन्नितेन घ्नन्ति तथात उदेति तथा संजीवति तस्मादश्ममया ग्रा-
वाणो भवन्ति ॥२॥ तमादत्ते । देव॒स्य त्वा सवि॒तुः प्रस॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो
हस्ता॑भ्यामा॒ददे॒ रावा॑सीति सवि॒ता वै दे॒वानां प्रसवि॒ता तत्स॑वितृप्रसूत ए॒वैनमे-
तदा॑दत्ते॒ऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्या॒मित्य॒श्विना॑वध्व॒र्यू तत्त॒योरे॒व बा॒हुभ्या॒माद॑त्ते॒ न स्वाभ्यां॑ पू॒-
ष्णो हस्ता॑भ्या॒मिति॑ पू॒षा भा॒गदु॒घस्तत्त॒स्यैव हस्ता॑भ्यामाद॑त्ते॒ न स्वाभ्यां॒ वज्रो॒ वा
ऽएष तस्य॒ न मनुष्यो॑ भ॒र्ता तमे॒ताभि॑र्देव॒ताभि॒राद॑त्ते ॥३॥ आददे॒ रावा॑सीति ।
यदा वाऽएन॑मे॒तेनाभिषु॒ण्वन्त्यथा॑हुतिर्भवति यदाहुतिं जुहोत्यथ दक्षि॑णा ददात्ये-
तद्धैष॒ द्वयᳪ रास॑तऽआहु॒तीश्च दक्षि॑णाश्च तस्मादाह॒ रावा॑सीति ॥४॥ गभी॒रमि॒-
मम॑ध्व॒रं कृ॑धीति । अध्वरो वै यज्ञो महाᳪस्तमिमं यज्ञं कृधीत्येवैतदाहेन्द्राय सुषूतम-

कां० ३, अ० ६, ब्रा० ३-४, कं० ३३-३४ व १-५ शतपथब्राह्मण / ५१७
इन्हीं के द्वारा यज्ञ की स्थापना होती है। यदि अतिरात्र या षोडशी हो तो न आहुति दे और न
बीच की परिधि को छुए । चुपके से वहाँ जावे। इस प्रकार वह यज्ञ के ऋतुओं में भेद कर सकता
है ॥३३॥
एकधन विषम संख्या में (अयुङ्क) होते हैं, तीन या पाँच, पाँच या सात, सात या नौ, नौ
या ग्यारह, ग्यारह या तेरह, तेरह या पन्द्रह । जोड़े से सन्तति होती है। यह जो एक बच रहता
है वह यजमान की श्री के लिए होता है। और जो यह यजमान की श्री के लिए बच रहा है वह
सबका धन अर्थात् सधन होता है और चूंकि सबका धन होता है इसलिए उसका नाम 'एकधन'
है ॥३४॥
अध्याय ६—ब्राह्मण ४
अब वे अधिषवण के पास बैठते हैं। अब वह इस (अनामिका अँगुली) में सुवर्ण का
टुकड़ा बाँधता है। दो ही होते हैं, तीसरा नहीं, अर्थात् सत्य और अनृत। देव सत्य है और मनुष्य
अनृत। सुवर्ण अग्नि के बीज से उत्पन्न है। 'सत्य से अंशों को छुऊँ, सत्य से सोम को लूँ'—वह
ऐसा विचारता है इसलिए अनामिका अँगुली में सुवर्ण को बाँधता है ।।१।।
अब वह ग्रावा (पत्थर) को लेता है। ये जो ग्रावा हैं वे अश्ममय अर्थात् पत्थर के
हैं। सोम देव है। सोम द्यौलोक में था । सोम वृत्र था। ये जो पहाड़ हैं वे इसके शरीर हैं।
उसके ही शरीर से उसको पुष्ट करता है, पूर्ण करता है। इसीलिए ग्रावा (पट्टे) पत्थर के होते
हैं। ये जो सोम को निचोड़ते हैं तो मानो उसका हनन करते हैं। उसको उसी से मारते हैं ।
वहीं से वह उठता है और जीवित हैं, इसलिए भी पट्टे पत्थर के होते हैं ॥२॥
वह पट्टे को इस मन्त्र से लेता है— "देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो
हस्ताभ्याम् । आददे रावासि ।"—"तुझको सविता देव की प्रेरणा से, अश्विन के बाहुओं से, पूषा
के हाथों से लेता हूँ । तू दानी है ।" सविता देवों का प्रेरक है। इस प्रकार सविता से प्रेरित करके
उसे लेता है। 'अश्विनों के बाहुओं से' इसलिए कि अश्विन देवों के अध्वर्यु हैं । वह अपने
बाहुओं से नहीं किन्तु उनके बाहुओं से लेता है। 'पूषा के हाथों से' इसलिए कि पूषा भागों का
बाँटनेवाला है। इसलिए पूषा के हाथों से लेता है, अपने हाथों से नहीं। इसके अतिरिक्त वह
(पत्थर का पट्टा) वज्र है, कोई उसे उठा नहीं सकता । उन्हीं देवताओं की सहायता से वह उसे
उठाता है ।।३।।
वह कहता है 'मैं तुझे लेता हूँ, तू दाता है।' जब वे उसको इस पत्थर से कुचलते हैं,
तब आहुति होती है। जब आहुति देता है तो दक्षिणा देता है। इस प्रकार वह पट्टा दो चीजें देता
है, आहुति भी और दक्षिणा भी । इसलिए कहा 'तू दाता है' ॥४॥
"गभीरमिममध्वरं कृधि" (यजु० ६।३०)— 'अध्वर' नाम है यज्ञ का अर्थात् "इस
गम्भीर यज्ञ को कर ।" "इन्द्राय सुषूतमम्" (यजु० ६।३०)— अर्थात् "इन्द्र के लिए उत्तम

५१८ शतपथ ब्राह्मण

मितीन्द्रो॒ वै य॒ज्ञस्य दे॒वता॒ तस्मादाहेन्द्रा॒येति सु॒षूतम॒मिति सु॒सुतम॒मित्ये॒वैतदा॒-
होत्त॒मेन प॒वित्रे॒त्येष वाऽउत्त॒मः प॒वित्रं॒ यत्सोम॒स्तस्मादा॒होत्त॒मेन प॒वित्रे॒त्यूर्ज॑स्वन्तं॒
मधु॑मन्तं॒ पय॑स्वन्तमिति रस॒वन्तमित्ये॒वैतदाह यदाहोर्ज॑स्वन्तं॒ मधु॑मन्तं॒ पय॑स्वन्तमिति
॥ ५ ॥ अथ॒ वाचं॒ यच्छति । दे॒वा ह वै य॒ज्ञं त॒न्वाना॒स्तेऽसु॒ररक्ष॒सेभ्य आस॒ङ्गाद्बिभ-
यां च॒क्रुस्ते होचु॒रुपा॒श्वप्सु य॒ज्ञाद्वाचं॑ य॒च्छामेति त॒ऽउपा॒श्वप्सूदन्न॒वाचमयच्छन् ॥ ६ ॥
अथ निग्रा॒भ्या आहरति । तास्वेनं वाचयति निग्रा॒भ्या स्थ देव॒श्रुतस्त॒र्पयत मा
मनो मे तर्पयत वाचं मे तर्पयत प्राणं मे तर्पयत चक्षुर्मे तर्पयत श्रोत्रं मे तर्पय-
ता॒त्मानं॑ मे तर्पयत प्रजां मे तर्पयत प॒शून्मे तर्पयत ग॒णान्मे तर्पयत ग॒णा मे मा
वितृ॑ष॒न्निति र॒सो वाऽआ॒पस्तास्वे॒वैतामाशिष॒माशा॑स्ते॒ सर्वं च मऽआ॒त्मानं॑ तर्प॒-
यत प्र॒जां मे तर्पयत प॒शून्मे तर्पयत ग॒णान्मे तर्पयत ग॒णा मे मा वितृ॑ष॒न्निति स
य ए॒ष उपा॑ऽशु॒सवनः स वि॒वस्वानादि॒त्यो नि॒दाने॒न सोऽस्यै॒ष व्या॒नः ॥ ७ ॥ त-
म॒भिमिमी॑ते । प्र॒ति वाऽए॒नम॑तद्य॒दभि॑षु॒ण्वन्ति॒ तमे॒तेन प्र॒ति तथ्थात॒ उदे॑ति तथ्था
संजी॑वति॒ यद्वेव॑ मिमी॒ते त॒स्मान्मात्रा मनु॒ष्ये॑षु मा॒त्रो यो चाय॒न्या मा॑त्रा ॥ ८ ॥
स मि॑मीते । इन्द्रा॑य त्वा॒ वसु॑मते रु॒द्रवत॒ऽइतीन्द्रो॒ वै य॒ज्ञस्य दे॒वता॒ तस्मादाहे-
न्द्रा॒य त्वेति॒ वसु॑मते रु॒द्रवत॒ऽइति तदिन्द्र॑मेवा॒नु वसू॑श्च रु॒द्रांश्चाभज॑तीन्द्रा॑य त्वादि-
त्यव॑त॒ऽइति तदिन्द्र॑मेवा॒न्वादित्या॑नाभज॑तीन्द्रा॑य त्वाभिमातिघ्न॒ऽइति स॒पत्नो वा
ऽअ॒भिमा॑ति॒रिन्द्रा॑य त्वा सपत्नघ्न॒ऽइत्ये॒वैतदाह॒ सोऽस्यो॑द्धा॒रो यथा॒ श्रेष्ठन्योद्धा॒र ए॒-
वम॒स्यैषऽऋते दे॒वेभ्यः ॥ ९ ॥ श्ये॒नाय॑ त्वा सोम॒भृत॒ऽइति । तद्गाय॒त्र्यै मि॑मीते॒ऽग्नये॑
त्वा रायस्पोषद॒ऽइत्य॒ग्निर्वे गायत्री तद्गाय॒त्र्यै मिमीते स यद्गायत्री श्ये॒नो भूत्वा॒ दि-
वः सोम॑माह॒रत्तेन सा श्ये॒नः सोम॑भृत्तेनै॒वास्या ए॒तद्वीर्येण द्वितीयं मि॑मीते ॥ १०॥
अथ यत्पञ्च॒ कृत्वो मि॑मीते । संवत्स॒रसं॑मितो॒ वै य॒ज्ञः पञ्च वाऽऋ॒तवः संवत्स॒र-
स्य तं प॒ञ्चभिराप्नोति॒ तस्मात्पञ्च॒ कृत्वो॑ मिमीते ॥ ११ ॥ तम॑भिमृशति । यु॒क्ते सोम

का० ३, अं० ६, ब्रा० ४, कं० ५-११ शतपथब्राह्मण / ५१६
रीति से बनाया गया ।" यज्ञ का देवता इन्द्र है इसलिए कहा 'इन्द्र के लिए' । “उत्तमेन पविना"
(यजु० ६।३०) - सोम सबसे अच्छा वज्र (पवि) है, इसलिए कहा 'उत्तम वज्र से'।
“ऊर्जस्वन्तं मधुमन्तं पयस्वन्तम्” (यजु० ६।३०) - इसके कहने का तात्पर्य कि "रस
वाला” ॥५॥
अब वाणी को रोक लेता है (चुप हो जाता है) । यज्ञ को करते हुए देव लोग राक्षसों के
आक्रमण से भयभीत हो गये । उन्होंने कहा, 'चुपके-चुपके यज्ञ करें। वाणी को रोक लें।'
उन्होंने चुपके-चुपके आहुति दी और वाणी को रोक लिया । ६।।
अब निग्राभ्य जलों को लेता और उन पर यह जपता है—"निग्राभ्या स्थ देवश्रुतस्तर्प-
यत मा । (यजु० ६।३०) मनो मे तर्पयत, वाचं मे तर्पयत, प्राणं मे तर्पयत, चक्षुर्मे तर्पयत, श्रोत्रं
मे तर्पयतात्मानं मे तर्पयत, प्रजां मे तर्पयत, पशून्मे तर्पयत, गणान्मे तर्पयत, गण मे मा वितृषन्'
(यजु० ६।३१) - "हे जलो ! तुम देवश्रुत निग्राभ्य हो। मुझे तृप्त करो, मेरे मन को तृप्त करो,
मेरी वाणी को तृप्त करो, मेरे प्राण को तृप्त करो, मेरी आँख को तृप्त करो, मेरे कान को तृप्त
करो, मेरे आत्मा को तृप्त करो, मेरी प्रजा को तृप्त करो, मेरे पशुओं को तृप्त करो, मेरे गणों
को तृप्त करो, मेरे गण प्यास से न मरें।” जल रस हैं। उन पर आशीर्वाद कहता है कि मुझ
सम्पूर्ण को तृप्त करो - प्रजा को, पशु को, गणों को; मेरे गण प्यासे न मरें। यह उपांशुसवन ही
आदित्य विवस्वान् है। यह वस्तुतः इस यज्ञ का ग्यान है ॥७॥
अब वह उसको नापता है। ये जो उसको कुचलते हैं तो मानो उसका हनन करते हैं।
वहीं से यह उठता है, जीता है। चूंकि उससे नापते हैं इसलिए नाप होती है—जो मनुष्यों में
प्रचलित है वह भी और अन्य नाप (मात्रा) भी ॥८॥
वह इस मन्त्र से नापता है—"इन्द्राय त्वा वसुमते रुद्रवते" (यजु० ६।३२)- "यह
वसुवाले और रुद्रवाले इन्द्र के लिए।" यज्ञ का देवता इन्द्र है, इसलिए कहा 'इन्द्र के लिए।'
'वसुवाले और रुद्रवाले' कहकर वह इन्द्र के साथ वसु और रुद्रों का भी भाग स्थापित कर
देता है। "इन्द्राय त्वादित्यवते" (यजु० ६।३२) - इससे इन्द्र के साथ आदित्यों का भाग भी
स्थापित कर देता है। "इन्द्राय त्वाभिमातिघ्ने" (यजु० ६।३२) - 'अभिमाति' का अर्थ है
शत्रु, अर्थात् “शत्रु के मारनेवाले इन्द्र के लिए।" यह उस (इन्द्र) का विशेष भाग है जैसे किसी
श्रेष्ठ (नेता) का होता है, - अन्य देवों से अलग ॥६॥
"श्येनाय त्वा सोमभृते" (यजु० ६।३२) - "तुम सोम रखनेवाले श्येन के लिए।" यह
गायत्री के लिए नापता है। "अग्ने त्वा रायस्पोषदे" (यजु० ६।३२) - "तुझ धन देनेवाले अग्नि
के लिए।" अग्नि गायत्री है। इसको गायत्री के लिए नापता है। यह जो गायत्री श्येन होकर
सोम को द्यौलोक में ले गई, इसलिए उसको 'सोमभृत श्येन' कहा। इसके उस पराक्रम के लिए
वह दूसरा भाग बाँटता है (नापता है) ॥१०॥
पाँच बार क्यों नापता है ? यज्ञ की वही नाप है जो वर्ष में पाँच ऋतुएँ होती हैं। वह
इसको पाँच भागों में लेता है। इसलिए पाँच बार नापता है ॥११॥

दिवि ज्योति॒र्पृथिव्या॑मु॒रावन्तरि॑क्षे । तेना॒स्मै यज॑मानायो॒रु रा॒ये कृ॑ध्यधि दा॒त्रे
वोच॒ इति॒ यत्र वाऽए॒षोऽग्रे॑ दे॒वानाꣳ ह॒विर्ब॒भूव तद्ध्ये॒लां चक्रे॑ नैव सर्वैणेवा-
त्मना दे॒वानाꣳ ह॒विर्भूर्वमिति॒ स ए॒तास्ति॒स्रस्त॒नूरे॒षु लो॒केषु विन्य॑धत्त ॥ १२ ॥
तद्वै दे॒वा अ॑शृण्वन् । तेऽस्यै॒तेनै॒वैतास्त॒नूरा॒प्नुवन्त्स कृत्स्न॑ एव दे॒वानाꣳ ह॒विर॑-
भवत्तथो॒ऽए॒वास्यै॒ष ए॒तेनै॒वैतास्त॒नूरा॒प्नोति॒ स कृत्स्न॑ एव दे॒वानाꣳ ह॒विर्भ॑वति
तस्मा॑दे॒वम॒भिमृ॑शति ॥ १३ ॥ अथ निग्रा॒भ्याभि॒रुप॑सृजति । आपो॑ ह॒ वै वृ॒त्रं जघ्नु॒-
स्तैने॒वैतद्वी॒र्ये॑णापः स्यन्द॑न्ते॒ तस्मा॑दे॒नाः स्यन्द॑माना॒ न किं च॒न प्रति॑धारयति ता
ह॒ स्वमे॒व वशं॑ चेरुः कस्मै॒ नु व॒यं ति॑ष्ठेमहि याभि॑र॒स्माभि॑र्वृ॒त्रो ह॒त इति॒ सर्वं
वाऽइ॒दमिन्द्रा॑य तस्थ्यानमास॒ यदि॒दं किं चापि॒ योऽयं पव॑ते ॥ १४ ॥ स इन्द्रो॒ऽब्र-
वीत् । सर्वं॒ वै म॒ऽइदं त॒स्यानं॒ यदि॒दं किं च ति॒ष्ठद्धमे॒व म॒ऽइति॒ ता हो॑चुः किं
नस्ततः॒ स्यादिति॑ प्रथम॒भक्ष॑ ए॒व वः सो॑मस्य॒ राज्ञ॒ इति॒ तथेति॒ ता अ॒स्माऽअति॑-
ष्ठन्त तास्त॑स्था॒ना उ॒रसि॒ न्य॑गृह्णीत तद्य॒देना उ॒रसि॒ न्य॑गृह्णीत॒ तस्मान्निग्रा॒भ्या ना॑-
म तथै॒वैता एतद्यज॑मान उ॒रसि॑ नि॒गृह्णी॑ते॒ स आ॑सामेष प्रथमभक्षः सो॑मस्य॒ राज्ञो॒
यन्निग्रा॒भ्याभि॒रुप॑सृजति॒ ॥ १५ ॥ स ऽउप॑सृजति । श्वा॒त्रा स्थ॑ वृत्र॒तुर॒ इति॒ शिवा ह्य्ा-
पस्तस्मा॑दाह॒ श्वा॒त्रा स्थेति॑ वृत्र॒तुर॒ इति वृ॒त्रꣳ ह्येता अ॑घ्नन्त्राधोगूर्ता अ॒मृत॑स्य॒ प-
त्नीरि॒त्यमृ॑ता ह्य्ाप॒स्ता दे॒वीर्दे॒वेभ्यं॑ य॒ज्ञं न॑य॒तेति नात्र॑ तिरो॒हित॑मिवास्त्युपहूताः
सो॒मस्य पिब॒तेति॒ तदुप॑हूता ए॒व प्र॑थमभ॒क्षꣳ सो॒मस्य॒ राज्ञो भ॑क्षयन्ति ॥ १६ ॥ अ-
थ प्रह॑रि॒ष्यन् । यं द्वि॒ष्यात्तं मन॑सा ध्यायेदमुष्माऽअ॒हं प्रह॑रामि॒ न तुभ्य॒मिति॒ यो
न्वैवेमं मानु॑षं ब्राह्म॒णाꣳ ह॒न्ति तं न्वेव परि॑चक्षते॒ऽथ किं य ए॒तं दे॒वो हि सोमो॑
ऽस्ति वाऽए॒नमेतद्यद॒भिषु॒ण्वन्ति॒ तमे॒तेन घ्न॑न्ति तथात उदे॑ति तथा संजी॑वति त-
थानेन॒स्यं॑ भवति॒ यद्यु॒ न द्वि॒ष्यादपि॑ तृ॒णमेव मन॑सा ध्यायेत्तथो॒ऽअनेन॒स्यं॑ भवति
॥ १७॥ स प्रह॑रति । मा भेर्मा सं॑विक्था॒ इति॒ मा त्वं भैषीर्मा सं॑विक्था अ॒मुष्मा

का० ३, अ० ६, ब्रा० ४, क० १२-१८ शतपथब्राह्मण / ५२१
वह इस मन्त्र से छूता है—‘‘यत् ते सोम दिवि ज्योतिर्यत् पृथिव्यां यदुरावन्तरिक्षे ।
तेनास्मै यजमानायोरु राये कृध्यधि दात्रे वोचः’’ (यजु० ६।३३)—‘‘हे सोम, जो तेरा प्रकाश
द्युलोक में है, जो पृथिवी में, जो अन्तरिक्ष में, उससे इस यजमान के लिए और उसके धन के
लिए स्थान कर । दाता के लिए आज्ञा दे।’’ जब यह (सोम) देवों की हवि बना तो उसने चाहा
कि मैं अपनी पूर्ण सत्ता (आत्मा) के साथ देवों का हवि न बनूँ। इसलिए उसने अपने तीन
शरीरों को संसार में छोड़ दिया ॥१२॥
तब देव विजयी हो गये। उन्होंने इसी मन्त्र द्वारा उसके इन तीनों शरीरों को प्राप्त कर
लिया, और वह सम्पूर्ण देवों का हवि हो गया। इसी प्रकार यह भी इसके शरीरों को प्राप्त
करता है और यह सोम सम्पूर्णतया देवों का हवि हो जाता है। इसी कारण से वह इस प्रकार
उसको छूता है ॥१३॥
अब निग्राह्य जल को उस पर छिड़कता है। जलों ने ही वृत्र को मारा। उसी पराक्रम
से ये बहते हैं। इसीलिए जब जल बहते हैं तो कोई उनको रोक नहीं सकता। वे अपनी ही इच्छा
से चले थे। उन्होंने सोचा कि जब हम वृत्र को मार चुके तो किसके लिए रुकें? सृष्टि में यह जो
कुछ है वह सब इन्द्र के लिए रुक गया, यहाँ तक कि पवन भी ॥१४॥
इन्द्र बोला कि ‘सृष्टि में जो कुछ है सब मेरे लिए रुक गया। तुम भी रुको।' उन्होंने कहा
कि ‘तो हमारा क्या होगा ?’ उसने कहा कि ‘सोम राजा का पहला घूंट तुमको मिलेगा।' उन्होंने
कहा, ‘अच्छा।' वे उसके लिए रुक गये। जब वे उसके लिए रुक गये तो उसने उनको छाती से
लगा लिया (न्यगृह्णीत), इसलिए इनका नाम ‘निग्राह्य' है। इसी प्रकार यह यजमान भी
इनको छाती से लगाता है। यह उनका सोम राजा का पहला घूंट है कि वह इन जलों को (सोम
पर) छोड़ता है ॥१५॥
वह इस मन्त्र से छोड़ता है—‘स्वात्रा स्थ वृत्रतुरः' (यजु० ६।३४) जल कल्याणकारक
होते हैं इसलिए कहा—‘‘वृत्र को मारनेवाले कल्याणकारी’’ क्योंकि इन्होंने वृत्र को मारा।
‘‘राधोगूर्ताऽमृतस्य पत्नीः’’ (यजु० ६।३४)—‘‘ऐश्वर्य की देनेवाली अमृत की पत्नियां ।’’
जल अमृत हैं। ‘‘ता देवीर्देवत्रेमं यज्ञं नय’’ (यजु० ६।३४)—‘‘हे देवियो, देवों के लिए इस यज्ञ
को ले जाओ।’’ यह सब स्पष्ट है। ‘‘उपहूताः सोमस्य पिबत’’ (यजु० ६।३४)—‘‘आप निमन्त्रित
होकर सोम को पियो।’’ ये जल निमन्त्रित हैं और सोम राजा के पहले घूंट को पीते
हैं ॥१६॥
जब सोम को कुचले तो मन में अपने शत्रु का विचार करे—‘मैं अमुक शत्रु को कुचलता
हूँ। तुझको नहीं।' जो कोई ब्राह्मण मनुष्य को मारते हैं वे पाप करते हैं, फिर उनका क्या
कहना जो सोम राजा का हनन करते हैं क्योंकि सोम तो देव है! ये जो उसको पत्थर से कुचलते
हैं तो इसका हनन करते हैं। वहीं से वह उठता है, जीता है, इस प्रकार पाप नहीं होता। यदि
कोई उसका शत्रु न हो तो तृण का ही चिन्तन कर ले। इससे भी पाप न लगेगा ॥१७॥
वह इस मन्त्र से कुचलता है—‘‘मा भेर्मा संविक्था’’ (यजु० ६।३५)—अर्थात् ‘‘डरे

ऽअरुं प्रकृरामि न तुभ्यमित्ये॒वैतदा॒होर्जं॑ धत्स्वेति॒ रसं॑ धत्स्वेत्ये॒वैतदा॒ह धिषणे॑
वीडू॒ सती॒ वोडेया॒मूर्जं॑ दधाथामितोभेऽए॒वैतत्फलकेऽअ॒ङ्कूरित्यु॒ कैकऽअ॒ङ्कः किं
नु तत्र योऽप्येते फलके भिन्यादिमे ह वै द्यावापृथिवीऽए॒तस्माद्व्याङ्क्यतात्सꣳ-
रेजेते तदाभ्यामेवैनमेतद्द्यावापृथिवीभ्याꣳ शमयति तथैमे शान्ते न हिनस्त्यूर्जं॑
दधाथामिति॒ रसं॑ दधाथामित्ये॒वैतदा॒ह पाप्मा कृतो न सोम॒ इति॒ तद॒स्य सर्वं॑ पा-
प्मानꣳ कृन्ति ॥ १८॥ स वै त्रि॒रभिषु॒णोति॑ । त्रिः सम्भरति चतुर्निग्राभमु॒पैति त-
दृश दशाक्षरा वै विराड्वैरा॒जः सोम॒स्तस्माद्दश कृत्वः सम्पा॒दयति ॥ १९॥ अथ॒ प्र॒-
न्निग्राभमुपैति । यत्र वा॒ऽएषोऽग्रे॑ दे॒वानाꣳ ह॒विर्बभूव॒ तदेमा दिशोऽभि॒द्यावा-
भि॒र्दिग्भि॒र्मिथु॒नेन प्रियेण धाम्ना॒ सꣳस्पृश्येति॒ तमे॒तद्देवा॒ आभि॒र्दिग्भि॒र्मिथु॒नेन
प्रियेण॒ धाम्ना॒ सम॑स्पर्शयन्निग्राभमुपायंस्तथो॒ऽए॒वैनमेष ए॒ताभि॒र्दिग्भि॒र्मिथु॒नेन
प्रियेण॒ धाम्ना॒ सꣳस्पर्शयति यन्निग्राभमुपैति ॥ २०॥ स उपैति । प्रागपागुदगधरा-
क्सर्वतस्त्वा दिश आ॒धावन्त्विति॒ तदेनमाभिर्दिग्भिर्मिथुनेन प्रियेण॒ धाम्ना॒ सꣳस्प-
र्शयत्यम्ब॒ निष्व॑र॒ समरीवि॒दामिति॒ योषा वाऽअ॒म्बा योषा॒ दिश॒स्तस्मादा॒हाम्ब॒
निष्वरेति॒ समरीविदामिति प्रजा वाऽअ॒रीः सं प्रजा जानतामित्ये॒वैतदा॒ह तस्मा-
द्या अ॒पि वि॒दूरमिव प्रजा भवन्ति॒ समेव ता जानते तस्मादाह समरीविदामिति
॥२१॥ अथ यस्मात्सोमो नाम । यत्र वाऽए॒षोऽग्रे॑ दे॒वानाꣳ ह॒विर्बभूव॒ तद्भे॒क्षां
चक्रे नैव सर्वे॑णेवा॒त्मना दे॒वानाꣳ ह॒विर्भूव॒मिति॒ तस्य या जुष्टतमा तनूरास ता-
मपनिदधे तद्वै देवा॒ अस्पृण्वत ते होचुरूपैवेतां प्रवृ॑ङ्ग्ध्व स॒हैव न एतया ह॒वि-
र्धेहीति तां दूर॒ऽइवोपप्रावृङ्क्त स्वा वै मऽए॒षेति॒ तस्मात्सोमो नाम ॥ २२॥ अ-
थ यस्माद्यज्ञो नाम । घ्नन्ति वाऽए॒नमेतद्यद॒भिषु॒ण्वन्ति॒ तद्यदे॒नं तन्वते॒ तदे॒नं ज-
नयन्ति स॒ ताय॑मानो जायते स यन्जाय॑ते तस्माद्य॒ज्ञो यज्ञो ह॒वै नमित्याच॑क्ष
इति ॥ २३॥ तत्रैतामपि वाचमुवाद । त्वमङ्ग प्र॒शꣳसिषो दे॒वः शविष्ठ मर्त्यम् ।

कां० ३; अ० ६, ब्रा० ४, कं० १८-२४ शतपथब्राह्मण / ५२३
मत, कांपे मत ।" क्योंकि मैं अमुक को कुचलता हूँ, तुझको नहीं। "ऊर्जं धत्स्व" (यजु० ६।३५)-
अर्थात् "रस को धारण कर ।" "धिषणे वीड़्वी सती वीड़ेयेथामूर्जं दधाथाम्" (यजु० ६।३५)-
"हे निश्चल धिषण, तुम निश्चल रहो और रस को धारण करो।" कुछ लोग कहते हैं कि इससे
उन दो पट्टों से तात्पर्य है। यदि इनको कोई तोड़ दे तो क्या हो ? ये वस्तुतः द्यौ और पृथिवी
हैं जो इस उद्यत वज्र से कांपते हैं। इसलिए इसको शान्त करता है और यह शान्त होकर हानि
नहीं पहुँचाता। 'ऊर्जं दधाथाम्' का अर्थ है 'रस को धारण कर ।' "पाप्मा हतो न सोमः" (यजु०
६।३५) -"पापी मर गया, न कि सोम।" इस प्रकार इसके सब पापों का नाश करता है ॥१८॥
वह तीन बार कुचलता है, तीन बार बटोरता है। चार बार निग्राभ-क्रिया करता है।
इस प्रकार दस हुए। दस अक्षर का विराट् छन्द होता है। सोम विराट्वाला है। इस प्रकार
दस बार में सम्पादन करता है ॥१९॥
वह निग्राभ-क्रिया क्यों करता है? जब यह सोम पहले देवताओं की हवि बना तो इसने
इन चार दिशाओं का ध्यान किया कि मैं इन चार दिशाओं के द्वारा अपने प्रिय तेज का स्पर्श
करूँ। निग्राभ के द्वारा देवों ने इन दिशाओं से प्रिय प्रकाश के साथ स्पर्श कराया। यह यजमान
भी निग्राभ करके इन दिशाओं के द्वारा प्रिय प्रकाश से इसका स्पर्श कराता है ॥२०॥
वह (निग्राभ क्रिया) इस मन्त्र से करता है- "प्रागपागुदगधराक् सर्वतस्त्वा दिशऽ-
आधावन्तु" (यजु० ६।३६) - "पूर्व से, पश्चिम से, उत्तर से, दक्षिण से, चारों ओर से दिशाएँ
तुझे धारण करें।" इस प्रकार वह दिशाओं से उसका जोड़ा मिला देता है, उसके प्रिय प्रकाश
से। "अम्ब निष्पर समरीर्विदाम्" (यजु० ६।३६) - "हे मा, इसको सन्तुष्ट कर। उच्च लोग
मिलें।" 'अम्बा' स्त्री हैं। 'दिशाएँ' स्त्री हैं। इसलिए कहा, 'अम्ब निष्पर।' 'अरीः' प्रजा हैं।
इसका तात्पर्य है कि प्रजाएँ परस्पर मेल से रहें। जो दूर-दूर रहते हैं वे भी मेल से रहते हैं।
इसलिए कहा कि प्रजाएँ मेल से रहें ॥२१॥
अब सोम नाम क्यों पड़ा ? जब यह पहले देवताओं का हवि बना तो इसने चाहा कि मैं
अपनी पूर्ण सत्ता से देवों का हवि न बनूं। उसका जो सबसे प्यारा शरीर (अंश) था उसको
उसने अलग कर लिया। अब देव विजयी हो गये। उन्होंने कहा, 'तू इसको अपने में धारण कर।
तब तू हमारा हवि होगा।' उसने उस अपने अंश को दूर से खींच लिया। यह मेरा ही है।
(स्वा वं म) इससे सोम हो गया ॥२२॥
इसको यज्ञ क्यों कहते हैं ? जब उसको कुचलते हैं तो उसको मारते हैं। जब उसको
फैलाते हैं तो उसको उत्पन्न करते हैं। वह फैलाया जाकर उत्पन्न होता है। उत्पन्न होता है,
इसलिए 'यन् जायते', 'यञ्ज', 'यज्ञ' हुआ ॥२३॥
उसने उस समय यह कहा- "त्वमङ्ग प्रशँसिषो देवः शविष्ठ मर्त्यम् । न त्वदन्यो
मघवन्नस्ति मर्डितेन्द्र ब्रवीमि ते वचः" (यजु० ६।३७, ऋ० १।८४।१६) -"हे श्रेष्ठ देव, तू

५२४ शतपथ ब्राह्मण
न॒ ह्य॒न्यो म॑घवन्नस्ति मर्डि॒तेन्द्र॒ ब्रवी॑मि ते॒ वच॒ इति॒ मर्त्यो॒ ह्यैवैतद्ब्रुवन्नु॑वाच
त्वमे॑वेतो ज॑नयितासि नान्यस्त्वदिति ॥ २४॥ अथ॑ निग्रा॒भ्याभ्यो॒ ग्रहा॒न्विगृह्ण॑ते ।
आपो॒ ह वै वृ॒त्रं ज॑घ्नुस्तेनैवैतद्वीर्ये॑णापः स्यन्दन्ते स्यन्द॑मानानां वै व॒सती॑वरीर्गृ-
ह्णाति वसतीवरी॒भ्यो निग्रा॒भ्या निग्रा॒भ्याभ्यो॒ ग्रहा॒न्विगृह्ण॑ते तेनै॒वैतद्वीर्ये॑ण ग्रहा॒-
न्विगृह्ण॑ते होतृ॑चमसाद्योषा वाऽऋग्घोता योषायै वाऽइमाः प्रजाः प्र॒जाय॑न्ते तदे-
नमेतस्यै योषायैऽऋचो होतुः प्र॒जनय॑ति तस्माद्धोतृचमसात् ॥ २५॥ ब्राह्मणम्
॥ ५ [१.४] ॥ सप्तमः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या ११४ ॥ नवमोऽध्यायः [३४.] ॥ ॥
अस्मिन्काण्डे कण्डिकासंख्या ८५१ ॥ ॥
इति माध्यन्दिनीये शतपथब्राह्मणे अध्वरनाम तृतीयं काण्डं समाप्तम् ॥ ३ ॥ ॥

का० ३, अ० ६, ब्रा० ४, कं० २४-२५ शतपथब्राह्मण / ५२५
मर्त्य को प्रशंसित करेगा। तुझसे अन्य कोई सुख का दाता नहीं है। हे ऐश्वर्यवान्, मैं तुझसे यह
वचन कहता हूँ।" यह मर्त्य ही था जो इसने यह कहा, अर्थात् तू ही इसको उत्पन्न करनेवाला
है, तुझसे अन्य कोई दूसरा नहीं ॥२४॥
अब निग्राभ्य जलों से कई ग्रहों (प्यालों) को भरते हैं। जलों ने ही वृत्र को मारा था।
उसी पराक्रम से जल बहते हैं। बहते हुओं से ही वसतीवरी को ग्रहण करता है, वसतीवरी से
निग्राभ्य को, निग्राभ्य से ग्रहों को। उसी पराक्रम के द्वारा होता के चमसे से वह ग्रहों को लेता
है। यह जो होता है, वह ऋक् है, ऋक् स्त्री है, स्त्री से ही यह प्रजा उत्पन्न होती है। इसलिए
वह (इस सोम) को स्त्री, ऋक् होता से उत्पन्न कराता है। इसलिए वह होतृ के चमसे से ग्रहों
को लेता है ॥२५॥
माध्यन्दिनीय शतपथब्राह्मण की श्रीमत् पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय कृत 'रत्नकुमारी-दीपिका'
भाषा व्याख्या का अध्वरनाम तृतीय काण्ड समाप्त हुआ।
तृतीय काण्ड
प्रपाठक कण्डिका-संख्या
प्रथम [ ३. २. १ ] १२४
द्वितीय [ ३. ३. ३ ] १२८
तृतीय [ ३. ४. ४ ] १२२
चतुर्थ [ ३. ६. १ ] १३२
पञ्चम [ ३. ७. ३ ] १२७
षष्ठ [ ३. ८. ४ ] ११२
सप्तम [ ३.६. ४ ] ११४
योग ८५६
पूर्वं के काण्डों का योग १३८७
पूर्णयोग २२४६
तृतीय काण्ड के विशेष शीर्षक
अवान्तर दीक्षा [३।४।३]; उपसदिष्ट: [३।४।४]; महावेदिनामम् [३।५।१];
अग्निप्रणयनादि [३।५।२]; सदो हविर्धाननिर्माणानि [३।५।३]; उपरवनिर्माणम् [३।५।४];
सदस्यौदुम्बरी निखननम् [३।६।१]; धिष्ण्याँ निवापादि [३।६।२]; वैसर्जनहोम: [३।६।३];
अग्निषोमीय पशुप्रयोग:, तत्र यूपच्छेदनम् [३।६।४]; यूपोच्छ्रयणादि [३।७।१]; यूपैकादशिनी
[३।७।२]; पशूपकरणादि [३।७।३]; पशुनियोजन प्रोक्षणादि [३।७।४]; पशु संज्ञपनम्;
तत्रोपवेशनादि विधिः [३।८।१]; अग्निषोमीय वपायागः [३।८।२]; पशुपुरोडाशयागः
[३।८।३]; उपयड्ढोमः [३।८।४]; पश्वेकादशिनी [३।६।१]; वसतीवर ग्रहणविधिः
[३।६।२]; सवनीयपशुप्रयोगः [३।६।३]; सोमाभिषवः [३।६।४]।