शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-२, ब्राह्मण-५
लोका॒ अद्धो॑ तद्य॒द्यजु॑स्तस्माच्चि॒र्य्यजु॑षा ह॑रति ॥२०॥ तूष्णीं॑ चतु॒र्थम् । स यदि॒मां-
ल्लोका॒नति॑ चतु॒र्थम॑स्ति वा॒ न वा॒ तेनै॒वैतद्वि॒षन्तं॒ भ्रातृ॑व्यमवबाधते॒ऽनद्धा॒ वै तद्य॒-
दि॒मांल्लोका॒नति॑ चतु॒र्थम॑स्ति वा॒ न वा॒नद्धो॒ तद्य॒त्तूष्णीं॒ तस्मा॑त्तू॒ष्णीं चतु॑र्थम् ॥२१॥
ब्राह्मणम् ॥२[४]॥
दे॒वाश्च॒ वाऽअ॑सुराश्च । उ॒भये॑ प्राजाप॒त्याः प॑स्पृधिरे॒ ततो॑ दे॒वा अनु॑व्यमिवा-
सु॒रय॒ ह्वासु॑रा मेनिरे॒ऽस्माक॑मे॒वेदं खलु॒ भुव॑नमिति ॥१॥ ते होचुः । हन्ते॒मां पृ॑-
थि॒वीं विभ॑जामहै॒ तां विभ॒ज्योप॑जीवा॒मेति॒ तामौ॒द्गोश्चर्म्म॑भिः पश्चा॒त्प्राञ्चो॒ विभ॑ज-
माना अभीयुः ॥२॥ तद्धे देवाः॑ शुश्रु॒वुः । विभ॑जन्ते ह॒ वाऽइ॒मामसु॑राः पृथि॒वीं
प्रेत॒ तदे॑ष्यामो॒ यत्रे॒मामसु॑रा विभ॑जन्ते॒ के ततः॑ स्याम॒ यद॑स्यै॒ न भजे॑महीति॒ ते
य॒ज्ञमे॒व विष्णुं॑ पुर॒स्कृत्ये॑युः ॥३॥ ते होचुः । अनु॑ नो॒ऽस्यां पृ॑थिव्या॒माभ॑जत॒स्त्वेव॑
नो॒ऽप्यस्यां॑ भाग॒ इति॒ ते ह्वासु॑रा असूयन्त-इ॒वोचु॒र्य्याव॑दे॒वैष विष्णुर॒भिशेते॒ ताव॑द्वो
दद्म॒ इति॑ ॥४॥ वाम॒नो ह॒ विष्णुरा॑स । तद्दे॒वा न जि॑हीडिरे म॒हद्वै नो॑ऽदु॒र्य्ये नो॑
य॒ज्ञसं॑मितम॒दुरिति॑ ॥५॥ ते प्राचं॒ विष्णुं॑ नि॒पाद्य॑ । छ॒न्दोभि॑र॒भितः॒ पर्य्य॑गृह्णन्ग़ा॒यत्रे॑ण
त्वा छन्द॑सा॒ परि॑गृह्णामीति॒ दक्षि॑णतस्त्रै॒ष्टुभेन॑ त्वा॒ छन्द॑सा॒ परि॑गृह्णामीति प॒श्चाज्जा॑-
ग॒तेन॑ त्वा॒ छन्द॑सा॒ परि॑गृह्णामी॒त्युत्त॑रतः ॥६॥ तं छन्दो॑भि॒रभि॑तः॒ परि॑गृह्य । अ॒ग्निं
पु॒रस्ता॑त्स॒माधा॑य तेना॑र्च॒न्तः श्राम्य॑न्तश्चेरू॒स्तेने॒मां सर्वां॑ पृथि॒वीं स॑मविन्दन्त॒ तय्-
द्ये॑नै॒नेमाꣳ सर्वां॑ सम॒विन्द॑न्त॒ तस्मा॑द्वे॒दिर्न्ना॑म॒ तस्मा॑दाहुर्य्याव॑ती वे॒दिस्ता॑वती पृथि॒-
वीत्ये॑तया॒ ह्ये॑माꣳ सर्वां॑ समा॒विन्द॑न्तै॒वꣳ ह॒ वाऽइ॒मां सर्वां॑ स॒पत्नौ॑नाꣳ सं॒वृङ्क्ते॑
नि॒र्ब्भ॑ज॒त्यस्यै॑ स॒पत्नौ॒न्य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥७॥ सो॒ऽयं विष्णुर्ग्ग्लानः॑ । छन्दो॑भि॒रभि॑तः प॒-
रि॒गृही॑तो॒ऽग्निः पु॒रस्ता॒न्नाप॑क्रमणमास स तत॑ ए॒वौष॑धीनां मू॒लान्युप॑मुम्लोच ॥८॥
ते ह॒ देवा॑ ऊचुः॒ । क्वा नु विष्णुर॑भू॒त्क्वा नु य॒ज्ञोऽभू॒दिति॑ ते होचुश्छन्दो॑भि॒रभि॑तः
प॒रि॒गृही॑तो॒ऽग्निः पु॒रस्ता॒न्नाप॑क्रमणम॒स्त्यत्रै॒वान्वि॑च्छतेति॒ तं खन॑न्त-इवा॒न्वीषु॒स्तं
कां० १, अ० २, ब्रा० ५, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / ३६
को दबाता है। जो ये तीन लोक हैं वही वास्तव में ये यजुः हैं। इसलिए यह इस प्रकार यजुः-
मन्त्र पढ़कर फेंकता है ॥२०॥
चौथी बार चुपचाप। इन लोकों से परे कोई चौथा लोक है नहीं। उस लोक से उस शत्रु
को भगा देता है। यह नहीं निश्चित कि इन तीन लोकों से आगे कोई चौथा लोक है या नहीं।
और जो मौन होकर किया जाय वह भी अनिश्चित ही है। इसलिए वह चौथी बार मौन होकर
फेंकता है ॥२१॥
अध्याय २—ब्राह्मण ५
प्रजापति की दो सन्तान देव और असुर अपने महत्त्व के लिए लड़ पड़े। देव हार गये।
असुरों ने सोचा, 'अब तो यह जगत् हमारा ही हो गया' ॥१॥
उस पर उन्होंने कहा—"अच्छा, इस पृथिवी को परस्पर बाँट लें और उस पर बस
जायें।" अब उन्होंने उसको बैल के चमड़े से पश्चिम से पूर्व तक बाँटा ॥२॥
देवों ने सुना और कहा—"अरे, असुर तो पृथिवी को वास्तव में बाँट रहे हैं। चलो, वहाँ
चलें जहाँ बाँट हो रहा है। यदि हमको कोई भाग न मिला तो हम क्या करेंगे?" विष्णु अर्थात्
इस यज्ञ को अपना नेता बनाकर वे वहाँ गये ॥३॥
उन्होंने कहा—"अपने साथ हमको भी कुछ बाँट दो। हमारा कुछ तो भाग हो!" असुरों
ने संकोच करते हुए कहा—"अच्छा हम तुमको केवल इतना भाग देते हैं जितने में यह विष्णु लेट
सके" ॥४॥
विष्णु तो वामन था। परन्तु देवों को भय नहीं हुआ। उन्होंने कहा—"इस यज्ञ-भर को
यदि स्थान मिल गया तो बहुत मिल गया" ॥५॥
उन्होंने उस विष्णु या यज्ञ को पूर्व की ओर लिटाकर तीन ओर से छन्दों से घेर दिया
(यजु० १।२७)—दक्षिण की ओर 'गायत्री छन्द से तुझे घेरता हूँ', पश्चिम की ओर 'त्रिष्टुभ् छन्द
से तुझे घेरता हूँ', उत्तर की ओर 'जगती छन्द से तुझे घेरता हूँ' ॥६॥
इस प्रकार तीन ओर छन्दों से घेरकर, पूर्व की ओर अग्नि को रखकर देव अर्चना और
श्रम करते रहे। इस प्रकार होते-होते समस्त पृथिवी ले ली। सब पृथ्वी ले ली, इसलिए इसका
नाम वेदी पड़ा। इसीलिए कहते हैं कि जितनी वेदी उतनी पृथिवी, क्योंकि इसी वेदी के द्वारा
उन्होंने पृथिवी जीत ली। जो इस रहस्य को समझता है वह इसी प्रकार समस्त पृथिवी को अपने
शत्रुओं से छीन लेता है और उनको उसमें भाग नहीं देता ॥७॥
अब विष्णु थक गया। तीनों ओर से छन्दों द्वारा ढका हुआ था और पूर्व की ओर अग्नि
था। अतः वहाँ से भाग न सकता था। इसलिए वह ओषधियों की जड़ों में छिप गया ॥८॥
देव कहने लगे—"विष्णु कहाँ गया ? यज्ञ कहाँ गया ? वह तो छन्दों द्वारा तीनों ओर
और पूर्व की ओर अग्नि द्वारा घिरा हुआ था। भाग तो सकता नहीं। उसको यहीं खोजना
चाहिए।" कुछ खोदा ही था कि वह मिल गया। केवल तीन अंगुल नीचे। इसलिए वेदी को तीन
४० शतपथ ब्राह्मण
त्र्य॒ङ्गुले॒न्ववि॑न्दं॒स्तस्माच्च॒त्र्यङ्गुला वेदि॑ः स्यात्त॒द्ध ह्यपि॑ पाश्चि॒त्त्र्यङ्गुलमिव॑ सौम्यस्या-
ध्व॒रस्य॒ वेदिं॑ चक्रुः ॥ ९॥ तदु॒ तथा॒ न कु॒र्यात् । ओष॑धीनां वै स मू॒लान्युपो॑ह्रो-
च्चत्तस्मा॒दोष॑धीनामिव मू॒लान्युक्रे॒त्तवै॑ ब्रूयाद्य॒न्त्वेवात्र॑ वि॒त्तुमन्व॑विन्दंस्तस्मा॑द्दि॒र्दिना-
म ॥ १०॥ तम॒नुवि॒द्योत्त्त॑रेण परि॒ग्रहे॑ण पर्य॑गृह्णन् । सुग्न्धा चासि॒ शिवा॒ चासीति॑
दक्षि॑णत इ॒मामे॒वैतत्पृ॑थि॒वीꣳ संवि॒द्य सु॒ग्न्धाꣳ शिवाम॑कुर्वत स्यो॒ना चा॑सि सुष॒दा
चासी॑ति प॒श्चादि॒मामे॒वैतत्पृ॑थि॒वीꣳ संवि॒द्य स्यो॒नाꣳ सुष॒दाम॑कुर्वतो॒र्जस्व॑ती चा॑सि
पय॑स्वती चेत्युत्त॑रत इ॒मामे॒वैतत्पृ॑थि॒वीꣳ संवि॒द्य र॑सवतीमुपजी॒वनी॑यामकुर्वत
॥ ११॥ स वै त्रिः पूर्वं परि॒ग्रहं॒ परि॑गृह्णाति । त्रिरुत्त॑रं॒ तत्षट् कृ॒त्वः षड्वाऽऋ॒तवः॑
सं॑वत्स॒रस्य॑ संवत्स॒रो य॒ज्ञः प्र॒जाप॑तिः स यावा॒नेव॑ य॒ज्ञो याव॑त्यस्य मा॒त्रा ताव॑त-
मे॒वैतत्परि॑गृह्णाति ॥ १२॥ षड्भि॒र्व्याहृ॑तिभिः । पूर्वं परि॒ग्रहं॒ परि॑गृह्णाति षड्भि॒रु-
त्तरं॒ तद्द्वाद॑श कृ॒त्वो द्वाद॑श वै मासाः सं॑वत्स॒रस्य॑ संवत्स॒रो य॒ज्ञः प्र॒जाप॑तिः स या-
वा॒नेव॑ य॒ज्ञो याव॑त्यस्य मा॒त्रा ताव॑तमे॒वैतत्परि॑गृह्णाति ॥ १३॥ व्याममा॒त्री प॒श्चा-
त्स्यादित्याहुः । ए॒तावा॒न्वॆ पुरु॑षः पुरु॑षसंमिता हि य॒ज्ञस्तिः प्राची त्रिवृ॑द्धि य॒ज्ञो
नात्र मा॒त्रास्ति॒ याव॑तीमे॒व स्वयं मन॑सा म॒न्येत॒ ताव॑तीं कुर्यात् ॥ १४॥ अ॒भि-
तोऽग्निमं॑सा॒ऽउन्न॑यति । योषा॒ वै वेदि॑र्वृषा॒ग्निः परि॑गृह्य वै योषा॒ वृषाणꣳ शेते
मि॑थु॒नमे॒वैतत्प्र॒जन॑नं क्रियते तस्मा॑द॒भितो॑ऽग्निमं॑सा॒ऽउन्न॑यति ॥ १५॥ सा वै प॒श्चा-
द्वरी॑यसी स्यात् । मध्ये॑ सं॒ग्राह्या॑ पुन॑ः पु॒रस्ता॑दु॒र्व्येवमिव हि योषां॑ प्रशं॑सन्ति
पृ॒थुश्रोणिर्विमृ॑ष्टा॒न्तरांसा॒ मध्ये॑ सं॒ग्राह्येति॑ जु॒ष्टमे॒विनाम॑तद्दे॒वेभ्यः॑ करोति ॥ १६॥
सा वै प्राक्प्रव॑णा स्यात् । प्राची॒ हि दे॒वानां॒ दिगथो॑ऽउदक्प्रव॑णोदीची॒ हि म-
नुष्या॑णां॒ दिग्द॑क्षिणतः पु॒रीषं॑ प्रत्युद्द्रुत्येषा वै दिग्पितॄणाꣳ सा यद्द॑क्षिणाप्रव॑णा
स्यात् क्षि॒प्रे ह॒ यज॑मानोऽमुं लो॒कमिया॒त्तथो ह॒ यज॑मानो ज्योङ्जी॑वति॒ तस्मा॑द्-
क्षिणतः॑ पु॒रीषं॒ प्रत्युद्द्रुह॑ति पुरीषव॒तीं कु॑र्वीत प॒शवो॒ वै पुरी॑षं प॒शुमती॑मे॒वैना-
कां० १, अ० २, ब्रा० ५, कं० ६-१७ शतपथब्राह्मण / ४१
अंगुल नीचे होना चाहिए। तदनुसार ही 'पाञ्चि' ने सोमयाग की वेदी तीन अंगुल गहरी ही
रखी थी ॥६॥
किन्तु ऐसा न करे। यतः उन्होंने ओषधियों के मूल में यज्ञ को पाया, अतः (अध्वर्यु
अग्नीध्र से कहे कि) ओषधियों की जड़ें काट दो। यतः वहाँ यज्ञ को पाया, इसलिये (विद् लाभे
धातु से बनकर) इसका नाम वेदि पड़ा ॥१०॥
अब उन्होंने उसको फिर घेर दिया। दक्षिण का घेरा बनाते हुए कहा (यजु० १।२७) —
“तू सुक्ष्मा (अच्छी भूमि) और शिवा (कल्याणी) है।” इस प्रकार इस पृथिवी को सुक्ष्मा और
शिवा बना दिया। पश्चिम की ओर घेरा बनाकर कहा— “तू स्योना(सुखदा)और सुषदा (अच्छा
आसन) है।” (यजु० १।२७) इस प्रकार उसको स्योना, सुषदा बना दिया। उत्तर की ओर घेरा
बनाकर कहा(यजु० १।२७)—“तू ऊर्जस्वती(अन्न वाली)और पयस्वती (दूध या रस वाली)
है। इस प्रकार उस भूमि को रसवती और बसने योग्य बना दिया ॥११॥
पहले तीन रेखाओं का घेरा बनाता है, फिर तीन का। इस प्रकार छः हुए। ऋतुएं छः
हैं, संवत्सर यज्ञ प्रजापति है। जितना बड़ा यज्ञ, उतनी उसकी मात्रा, उतना ही उसको घेरता
है ॥१२॥
पहला घेरा बनाने में छः व्याहृतियां पढ़ता है, और दूसरे में छः। इस प्रकार बारह
हुईं। महीने बारह होते हैं। संवत्सर यज्ञ प्रजापति हैं, इसलिये जितना बड़ा यज्ञ, जितनी उसकी
मात्रा, उतना ही बड़ा उसको बनाता है ॥१३॥
कुछ लोग कहते हैं कि पश्चिम की ओर उसकी लम्बाई 'व्याम मात्री' (मनुष्य की देह के
बराबर) होनी चाहिए, क्योंकि पुरुष इतना ही लम्बा होता है। पूर्व की ओर तीन हाथ, क्योंकि
यज्ञ त्रिवृत् है। परन्तु यहाँ कोई मात्रा निश्चित नहीं है। जितना मन आवे उतना रख लेवे ॥१४॥
वेदी की दो भुजाओं को आहवनीय अग्नि के दोनों ओर आगे तक ले जाते हैं। वेदी स्त्री
है। अग्नि पुरुष हैं। स्त्री पुरुष को दोनों भुजाओं से लपेटकर सोया करती है। इस प्रकार वेदी
की दोनों भुजाओं को अग्नि के दोनों ओर बढ़ाकर मानो वह उन स्त्री-पुरुषों का सन्तानोत्पत्ति
के लिए सम्पर्क करा देता है ॥१५॥
वेदी पश्चिम में चौड़ी, बीच में तंग और पूर्व में फिर चौड़ी होनी चाहिये। इसी प्रकार
की स्त्री अच्छी समझी जाती है-नीचे का भाग भारी, कन्धों के निकट कुछ कम चौड़ी और कमर
पर पतली। इस प्रकार वह इसको देवों की दृष्टि में प्रिय बना देता है ॥१६॥
वह पूर्व की ओर ढालू होनी चाहिए, क्योंकि पूर्व देवों की दिशा है। पश्चिम की ओर भी
ढालू होनी चाहिए, क्योंकि पश्चिम मनुष्यों की दिशा है। कूड़े को दक्षिण की ओर हटा देता है,
क्योंकि दक्षिण पितरों की दिशा है। यदि दक्षिण की ओर ढालू हो तो यजमान शीघ्र ही परलोक
को सिधार जायगा। ऐसा करने से यजमान बहुत जीता है। इसलिए कूड़े को दक्षिण की ओर
हटा देते हैं। पशु ही कूड़ा हैं। इस प्रकार वह वेदी को पशु-सम्पन्न कर देता है ॥१७॥
४२ शतपथ ब्राह्मण
मेतत्कुरुते ॥ १७॥ तां प्र॑ति॒मार्ष्टि । दे॒वा ह॒ वै सं॒ग्राम॒ꣳ सं॒निधा॑स्यन्तस्ते॒ होचु॒र्हन्त॑
यद॒स्यै पृ॑थि॒व्याऽअ॒नामृ॑तं देव॒यज॑नं॒ तच्च॒न्द्रम॑सि नि॒दधा॑महै॒ स यदि॑ न॒ऽइतो॒ऽसुरा॑
ज॑येयु॒स्तत॑ ए॒वार्च॑न्तः॒ शाम्य॑न्तः॒ पुन॑रभि॒भवे॑मेति॒ स यद॒स्यै पृ॑थि॒व्याऽअ॒नामृ॑तं दे॒व-
यज॑नमासी॒त्तच्च॒न्द्रम॑सि न्यदध॒त तदे॒तच्च॒न्द्रम॑सि कृ॒ष्णं तस्मादाहुर॒श्चन्द्रम॑स्यस्यै पृ॑थि॒व्यै
दे॒वयज॑न॒मित्यपि॑ ह॒ वाऽअ॒स्यैतस्मि॑न्दे॒वयज॑न॒ऽइष्टं भवति॒ तस्मा॑द्धि प्र॑ति॒मार्ष्टि
॥ १८॥ स प्र॑ति॒मार्ष्टि । पुरा क्रूरस्य॑ वि॒सृपो॑ विर॒प्शिनि॒ति सं॒ग्रामो वै क्रू॒रꣳ सं॑-
ग्रामे॒ हि क्रूरं क्रि॒यते॑ ह॒तः पुरु॑षो ह॒तोऽश्वः॒ शेते॑ पु॒रा ह्ये॑त॑त्सं॒ग्रामा॒न्न्यद॑धत॒ त-
स्मादाह पु॒रा क्रू॒रस्य॑ वि॒सृपो॑ विर॒प्शिनि॒त्युदादाय॑ पृथि॒वीं जी॒वदा॑नु॒मित्यु॒दादाय॑ हि
यद॒स्यै पृ॑थि॒व्यै जी॒वमासी॒त्तच्च॒न्द्रम॑सि न्य॑दध॒त तस्मा॑दा॒होदादाय॑ पृथि॒वीं जी॒वदा॑-
नु॒मिति॒ यामेरय॑ꣳश्च॒न्द्रम॑सि स्व॒धाभि॒रिति॒ यां च॒न्द्रम॑सि ब्रह्मणा॒दधु॒रित्ये॒वैतदा॑ह॒
तामु धीरा॑सो॒ऽअनु॑दिश्य यजन्त॒ऽइत्ये॒तेनो॑ ह॒ तामनु॑दिश्य यजन्त॒ऽपि॑ ह॒ वाऽअ॒स्यै-
तस्मि॑न्दे॒वयज॑न॒ऽइष्टं भव॑ति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥१९॥ अथाहा प्रो॒क्षणी॒रासा॑द॒येति॑ ।
वज्रो॒ वै स्फ्यो ब्रा॑ह्म॒णस्त्वं पुरा य॒ज्ञम॒भ्यनू॑त॒द्गुप॑तां वज्रो वाऽआप॒स्तद्ब्रह्मै॒वैतद॒भि-
गु॒प्त्याऽऽसा॑दयति स वा॒ऽउपर्य्युपर्य्येव प्रो॒क्षणी॑षु धार्य्यमा॒णास्वथ॑ स्फ्यमु॒द्यच्छे॒त्यथ॑
यन्निहि॑तऽएव॒ स्फ्ये प्रो॒क्षणी॒रासा॑दयेद्व॒ज्रौ ह॒ समृ॑द्धेयातां॒ तथो॑ ह॒ वज्रौ न समृ॑द्धेते
त॒स्मादु॒पर्य्युपर्य्येव प्रो॒क्षणी॑षु धार्य्यमा॒णास्वथ॑ स्फ्यमु॒द्यच्छ॑ति ॥ २०॥ अथैतां वाचं वद-
ति । प्रो॒क्षणी॒रासा॑दये॒ध्मं ब॒र्हिरुप॑सादय स्रुचः॒ संमृ॑ड्ढि॒ पत्नीं संन॑ह्याज्ये॒नोदे॒हीति॑
संप्रैष॒ ए॒वैष स यदि॑ कामयेत ब्रूयादेतद्यद्यु कामयेतापि नाद्रियेत स्व॒यमु ह्येवैत-
द्दे॒देद॒मतः॒ कर्म॒ कर्त॒व्यमि॑ति ॥ २१॥ अथोद॒ञ्चꣳ स्फ्यं प्रह॑रति । अ॒मुष्मै॑ त्वा व॒ज्रं
प्रह॑रा॒मीति॑ यद्य॒भिच॑रेद्व॒ज्रो वै स्फ्य स्स्तृणु॑ते॒ ह्यैवैने॑न ॥ २२॥ अथ पाणी॒ऽअ-
वनेनिक्ते । य॒द्यस्यै क्रूरमभूत्त॒द्व्यस्याऽए॒तद॒हार्षीतस्मात्पाणी॒ऽअव॑नेनिक्ते ॥ २३॥
स ये ह्यग्र॒ऽईजिरे॑ । ते॒ ह स्मावम॒र्शं य॑जन्ते ते पापी॑याꣳस आसुरथ॒ ये ने-
कां० १, अ० २, ब्रा० ५, कं० १८-२४ शतपथब्राह्मण / ४३
(वेदी को पूर्व से पश्चिम की ओर अग्नीध्र ) लीप देता है। जब देव संग्राम की तैयारी
कर रहे थे तो वे बोले- "इस पृथिवी का जो कुछ भाग यज्ञ के योग्य हो उसे चन्द्रलोक को ले चलें।
यदि असुरों ने जीतकर हमको भगा दिया तो हम अर्चना और परिश्रम द्वारा फिर वैभव प्राप्त
कर सकेंगे। इसने भी पृथिवी का जो पवित्र यज्ञ के योग्य भाग था उसको चन्द्रलोक के अर्पण कर
दिया। चांद के काले धब्बे यही हैं। इसीलिये कहावत है कि चन्द्रलोक में इस पृथिवी का यज्ञ-स्थान
है। देवयज्ञ इसी पृथिवी पर उसी वेदी के स्थान में किया जाता है। अतः वह वेदी को लीपता
है ॥१८॥
यजुर्वेद (१।२८) के इस अंश को पढ़कर लीपता है— "हे शक्तिमान् ! इधर-उधर गति
करते हुए क्रूर के पहले।" क्रूर नाम है संग्राम का। संग्राम में बहुत क्रूरता की जाती है। इसमें
बहुत-से मनुष्य, अश्व आदि मरकर धराशायी हो जाते हैं। वे संग्राम से पहले ही पृथिवी के यज्ञ
वाले भाग को चन्द्रलोक को ले गये थे, इसीलिये कहा, 'हे शक्तिशालीन् ! इधर-उधर हिलते हुए
क्रूर से पूर्व।' फिर कहता है— "जीवन देनेवाली भूमि को उठाकर।" इस पृथिवी पर जो जीवन
था उसको उठाकर ही चन्द्रलोक को ले गये थे। इसीलिये कहा, 'जीवन देनेवाली भूमि को उठा-
कर', 'जिसको स्वधाओं के साथ चन्द्रलोक को ले गये', अर्थात् प्रार्थनाओं (ब्रह्म) के साथ।
'बुद्धिमान् लोग अब भी इसी भूमि का अनुदेश करके यज्ञ करते हैं'; अपने यज्ञ को वे इसी भूमि
पर करते हैं। जो इस रहस्य को समझता है उसका यज्ञ भी यहीं होता है ॥१९॥
अब वह (अध्वर्यु) (अग्नीध्र से) कहता है (यजु० १।२८)-"प्रोक्षणी पात्र को (वेदी
में) रक्खो।" स्फ्यारूपी वज्र ने और ब्राह्मण ने अब तक यज्ञ की रक्षा की। जल भी तो वज्र है।
अब इस वज्र को रक्षा के लिए रखता है। प्रोक्षणी को स्फ्या पर रखते समय पहले वह स्फ्या को
उठा लेता है। यदि स्फ्या रक्खी रहे और उस पर प्रोक्षणी रक्खी जाय तो दो वज्र परस्पर टकरा
जायें। ये वज्र न टकराने पावें इसीलिये प्रोक्षणी को स्फ्या पर रखने से पूर्व स्फ्या को उठा लेता
है ॥२०॥
अब इस (पूर्ण) वाणी को बोलता है— "प्रोक्षणी को वेदी में रक्खो। उसी के पास समिधा
और बर्हि भी रक्खो। स्रुक् को माँजो, पत्नी की कमर को कसो और घी लेकर यहाँ आओ।" ये
आदेश (अग्नीध्र के लिए) हैं। अध्वर्यु का जी चाहे तो इसको कहे, जी चाहे न कहे। क्योंकि
अग्नीध्र तो जानता ही है कि क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए ॥२१॥
अब वह स्फ्या को उत्तर की ओर कूड़े पर फेंक देता है। यदि वह किसी शत्रु को मारने
के अभिप्राय से फेंके तो उसको कहना चाहिए कि 'मैं अमुक-अमुक शत्रु के नाश के लिए वज्र
फेंकता हूँ।' यह स्फ्या वज्र के समान ही शत्रु की घातिनी होगी ॥२२॥
अब वह हाथ धोता है। वेदी में जो कुछ क्रूर था उसको फेंक दिया। अतः हाथ धोता
है ॥२३॥
जिन्होंने पहले यज्ञ किया था उन्होंने यज्ञ करते हुए वेदी छली। यह पापकर्म था। जिन्होंने