शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-१, ब्राह्मण-२
६ शतपथ ब्राह्मण
ऽना॒ष्ट्रे॒ निवा॒ते य॒ज्ञम॑तन्वत तथो॒ ऽए॒वैष ए॒तं वज्र॑मुद्यच्छति तस्या॑भये ऽना॒ष्ट्रे॒ नि-
वा॒ते य॒ज्ञं त॑नुते॒ तस्मा॑दपः प्रणयति ॥ १७॥ ता उत्सिच्योत्तरेण गार्हपत्यग्ं साद-
यति । योषा वा॒ऽआपो॑ वृ॒षाग्नि॑र्गृ॒हा वै गार्हप॒त्यस्तद्गृ॒हेष्वे॒वैतन्मिथु॒नं प्र॒जन॑नं
क्रियते वज्रं वा॒ऽए॒ष उद्यच्छ॑ति यो ऽपः प्रणयति यो वा॒ऽअप्रति॑ष्ठितो वज्रमुद्य-
च्छति नैनग्ं शक्नोत्युद्यन्तुग्ं सग्ं हैनग्ं शृणाति ॥ १८॥ स यद्गार्हपत्ये सादयति ।
गृहा वै गार्हपत्यो गृहा वै प्रतिष्ठा तद्गृ॒हेष्वे॒वैतत्प्रति॑ष्ठायां प्रतितिष्ठति तथो॒ है-
नमेष वज्रो न हिनस्ति तस्माद्गार्हपत्ये सादयति ॥ १९॥ ता उत्तरेणाहवनीयं प्र-
णयति । योषा वा॒ऽआपो॑ वृ॒षाग्नि॑र्मिथु॒नमे॒वैतत्प्र॒जननं॑ क्रियतऽए॒वमिव हि मि-
थुनं ल्नाम्युत्तरतो हि स्त्री पुमांसमुपशेते ॥ २०॥ ता नान्तरेण संचरेयुः । नेन्मि-
थुनं चर्य॑माणमन्तरेण संचरानिति ता नाति॑कृत्य सादयेन्नो॒ऽअन्नाप्ताः॑ सादयेत्स यद्-
तिकृत्य सादयेदस्ति वा॒ऽअग्ने॒श्चापां॑ च विभ्रातृव्यमिव स यथैव ह तदग्नेर्भवति य-
त्रास्याप उपस्पृशन्त्यग्नौ ह्यधि भ्रातृव्यं वर्धयेद्यदतिकृत्य सादयेद्यद्यन्वन्नाप्ताः सा-
दयेन्नो ह्वामिस्तं काममभ्यापयेद्यस्मै कामाय प्रणीयन्ते तस्मादु सम्प्रत्येवोत्तरेणा-
हवनीयं प्रणयति ॥ २१॥ अथ तृणैः परिस्तृणाति । द्वन्द्वं पात्राण्युदाहरति शूर्पं
चाग्निहोत्रहवणीं च स्फ्यं च कपालानिच शम्यां च कृष्णाजिनं चोलूखलमुसले
दृषदुपल॒ तद्दश॑ दशा॒क्षरा॑ वै वि॒राड्वि॒राडु॑ य॒ज्ञस्तद्वि॒राज॑मे॒वैतद्य॒ज्ञम॑भिसम्पादयत्यथ
यद्द्व॒न्द्वं द्व॒न्द्वं वै वी॒र्यं य॒दा वै द्वौ सग्ंर॑भेते॒ऽथ तद्वी॒र्यं भ॑वति द्व॒न्द्वं वै मिथु॒नं प्र-
जन॑नं मिथु॒नमे॒वैतत्प्र॒जन॑नं क्रियते ॥ २२॥ ब्राह्मणम् ॥ १॥
अथ शूर्पं चाग्निहोत्रहवणीं चादत्ते । कर्म॑णे वां वे॒षाय॑ वा॒मिति॑ य॒ज्ञो वै कर्म॑
य॒ज्ञाय॑ हि॒ तस्मा॑दाह॒ कर्म॑णे वा॒मिति॑ वे॒षाय॑ वा॒मिति॑ वेवेष्टीव हि य॒ज्ञम् ॥ १॥
अथ वाचं यच्छति । वाग्वै य॒ज्ञोऽवि॑च्छुब्धो य॒ज्ञं तनवा॒ऽइत्यथ प्रत॑पति प्रत्युष्टग्ं
रक्षः॑ प्रत्यु॑ष्टा अरा॒तयो॒ निष्ट॑प्तग्ं॒ रक्षो॒ निष्ट॑प्ता अरा॒तय॒ इति॑ वा ॥ २॥ दे॒वा ह॒ वै
कां० १, अ० १, ब्रा० २, कं० १-२ शतपथब्राह्मण / ७
कर देता है। उन्होंने इस वज्र को लिया और उसीकी छत्र-छाया में यज्ञ को ताना। वह भी जल
का प्रणयन करके इसी वज्र को लाता है और इसी की छत्र-छाया में यज्ञ को तानता है ॥१७॥
पात्र में थोड़ा-सा जल लेकर गार्हपत्य के उत्तर की ओर रख देता है। आपः (जल)
स्त्रीलिङ्ग है और अग्नि पुँल्लिङ्ग। गार्हपत्य घर है। स्त्री-पुरुष मिलकर घर में ही सन्तानोत्पत्ति
करते हैं। जो जल का प्रणयन करता है वह वज्र को लाता है। जो भूमि में सुदृढ़ता से खड़ा
नहीं होता वह वज्र को नहीं ले सकता, क्योंकि वज्र उसी को हानि पहुँचा देगा ॥१८॥
गार्हपत्य में रखने का यही प्रयोजन है। गार्हपत्य घर है। घर ही प्रतिष्ठा है (खड़े होने
की जगह—, प्रति + स्था)। घर में इसकी प्रतिष्ठा करता है। इस प्रकार वज्र उसको हानि
नहीं पहुँचाता। इसीलिये वह जल की गार्हपत्य में स्थापना करता है ॥१९॥
आहवनीय के उत्तर में क्यों ले जाता है ? आपः (जल) स्त्रीलिङ्ग हैं। अग्नि पुँल्लिङ्ग
है। स्त्री-पुरुष के मिलने से ही सन्तान होती है। स्त्री, पुरुष के बाईं ओर सोती है ('उत्तर' का
अर्थ 'बायां' भी है) ॥२०॥
जल और अग्नि के बीच में होकर न निकले, क्योंकि स्त्री-पुरुष के जोड़े के बीच में
नहीं पड़ना चाहिये (उनके सहवास में विघ्न नहीं डालना चाहिये (जल को ठीक उत्तर की
ओर रखना चाहिये) न तो सीमा से आगे बढ़ाकर और न सीमा को प्राप्त करने के पहले
(न पूर्व की ओर, न पश्चिम की ओर)। यदि सीमा से आगे बढ़ाकर रखेगा तो जल और
अग्नि में जो परस्पर-विरोध है उसको बढ़ा देगा और जब जल का स्पर्श होगा तो अग्नि का विरोध
बढ़ जायगा। यदि सीमा को प्राप्त किये बिना ही रख देगा तो कामना की पूर्ति नहीं होगी।
इसलिये जल का प्रणयन ठीक उत्तर को ही करना चाहिये ॥२१॥
अब तृणों को बिछाता है (अग्नियों को) चारों ओर। पात्रों को दो-दो करके ले
जाता है, अर्थात् सूप और अग्निहोत्र-हवणी, स्फ्या और कपाल, शमी और कृष्णमृगचर्म,
ऊखल और मूसली, और छोटे-बड़े पत्थर; ये दस हो गये। विराट् छन्द दस अक्षर का होता है।
यज्ञ भी विराट् है। इस प्रकार यज्ञ को विराट् रूप दे देता है। दो-दो करके क्यों ले जाते हैं ?
इसलिये कि दो में शक्ति होती है। जब दो मिलकर काम करते हैं तो वह काम सुदृढ़ होता है।
दो से सन्तान होती है। इस प्रकार यज्ञ को प्रजनन-शील कर देता है ॥२२॥
अध्याय १—ब्राह्मण २
अब सूप और अग्निहोत्र-हवणी को लेता है इस मंत्र से (यजु० १।६)—"कर्म के लिए
तुम दोनों को, व्यापकत्व के लिए तुम दोनों को।" यज्ञ कर्म है। कर्म के लिए अर्थात् यज्ञ के
लिए। 'व्यापकत्व के लिए तुम दोनों को' क्योंकि यजमान यज्ञ में व्यापक होता है ॥१॥
अब वाणी रोकता है। वाणी यज्ञ है। इस प्रकार यज्ञ को निर्विघ्न पूरा करूँ, यह तात्पर्य
है। अब इन दोनों (सूप और हवणी) को आग पर तपाता है यह मंत्र बोलकर (यजु० १।७)—
"झुलस गया राक्षस, झुलस गये शत्रु । जल गया राक्षस, जल गये शत्रु" ॥२॥
८ शतपथ ब्राह्मण
य॒ज्ञं तन्वा॒नाः । ते ऽसु॒ररक्ष॒सेभ्य॒ आसं॑गाद्विभयां॒चक्रुस्तद्य॒ज्ञमुखा॑दे॒वैतन्नाष्ट्रा॒ र॑क्षा॒-
स्यपो॑ ऽपह॒न्ति ॥३॥ अथ॒ प्रेति॑ । उ॒र्व॒न्तरि॑क्षम॒न्वेमीत्य॒न्तरि॑क्षं वा॒ऽअनू॒ र॑क्ष॒स्तर॒-
त्यमू॑ल॒मुभ॒यतः॒ परि॑च्छिन्नं॒ यथा॒यं पुरु॑षो॒ऽमूल॒ उभ॑यतः॒ परि॑च्छिन्नो॒ऽन्तरि॑क्षम॒नुच॒-
रति॒ तल्लक्ष्म॑णै॒वैतद॒न्तरि॑क्षम॒भयमना॒ष्ट्रं कुरुते ॥४॥ स वा॒ऽअन॑स ए॒व गृ॑ह्णीयात् ।
अनो ह॒ वा॒ऽअ॒ग्रे प॒श्चेव वा॒ऽइदं य॒ज्ञ आस॑ स॒ यदे॒वाग्रे॒ तत्क॑रवा॒णीति॒ तस्मा॑-
दन॑स ए॒व गृ॑ह्णीयात् ॥५॥ भूमा वा॒ऽअन॑ः । भूमा॒ हि वा॒ऽअन॒स्तस्मा॒द्यदा बहु॒
भव॒त्यनो॑वा॒क्यमभू॒दित्या॑हुरु॒त्तद्भू॒मान॑मे॒वैतदुपैति॒ तस्मा॑दनस ए॒व गृ॑ह्णीयात् ॥६॥
य॒ज्ञो वा॒ऽअन॑ः । य॒ज्ञो हि वा॒ऽअन॒स्तस्मा॑दनस ए॒व य॒जूंषि॒ सन्ति॒ न कौ॒ष्ठस्य॒
न कु॒म्भ्यै भस्त्रायै ह॒ स्म॒र्षयो गृ॒ह्लन्ति॒ तद्वैषीन्प्रति भस्त्रायै॒ यजूं॑ष्यास॒स्तान्ये॒तर्हि॒
प्रा॒कृता॑नि य॒ज्ञाद्य॒ज्ञं निर्मिमा॒ऽइति॒ तस्मा॑दनस ए॒वगृह्णीयात् ॥७॥ उ॒तो पात्र्यै॒
गृ॒ह्लन्ति॑ । अन॒न्तराय॒मु तर्हि॑ य॒जूंषि॒ जपे॒त्स्तू॒मु त॒र्ह्यव॑स्त॒दुपो॒क्ष्य गृ॑ह्णीयाद्य॒तो यु॒-
नक्ता॒म ततो॒ विमु॑ञ्चामिति यतो॒ ह्येव यु॒ञ्जन्ति॒ ततो॒ विमु॑ञ्चन्ति ॥८॥ तस्य॒ वा
ऽए॒तस्यान॑सः । अ॒ग्निरिव॒ धूर॒ग्नि॒र्हि वै धूर्य्य ए॒नद्द॒हत्य॒ग्नि॒रिद॒मिवैषां॒ वरूं॑ भ॑व-
त्यथ॒ यज्जघ॒नेन कस्तम्भी॑ प्र॒ऽउगं वेदि॑रे॒वास्य॒ सा नीड॑ ए॒व ह॒विर्धानम् ॥९॥
स धुरम॒भिमृ॑शति । धूर॑सि॒ धूर्व॒ धूर्वन्तं॒ धूर्व॒ तं यो॒ऽस्मान्धूर्व॑ति॒ तं धू॑र्व॒ यं व॒यं
धूर्वाम॒ इत्य॒ग्निर्वाऽए॒ष धुर्य्य॑स्तमे॒तद॒त्ये॒ष्वन्व॑वति ह॒विर्ग्रही॑ष्यं॒स्तस्मा॒ऽए॒वैतान्नि॒-
ह्नुते॒ तथो॒ हैतमेषो॒ऽतियन्नमग्निर्धुर्य्यो न॑ हिनस्ति ॥१०॥ तद्व स्मैतद्दारुणिराह ।
अर्धमासशो वा॒ऽअरु॒रु॑ सपत्नान्धूर्वामीत्येतद्व स्म स तद॒भ्याह॑ ॥११॥ अथ॒ जघ॒-
नेन कस्तम्भीमीषाम॒भिमृश्य॑ जपति । दे॒वाना॒मसि॒ वह्नितम॒ग्ं सस्नितमं॑ प॒प्रितमं॑ जु॒-
ष्टतमं॑ दे॒वहू॑तमम् । अह्रुत॒मसि ह॒विर्धानं॒ दृग्ं॒हस्व॒ मा ह्वा॒रित्यन ए॒वैतदुपस्तौ-
त्युप॑स्तुतादा॒त्मानम॒तो ह॒विर्गृह्णानीति॒ मा ते य॒ज्ञप॑तिर्ह्वार्षी॒दिति यज॑मानो॒ वै य॒ज्ञ-
पति॒स्तद्यज॑मानायै॒वैतद॑कुला॒माशा॑स्ते ॥१२॥ अथा॒क्रम॑ते । वि॒ष्णुस्त्वा क्रम॒तामिति॑
कां० १, अ० १, ब्रा० २, कं० ३-१३ शतपथब्राह्मण / ६
क्योंकि जब देव यज्ञ करने लगे तो डरे कि कहीं असुर-राक्षस यज्ञ में विघ्न न डालें।
अतः पहले से ही वह दुष्ट राक्षसों को यज्ञ से दूर कर देता है ॥३॥
अब वह (धान की गाड़ी की ओर) चलता है यह मंत्रांश बोलकर (यजु० १।७)--
“अन्तरिक्ष में चलता हूँ।” राक्षस अन्तरिक्ष में खुले-बन्द दोनों ओर चलता है। इसी प्रकार
यह पुरुष (अध्वर्यु) भी खुले-बन्द, दोनों ओर चलता है। इस प्रकार वह यह मंत्रांश पढ़कर
अन्तरिक्ष को दुष्ट राक्षसों से मुक्त कर देता है ॥४॥
(हवि के धान को) गाड़ी से ही लेना चाहिये। गाड़ी पहले है और यज्ञ-शाला पीछे।
जो पहले है उसको मैं पहले करूँ। इसलिये गाड़ी से ही लेना चाहिये ॥५॥
अनस् (गाड़ी) का अर्थ है भूमा (बहुतायत)। वस्तुतः गाड़ी बहुतायत का चिह्न है।
जो चीज बहुत होती है उसको कहते हैं 'गाड़ी भरकर है'। इस प्रकार बहुतायत का सम्पादन
करता है। इसलिये गाड़ी से ही लेना चाहिये ॥६॥
यज्ञ गाड़ी है। यज्ञ वस्तुतः गाड़ी है। इसलिये यजुः-मंत्रों का संकेत गाड़ी की ओर है;
कोष्ठ (कोठार) या घड़े की ओर नहीं। यह ठीक है कि ऋषियों ने चावलों को चमड़े के थैले
से निकाला था। इसलिये यजुः-मंत्र ऋषियों के सम्बन्ध में चमड़े के थैले की ओर संकेत करते
हैं। परन्तु यहाँ तो प्रकृत अर्थ ही है- 'यज्ञ से यज्ञ को करूँ।' इसलिये गाड़ी से ही लेना
चाहिये ॥७॥
कुछ पात्र से भी लेते हैं। फिर भी यजुः-मंत्रों को पूरा-पूरा पढ़ना चाहिये। इस दशा में
स्फ्या को पात्र में डालना चाहिये, यह सोचकर कि जहाँ जोड़ूं वहीं खोलूं। जहाँ जोड़ते हैं वहीं
खोलते हैं (गाड़ी का जुआ जहाँ जोड़ा जाता है वहीं खोला जाता है) ॥८॥
इस गाड़ी का जुआ अग्नि हो। जुआ अग्नि है, क्योंकि जुआ जब बैलों के कन्धों पर
रक्खा जाता है तो कन्धे जल जाते हैं। डण्डे का जो बीच का भाग है वह मानो वेदी है और गाड़ी
में जहाँ चावल रहता है वह मानो हविर्धान है। इस प्रकार गाड़ी की यज्ञ से उपमा दी
गई है ॥६॥
अब वह जुए को छूता है, यजु० १।८ के इस अंश को पढ़कर - "तू जुआ है। उसको सता
जो सतानेवाला है। उसको सता जो हमको सताता है या जिसको हम सताते हैं।" जुए में अग्नि
होता है। जब वह हवि लेने जायगा तो जुए के पास से गुजरेगा। इस प्रकार जुए को प्रसन्न करता
है जिससे जुआ उसको कष्ट न दे ॥१०॥
आरुणि ने जो कहा था कि मैं हर आधे मास में शत्रुओं का नाश करता हूँ वह इसी सम्बन्ध
में कहा था ॥११॥
डण्डे को छूते हुए, यजु० १।८ और १।६ के इन अंशों का जाप करता है- “तू देवों में
सबसे अच्छा ले-जानेवाला, सबसे अच्छा जुड़ा हुआं, सबसे अच्छा भरा हुआ, सबसे अच्छा,
प्यारा, सबसे अच्छा निमंत्रण देनेवाला है।" "तू सबसे दृढ़ हविर्धान है। कड़ा रह, ढीला न
पड़।" इस प्रकार वह गाड़ी की स्तुति करता है कि इस प्रकार स्तुत और प्रसन्न गाड़ी से वह
हवि ले सके। “यज्ञपति स्खलित न हो” (यजु० १।६)। यजमान ही यज्ञपति है। यजमान की
दृढ़ता के लिए ही यह प्रार्थना करता है ॥१२॥
(दाहिने पहिये पर से) गाड़ी पर चढ़ता है इस मंत्र से (यजु० १।६)--"विष्णु तुझ पर
१० शतपथ ब्राह्मण
य॒ज्ञो वै विष्णुः स॑ दे॒वेभ्य॑ इ॒मां वि॒क्रान्तिं॒ विच॑क्रमे यैषा॒मियं वि॒क्रान्ति॒रिद॒मेव प्रथ॑-
मेन प॒देन पर्य्याग्रहीद॒मन्तरि॑क्षं द्वि॒तीये॑न दि॒वमुत्त॑मेनैता॒म्वेवैष ए॒तस्मै॑ वि॒ष्णुर्य॒ज्ञो
वि॒क्रान्तिं॒ विक्र॑मते ॥१३॥ अथ प्रेक्ष॑ते । उ॒रु वाता॒येति॑ प्रा॒णो वै वात॒स्तल्ल॑क्ष्णो-
वैतत्प्रा॒णाय वाता॒योरुगायं कु॑रुते ॥१४॥ अथा॒पास्य॑ति । अ॒पह॒तं रक्ष॒ इति य-
द्यत्र किञ्चिदामेध्रं भव॑ति यद्यु ना॒म्येव मृशेत्तन्ना॒ष्ट्रा ए॒वैतद्र॒क्षांस्यतो॒ऽपह॑न्ति
॥१५॥ अथा॒भिपद्य॑ते । यु॒क्तां पञ्चेति पञ्च वाऽइ॒मा अ॒ङ्गुल॑यः पा॒ङ्क्तो वै य॒ज्ञस्त-
द्य॒ज्ञमेवैतदु॑प दधाते ॥१६॥ अथ गृह्णाति । दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्रस॒वेऽश्विनो॒र्बा-
हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ताभ्या॒मग्नये॒ जुष्टं॑ गृह्णामी॒ति सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता तत्स-
वितृप्रसूत ए॒वैतद्गृह्णात्य॒श्विनोर्बा॒हुभ्या॒मित्य॒श्विनाव॑ध्व॒र्यू पू॒ष्णो हस्ताभ्या॒मिति पू॒षा
भागदु॒घोऽन्नं॑ पा॒णिभ्या॒मुप॑निधाता स॒त्यं देवा अ॒नृतं॑ मनु॒ष्या॒स्तत्स॒त्येनैवैतद्गृह्णा-
ति ॥१७॥ अथ दे॒वताया॒ऽआदि॑शति । सर्वा ह वै दे॒वता॑ अध्व॒र्युं ह॒विर्गृहीष्यन्त-
मुप॑तिष्ठन्ते म॒म नाम॑ ग्रहीष्यति म॒म नाम॑ ग्रहीष्यती॒ति ताभ्य ए॒वैतत्सह॑ सती-
भ्यो॒ऽसम॑दं करोति ॥१८॥ य॒द्वेव दे॒वताया॒ऽआदि॑शति । यावती॑भ्यो ह॒ वै दे॒व-
ताभ्यो ह॒वीꣳषि गृह्णन्त्य॑ऽऋणमु है॑व तास्तेन मन्यन्ते यद॒स्मै तं कामꣳ सम॒र्ध-
येयु॒र्यत्काम्या गृह्णाति॒ तस्मा॑द्देवताया॒ऽआदि॑शत्ये॒वमेव यथापूर्वं॑ ह॒वीꣳषि गृ-
हीत्वा ॥१९॥ अ॒थाभि॒मृश॑ति । भू॒ताय॑ त्वा॒ नारा॑तय॒ऽइति तद्य॑त ए॒व गृह्णाति
तद्वैवैतत्पुन॒राप्या॑ययति ॥२०॥ अथ प्राङ्प्रेक्ष॑ते । स्वर॒भिव्य॑ख्येष॒मिति परि॑वृतमिव
वाऽए॒तदनो॒ भव॑ति तद॒स्यैतच्चक्षुः पाप्म॑गृहीतमि॒व भव॑ति य॒ज्ञो वै स्व॒र्हर्देवाः
सूर्य्य॒स्तत्स्व॒रेवैतद॒तोऽभिविप॑श्यति ॥२१॥ अथा॒वरो॑हति । दृꣳहन्तां॒ दुर्याः पृथि॒-
व्यामिति गृहा वै दुर्यास्तै ह्येत ईश्वरो गृहा यज॑मानस्य यो॒ऽस्यैषोऽध्व॑र्युर्य॒ज्ञेन
च॑रति॒ तं प्रय॑न्त॒मनु प्र॒च्योतोस्तस्यैश्व॑रः कुलं वि॒क्षोब्धो॒स्तानिवैतदस्यां॑ पृथि॒व्यां दृꣳ
हति तथा नानुप्रच्यव॑न्ते॒ तथा न वि॒क्षोभ॑न्ते तस्मादाह दृꣳहन्तां दुर्याः पृथिव्या-
कां० १, अ० १, ब्रा० २, कं० १३-२२ शतपथब्राह्मण / ११
चढ़े।” यज्ञ का नाम विष्णु है। यज्ञ ने ही अपने पराक्रम से देवों को पराक्रमयुक्त किया जो
पराक्रम कि देवों में है। पहले पैर से पृथिवी को, दूसरे से अन्तरिक्ष को, तीसरे से द्यौलोक को।
इस यजमान के लिए भी यह विष्णु नामक यज्ञ इस सब पराक्रम को प्राप्त कराता है ॥१३॥
अब वह (चावलों को देखता है और) गाड़ी को सम्बोधन करके इस मन्त्रांश (यजु०
१।६) का जाप करता है— “वायु के लिए खुल।” वायु प्राण है। इस मन्त्र के जाप से वह यजमान
के प्राण को खुली वायु प्रदान करता है ॥१४॥
(अगर चावलों पर कोई तिनका या घास आ जावे तो) इस मन्त्रांश (यजु० १।६) को
पढ़कर उड़ाता है— “राक्षस भाग गया।” यदि न हो, तो भी छू ले और इस मन्त्र को पढ़ ले।
इससे राक्षस दूर भाग जाय ॥१५॥
अब वह चावलों को इस मन्त्रांश (यजु० १।६) को जपकर छूता है— “पांचों इसको ले
लेवें।” ‘पांचों’ का अर्थ है पांच अंगुलियां; यज्ञ को भी पांक्त (पांच वाला) कहते हैं। इस प्रकार
यज्ञ को धारण करता है ॥१६॥
यजु० १।१० के इस अंश को पढ़कर (चावल) लेता है— “देव सविता की प्रेरणा से,
पूषा के दोनों हाथों से अग्नि के लिए तुझको लेता हूँ।” सविता देवों का प्रेरक है। सविता की इसी
प्रेरणा से इसको लेता है, अश्विन की दोनों भुजाओं से। दोनों अध्वर्यु अश्विन हैं। “पूषा के
दोनों हाथों से”, पूषा बांटनेवाला है, जो हाथों से भागों को बांटता है। देव सत्य हैं। मनुष्य
अनृत है। इस प्रकार सत्य के द्वारा ही चावलों को ग्रहण करता है ॥१७॥
अब देवताओं का नाम निर्देश करता है। जब अध्वर्यु हवि देने को होता है तो सभी देव
घिर आते हैं, ‘वह मुझको देगा, वह मुझको देगा’ इस प्रकार सोचकर। इस प्रकार वह आये हुए
देवों में सामञ्जस्य उत्पन्न करता है ॥१८॥
देवों के नामों के निर्देश का एक प्रयोजन यह भी है कि जिन देवताओं के लिए हवि ग्रहण
की जाती है उन देवताओं का यह कर्तव्य हो जाता है कि वे यजमान की इच्छाओं की पूर्ति करें,
इसलिए भी देवताओं का निर्देश करता है। पूर्ववत् देवताओं के लिए निर्देश करके—॥१९॥
वह (बचे हुए चावलों को) यजु० १।११ के इस अंश को जपकर छूता है— “विभूति के
लिए तुझको, न कि शत्रु के लिए।” जितना वह लेता है उतनी ही उसकी पूर्ति कर देता है ॥२०॥
अब (गाड़ी पर बैठकर) पूर्व की ओर देखता है इस मन्त्रांश (यजु० १।११) को जपकर,
“मैं प्रकाश का अवलोकन करूँ।” गाड़ी ढकी होती है, मानो उसकी आंख पापयुक्त है। यज्ञ
प्रकाश है, यज्ञ दिन है, यज्ञ देव है, यज्ञ सूर्य है। इस प्रकार वह प्रकाशरूपी यज्ञ का अवलोकन
करता है ॥२१॥
इस मन्त्रांश (यजु० १।११) को पढ़कर गाड़ी से उतरता है— “दरवाजोंवाले पृथिवी पर
सुदृढ़ रहें।” दरवाजोंवाले घर हैं। जब अध्वर्यु यज्ञ के साथ चलता है तो सम्भव है कि उसके
पीछे यजमान के घर टूट जायें और उसका परिवार नष्ट हो जाय। अतः इस प्रकार यजमान के
घर को भूमि पर सुदृढ़ करता है कि वे टूटें न और परिवार नष्ट न हो। इसलिए वह कहता है,