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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-५, ब्राह्मण-१

८८ शतपथ ब्राह्मण
ज्योति॒रिति॑ ज्योतिर्वा॒ऽइतर॒स्यामाज्यं॑ भवति ज्योति॒रितर॑स्यां ते ह्ये॒तदु॒भे ज्योति॒-
षी संग॑क्ते॒ तस्मा॑देव॒ꣳ समनक्ति॑ ॥ ७ ॥ अथातो॒ मन॑सश्चैव॒ वाच॑श्च । अहम्भद्र॒-
ऽउदि॑तं॒ मन॑श्च ह वै वाक्चाहम्भद्र॒ऽऊदाते ॥ ८ ॥ तद्ध॒ मन॑ उवाच । अह॒मेव त्व-
त्प्रेयो॒ऽस्मि॒ न वै मया॒ त्वं किं च॒नान॑भिगतं वदसि सा यन्मम॒ त्वं कृ॒तानु॒करानु॒वर्त्मा॑-
र्त्स्यास्य॒हमेव त्वत्प्रेयो॒ऽस्मीति॑ ॥ ९ ॥ अथ ह वागुवाच । अह॒मेव त्वत्प्रेय॒स्यस्मि॒ यदि॑
त्वं वेत्था॒हं तद्वि॑ज्ञापयाम्य॒हꣳ सञ्ज्ञ॑पयामीति॑ ॥ १० ॥ ते प्रजाप॑तिं प्रतिप्रश्न॑मेयतुः ।
स प्र॒जाप॑ति॒र्मनस॑ऽए॒वानू॑वाच॒ मन॑ एव त्व॒त्प्रेयो॒ मन॑सो वै॒ त्वं कृ॒तानु॒करानु॒वर्त्मा॑-
सि प्रेयसो॒ वै पापी॑यान्कृ॒तानु॒करो॒ऽनुवर्त्मा भवतीति॑ ॥ ११ ॥ सा ह वाक्प॒रोक्ता॑
विसिषि॒म्ये । तस्यै॒ गर्भः॑ पपात सा॒ ह वाक्प्र॒जाप॑तिमुवाचाहव्यवाडे॒वाहं तुभ्यं॑
भूयासं॒ यां मा परा॑वोच॒ इति॒ तस्मा॒द्यत्किं च प्रा॑जाप॒त्यं य॒ज्ञे क्रि॒यत॒ऽउपा॑ꣳश्वेव॒ त-
त्क्रि॑यते॒ऽहव्यवाड्ढि वाक्प्र॒जापतय॒ऽआसी॑त् ॥ १२ ॥ तद्वैतद्देवाः । रेत॑श्चर्मन्वा॒ घ-
स्मिन्वा बभूवुस्तद्ध॑ स्म पृच्छ॒त्यत्रे॑व॒ त्याऽदिति॒ ततो॒ऽत्रिः सम्ब॑भूव॒ तस्मा॒द्व्यात्रे॒य्या
योषितिन॒स्त्वै॒तस्यै॑ हि योषायै वाचो देव॒ताया॒ रेत॑ सम्भू॒तः ॥ १३ ॥ ब्राह्म॒णम्
॥ १ [४.५.] ॥ अध्यायः ॥ ४ ॥ ॥
स वै प्र॒वरा॑याश्रावयति । तद्यत्प्र॒वरा॑याश्राव॒यति॑ य॒ज्ञो वा॒ऽआश्रा॑वणं॒ य॒ज्ञम॒-
भिव्याहृत्याथ॒ होता॑रं प्र॒वृणी॒ऽइति॒ तस्मात्प्र॒वरा॑याश्रावयति ॥ १ ॥ स इ॒ध्मसंनह॒-
नान्ये॒वाभि॑पद्याश्रावयति । स य॒द्वाना॑रभ्य य॒ज्ञमध्व॒र्युराश्रा॑वये॑द्विप॒न्नो वा॑ ह॒ स्याद॒न्यां
वार्त्ति॒मार्छे॑त् ॥ २॥ तदु॑के । वेदि॑ स्ती॒र्णीये॑ ब॒र्हिर॒भिप॒द्याश्रा॑वयती॒ध्मस्य वा शक॒-
लमपच्छि॒द्याभि॑पद्याश्रावयतीदं वै किंचि॒द्यज्ञस्ये॒दं य॒ज्ञमभिप॒द्याश्रा॑वयाम॒ इति॒ वद॒-
न्तस्तदु॒ तथा॒ न कुर्यादेतद्वै किंचि॒द्यज्ञस्य॒ येरि॒ध्मः संनद्धो भवत्य॒ग्निꣳ सम्मृ॑जन्ति॒ तद्वैव
खलु॒ य॒ज्ञम॒भिप॒द्याश्रा॑वयति॒ तस्मा॑दि॒ध्मसंनह॒नान्ये॒वाभि॑प॒द्याश्रा॑वयेत् ॥ ३ ॥ स आ-
श्राव्य॑ । य ए॒व दे॒वाना॒ꣳ होता॒ तमे॒वाग्रे प्र॒वृणी॑ते॒ऽग्निमेव तद॒ग्नये चैवैतद्दे॒वेभ्य॑श्च

कां० १, अ० ५, ब्रा० १, कं० १-४ शतपथब्राह्मण / ८६
से ज्योति (मिल गई)।" एक में जो आज्य है वह ज्योति है। दूसरी में जो आज्य है वह भी ज्योति
है। इस प्रकार दोनों ज्योतियाँ मिल गईं। इसलिए इस प्रकार मिलाता है ॥७॥
एक बार मन और वाणी में झगड़ा हुआ बड़ाई के लिए। मन और वाणी दोनों कहने लगे
कि 'मैं भद्र हूँ'-'मैं भद्र हूँ' ॥८॥
अब मन ने कहा, 'मैं तुझसे अच्छा हूँ। मेरे बिना बिचारे तू कुछ नहीं कहती। तू मेरे
किये का ही अनुकरण करती है। तू मेरा अनुसरण करती है। इसलिए तुझसे मैं बड़ा हूँ' ॥६॥
अब वाणी बोली, 'मैं तुझसे अवश्य बड़ी हूँ, क्योंकि जो तू जानता है उसे मैं प्रकाशित
करती हूँ। मैं उसे फैलाती हूँ' ॥१०॥
वे प्रजापति के पास निश्चय के लिए गये। उस प्रजापति ने मन-अनुकूल निश्चय किया
कि मन ही तुझसे श्रेष्ठ है, क्योंकि तू मन का ही अनुकरण करती और उसी के मार्ग पर चलती है।
निश्चय करके वह छोटा है जो बड़ों का अनुसरण करता और उनके मार्ग पर चलता है ॥११॥
वह वाणी अपने विरुद्ध निश्चय को सुनकर खिन्न हो गई और उसका गर्भपात हो गया।
उस वाणी ने प्रजापति से कहा, 'मैं कभी तेरे लिए हवि न ले जाऊँगी क्योंकि तूने मेरा विरोध
किया।' इसलिए यज्ञ में जो कुछ प्रजापति के लिए किया जाता है वह मौन होकर पढ़ा जाता है,
क्योंकि वाणी प्रजापति के लिए हवि का वाहक नहीं होती ॥१२॥
तब देव उस रेत (वीर्य) को चमड़े में या किसी अन्य चीज में ले आये। उन्होंने पूछा,
'अत्र ?' (अरे क्या यह यहाँ है ?) इस प्रकार अत्रि उत्पन्न हुआ (अत्र से अत्रि)। इसीलिए
आत्रेयी स्त्री से समागम करने से दोष लगता है, क्योंकि देवी वाणी रूपी स्त्री से ये सब उत्पन्न
हुए हैं। (आत्रेयी वह स्त्री है जिसका अभी गर्भपात हो चुका हो) ॥१३॥
अध्याय ५-ब्राह्मण १
अब वह (अध्वर्यु) प्रवर के लिए बुलाता है (होता के लिए जो वरण किया जाता है
उसे प्रवर कहते हैं)। प्रवर के लिए बुलाने का कारण है कि बुलाना (आश्रावण) ही यज्ञ है। वह
प्रवर के लिए इसलिए बुलाता है कि 'यज्ञ को कहकर अब मैं होता का वरण करूँ' ॥१॥
वह समिधाओं के बन्धन को (वह रस्सी जिससे लकड़ी बँधी रहती है) लेकर ही बुलाता
है। क्योंकि यदि अध्वर्यु बिना यज्ञ को आरम्भ किये बुलाये तो या तो काँप जाय या उस पर और
कोई विपत्ति आ पड़े ॥२॥
कुछ लोग वेदि में से बर्हि (कुश) लेकर बुलाते हैं या समिधा के टुकड़े को काटकर बुलाते
हैं और समझते हैं कि 'यह यज्ञ की चीज है, इसलिए इस यज्ञ को लेकर बुलायेंगे।' परन्तु उसको
ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि जिन चीजों से समिधायें बाँधी जाती हैं वे भी तो यज्ञ का अंश
हैं, या वे चीजें जिनसे अग्नि की राख हटाई जाती है। इसलिए वह यज्ञ को लेकर ही बुलाता है।
इसलिए समिधाओं के बन्धन को लेकर ही बुलावे ॥३॥
बुलाकर पहले उसका वरण करता है जो देवों का होता है अर्थात् अग्नि। इस प्रकार वह

निह्नु॒ते यद॒ग्न्याये॑ऽग्निं प्र॒वृणी॒ते तद॒ग्नये॑ निह्नु॑तेऽथ॒ यो दे॒वानाꣳ॑ होता॒ तमग्न्यॆ प्र-
वृणी॒ते तद् दे॒वेभ्यो॑ निह्नु॒ते ॥ ४॥ स आह॑ । अ॒ग्निर्दे॒वो दैव्यो॒ होतेत्य॒ग्निर्हि॑
दे॒वानाꣳ॑ होता॒ तस्मा॑दाहा॒ग्निर्दे॒वो दैव्यो॒ होतेति॒ तद॒ग्नये॑ चैव॒ देवेभ्य॑श्च॒ निह्नु॑ते
यद्वै॒वाग्ने॑ऽग्निमाह॒ तद॒ग्नये॑ निह्नु॒तेऽथ॒ यो दे॒वानाꣳ॑ होता॒ तमग्न्य॑ऽआह॒ तद् दे॒वे-
भ्यो॑ निह्नु॒ते ॥ ५॥ दे॒वान्य॒क्षद्वि॒द्वाꣳश्चिकि॒त्वानिति॑ । ए॒ष वै दे॒वाननु॑विद्वांन्यद॒ग्निः स
एना॒ननु॑विद्वांननुध्या॒ यक्ष॒दित्ये॒वैतदा॑ह ॥ ६॥ मनु॒ष्वद्भ॑रत॒वदि॑ति । मनु॑र्ह वा॒ऽअग्रे॑
यज्ञेने॑जे॒ तदनु॑कृत्ये॒माः प्र॒जा य॑जन्ते॒ तस्मा॑दाह मनु॒ष्वदि॑ति मनोर्य॒ज्ञाऽइ॒त्यु वा॒ऽआ-
ह॒स्तस्मा॑द्धिवाह मनु॒ष्वदि॑ति ॥ ७॥ भर॒तवदि॑ति । ए॒ष हि दे॒वेभ्यो॑ ह॒व्यं भर॑ति॒ त-
स्माद्भर॒तोऽग्नि॒रित्या॑हुरे॒ष उ वा॒ऽइमाः प्र॒जाः प्रा॒णो भू॒त्वा बिभ॑र्ति॒ तस्मा॑द्धिवाह
भर॒तवदि॑ति ॥ ८॥ अथा॑र्षेयं॒ प्रवृ॑णीते । ऋ॒षिभ्य॑श्चैवै॒नमॆतद्दे॒वेभ्य॑श्च निवे॑दयत्य॒यं
म॒हावी॒र्यो यो य॒ज्ञं प्रापदिति॒ तस्मा॒दार्षेयं॒ प्रवृ॑णीते ॥ ९॥ प॒रस्ता॑दर्वा॒क्प्रवृ॑णीते ।
प॒र॒स्ता॑द्धय॒र्वाच्यः॑ प्र॒जाः प्र॒जाय॑न्ते ज्याय॑सस्पूतय॒ऽउ चैवैतन्निह्नु॑त॒ऽइदं॑ हि पि॒तेवाग्रे॑
ऽथ पु॒त्रोऽथ पौत्र॒स्तस्मा॑त्पर॒स्ता॑दर्वा॒क्प्रवृ॑णीते ॥ १०॥ स आ॑र्षेय॒मुक्त्वाह॑ । ब्र॒ह्म-
ण्वादि॑ति ब्र॒ह्म ह्य॒ग्निस्तस्मा॑दाह ब्रह्मण्वदित्या च॒ वक्ष॒दिति तथ्या॒ ह्यैवैतद्दे॒वता
आ॒वोच्व॒ऽआह॑ ता ह्यैवैतदा॒हा च॑ वक्ष॒दिति ॥ ११॥ ब्राह्म॑णा अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ प्रा-
वि॒तार॒ इति॑ । ए॒ते वै ब्राह्म॑णा य॒ज्ञस्य॑ प्रावि॒तारो॒ येऽनू॑चा॒ना ए॒ते ह्यॆनं॑ तन्व॒त
ऽएत॒ऽएनं॑ जनयन्ति॒ तद् तेभ्यो॑ निह्नु॒ते तस्मा॑दाह ब्राह्म॑णा अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ प्रावि॒तार॒
इति॑ ॥ १२॥ असौ॒ मानु॑ष॒ इति॑ । तदि॒मं मानु॑षꣳ होता॑रं प्रवृणीते॒ऽथो॑ता ह्यॆष॒
पुरा॑श्चितर्हि॒ होता॑ ॥ १३॥ स प्रवृ॑तो॒ होता॑ जपति । दे॒वता॑ उपधावति॒ यथानु॑ध्या॒
दे॒वेभ्यो॒ वष॑ट्कुर्याद्यथानु॑ध्या॒ दे॒वेभ्यो॑ ह॒व्यं वहे॒द्यथा न ह्वले॑दे॒वं दे॒वता॑ उप॒धा-
वति ॥ १४॥ तत्र ज॑पति । ए॒तत्वा॑ दे॒व स॑वितर्वृणत॒ऽइति॒ तत्स॑वि॒तारं॑ प्रसवा॒यो-
प॑धावति॒ स हि दे॒वानां॑ प्रसवि॒ताग्निꣳ॑ होत्रा॒येति॒ तद॒ग्नये॑ चैवैतद्दे॒वेभ्य॑श्च॒ निह्नु॑ते

कां० १, अ० ५, ब्रा० १, कं० ४-१५ शतपथब्राह्मण / ६१
अग्नि और देव दोनों को प्रसन्न करता है। यह जो पहले अग्नि का वरण किया उससे अग्नि को
प्रसन्न किया, और जो देवों के होता को पहले वरण किया इससे देवों को प्रसन्न किया ॥४॥
अब कहता है—'अग्नि देव, देवों का होता'। अग्नि ही देवों का होता है, इसलिए कहा
'अग्नि देव, देवों का होता'। इससे अग्नि और देव दोनों को प्रसन्न करता है। यह जो पहले अग्नि
का वरण किया उससे अग्नि प्रसन्न हुई, और देवों के होता का पहले वरण किया उससे देव प्रसन्न
हुए ॥५॥
अब कहता है—"देवान् यक्षद् विद्वाँश्चिकित्वान्"—"वह बुद्धिमान्, देवों को जानता हुआ
यज्ञ करे।" यह जो अग्नि है वह देवों को भली-भाँति जानता है। इसलिए ऐसा कहने का तात्पर्य
यह है कि वह जो देवों को जानता है विधिवत् यज्ञ करे ॥६॥
अब वह कहता है—"मनुष्वद् भरतवद्"—'मनु के समान, भरत के समान।' मनु ने ही
पहले यज्ञ किया था और यह प्रजा उसी का अनुकरण करके यज्ञ करती है। इसलिए कहा, 'मनु
का यज्ञ', इसलिए कहा, 'मनु के समान' ॥७॥
'भरतवद्' क्यों कहा ? यही देवों के लिए हवि ढोता है, इसलिए अग्नि भरत है। ऐसा
भी कहते हैं कि वह इन प्रजाओं को प्राण हांकर पालता है। इसलिए भी कहा, 'भरत के
समान' ॥८॥
अब वह अग्नि को आर्ष होता के रूप में वरण करता है। इस प्रकार वह इस (अग्नि)
को ऋषि और देव दोनों के प्रति निवेदन करता है। इसको आर्ष होता के रूप में इसलिए वरण
करता है कि जो यज्ञ करता है वह महा-वीर्यवान् होता है ॥६॥
पहले से पीछे-पीछे का वरण करता है (अर्थात् पहले पूर्वज, फिर अनुज), क्योंकि
प्रजा पीछे-पीछे उत्पन्न होती है। इस प्रकार वह बड़ों को प्रसन्न करता है। क्योंकि यहाँ पहले
पिता होता है, फिर पुत्र, फिर पौत्र, इसीलिए वह सबसे पहले पूर्वज से आरम्भ करता है, फिर
क्रमशः निचली श्रेणी को ॥१०॥
आर्ष होता का वरण करने के पश्चात् कहता है—"ब्रह्मण्वद्"— "ब्रह्म के समान"। ब्रह्म
ही अग्नि है इसलिए कहा 'ब्रह्म के समान'। अब कहता है—"आ च वक्षत्"—"यहाँ लावे।"
जिन-जिन देवताओं को बुलाना चाहता है उन-उनके लिए कहता है—'यहाँ लावे' (अर्थात् अग्नि
अमुक-अमुक देवताओं को लावे) ॥११॥
ब्राह्मण इस यज्ञ के संरक्षक हैं। वही ब्राह्मण यज्ञ के संरक्षक हैं जो वेद के विद्वान् हैं,
क्योंकि यही यज्ञ को फैलाते हैं, यही उसको उत्पन्न करते हैं। इसीलिए कहता है कि ब्राह्मण इस
यज्ञ के संरक्षक हैं ॥१२॥
'यह मनुष्य है।' अब वह इस मनुष्य को होता के रूप में वरण करता है। पहले वह
'अहोता' था (अर्थात् होता नहीं था), अब 'होता' हो गया ॥१३॥
वह वरण किया हुआ होता जप करता है। देवताओं के समीप दौड़ता है। देवताओं के
पास दौड़ने का प्रयोजन यह है कि विधिपूर्वक देवों के लिए वषट्कार करे, विधिपूर्वक उनके लिए
हवि ले जावे, अवहेलना न करे। इस प्रकार वह देवताओं के पास दौड़ जाता है ॥१४॥
वह यह जप करता है—"एतत् त्वा देव सवितर्वृणते"—'हे देव सविता, तुझको वरण
करते हैं।' इस प्रकार वह सविता देवता के पास प्रसव के लिए अर्थात् प्रेरणा के लिए दौड़ता है,
क्योंकि सविता देवताओं का प्रेरक है। अब कहता है—'अग्नि होत्राय' (अग्नि को होत्र के

६२ शतपथ ब्राह्मण
यद॒ह्याग्ने॒ग्रिमाहे॒ तद॒ग्नये॒ निह्नु॑ते॒ऽथ यो दे॒वानाꣳ होता॑ तम॒ग्नऽआह॒ तद् दे॒वेभ्यो
नि॒ह्नुते ॥ १५॥ सह् पित्रा॒ वैश्वान॒रेणेति॑ । संवत्सरो वै पिता॒ वैश्वान॒रः प्र॒जाप॒-
तिस्तत्संवत्स॒रायैवैतत्प्र॒जाप॑तये नि॒ह्नुते॒ऽग्ने पूषन्बृहस्पते॒ प्र च॑ वद॒ प्र च॑ य॒ज्ञेत्य-
नुवद्यन्वा॒ऽएतद्य॒ज्यन्भव॑ति तद्दे॒ताभ्य ए॒वैतद्देवताभ्यो निह्नुते यूयमनु॑ब्रूत यूयं
यज॒तेति॑ ॥ १६॥ ॥ शतम् ॥४००॥ ॥ वसूनाꣳ रा॒तौ स्याम । रु॒द्राणाꣳनूर्व्यायाꣳ
स्वादित्या अ॑दितये स्यामानिकृत इत्येते वै त्रया देवा यद्वसवो रुद्रा आदित्या ए-
तेषामभिगुप्तौ स्यामित्येवैतदाह ॥ १७॥ जु॒ष्टम॒द्य दे॒वेभ्यो॒ वाच॑मुद्यासमिति । जुष्ट-
म॒द्य दे॒वेभ्यो॒ऽनूच्यासमित्येवैतदाह तद्धि समृद्धं यो जुष्टं दे॒वेभ्यो॒ऽनु॑ब्रूयात् ॥ १८॥
जु॒ष्टां ब्र॒ह्मभ्य॒ इति॑ । जु॒ष्टम॒द्य ब्राह्मणेभ्यो॒ऽनूच्यासमित्येवैतदाह तद्धि समृद्धं यो
जुष्टं ब्राह्मणेभ्यो॒ऽनु॑ब्रूयात् ॥ १९॥ जु॒ष्टां नराशꣳ॒सायेति॑ । प्रजा वै नरा॒स्तत्सर्वाभ्यः
प्रजाभ्य आह तद्धि समृद्धं यच्च वेद॒ यच्च॒ न सा॒ध्वन्व॑वोचत्सा॒ध्वन्व॑वोचदित्येव वि-
सृज्यन्ते॒ यद॒द्य होतृ॒वूर्ये जि॒ह्वां चक्षुः॑ परा॒पत॑त् अ॒ग्निष्टत्पुन॒राग्निराऽऽजातवे॑दा वि॒-
चर्षणि॒रिति॒ यथा यान्ये॒ऽग्नीन्द्होत्राय॑ प्रावृणीत ते प्राधन्व॒न्नि॒वं यन्मे॒ऽत्र प्रव॑रेणा-
मायि॒ तन्मे पुन॒राप्याययेत्येवैतदाह तथो हास्यैतत्पुन॒राप्यायते ॥ २०॥ अ॒थाध॒र्युं
चा॒ग्नीध्रं॑ च सम्मृशति । म॒नो वा॒ऽअ॒र्ध्वर्युर्वाग्घोता तन्मन॒श्चैवैतद्वाचं च संदधाति
॥ २१॥ तत्र जपति । ष॒णमोर्वरि॑ꣳहसस्पान्त्व॒ग्निश्च॑ पृथि॒वी चाप॑श्च वा॒युश्चा॒हश्च॑ रा-
त्रिश्च॒त्येता मा देवता आर्त्ते॑र्गीपायन्वित्येवैतदाह तस्यो हि न कूलम॑स्ति यमेता
दे॒वता आर्त्तेर्गीपा॒येयुः॑ ॥ २२॥ अथ होतृषदनमुपावर्तते । स होतृष॒दना॒देकं॑ तृणं
निर॒स्यति निर॒स्तः पराव॒सुरिति॒ पराव॒सुर्ह वै नामासुराणाꣳ होता स तमे॒वैतद्धो-
तृषदना॒न्निर॑स्यति ॥ २३॥ अथ होतृषद॒नऽउप॑विशति । इ॒दम॒हमर्वावसोः सद॑ने
सीदामीत्यर्वावसुर्वै नाम देवानाꣳ होता तस्यैवैतत्स॒दने सीदति ॥ २४॥ तत्र ज-
पति । वि॒श्वकर्म॑न्स्तनूपा असि॒ मा मो दोषिष्टं मा मा हिꣳसिष्ट॒मेष वां लोक इत्यु-

कां० १ ; अ० ५, ब्रा० १, कं० १५-२५ शतपथब्राह्मण / ६३
लिए)। इस प्रकार वह देवों को और अग्नि को दोनों को प्रसन्न करता है। जब पहले 'अग्नि' कहा
तो अग्नि को प्रसन्न किया, और जब 'देवताओं का होता' कहा तो देवताओं को प्रसन्न
किया ।।१५।।
अब कहता है-“सह पित्रा वैश्वानरेण”-“वैश्वानर पिता के साथ ।” संवत्सर ही पिता
वैश्वानर तथा प्रजापति है। इस प्रकार वह संवत्सर अर्थात् प्रजापति को प्रसन्न करता है। अब
कहता है-“अग्ने पूषन् बृहस्पते प्र च वद प्र च यज”-“हे अग्नि ! हे पूषा ! हे बृहस्पति ! बोल
और यज्ञ कर ।” इस प्रकार बोलने से ही यज्ञ होता है। इसलिए इन देवताओं को प्रसन्न करता
है कि 'तुम बोलो, तुम यज्ञ करो' ॥१६॥ यहाँ ४०० पूरे हुए ।।
'वसुओं की कृपा के हम पात्र हों । रुद्रों का वैभव हम में आवे । अदिति अर्थात् पूर्णता
के लिए और स्वतन्त्रता के लिए आदित्यों के प्रिय होवें ।' ये तीन देवता हैं वसु, रुद्र और आदित्य ।
इस कथा का प्रयोजन यह है कि 'हम इन देवताओं के संरक्षण में रहें' ॥१७॥
अब कहता है-“जुष्टामद्य देवेभ्यो वाचमुद्यासम्”-“मैं आज देवताओं की प्रिय वाणी
बोलूं ।” इसका तात्पर्य यह है कि जो वाणी देवताओं को पसन्द हो वह बोलूं। देवताओं के लिए
प्रिय जो वाणी है उसका बोलना समृद्धि का हेतु है ॥१८॥
अब कहता है-“जुष्टां ब्रह्मभ्यः” अर्थात् ‘ऐसी वाणी बोलूं जो ब्राह्मणों को प्रिय है ।”
इसका तात्पर्य यह है कि देवताओं के प्रिय जो वाणी हो उसको बोलूं, क्योंकि ब्राह्मणों के प्रति
जो वाणी प्रसन्न हो उसका बोलना समृद्धि का कारण होता है ॥१९॥
अब कहता है-“जुष्टां नराशꣳसाय” अर्थात् ‘ऐसी वाणी बोलूं जो नराशंस के लिए
प्रिय हो ।” प्रजा ही नर हैं, इसलिए वह यह समस्त प्रजा के लिए कहता है। इससे समृद्धि होती
है। चाहे समझे चाहे न समझे, यही कहा जाता है, 'खूब कहा ! खूब कहा ! ' जो कुछ होता की
टेढ़ी निगाह से छूट जाये उसको अग्नि वापस लावे, क्योंकि अग्नि जातवेद (प्राणियों को जानने-
वाला) और विचर्षण (बुद्धिमान्) है। “ये जो तीन अग्नियां पहले होता के लिए चुनी गई थीं
वे चली गईं। यह चौथी अग्नि जो चुनी गई है वह उस सब की पूर्ति करे जो छूट गया हो ।” ऐसा
कहता है और इससे त्रुटि की पूर्ति हो जाती है ॥२०॥
अब वह अध्वर्यु और अग्नीध्र को छूता है। अध्वर्यु मन है और होता वाणी है। इस प्रकार
वह मन और वाणी में मेल कराता है ॥२१॥
अब जाप कराता है-'छः उर्वियां पाप से रक्षा करें'-अग्नि, पृथिवी, जल, वायु, दिन और
रात्रि । ऐसा कहने से तात्पर्य यह है कि ये देवता आर्त अर्थात् रोग से मेरी रक्षा करें। उस पुरुष
की कभी अवहेलना नहीं होती जिसकी देवता रोग से रक्षा करते हैं ॥२२॥
अब होता के आसन तक जाता है और होता के आसन में से एक तृण निकालकर फेंकता
है और कहता है-“निरस्तः परावसुः”-“परावसु भगा दिया गया ।” परावसु (पराया माल खाने-
वाला) असुरों का होता था। वह उसको होता के आसन से निकालकर फेंक देता है ॥२३॥
अब वह 'होता' के आसन पर बैठता है यह कहकर-“इदमहमर्वावसोः सदने सीदामि”-
“मैं अर्वावसु के आसन पर बैठता हूँ ।” अर्वावसु (धन न चाहनेवाला) देवताओं का होता
इसलिए वह उसी के आसन पर बैठता है ॥२४॥
अब वह जपता है-“विश्वकर्मंस्तनूपा असि मा मो दोषिष्टं मा मा हिꣳसिष्टम् । एष
वां लोकः”-“हे विश्वकर्मा, तू शरीर की रक्षा करनेवाला है। हे दोनों अग्नियो, मुझे न जलाओ !
मुझे न सताओ ! यह तुम दोनों का लोक है ।” ऐसा कहकर वह कुछ उत्तर की ओर बढ़ जाता है।