शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-२, ब्राह्मण-४
३६६ शतपथ ब्राह्मण
तया॒ दिशं॑ प्राजा॑नन्नुदीची॒ ह्येतस्यै॒ दिक् ॥ १५॥ प्राची॑मेव॒ दिश॑म्। अ॒ग्निना॒ प्रा-
जानं॒स्तस्मा॑द॒ग्निं प॒श्चात्प्राञ्च॒मुद्धृत्योपा॑सते प्राची॑ꣳ ह्येतस्य॒ दिशं॑ प्राजा॑नन्प्राची॒ ह्ये-
तस्य॒ दिक् ॥ १६॥ दक्षि॑णामेव॒ दिश॑म्। सोमे॑न॒ प्राजा॑नं॒स्तस्मा॒त्सोमं॑ क्री॒तं दक्षि॑णा
प॒रिव॑हन्ति तस्मादाहुः पितृदे॒वत्यः॒ सोम॒ इति॒ दक्षि॑णाꣳ ह्येतस्य॒ दिशं॑ प्राजा॑नन्द-
क्षिणा॒ ह्येतस्य॒ दिक् ॥ १७॥ प्रतीची॑मेव॒ दिश॑म्। स॒वित्रा॒ प्राजा॑नन्ने॒ष वै स॑वि॒ता
य ए॒ष तप॑ति॒ तस्मा॑दे॒ष प्रत्य॒ङ्ङेति॑ प्रतीची॑ꣳ ह्येतस्य॒ दिशं॑ प्राजा॑नन्प्रतीची॒ ह्येतस्य
दिक् ॥ १८॥ ऊ॒र्ध्वामेव॒ दिश॑म्। अदि॑त्या प्राजा॑नन्नियं वाऽअदि॑ति॒स्तस्मा॑द॒स्यामूर्ध्वा
ओष॑धयो जायन्त॒ऽऊर्ध्वा वन॒स्पत॑य ऊ॒र्ध्वाꣳ ह्येतया॒ दिशं॑ प्राजा॑नन्नू॒र्ध्वा ह्येतस्यै॒ दिक्
॥ १९॥ शिरो॒ वै य॒ज्ञस्या॑ति॒थ्यम्। बा॒हू प्रायणी॑योदयनी॒याव॒भितो॒ वै शिरो॑ बा॒हू
भ॑वत॒स्तस्मा॑द॒भित॑ आति॒थ्यमे॒ते ह॒विषी॑ भवतः प्रायणी॒यश्चो॑दयनी॒यश्च॑ ॥ २०॥ त-
द्दाहुः। यदे॒व प्रायणी॑ये क्रि॒येत॒ तदु॑दयनी॒ये क्रि॑येत यदे॒व प्रायणी॑यस्य ब॒र्हिर्भव॑-
ति॒ तदु॑दयनी॒यस्य ब॒र्हिर्भवतीति॒ तद॒पोद्धृ॑त्य निद॑धाति॒ ताꣳ स्थालीꣳ सन्नामक॑र्षां
प्रमृ॑ज्य मे॒क्षणं॒ निद॑धाति॒ यऽए॒व प्रायणी॑यस्य॒ऽर्त्विजो॒ भव॑न्ति तऽउ॑दयनी॒यस्य॒ऽर्त्वि-
जो भव॑न्ति॒ तद्यदे॒तत्समा॒नं य॒ज्ञे क्रि॒यते॒ तेन॑ बा॒हू स॒दृशौ॒ तेन॑ स॒रूपौ॑ ॥ २१॥ तदु॑
तथा॒ न कु॒र्यात्। काम॒मेवैतद्ब॒र्हिरनु॑प्रहरेदे॒वं मे॒क्षणं॑ निर्णि॑ज्य॒ स्थालीं॑ निद॒ध्याद्य
ऽए॒व प्रायणी॑यस्य॒ऽर्त्विजो॒ भव॑न्ति तऽउ॑दयनी॒यस्य॒ऽर्त्विजो॒ भव॑न्ति य॒द्यु ते वि॑प्रे॒ताः
स्यु॒रप्य॒न्यऽए॒व स्युः स यद्वै समा॑नीर्देव॒ता यज॑ति समा॒नानि॑ ह॒वीꣳषि॒ भव॑न्ति ते-
नैव बा॒हू स॒दृशौ॒ तेन॑ स॒रूपौ॑ ॥ २२॥ स वै पञ्च प्रायणी॑ये दे॒वता॑ यज॑ति । प-
ञ्चोदयनी॒ये तस्मा॒त्पञ्चेत्या॑हु॒रङ्गुल॑यः प॒ञ्चैत्यात्त॒त्कुभ्यू॑तं भवति न पत्नीः संया॑जयति
पूर्वा॒र्धं वाऽअ॒न्वात्मनो॒ बाहू पूर्वा॒र्धमे॒वैतद्य॒ज्ञस्या॒भिसंस्क॑रोति॒ तस्मा॒त्कुभ्यू॑तं भव-
ति॒ न पत्नीः संया॑जयति ॥ २३॥ ब्रा॒ह्मणम् ॥ २ [२.३.] ॥ ॥
दि॒वि वै सोम॑ आसी॒त् । अथेह॒ देवा॑स्ते देवा॑ अकामयन्ता॒ नः॑ सोमो॑ गच्छेते॒-
कां० ३, अ० २, ब्रा० ३-४, कं० १५-२३ व १ शतपथब्राह्मण / ३६७
दिशा को पहचाना। इस (पथ्य-स्वस्ति) की दिशा उत्तर है ॥१५॥
पूर्व दिशा को अग्नि के द्वारा पहचाना। इसलिए अग्नि के पीछे से होकर पूर्व की ओर
ले जाते हैं, और उसकी उपासना करते हैं। क्योंकि (अग्नि) के द्वारा उन्होंने पूर्व दिशा को
पहचाना और पूर्व दिशा उसी की है ॥१६॥
दक्षिण दिशा को सोम के द्वारा पहचाना। इसलिए सोम-क्रय के पीछे उसको दक्षिण को
ले जाते हैं। इसीलिए कहते हैं कि सोम पितृ-देव वाला है। उसी के द्वारा उन्होंने दक्षिण दिशा
को पहचाना। दक्षिण दिशा इसी की है ॥१७॥
सविता के द्वारा उन्होंने पश्चिम दिशा को पहचाना। क्योंकि सविता तपता है, इसीलिए
वह पश्चिम को जाता है। उसी के द्वारा उन्होंने पश्चिम को पहचाना। पश्चिम दिशा उसी की
है ॥१८॥
अदिति के द्वारा उन्होंने ऊर्ध्व (ऊपर की) दिशा को पहचाना। यह (पृथिवी) ही
अदिति है। इसलिए इस पृथिवी पर ओषधियां ऊपर को उगती हैं। उसी के द्वारा उन्होंने ऊपर
की दिशा को पहचाना। ऊपर की दिशा उसी की है ॥१९॥
(सोम के प्रति) जो आतिथ्य किया जाता है वह यज्ञ का शिर है। प्रायणीय और उदय-
नीय (अर्थात् आरम्भ की और अन्त की क्रियाएं) यज्ञ के बाहू हैं। बाहू शिर के दोनों ओर रहते
हैं। इसलिए प्रायणीय और उदयनीय आतिथ्य के दोनों ओर होती हैं ॥२०॥
कुछ लोग कहते हैं कि जो कृत्य प्रायणीय में हो, वही उदयनीय में भी हो; जो प्रायणीय
की बर्हि हैं वही उदयनीय की भी। वह इसको वहाँ से हटाकर अलग रख देता है। थाली को भुने
हुए कर्ष के साथ और चमचे (मेक्षणं) को माँजकर एक ओर रख देता है। जो प्रायणीय के ऋत्विज्
होते हैं वही उदयनीय के भी होते हैं। ये यज्ञ में एक-से होते हैं। इसलिए एक-सा स्वरूप होने
के कारण ये यज्ञ के बाहू कहलाते हैं ॥२१॥
परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए। बर्हि को (आग में) डाल देना चाहिए और चमचे को
भी, और थाली को माँजकर अलग रख देना चाहिए। जो प्रायणीय के ऋत्विज् हों वही उदय-
नीय के भी हों। यदि कोई मर जाय तो दूसरे नियत कर लिये जायें। ये दोनों यज्ञ के बाहू
इसलिए हैं कि इनके देवता एक ही हैं और आहुतियाँ एक ही। इस प्रकार इनका स्वरूप भी एक
ही है ॥२२॥
प्रायणीय में पाँच देवताओं की आहुतियाँ दी जाती हैं, और उदयनीय में भी। इसलिए
पाँच अंगुलियाँ यहाँ हैं और पाँच अंगुलियाँ वहाँ। प्रायणीय के अन्त में शम्यु होता है, पत्नी-
संयाज नहीं होता। भुजाएं शरीर का अगला भाग हैं। यह प्रायणीय भी यज्ञ का अगला भाग है।
इसलिए इसके अन्त में शम्यु होता है, पत्नी-संयाज नहीं होता ॥२३॥
अध्याय २—ब्राह्मण ४
सोम द्यौलोक में था, और देव यहां (पृथिवी पर) थे। देवों ने चाहा कि सोम हमारे समीप
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३६८ शतपथ ब्राह्मण
नागतेन॒ धने॑न॒ह्वीति॒ तऽए॒ते मा॒येऽअ॑सृजन्त सुपर्णीं च क॒द्रूं च॒ तद्दि॒क्ष्यानां ब्रा॑-
ह्मणे व्याख्यायते सौपर्णिकाद्रवं यथा॒ तदा॑स ॥ १॥ तेभ्यो गायत्री॒ सोम॒महा॑प-
तत् । तस्या॒ऽआहर॑न्त्यै गन्ध॒र्व्वो विश्वावसुः॒ पर्य्युम्नात्ते देवा॒ अविदुः प्रच्युतो वै
प॒रस्ता॒त्सोमो॒ऽथ नो नागच्छति गन्ध॒र्वा वै पर्य्यमोषिषुरिति॑ ॥ २॥ ते होचुः । यो-
षित्कामा वै गन्धर्वा वाच॑मे॒वैभ्यः॒ प्रहि॑णवाम सा नः सह सोमे॒नाग॑मिष्यतीति
तेभ्यो॒ वाचं॒ प्राहि॑ण्वन्त्सेनात्स॒ह सोमे॑नागच्छत् ॥ ३॥ ते गन्ध॒र्वा अन्वागत्या॑ब्रु-
वन् । सोमो यु॒ष्माकं वागेवास्माक॒मिति तथेति देवा॒ अब्रुवन्निहो चेदागान्नैना-
मभिषहेव नेष्ट वि॒ह्वयाम॑हाऽइति तां व्यह्वयन्त ॥ ४॥ तस्यै गन्ध॒र्वाः । वेदानॆव
प्रोचि॒रऽइति वै वयं वि॒द्मेति वयं वि॒द्मेति ॥ ५॥ अथ देवाः । वीणामेव सृष्ट्वा
वादयन्तो निगायन्तो निषेदुरिति वै ते वयं गास्याम॒ इति त्वा प्रमोदयिष्यामह
ऽइति सा देवानुपाववर्त सा वै सा तन्मोघमुपाववर्त या स्तुवद्भ्यः शंस॑द्भ्यो
नृत्तं॑ गीतम॒पाव॑वर्त तस्मा॒दप्ये॒तर्हि मोघसं॑हिता ए॒व योषा एवꣳ हि वागुपा-
वर्तत तासु ह्यन्या अनु॒ योषा॒स्तस्माद्य एव नृत्यति यो गायति तस्मिन्नेवैता नि-
मिश्नतमा-इव ॥ ६॥ तद्वा॒ऽएतदु॒भयं॑ दे॒वेष्वासी॑त् । सोमश्च वाक् स यत्सोमं क्री-
णात्याग॒त्याऽए॒वागतेन यज्ञाऽइत्युनागतेन ह वै स सोमेन यजते योऽक्रीतेन
यज॑ते ॥ ७॥ अथ यद्द्रुवा॒यामाज्यं॑ परिशिष्टं भव॑ति । तच्छु॒क्लां च॑तुष्कुलो विगृह्णा-
ति ब॒र्हिषा हिर॑ण्यं प्रब॒ध्यावधाय जुहोति कृत्स्नेन पयसा जुहुवानीति समानङ्ग-
न्वं॒ वै पयश्च॒हिर॑ण्यं चोभयꣳ ह्यमृिरेतस॒म् ॥ ८॥ स हिर॑ण्यमवदधाति । ए॒षा ते
शुक्र तनूरेत॒दृचं॒ इति॒ वर्चो॒ वाऽए॒तद्यद्धिर॑ण्यं तया॒ सम्भव भ्राजं गहेति स प्रदा-
ह तपा सम्भवे॑ति तया॒ सम्पृच्यस्वे॒त्ये॒वैतदाह भ्राजं गहेति सोमो वै भ्राट् सोमं
गहेत्ये॒वैतदाह ॥ ९॥ तां यथै॒वादो देवाः । प्राहि॑ण्वन्त्सोमम॒हैवमे॒वैनामेष एत-
त्प्रहि॑णोति॒ सोमम॒ह वाग्वै सोमक्रयणी निदानेन तामेतयाऽऽहुत्या प्रीणाति प्री-
का० ३, अ० २, ब्रा० ४, कं० १-१० शतपथब्राह्मण / ३६६
आ जाय तो उसके द्वारा यज्ञ करें। उन्होंने दो माया बनाईं, सुपर्णी और कद्रू। सुपर्णी और कद्रू
की कथा धिष्ण्यों के ब्राह्मण में लिखी है ॥१॥
उनके लिए गायत्री सोम के पास उड़ गई। जब वह उसे ला रही थी तो गन्धर्व विश्वा-
वसु ने उसको चुरा लिया। देवताओं ने जान लिया कि सोम अब द्युलोक में नहीं है, गन्धर्वों ने
इसे चुरा लिया है ॥२॥
उन्होंने कहा—'गन्धर्व लोगों को स्त्रियां प्रिय हैं। उनके पास वाणी भेज दें। वह सोम
के साथ हमारे पास चली आवेगी।' उन्होंने वाणी को भेजा और वह सोम को लेकर चली
आई ॥३॥
गन्धर्व उसके पीछे-पीछे आये और कहने लगे कि 'सोम तुम्हारा और वाणी हमारी।'
देवों ने कहा 'अच्छा। परन्तु यदि वह यहाँ आना चाहे तो उसको बलात्कार से न ले जाओ।
उसको राजी करो।' इस प्रकार उन्होंने उसको राजी करना चाहा ॥४॥
गन्धर्वों ने उसके लिए वेदों का पाठ किया और कहने लगे—'हम जानते हैं, हम जानते
हैं' ॥५॥
तब देवों ने वीणा बनाई और बजा-बजाकर कहने लगे कि 'हम इस प्रकार बजायेंगे, हम
इस प्रकार तुझे प्रसन्न करेंगे।' वह देवों के पास चली आई। परन्तु वह व्यर्थ ही आई क्योंकि जो
लोग स्तुति और प्रार्थना करते थे (अर्थात् वेद-पाठी गन्धर्व) उनसे हटकर गाने-बजानेवालों के
पास आ गई। इसीलिए स्त्रियाँ आज तक व्यर्थ बातों में फँसी रहती हैं। जैसे वाणी ने किया वैसे
ही अन्य स्त्रियाँ भी करती हैं, और जो गाता-बजाता है उसी पर वे मोहित हो जाती हैं ॥६॥
इस प्रकार सोम और वाणी दोनों देवों को मिल गये। सोम को खरीदा इसलिए जाता
है कि अपनी सम्पत्ति से यज्ञ किया जा सके। यदि बिना खरीदे सोम से यज्ञ किया तो मानो
नाजायज सम्पत्ति से यज्ञ किया गया ॥७॥
ध्रुवा में जो घी बचा था, उसको चार भाग करके जुहू में डाल देता है, और बर्हि (कुशा)
से सोने का टुकड़ा बाँधकर (जुहू में) रख देता है और आहुति देने में यह समझता है कि मैं शुद्ध
घी से आहुति देता हूँ, क्योंकि घी और सोना दोनों समान-जन्मा है। दोनों की उत्पत्ति अग्नि के
वीर्य से हुई ॥८॥
सोने के टुकड़े को रखने में यह मन्त्र पढ़ता है—"एषा ते शुक्र तनूरेतद् वर्चः" (यजु०
४।१७)—"हे चमकनेवाले शुक्र या अग्नि ! यह (घी) तेरा शरीर है, यह (सोना) तेरी ज्योति है।"
हिरण्य यानी सोना वस्तुतः ज्योति ही है। अब कहता है—"तया सम्भव भ्राजं गच्छ" (यजु०
४।१७)—"उससे मिल और ज्योति को प्राप्त कर।" 'उससे मिल' का अर्थ है 'उसके साथसंयुक्त
हो जाय', 'ज्योति को प्राप्त कर' का अर्थ है 'सोम को प्राप्त कर', क्योंकि 'भ्राजं' या 'ज्योति'
का अर्थ है 'सोम' ॥९॥
जिस प्रकार देवों ने वाणी को सोम के पास भेजा था, इसी प्रकार इसको भी वह सोम के
पास भेजता है। वाणी ही सोम-क्रय करनेवाली है। इस आहुति से वह इसी को प्रसन्न करता है
३७० शतपथ ब्राह्मण
तया॒ सोमं॑ क्रीणानीति॑ ॥१०॥ स॒ जुहोति । धू॒रसीत्येतद् वा अस्या एकं॒ नाम
यद्धू॒रसीति॒ धृता॒ मन॑सेति॒ मन॑सा वाऽइ॒यं वाग्घृता॒ मनो॒ वाऽइ॒दं पु॒रस्ताद्वाच॒ इ-
त्यं॒ वद॒ मैतद्वादी॒रित्यल॒ग्लामिव ह॒ वै वाग्वद॒त्यन्मनो॒ न स्यात्त॒स्मादाह॒ धृता॒ म-
न॑सेति ॥११॥ जु॒ष्टा विष्ण॑व॒ऽइति॑ । जु॒ष्टा सोमा॒येत्ये॒वैतदाह॒ यन्म॑हि॒म इति॒ तस्या॑-
स्ते॒ सत्यस॑वतः प्रस॒वऽइति॑ सत्यप्रसवा न एधि॒ सोमं॑ नोऽछेहीत्ये॒वैतदाह॒ तन्वो॒
यक्ष्म॑नशीय॒ स्वाहेति॒ स ह॒ वै तन्वो॒ यक्ष्म॑मश्नुते यो यज्ञस्योदृचं॒ गच्छ॑ति यज्ञस्योदृ-
चं गछानीत्ये॒वैतदाह ॥१२॥ अथ॒ हिर॑ण्यमपोद्धरति । तन्मनु॒ष्येषु॒ हिर॑ण्यं करो-
ति॒ स यत्स॒हिर॑ण्यं जुहुयात्प॒राङ् ह्यैवे॒तन्मनु॑ष्येभ्यो॒ हिर॑ण्यं प्र॒वृञ्ज्यात्तन्मनु॑ष्येषु
हिर॑ण्यमभिग॒म्ये॑त ॥१३॥ सोऽपो॒द्धर॑ति । शु॒क्रम॑सि च॒न्द्रम॒स्यमृ॑तमसि वैश्वदे॒वम॑-
सीति कृ॒त्स्नेन॒ पय॑सा ह्यवा पद्वेवे॒तदाह॒ शुक्रम॑सीति शु॒क्रꣳ ह्ये॑तच्च॒न्द्रम॑सीति
चन्द्रꣳ॒ ह्ये॑तदमृ॑तमसीत्य॒मृतꣳ॒ ह्ये॑तद्वैश्वदे॒वम॑सीति वैश्वदे॒वꣳ ह्ये॑तत्प्रमुच्य तृणं॑ ब-
र्॒हिष्य॑पिसृजति सूत्रेण॒ हिर॑ण्यं प्रब॒ध्नेति॑ ॥१४॥ अथाप॑रं चतुर्गृहीतमाज्यं॑ गृही॒त्वा ।
अ॒न्वार॒भस्व॒ यज॑मानेत्याहा॒पोर्णुवन्ति॒ शाला॑यै द्वा॑रे॒ दक्षि॑णतः सोमक्रय॒ण्युप॑तिष्ठते
तत्प्र॒ह्निता॑मे॒वैना॑मे॒तत्सर्तो॒ प्राहि॑षीद्गा॒ग्वे सो॑मक्रयणी नि॒दाने॑न ता॒मेतया॒ऽभ्य॒त्याप्रे॑-
षीत्प्री॒तया॒ सोमं॑ क्रीणानीति॑ ॥१५॥ अथोप॒निष्क्रम्या॑भिमन्त्रयते । चि॒दसि॒ मना॑-
सीति चि॒त्तं वाऽइ॒दं मनो॑ वागनुवदति धीर॑सि दक्षि॑णेति धि॒या-धि॑या ह्ये॑त॒या म-
नु॒ष्या॒ जुहु॑ष्य॒न्त्यनू॒क्तेनैव प्र॒कामो॒द्येने॑व गाथाभि॑रिव त॒स्मादाह॒ धीर॑सीति दक्षि॑णे-
ति दक्षि॑णा ह्ये॑षा क्ष॒त्रिया॑सि य॒ज्ञिया॑सीति क्ष॒त्रिया॒ ह्ये॑षा य॒ज्ञिया॒ ह्ये॒षादिति॑र-
स्युभयतःशी॒र्ष्णती स॒ यदेनया समा॒नꣳ स॒द्विप॑र्यासं॒ वद॑ति॒ यद॒परं॒ तत्पूर्वं॑ करोति
यत्पूर्वं॒ तद॒परं॒ तेनोभयतःशी॒र्ष्णी त॒स्मादाहा॒दिति॑रस्युभयतःशी॒र्ष्णीति॑ ॥१६॥ सा
नः॒ सु॒प्राची॒ सु॒प्रती॒च्येधी॑ति । सु॒प्राची न एधि॒ सोमं॑ नो॒ऽछेहीत्ये॒वैतदाह॒ सु॒प्रती॑-
ची त एधि॒ सोमे॑न नः सह॒ पुन॒रेहीत्ये॒वैतदाह॒ तस्मा॑दाह॒ सा नः॒ सु॒प्राची॒ सु॒प्र-
कां० ३, अ० २, ब्रा० ४, कं० १०-१७ शतपथब्राह्मण / ३७१
कि इसको प्रसन्न करके ही सोम को क्रय करूँगा ॥१०॥
अब वह आहुति देता है इस मन्त्र से- "जूरसि" (यजु० ४।१७)- "तू स्तुतिकरनेवाला है।"
'जू' वाणी का एक नाम है। अब कहता है- "धृता मनसा" (यजु० ४।१७)- "मन से धारण की
गई।" यह वाणी मन से धारण की जाती है क्योंकि पहले मन चलता है, और कहता है 'यह कह,
यह मत कह।' यदि मन साथ न हो तो वाणी असंगत हो जाय, इसलिए वह कहता है 'मन से
धारण की गई' ॥११॥
अब कहता है- "जुष्टा विष्णवे" (यजु० ४।१७)- "विष्णु के लिए प्रिय।" इसका तात्पर्य
है 'सोम के लिए, जिसको हम प्राप्त हो रहे हैं।' अब कहता है— "तस्यास्ते सत्यसवसः प्रसवेः"
(यजु० ४।१८)- "तुझ सत्य प्रेरणावाली की प्रेरणा के लिए।" अर्थात् तू सत्य प्रेरणवाली है।
सोम के पास जा। अब कहता है— "तन्वो यन्त्रमशीय स्वाहा' (यजु० ४।१८)- "मैं अपने शरीर
का बल प्राप्त करूँ।" जो यज्ञ की पूर्णता प्राप्त करता है वह शरीर का बल भी प्राप्त करता है।
इसका तात्पर्य है कि यज्ञ की पूर्णता प्राप्त करूँ ॥१२॥
अब वह सोने को (जुहू में से) निकालता है। इससे वह मनुष्यों को सोना देता है। यदि
वह घी के साथ सोने की भी आहुति दे डाले तो मानो वह मनुष्यों से सोने को छीन ले अर्थात्
मनुष्यों में सोना मिले ही नहीं ॥१३॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर सोने को निकालता है- "शुक्रमसि चन्द्रमस्यमृतमसि वैश्व-
देवमसि" (यजु० ४।१८)- "तू शुद्ध है, तू चमकदार है, तू सब देवों को प्रिय है।" सम्पूर्ण दूध से
आहुति देकर जब कहता है कि 'तू शुक्र है' तो यह शुक्र ही है। 'तू चन्द्र है' कहता है तो यह चन्द्र
ही है। 'तू अमृत है।' यह अमृत है ही। 'तू सब देवों को प्रिय है।' यह सब देवों को प्रिय है ही।
अब तृण को खोलकर बर्हि के ऊपर डालता है और सूत्र के सोने को बाँधता है ॥१४॥
अब फिर घी के चार भाग करके कहता है— 'यजमान, चलो।' वे शाला के (दक्षिण
और पूर्व के) द्वार खोलते हैं (और बाहर आ जाते हैं)। द्वार की दाहिनी ओर सोम-क्रय करने-
वाली (गाय) खड़ी होती है। उसको सामने करके मानो उसने गाय को सोम-प्राप्ति के लिए
भेज दिया, क्योंकि सोम-क्रयणी गाय ही वाणी है। इस आहुति से उसने इसी को प्रसन्न किया
है, इस आशा से कि जब यह प्रसन्न हो जायगी तो मैं इससे सोम खरीद सकूँगा ॥१५॥
अब उसके पास जाकर अभिवादन करता है, यह मन्त्र पढ़कर- "चिदसि मनोसि" (यजु०
४।१६)- "तू चित् है, तू मन है।" वाणी चित् और मन की अनुगामिनी है। अब कहता है—
"धीरसि दक्षिणासि" (यजु० ४।१६)- "तू बुद्धि है, तू दक्षिणा है।" बुद्धि से ही लोग जीविका
कमाते हैं, वेदपाठ से या बातचीत करके या कथा कहकर। इसलिए कहा कि 'तू धी है।' उसको
'दक्षिणा' कहता है क्योंकि वह 'दक्षिणा' है ही। "क्षत्रियासि यज्ञियासि" (यजु० ४।१६)-"तू
श्रेष्ठ है, तू पूज्या है।" वस्तुतः वह श्रेष्ठ और पूज्या है। "अदितिरसि उभयतः शीर्णी" (यजु०
४।१६)- "तू दो सिरवाली अदिति है।" क्योंकि वाणी से ही वह ठीक को बेठीक कहता है, पीछे
को पहले कहता है। इसीलिए कहा कि 'तू दो सिरवाली अदिति है' ॥१६॥
अब कहता है— "सा नः सुप्राची सुप्रतीच्येधि" (यजु० ४।१६)- "वह हमारे लिए आगे
और पीछे शुभ हो।" 'आगे शुभ हो' कहने से तात्पर्य है कि 'तू हमारे लिए सोम लाने के लिए
आगे चल। और 'पीछे शुभ हो' से तात्पर्य है कि 'सोम के साथ लौट।' इसीलिए कहा कि 'तू