शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-५, ब्राह्मण-१
६२६ शतपथ ब्राह्मण
त॒देन॒मेते॒न रसे॑न॒ सं गमयति॒ तदेनमतो जनयति॒ स ए॒नं जा॒त ए॒व स॒न्जनयति
सं वा विशन्त्वोष॑धीरु॒ताप॒ इति॒ तद॒स्मिन्नुभय॑ꣳ रसं दधाति॒ यश्चौष॑धिषु॒ यश्चाप्सु॒
यज्ञस्य॑ त्वा यज्ञपते सूक्तोक्तौ नमोवाके॑ विधेम॒ यत्स्वाहेति॒ तद्य॒देव॒ यज्ञस्य॑ साधु॒
तदे॒वास्मिंस्तद्दधाति ॥ २०॥ अथा॒नुसृ॒ज्योप॑तिष्ठते । देवी॑राप ए॒ष वो॒ गर्भ॒ इत्य-
पा॒ꣳ ह्येष गर्भस्तꣳ सु॒प्रीतꣳ सु॒भृतं॑ बिभृते॒ति तदेनमद्भाः परि॑ददाति गु॒प्त्यै दे॒व
सोम॑ैष ते लोक इत्यापो॒ ह्येतस्य लोक॒स्तस्मिञ्छुं च॑ व॒र्द्धव॒ परि॑ च वर्द्ध्वेति॒ त-
स्मिन्नः॒ शं चैधि॒ सर्वाᳵभ्यश्च न आ॒र्तिभ्यो गोपायि॒त्येवैतदाह ॥ २१॥ अथोपमार्यति
। अव॑भृथ निचुम्पुण निचे॒रुर॑सि निच॒म्पुणः । अव॑ दे॒वैर्देव॒कृत॒मेनो॑ यासिष॒मव॑
म॒र्त्यैर्मर्त्य॒कृत॒मित्यव॒ ह्येतद्देवै॑र्देव॒कृत॒मेनो॒ऽयासीत्सोमेन॒ राज्ञाव॑ म॒र्त्यैर्मर्त्य॒कृत॒मि-
त्यव॒ ह्येतन्मर्त्यैर्मर्त्य॒कृत॒मेनो॒ऽयासीत्पशूना पुरोडाशेन पुरुरुाणो देव रिषस्या-
हीति॒ सर्वा॑भ्यो मार्तिभ्यो गोपाये॒त्येवैतदाह ॥ २२॥ अथाभ्यवेत्य स्नातः । अन्यो
ऽन्यस्य पृष्ठे प्रधावतस्तावन्वे वाससी परिधायोदेतः स यथाऽहिनिर्व्वचो निर्मुच्येते-
वꣳ सर्व्वस्मात्पाप्मनो निर्मुच्यते तस्मिन्न तावच्चनेनो भवति यावत्कुमारोऽदति
स येनैव निष्क्रामन्ति तेन पुनरायन्ति पुनरेत्याहवनीये समिधमभ्यादधाति देवा-
नाꣳ समिदसीति यजमानमेवैतया समिन्द्धे देवानाꣳ हि समिद्धिमनु यजमानः स-
मिध्यते ॥ २३॥ ब्राह्मणम् ॥ १ [४. ५.] ॥ ॥ चतुर्थोऽध्यायः ॥ ५८ ॥ ॥
आदित्येन चरुणोदयनीयेन प्रचरति । तद्यदादित्यश्चरुर्भवति यद्देवैनामदो दे-
वा अब्रुवंस्तद्वैव प्रायणीयस्त्वोदयनीय इति तमेवास्याऽ एतदुभयत्र भागं करो-
ति ॥ १॥ स यदमुत्र राजानं क्रेष्यन्नुपप्रेष्यन्यज॑ते । तस्मात्तत्प्रायणीयं नामाथ यद्-
त्रावभृथादुदेत्य यज॑ते तस्मादेतदुदयनीयं नाम तद्वाऽ एतत्त्समानमेव हविरादित्या
ऽएव प्रायणीयमदित्याऽउदयनीयमियꣳ ह्येवादितिः ॥ २॥ स वै पथ्यामिवाग्रे स्व-
स्तिं यजति । तद्देवा अप्रज्ञायमाने वाचेव प्रत्यपद्यन्त वाचा हि मुग्धं प्रज्ञायते
कां० ४, अ० ४-५, ब्रा० ५-१, कं० २०-२३ व १-३ शतपथब्राह्मण / ६२७
इस रस को उत्पन्न करता है। वह (सोम) पैदा होकर इस (यजमान) को पैदा करता है। "सं
त्वा विशन्त्वोषधीरुतापः" (यजु० ८।२५) - "ओषधियाँ और जल तुझसे मिलें।" इस प्रकार
इसमें दोनों रसों को युक्त करता है-वह रस जो ओषधि में है और वह जो जलों में है। "यज्ञस्य
त्वा यज्ञपते सूक्तोक्तौ नमोवाके विधेम यत् स्वाहा" (यजु० ८।२५) - "हे यज्ञपति, सूक्त पढ़ने
और नमस्कार में तुझ यज्ञ की आराधना करें।" यज्ञ में जो कुछ भली बात है उसको वह उस
(यजमान) में रखता है ॥२०॥
अब उस (सोम के फोक) को छोड़कर यह मन्त्र पढ़कर खड़ा होता है, "देवीरापऽ एष वो
गर्भः” (यजु० ८।२६) - "हे प्रकाशयुक्त जल, यह तेरा गर्भ (बच्चा) है।" यह जलों का ही तो
गर्भ है।" "तं॒ सुप्रीतं॒ सुभृतं बिभ्रत" (यजु० ८।२६) - "इसको प्रीति के साथ और अच्छी
तरह उठाकर ले जाओ।" इस प्रकार वह रक्षा के लिए उसको जल के सुपुर्द कर देता है। "देव
सोमैष ते लोकः" (यजु० ८।२६) - "हे सोम देव, यह तुम्हारा घर है।" जल ही तो इसका घर
है। "तस्मिञ्छञ्च वक्ष्व परि च वक्ष्व" (यजु० ८।३६) -अर्थात् "इसमें तू हमको कल्याण दे और
सब कष्टों से बचा" ॥२१॥
अब वह रस को इस मन्त्र से डुबो देता है - "अवभृथ निचङ्कुण निचेरुरसि निचङ्कुणः ।
अव देवैर्देवकृतमेनोऽयासिषमव मर्त्यैर्मर्त्यकृतम्" (यजु० ८।२७) - 'हे अवभृथ, मन्द गति से
जा। यद्यपि तू तेज चलनेवाला है, तो भी मन्द गति से जा। मैंने देवों की सहायता से देवों के प्रति
किये हुए पाप को और मनुष्यों की सहायता से मनुष्यों के प्रति किये पाप को दूर कर दिया।"
इसने वस्तुतः देवों की सहायता से अर्थात् सोम राजा के द्वारा देवकृत पाप को दूर कर दिया और
मनुष्यों की सहायता से अर्थात् पशु तथा पुरोडाश के द्वारा मनुष्यकृत पाप को दूर कर दिया।
"पुरूराणो देव रिषस्पाहि" (यजु० ८।२७)-'हे देव, विरुद्धफलदायी वध से तू हमको बचा।"
अर्थात् सब कष्टों से हमको बचा ॥२२॥
अब यजमान और उसकी पत्नी जलों में उतरकर नहाते हैं और एक-दूसरे की पीठ मलते
हैं। दूसरे कपड़े पहनकर वे बाहर आते हैं। जिस प्रकार साँप केंचुल छोड़ देता है उसी प्रकार यह
सब पापों से युक्त हो जाता है। उसमें इतना पाप भी नहीं रहता जितना दाँत-शून्य बच्चे में।
जिस मार्ग से ये बाहर आये थे उसी से जाते हैं। लौटकर आहवनीय में समिधा रखता है (इस
मन्त्र से) "देवानाऽ समिदसि" (यजु० ८।२७) - "तू देवों की समिधा है।" इस प्रकार यजमान
को प्रकाश-युक्त करता है, क्योंकि देवों के प्रज्वलित होने से यजमान भी प्रज्वलित होता है ॥२३॥
उदयनीयेष्टिः
अध्याय ५-ब्राह्मण १
अब अन्तिम अदिति-सम्बन्धी चरु बनाता है। अदिति का चरु इसलिए बनाता है कि
पहले कभी देवों ने उससे कहा था कि तेरी ही प्रायणीय अर्थात् पहली (Opening) आहुति होगी
और तेरी ही उदनीय अर्थात् पिछली (Concluding) । इसलिए पहले और पीछे दोनों भाग
उसी के होते हैं ॥१॥
उस समय सोम राजा को मोल लेने की इच्छा से जाते हुए (उपप्रैष्यन्) आहुति देता है,
इसलिए इसका नाम 'प्रायणीय' पड़ा और इस समय अवभृथ से लौटकर आहुति देता है, इसलिए
इसका 'उदनीय' नाम हुआ। यह आहुति तो समान ही है। प्रायणीय भी अदिति की और उदय-
नीय भी अदिति की। यह पृथिवी ही अदिति है ॥२॥
पहले वह 'पथ्या-स्वस्ति' (कल्याणकारी मार्ग हो) इसकी इच्छा के लिए आहुति देता
है। पहले देवों ने न जानने की दशा में वाणी से ही मार्ग को पाया था। वाणी से ही अज्ञान को
ऽथात्र॑ प्र॒जाते॑ यथापू॒र्वं क॑रोति ॥ ३॥ सोऽग्निमेव॑ प्रथ॒मं य॑जति । अथ॒ सोम॒मथ॑
स॒वि॒तार॒मथ॑ प॒थ्याꣳ स्व॒स्तिमथादि॑तिं॒ वाग्वै प॒थ्या स्व॒स्तिरिय॒मदि॑ति॒रस्या॑मेव॒ तद्दे-
वा वाचं॒ प्रत्य॑ष्ठापयं॒त्सेयं॒ वाग॒स्यां प्र॑ति॒ष्ठिता॒ वद॑ति ॥ ४॥ अथ॑ मैत्रावरु॒णीं व-
शाम॑नूब॒न्ध्या॒माल॑भते । स ए॒षोऽन्य एव य॒ज्ञस्ता॑यते पशुब॒न्ध ए॒व स॑मिष्टयजूꣳषि
ह्येवा॒त्तो य॒ज्ञस्य॑ ॥ ५॥ तद्यन्मै॑त्रावरु॒णी व॒शा भ॑वति । यद्वाऽई॑ज्ञा॒नस्य॑ स्वि॑ष्टं भ-
व॑ति मि॒त्रोऽस्य॒ तद्गृह्णा॑ति॒ यद॑स्य दुरि॑ष्टं भ॑वति वरु॑णोऽस्य॒ तद्गृह्णा॑ति ॥ ६॥ त-
दाहुः । क्षेत्ता॑नो॒ऽभूदि॑ति तद्युद्देवा॒व्यात्र॑ मि॒त्रः स्वि॑ष्टं गृह्णा॑ति तद्देवास्माऽऋ॒त्या
प्री॒तः प्रत्य॑वसृ॒जति॒ यड॒ चास्य॒ वरु॑णो दुरि॑ष्टं गृह्णा॑ति॒ तद्ये॒वास्मा॑ऽऋ॒त्या प्री॒तः
स्वि॑ष्टं क॒रोति॒ तडु॒ चास्मै॒ प्रत्य॑वसृ॒जति॒ सोऽस्यै॒ष स्व ए॒व य॒ज्ञो भ॑वति स्वꣳ सु-
कृ॒तम् ॥ ७॥ तद्यन्मै॑त्रावरु॒णी व॒शा भ॑वति । यत्र॒ वै दे॒वा रेतः॑ सि॒क्तं प्राज॑नयं-
स्तदा॑ग्निमारु॒तमित्यु॑क्त्यं तस्मिंस्तद्व्याख्यायते॒ यथा॒ तद्दे॒वा रेतः॑ प्राज॑नयंस्ततो॒ऽङ्गा-
राः सम॑भव॒न्नङ्गा॑रेभ्यो॒ऽङ्गि॑रस॒स्तद॒न्वन्थे प॒शवः॑ ॥ ८॥ अथ॒ यदा॑सां पाꣳस॑वः॒ पर्य॑-
शिष्यन्त । ततो॒ गर्द॑भः सम॑भव॒त्तस्मा॒द्यत्र॑ पाꣳसु॒लं भ॑वति ग॑र्दभस्था॒नमिव बते-
त्याड॒रथ॒ यदा॒ न कश्च॒न रसः॒ पर्य॑शिष्यत॒ तत॑ ए॒षा मै॑त्रावरु॒णी व॒शा सम॑भव॒त्त-
स्मा॒देषा॒ न प्र॒जाय॑ते र॒साद्धि रेतः॒ सम्भ॑वति॒ रेत॑सः प॒शव॒स्तद्यदन्ततः॒ सम॑भव॒त्त-
स्मा॒दन्तं॑ य॒ज्ञस्यानु॑वर्तते॒ तस्मा॒द्वाऽए॒षात्र॑ मैत्रावरु॒णी व॒शाव॑कॢप्ततमा भ॑वति॒ यदि॑
व॒शां न वि॒न्देद॒प्युक्षाव॒श ए॒व स्या॑त् ॥ ९॥ अथै॒तरं॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॑मरीमृत्सन्त ।
ततो॑ वैश्वदे॒वी सम॑भव॒दथ॑ बा॒र्हस्प॒त्या सोऽन्तो॒ऽन्तो हि बृ॒हस्पतिः॑ ॥ १०॥ स यः॑
स॒हस्रं॑ वा॒ भूयो॑ वा दद्या॑त् । स ए॒ताः सर्वा॒ आ ल॑भेत॒ सर्वं॒ वै तस्या॑प्तं भव॑ति
सर्वं॑ जि॒तं यः॑ स॒हस्रं॑ वा॒ भूयो॑ वा ददा॑ति॒ सर्व॑मेता ए॒वमे॒व यथा॑पू॒र्वं मै॑त्रावरु-
णीमे॒वाग्रेऽथ॑ वैश्वदे॒वीमथ॑ बा॒र्हस्प॒त्यम् ॥ ११॥ अथो॒ ये दी॑र्घस॒त्रमासी॑रन् । सं-
व॒त्स॒रं वा॒ भूयो॑ वा॒ तऽए॒नाः सर्वा॒ आ ल॑भेरन्त्स॒र्वं वै ते॒षामा॑प्तं भव॑ति॒ सर्वं॑ जि॒तं
कां० ४, अ० ५, ब्रा० १, कं० ३-१२ शतपथब्राह्मण / ६२६
दूर किया जाता है। अब यहाँ ज्ञान होने पर क्रमशः ठीक-ठीक कार्य करता है ॥३॥
वह पहले अग्नि के लिए आहुति देता है, फिर सोम के लिए, फिर सविता के लिए, फिर
पथ्या के लिए, फिर अदिति के लिए। वाणी ही पथ्यास्वस्ति है और पृथिवी अदिति है। इसी
पृथिवी पर देवों ने वाणी को स्थापित किया और उसी पर स्थापित होकर वाणी बोलती है ॥४॥
अब मित्र और वरुण के लिए अनुबन्ध्या गाय को मारते हैं।१ यह पशुबन्ध एक दूसरा ही
यज्ञ है। यज्ञ का अन्त समष्टि-यजुः हैं ॥५॥
मित्र और वरुण के लिए गाय इसलिए होती है कि यज्ञ का जो स्विष्ट भाग (अच्छा,
हितकर) है उसे मित्र लेता है और जो दुरिष्ट भाग है उसे वरुण लेता है ॥६॥
इस पर कुछ लोग कहते हैं कि यजमान का क्या हुआ ? उसके जिस स्विष्ट भाग को
मित्र लेता है उसको वह इस गाय के द्वारा प्रसन्न होकर उसी को लौटा देता है। और इसके
दुरिष्ट भाग को वरुण लेता है। उसको वह इस गाय के द्वारा प्रसन्न होकर स्विष्ट बना देता है
और उसी के लिए छोड़ देता है। इस प्रकार यह यज्ञ उसका अपना ही हो जाता है, अपना ही और
भलीभाँति किया हुआ (सुकृत) ॥७॥
यह गौ मित्र वरुण की इसलिए होती है कि जब देवों ने सींचे हुए वीर्य को उगाया, उसे
अग्नि-मारुत उक्थ कहते हैं। उसकी व्याख्या है कि देवों ने वीर्य को कैसे उगाया। उससे अंगारे
हुए, अंगारों से अंगिरस, उसके पीछे दूसरे पशु ॥८॥
अब जो राख की धूलि रह गई उससे गधा उत्पन्न हुआ। इसीलिए जब कोई धूल का
स्थान (बुरा स्थान) होता है तो कहते हैं कि यह तो गधे का स्थान (गर्दभ-स्थान) है। जब कुछ
भी रस शेष न रहा तो उससे मित्र और वरुण की गौ उत्पन्न हुई। इसलिए यह वशा (बन्ध्या
गौ) बच्चा नहीं देती। क्योंकि रस से वीर्य होता है और वीर्य से सन्तान। चूंकि वह सबसे पीछे
उत्पन्न हुई, इसलिए यह यज्ञ के अन्त में लाई जाती है। इसीलिए मित्र वरुण के लिए वशा
(बन्ध्या गाय) ही ठीक है। यदि बन्ध्या गाय न मिले तो बैल ही सही ॥९॥
अब विश्वेदेवों ने यत्न किया, उससे वैश्वदेवी गाय हुई, फिर बृहस्पति-सम्बन्धी गाय।
बृहस्पति अन्त है, बृहस्पति ही अन्त है ॥१०॥
यह जो हजार गायें देता है वह इन सबका आलभन करता है। जो हजार या बहुत-सी
गायें दान करता है उसे सब प्रकार की जय प्राप्त हो जाती है। यह सब क्रमानुसार इस प्रकार
है—पहले मित्र-वरुण की, फिर वैश्वदेव की, फिर बृहस्पति की ॥११॥
जो दीर्घ सत्र करते हैं, वर्ष-भर का या अधिक काल का, वे इन सबका आलभन करते
हैं। उनकी सब इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं, सब विजय मिल जाती है, जो दीर्घ सत्र को करते हैं,
१. वेदों में तो गाय को बारम्बार 'अघ्न्या' कहा गया है; यह सन्दर्भ मांसाहारियों द्वारा प्रक्षिप्त
है। —स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती