शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-३, ब्राह्मण-४
३८६ शतपथ ब्राह्मण
अथ॒ यद॒पामन्त॑ क्री॒णाति॑ । र॒सो वाऽआप॑ः सर॒समे॒वैतत्क्री॑णात्यथ॒ यद्धिर॑ण्यं भव॑-
ति सशु॒क्रमे॒वैतत्क्री॑णात्यथ॒ यद्वा॑सो भव॑ति सवच॑समे॒वैतत्क्री॑णात्यथ॒ यद॒जा भव॑-
ति सतप॑समे॒वैतत्क्री॑णात्यथ॒ यद्धे॒नुर्भव॑ति साशिर॒मेवैतत्क्री॑णात्यथ॒ यन्मिथु॒नौ भ॑-
वतः॒ स॒मिथु॑नमे॒वैतत्क्री॑णाति॒ तं वै दश॑भिरेव॒ क्री॑णीयान्नादश॑भिर्दशाक्षरा॒ वै वि॒-
राड्वि॒राट् सोम॒स्तस्माद्दश॑भिरेव॒ क्री॑णीयान्नादश॑भिः ॥ १८ ॥ ब्राह्मणम् ॥ ६ [३. ३.] ॥
द्वितीयः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या १२८ ॥ ॥
नीडे॑ कृष्णाजिनमास्तृणाति । अ॒दित्या॒स्त्वग॑सीति॒ सोऽत्रै॑व बन्धु॒रथैनमासा॒-
दय॒त्यदि॑त्यै॒ सद॒ आसी॒देती॒यं वै पृ॑थि॒व्यदि॑तिः सेयं प्रतिष्ठा॒ तद॒स्यामे॒वैनमे॒तत्प्र॑ति॒-
ष्ठाय प्रतिष्ठा॑पयति॒ तस्मा॑दाहादि॑त्यै॒ सद॒ आसी॒देति॑ ॥ १ ॥ अथैनमभिमृश्य वाच-
यति । अ॒स्तम्भा॒द्द्यां वृ॑ष॒भोऽअ॒न्तरि॑क्षम॒ति दे॒वा ह॒ वै य॒ज्ञं त॒न्वाना॒स्तेऽसुर॒रक्ष॑-
सेभ्य आस॒ङ्गाद्बिभ॑यां चक्रुस्त॒देनमेत॒च्छाया॑ऽसमे॒व ब॒धाञ्च॑क्रुर्यदाहास्तम्भा॒द्द्यां वृ॑-
ष॒भोऽअ॒न्तरि॑क्षम॒ति ॥ २ ॥ अ॒मिमी॑त व॒रिमा॑णं पृथि॒व्या इति॑ । त॒देनेने॒माँल्लोका-
नास्तृणोति॒ तस्य॒ हि न वृत्तास्ति॒ न ब॒धो येने॒मे लो॒का आ॑स्तृ॒तास्तस्मा॑दाहा॒मि-
मी॑त व॒रिमा॑णं पृथि॒व्या इति॑ ॥ ३ ॥ आसी॑द्वि॒श्वा भुव॑नानि स॒म्राडिति॑ । त॒देने॒ने-
द॒ꣳ सर्व॑मास्तृणोति॒ तस्य॒ हि न वृत्तास्ति॒ न ब॒धो येने॒दꣳ सर्व॑मास्तृतं॒ तस्मा॑दा-
हासी॑द्वि॒श्वा भुव॑नानि स॒म्राडिति॑ ॥ ४ ॥ विश्वेत्तानि॒ वरु॑णस्य व्र॒तानीति॑ । तद॒-
स्मा॒ऽइदꣳ सर्व॒मनु॑वर्त्म करोति॒ यदि॒दं किं च॒ न कं च॒न प्र॒त्युद्यामि॑नं॒ तस्मा॑दाह॒
विश्वेत्तानि॒ वरु॑णस्य व्र॒तानीति॑ ॥ ५ ॥ अथ सोमपर्याणहननेन पर्याणह्यति । नैदे-
नं नाष्ट्रा रक्षा॑ꣳसि प्रमृशा॒निति॒ गर्भो वाऽए॒ष भ॑वति ति॒र्-इव॒ वै गर्भास्ति॒र्-इ-
वैतत्पर्याणहं ति॒र्-इव॒ वै दे॒वा मनु॒ष्येभ्यस्ति॒र्-इवैतद्यत्पर्याणहं तस्मा॑द्वै पर्याण-
ह्यति ॥ ६ ॥ स पर्याणह्यति । वने॑षु व्य॒न्तरि॑क्षं तता॒नेति॒ वने॑षु॒ हीद॒मन्तरि॑क्षं
वि॒ततं॒ वृक्षाग्रे॑षु॒ वाज॒मर्व॑त्सु॒ पय॑ उ॒स्रिया॑स्विति वी॒र्यं वै वाज॑ः पुमाꣳसो॒ऽर्व॑न्तः
कां० ३, अ० ३, ब्रा० ३-४, कं० १८ व १-७ शतपथब्राह्मण / ३८७
सोम को जल के समीप मोल लेता है। जल ही रस है। इस प्रकार वह उसको रस-युक्त
करता है। सोने के होने का तात्पर्य यह है कि वह उसको शुक्र-(तेज)-सहित मोल लेता है। वस्त्र
के होने का तात्पर्य यह है कि वह उसको चमड़े-सहित मोल लेता है। बकरी के होने का तात्पर्य
यह है कि वह उसको तप के साथ मोल लेता है। गाय के होने का तात्पर्य यह है कि वह उसको
दूध-सहित मोल लेता है जिससे सोमरस में मिलाया जा सके। गायों के जोड़े का अर्थ यह है कि
वह सोम को जोड़े के साथ मोल लेता है। सोम को दश चीजों के बदले मोल ले। दश से कम
या ज्यादा नहीं, क्योंकि विराट् छन्द में दश अक्षर होते हैं। सोम विराट् है इसलिए दश के बदले
खरीदे, न्यूनाधिक के बदले नहीं ॥१८॥
अध्याय ३—ब्राह्मण ४
गाड़ी के नीड अर्थात् बन्द स्थान में काले हिरन के चर्म को रखता है यह कहकर—
“अदित्यास्त्वगसि” (यजु० ४।३०)-“तू अदिति की त्वचा है।” अब वह सोम को रख देता है यह
कहकर-“अदित्यै सदऽआसीद” (यजु० ४।३०)-“तू अदिति के स्थान पर बैठ।” यह पृथिवी
ही अदिति है और यही प्रतिष्ठा है। इस प्रकार वह उसको इस प्रतिष्ठा में स्थापित करता है।
इसीलिए कहा, 'तू अदिति के स्थान पर बैठ' ॥१॥
अब वह सोम को छूकर पढ़ता है-“अस्तभ्नाद् द्यां वृषभोऽअन्तरिक्षम्” (यजु० ४।३०)-
“इस वृषभ ने द्यौ और अन्तरिक्ष को उभारा।” देवों ने यज्ञ ताना और वे असुर राक्षसों के
आक्रमण से डरे। उन्होंने इस सोम को वध की अपेक्षा बड़ा कर दिया। इसीलिए कहा,
'अस्तभ्नाद्' इति ॥२॥
“अमिमीत वरिमाणं पृथिव्याः” (यजु० ४।३०)-“उसने पृथिवी के विस्तार को मापा।
इस प्रकार इस सोम की सहायता से इन लोकों को प्राप्त करता है। जिसने इन लोकों को प्राप्त
कर लिया उसके लिए न कोई वध है, न मारनेवाला। इसीलिए कहता है, 'अमिमीत वरिमाणं
पृथिव्याः' ॥३॥
“आसीदद् विश्वा भुवनानि सम्राट्” (यजु० ४।३०)-“सब भुवनों में वह सम्राट् के रूप
में बैठा।” इसकी सहायता से वह 'सब' की प्राप्ति करता है। जिसको इस 'सब' की प्राप्ति हो
गई उसके लिए कोई घातक या वध करनेवाला नहीं रहता। इसीलिए 'आशीदद्' मन्त्र
पढ़ा ॥४॥
“विश्वेत् तानि वरुणस्य व्रतानि” (यजु० ४।३०)-“वस्तुतः ये वरुण के व्रत हैं।” इसके
द्वारा वह सबको उसका अनुयायी करता है, अर्थात् जो कुछ यहाँ है अथवा जो कोई प्रतिकूल है
उस सबको। इसीलिए 'विश्वेत् तानि' मन्त्र पढ़ा गया ॥५॥
अब सोम पर्याणहन अर्थात् सोम-वस्त्र से सोम को लपेटता है कि दुष्ट राक्षस उसको छू
न ले। वस्तुतः यह गर्भ है, गर्भ छिपा रहता है; और यह जो ढका हुआ है वह भी छिपा रहता
है। देव मनुष्यों से छिपे रहते हैं। जो ढका हुआ है वह भी छिपा रहता है, अतः सोम को कपड़े
में लपेटता है ॥६॥
इस मन्त्र को पढ़कर लपेटता है-“वनेषु व्यन्तरिक्षं ततान” (यजु० ४।३१)-“वनों के
ऊपर अन्तरिक्ष ताना गया।” वनों अर्थात् वृक्षों के सिरों पर तो अन्तरिक्ष तना हुआ है ही।
“वाजमर्वत्सु पयऽउस्रियासु” (यजु० ४।३१)-“मनुष्यों में वीर्य और गायों में दूध।” यहाँ 'वाज्'
का अर्थ है वीर्य और 'अर्वन्त' का अर्थ है मनुष्य। इस प्रकार मनुष्यों में वीर्य धारण करता है।
३८८ शतपथ ब्राह्मण
पु॒रु॒ष्वे॒वैतद्वीर्यं॑ दधाति पय॑ उ॒स्त्रिया॑स्विति पयो॒ हीदमु॒स्रिया॑सु हि॒तं॒ हृत्सु क्रतुं॒
वरु॑णो वि॒द्वन्निति॑ हृ॒त्सु ह्ययं॒ क्रतुर्मनोजवः॒ प्रवि॑ष्टो वि॒द्वन्निति॑ वि॒न्दु॒
र्ह्ययं॒ प्रज्ञा॑स्व॒ग्निर्दिवि सूर्य॑मदधा॒त्सोम॒मद्रा॑विति दि॒वि ह्य॑सौ सूर्यो॑ हि॒तः सोम॑म॒-
द्रा॑विति गि॒रिषु॒ हि सोमो॒त्तस्मा॑दाह दि॒वि सूर्य॑मदधा॒त्सोम॒मद्रा॑विति ॥७॥ अथ॑
य॒दि द्वे कृ॒ष्णाजिने भवतः॑ । तयो॒रन्यतर॒त्प्रत्यानह्यति प्रतीनाह॒भाजनं॒ यद्यु॒त्वेकं॑
भव॑ति कृ॒ष्णाजिनग्रीवा॒मु॒वाव॑कृत्य॒ प्रत्या॑नह्यति प्रतीनाह॒भाजनं॒ सू॒र्यस्य॒ चक्षु॒-
रारो॒हम॒ग्नेर॒क्ष्णः कनी॑नकम् । यत्रे॒तशे॑भिरीयसे॒ भ्राज॑मानो विपश्चि॒तेति॒ सूर्य॑मे॒वैत॒-
त्पुर॒स्ता॑त्करोति॒ सूर्यः॑ पुर॒स्तान्नाष्ट्रा॒ रक्षा॑ꣳस्यपघ्नन्नेत्यथाभयेनानाष्ट्रेण॒ परिव॑हन्ति
॥८॥ उ॒द्धते प्र॒ऽउगे फलके भवतः । तदुत्तरेण तिष्ठ॒न्त्सुब्रह्मण्यः प्राज॑ति श्रेया॒-
न्वाऽए॒षोऽभ्यारोहाद्भवति को ह्येतमर्ह॒त्यभ्यारो॑ढुं॒ तस्मा॑दुत्तरेण तिष्ठ॒न्प्राज॑ति ॥९॥
पलाशशाखया प्राज॑ति । यत्र॒ वै गायत्री सो॒मम॒च्छाप॑तत्तदस्या॒ऽआहर॑न्त्या॒ऽअपादु॒-
स्ताम्भायत्य॑ पर्णं प्रचि॒च्छेद॒ गाय॒त्र्यै वा सो॒मस्य वा॒ राध॑स्तत्पति॒त्वा प॒र्णोऽभव॒त्त-
स्मात्प॒र्णो नाम॒ तय्दे॒वात्र॒ सोम॑स्य॒ न्यक्तं॒ तदिहाप्यसदिति॒ तस्मा॑त्पलाशशाखया
प्राज॑ति ॥१०॥ अथानडुहा॑वाह्वय॑ति । तौ यदि॑ कृ॒ष्णौ स्या॑तामन्यत॒रो वा कृष्णस्त॒-
न्न विद्या॑द्वर्षिष्यत्ये॒षमः पर्जन्यो वृष्टिमा॒न्भविष्यतीत्येतद्विज्ञानम्॑ ॥११॥ अथ॑
युनक्ति । उ॒स्रावे॑तं धूर्षाहा॒वित्य॒स्रौ हि भवतौ धूर्षाहा॒विति धूर्वाहा॑ हि भवतौ
यु॒ज्येथामनश्रू॒रिति यु॒ज्येते ह्यनश्रू॒ऽइत्यनार्ता॒विति तद्वीरहणावित्यपापकृतावि-
ति तद्ब्रह्मचोदनाविति ब्रह्मचोदनौ हि भवतः स्वस्ति यज॑मानस्य गृ॒हान्गच्छत-
मिति यथैनावतरा नाष्ट्रा रक्षाꣳसि न हिꣳस्युरेवमेतदाह ॥ १२ ॥ अथ पश्चात्प-
रिक्रम्य । अपालम्बमभिपद्य॒त्याह॒ सोमा॑य क्रीतायानुब्रूहीति॒ सोमा॑य पर्याह्रियमाणा॒ये-
ति वातो यत॒रथा कामयेत ॥ १३॥ अथ वाचयति । भ॒द्रो मे॒ऽसि प्र॒च्यव॑स्व भुव-
स्प॒तऽइति भ॒द्रो ह्यस्यैष भ॑वति तस्मा॑न्नान्यमाद्रियते॒ऽप्यस्य राजानः सभागा आ-
कां० ३, अ० ३, ब्रा० ४, कं० ७-१४ शतपथब्राह्मण / ३८६
गायों में तो दूध होता ही है। [मेरी धारणा है कि पुमान् का अर्थ है 'नर' और 'उस्रियासु' का
मादा। नरों में वीर्य होता है और नारियों में दूध'] । "हृत्सु क्रतुं वरुणो विश्व॑म॒ग्निम्" (यजु०
४।३१)-"मनों में बुद्धि और घरों में अग्नि वरुण ने (स्थापित की) ।" मनों में बुद्धि स्थापित है
ही और घरों में या प्रजाओं में अग्नि । "दिवि सूर्य॑मदधात्स सोममद्रौ" (यजु० ४।३१) - "सूर्य को
द्युलोक में स्थापित किया और सोम को पहाड़ पर" [यहाँ सोम का अर्थ 'चन्द्र' ठीक नहीं है।
सोमलता ही पहाड़ पर होती है और द्यौलोक का सूर्य उसको प्रभावित करता है ? ] द्यौलोक में
सूर्य है ही और सोम पहाड़ों में होता ही है। इसलिए कहा 'दिवि सूर्य' इत्यादि ॥७॥
यदि दो मृगचर्म हों तो उनमें से एक को ध्वजा बनाकर लटकाता है। यदि एक हो तो
गर्दन के ऊपर से काटकर ध्वजा के रूप में लटकाता है। यह मन्त्र पढ़कर - "सूर्य॑स्य चक्षुरारोहा-
ऽग्नेरक्षणः कनीनकम् । यत्रैतशेभिरीयसे भ्राज॑मानो विपश्चिता" (यजु० ४।३२) - "हे मृगचर्म,
तू सूर्य की आँख के ऊपर चढ़ और अग्नि की आँख के तारे के ऊपर चढ़। जहाँ सूर्य और अग्नि
के साथ चमकता हुआ तू चढ़ता है।" इस प्रकार वह सूर्य को आगे करता है। सूर्य के सामने दुष्ट
राक्षस नहीं आने पाते। अब वे सोम को निर्विघ्न गाड़ी में ले जाते हैं ॥८॥
गाड़ी को बल्लियों के आगे के भाग में प्रउग या त्रिभुजाकार दो तख्ते होते हैं। उन
दोनों के बीच में सुब्रह्मण्य (उद्गाता का सहायक) खड़ा होकर गाड़ी को चलाता है। सोम
राजा उससे बहुत ऊँचा होता है। ऐसा कौन है जो सोम राजा के बराबर बैठ सके ? इसलिए वह
खड़ा होकर गाड़ी को चलाता है ॥६॥
पलाश की शाखा से हाँकता है। जब गायत्री सोम की ओर उड़ी और उसको लिये जा
रही थी तो एक बिना पैर के मनुष्य ने निशाना लगाकर गायत्री का या सोम राजा का एक पर
गिरा दिया। वह गिरकर पर्ण हो गया। इसीलिए उसे पर्ण कहते हैं। वह सोचता है कि जो बात
उस सोम के साथ हुई वह यहाँ भी हो। इसलिए वह पलाश से हाँकता है ॥१०॥
दो बैल जुतते हैं। यदि दोनों काले हों या एक काला हो तो जानना चाहिए कि वर्षा
बहुत अच्छी होगी। यही विज्ञान है ॥११॥
बैलों को जोतता है यह मन्त्र पढ़कर - "उस्त्रावेतं धूर्षाहौ" (यजु० ४।३३)-"हे धुरे को
सहन करनेवाले दो बैलो, तुम आओ।" क्योंकि ये दो बैल हैं और धुरे को सह सकते हैं।
"युज्येथामनश्रू" (यजु० ४।३३)-"आँसूरहित तुम जुतो।" 'आँसूरहित' का अर्थ हैदुःख-रहित' ।
"अवीरहणौ" (यजु० ४।३३)- "पापरहित।" "ब्रह्मचोदनौ" (यजु० ४।३३)- "ब्रह्म के प्रेरक ।"
"स्वस्ति यजमानस्य गृहान्गच्छतम्" (यजु० ४।३३)-"यजमान के घर में कल्याणकारक होकर
आओ।" इसके कहने का प्रयोजन यह है कि मार्ग में दुष्ट राक्षस उसको न सतावें ॥१२॥
मुड़कर गाड़ी के पीछे जाता है और अपालम्ब (गाड़ी के पीछे एक लकड़ी का टुकड़ा
लगा रहता है जिसे अपालम्ब कहते हैं) को पकड़कर (होता से) कहता है, 'खरीदे हुए सोम के
लिए पढ़ो' या 'गाड़ी में लाये हुए सोम के लिए पढ़ो' इन दोनों वाक्यों में से जिस वाक्य को चाहे
कहे ॥१३॥
अब वह मन्त्र पढ़वाता है - "भद्रो मेऽसि प्रच्यवस्व भुवस्पते" (यजु० ४।३४)-'हे संसार
के पति ! तू मेरे लिए कल्याणकारी है, चल।" सोम वस्तुतः उसके लिए कल्याणकारी है। अतः
वह सोम के सिवाय और किसी का आदर नहीं करता। जिस प्रकार महाराजा के आधीन राजा
३६० शतपथ ब्राह्मण
गच्छ॑ति पूर्वी॒ राज्ञो॒ऽभिव॑दति भ॒द्रो हि भव॑ति॒ तस्मा॑दाह भ॒द्रो मे॒ऽसीति॒ प्रच॑व-
स्व॒ भुव॑स्पत॒ऽइति॒ भुव॑नानाꣳ ह्ये॒ष पति॒र्विश्वान्य॒भि धामा॑नी॒त्यङ्गा॑नि॒ वै विश्वा॑-
नि धामा॑न्य॒ङ्गान्ये॒वैतद॑भ्याह॒ मा त्वा॑ परिप॒रिणो॑ विद॒न्मा त्वा॑ परिप॒न्थिनो॑ विद-
न्मा त्वा॒ वृका॑ अघाय॒वो वि॑द॒न्निति॒ यथै॑नम॒लरा॒ नाष्ट्रा रक्षा॑ꣳसि॒ न वि॒न्देयु॑रे॒वमे॒-
तदा॑ह ॥ १४॥ श्ये॒नो भू॒त्वा परा॑प॒तेति॑ । वय॒ ह्ये॑नमेत॒द्भूतं॒ प्रपा॑तयति॒ यद्वा॒ऽउग्रं॑
तन्नाष्ट्रा रक्षा॑ꣳसि॒ नान्न्व॑वपल्येतद्वै॒ वय॑सामो॒जिष्ठं॒ बलि॑ष्ठं॒ यच्छ्ये॒नस्तमे॒वैत॒द्भूतं॒ प्रपा॑-
तयति॒ यदा॑ह श्ये॒नो भू॒त्वा परा॑प॒तेति॑ ॥ १५॥ अथ श॒रीर॑मे॒वान्व॑वहरन्ति । य॒ज्ञम॑-
नस्य गृ॒हान्ग॑च्छ॒ तन्वौ॒ सꣳस्कृ॒तमिति॒ नात्र॑ तिरो॒हित॑मिवास्ति ॥ १६॥ अथ सु॒ब्रह्म॑-
ण्यामाह्व॑यति । यथा॒ येभ्यः॑ पच्येत॒ तान्ब्रू॑यादि॒त्यह्वं॑ वो पक्ता॒स्मीत्ये॑वमे॒वैतद्दे॒वे-
भ्यो य॒ज्ञं निवे॑दयति सुब्रह्म॒ण्यो३ꣳ सु॒ब्रह्म॑ यो३मि॒ति ब्रह्म॑ हि दे॒वान्प्रच्या॒वय॑ति
त्रिष्कृ॑त्व॒ आह॑ त्रि॒वृद्धि य॒ज्ञः ॥ १७॥ इन्द्राग॑च्छेति॒ । इन्द्रो॒ वै य॒ज्ञस्य॑ दे॒वता॒ तस्मा॑-
दाहेन्द्राग॒च्छेति॒ हरिव॒ आग॑ह मेधाति॒थेर्मे॑ष वृषणश्वस्य मेने । गौरावस्कन्दि॒न्नह॑-
ल्यायै॑ जारेति॒ तद्या॒न्येवा॑स्य॒ चर॑णानि॒ तैरे॒वैन॑मे॒तत्प्रमु॑मोदयिषति ॥ १८॥ कौशि॑-
क ब्राह्म॑ण गौतम ब्रुवा॒णेति॑ । शश्व॑द्वैतद्दारुणि॒नाधु॒नोप॑ज्ञातं॒ यद्गौ॑तम ब्रुवा॒णेति॑
स॒ यदि॑ कामयेत ब्रू॒यादे॒तद्यद्यु॑ काम॒येतापि॒ नाद्रि॑येतत्यह्वे॒ सुत्या॒मिति॒ याव॑दहे सु॒-
त्या भ॑वति ॥ १९॥ देवा॑ ब्रह्म॒ण आग॑हतेति । तद्दे॒वांश्च॑ ब्राह्म॒णांश्चा॑है॒तैर्यत्रो॒भ-
यैर॒र्थो भ॑वति॒ यद्दे॒वैश्च॑ ब्राह्म॒णैश्च॑ ॥ २०॥ अथ प्रतिप्रस्थाता । अग्रेण शालामग्नी-
षोमी॑येण प॒शुना॒ प्रत्यु॑पतिष्ठतेऽग्नीषोमौ॒ वाऽए॒तमन्त॑र॒म्भऽआ॑दधाते॒ यो दीक्ष॑त
ऽआग्नावैष्ण॒वं ह्यदो दी॑क्षणी॒यं ह॒विर्भव॑ति॒ यो वै विष्णुः॒ सोमः॒ स ह॒विर्वा॒ऽए॒-
ष भ॑वति॒ यो दीक्ष॑ते॒ तदेन॑मन्त॒रम्भऽआ॑दधाति॒ तत्प॒शुना॒त्मानं॒ निष्क्री॑णीते ॥ २१॥
तद्धै॑के । आ॒ह॒व॒नीया॑दु॒ल्मुक॒माहृत्य॑य॒मग्निर॒यꣳ सोम॒स्ताभ्याꣳ॒ सह॑ स॒द्यां निष्क्रे॑-
ष्यामह॒ऽइति॒ वद॑न्त॒स्तदु॒ तथा॑ न कु॒र्यादत्र॑ वा॒ऽए॒तौ क्व॑ च॒ तत्सहैव॑ ॥ २२॥ स
PARS II.
कां० ३, अ० ३, ब्रा० ४, क० १४-२२ शतपथब्राह्मण / ३६१
लोग आते हैं और वह पहले उनका अभिवादन करता है और कल्याणकारी होता है, इसीलिए
कहा, ‘भद्रो मे ऽ असि’ इत्यादि। यह भुवनों का पति है। इसलिए कहा है ‘चल’। “विश्वान्यभि
धामानि” (यजु० ४।३४)-“सब धामों के लिए।” ‘विश्वानि धामानि’ से तात्पर्य है अंगों से।
“मा त्वा परिपारिणो विदन् मा त्वा परिपन्थिनो विदन् मा त्वा वृकाऽअघायवो विदन्” (यजु०
४।३४)-“तुझे लुटेरे न मिलें, तुझे डाकू न मिलें, तुझे खाऊ भेड़िये न मिलें।” यह इसलिये कहता
है कि दुष्ट राक्षस उसको किसी प्रकार से न सतावें ॥१४॥
“श्येनो भूत्वा परापत” (यजु० ४।३४)-“बाज होकर उड़ जा।” उसको पक्षी बनाकर
उड़ाता है। जो बलवान् होता है, दुष्ट राक्षस उसका पीछा नहीं करते। श्येन या बाज सब
पक्षियों में बलवान् होता है। उसको बाज बनाकर उड़ाता है। इसलिये कहा, ‘श्येनो भूत्वा’
आदि ॥१५॥
अब वे उसके शरीर को लाते हैं। “यजमानस्य गृहान् गच्छ तन्नौ संस्कृतम्” (यजु०
४।३४)—“यजमान के घरों को जा, जो हमारे लिए तैयार किया हुआ है।” यह बहुत स्पष्ट
है ॥१६॥
अब सुब्रह्मण्य-सम्बन्धी जाप करता है। जैसे जिन लोगों के लिए खाना पकाना हो
उनसे कहे कि मैं आपके लिए अमुक दिन भोजन बनाऊँगा, इसी प्रकार देवताओं के लिए यज्ञ
का निवेदन करता है। ‘सुब्रह्मण्यमो ३ म्’ ऐसा तीन बार कहता है, क्योंकि ब्रह्मा ही देवताओं को
प्रेरणा करता है। तीन बार कहने का प्रयोजन यह है कि यज्ञ के तीन भाग हैं ॥१७॥
'इन्द्र, आ।' इन्द्र यज्ञ का देवता है। इसलिए कहा कि इन्द्र आ। ‘आ जा; घोड़ोंवाले
मेधातिथि के भेड़े, आ ! वृषणश्व की स्त्री (या बाणी), आ ! भैंस के सवार, आ ! अहल्या के जार
या उपपति, आ !' इन प्रकार वह उसको उसके व्यवहार में प्रसन्न करता है। (पता नहीं कि इन्द्र
के ये नाम क्यों हैं ? या इनका वास्तविक अर्थ क्या है) ॥१८॥
‘कौशिक, ब्राह्मण, गौतम कहलानेवाले’ (ये भी इन्द्र के ही नाम मालूम होते हैं)।
आजकल आरुणि ने यह वाक्य निकाला है अर्थात् ‘कौशिक, ब्राह्मण, गौतम कहलानेवाले’। यदि
जी चाहे तो इस वाक्य को कहे, जी चाहे न कहे। ‘इतने दिनों में सोम-यज्ञ होगा।' यहाँ जितने
दिनों में होनेवाला हो उनके नाम ले दे ॥१९॥
‘देव और ब्राह्मण, आओ !' यह वह देवों और ब्राह्मणों से कहता है, क्योंकि इन्हीं देवों
और ब्राह्मणों की उसको आवश्यकता है ॥२०॥
अब प्रतिप्रस्थाता शाला के आगे अग्नि और सोम के पशु को लाता है। जो दीक्षा लेता
है वह अपने-आपको अग्नि और सोम को दाढ़ों में रख देता है। दीक्षा की हवि वस्तुतः अग्नि और
विष्णु की होती है। जो विष्णु है वही सोम है। हवि वही है जो दीक्षा लेता है। इस प्रकार
उन्होंने उसको दाढ़ों में दबा लिया है और इस पशु के द्वारा ही उसका छुटकारा होता है ॥२१॥
कुछ लोग आहवनीय में से जलती लकड़ी निकाल लाते हैं यह कहते हुए, ‘यह अग्नि है,
यह सोम है। इन्हीं दोनों के सहारे हमारा उद्धार होगा।' परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए। जहाँ
कहीं वे हों वे साथ ही होते हैं ॥२२॥