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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-७, ब्राह्मण-४

१४६ शतपथ ब्राह्मण
का॒ तेऽन॒मति॒त्यभि॑त ए॒व मा॒ परि॑स्तृणी॒युरि॑ति॒ तस्मा॑दे॒तद॒ग्निम॑भि॒तः परि॑स्तृणन्ति
तृ॒ष्णायै॒ वै बि॑भेमीति॒ का ते॑ तृप्ति॒रिति॑ ब्राह्म॒णस्ये॑व तृप्ति॒मनु॑तृप्येय॒मिति॒ तस्मा॑-
त्सं॑स्थिते य॒ज्ञे ब्रा॑ह्म॒णं त॑र्पयित॒वै ब्रू॑याद्य॒ज्ञमे॒वैतत्त॑र्पयति ॥ २८ ॥ ॥ ब्राह्मणम् ॥
१ [७. ३.] ॥ ॥
प्र॒जाप॑तिर्ह॒ वै स्वां दु॑हि॒तर॑मभिद॒ध्यौ । दि॒वं वो॒षसं॑ वा मिथु॒न्येना॑या स्यामि॒-
ति ताꣳ सं॑बभूव ॥ १ ॥ तद्धै दे॒वाना॒माग॑ आस । य इ॒त्थꣳ स्वां दु॑हि॒तर॑मस्माकं॒
स्वसा॑रं करो॒तीति॑ ॥ २ ॥ ते ह॒ देवा॑ ऊचुः । योऽयं दे॒वः प॑शूना॒मीष्टे॑ऽति॒संधं॑ वा
ऽअय॑ चरति॒ य इ॒त्थꣳ स्वां दु॑हि॒तर॑मस्माकं॒ स्वसा॑रं करो॒ति वि॒ध्येम॒मिति॒ तꣳ
रु॒द्रोऽभ्या॒यत्य॑ विव्याध॒ तस्य॑ सा॒मि रेत॑: प्रचस्कन्द॒ तथै॒तन्नू॒नं त॒दास॑ ॥ ३ ॥ तस्मा॑दे-
तदृषि॒णाभ्य॑नूक्तम् । पि॒ता यत्स्वां दु॑हि॒तर॒मधि॒ष्कन् क्ष्म॒या रेत॑: संजग्मा॒नो निषि॑-
ञ्च॒दिति॑ तदाग्निमारु॒तमित्यु॒क्त्यं॒ तस्मिं॒स्तद्व्या॒ख्याय॑ते॒ यथा॒ तद्दे॒वा रेत॑: प्राज॑नयं॒स्तेषां॑
य॒दा दे॒वानां॑ क्रो॒धो व्यै॒दथ॑ प्रजा॒पति॑मभिषज्यं॒स्तस्य॒ तꣳ श॒ल्यं निर॑कृन्त॒न्त्स वै य॒ज्ञ
ए॒व प्र॒जाप॑तिः ॥ ४ ॥ ते हो॑चुः । उप॑जानीत॒ यथे॒दं नामु॒यासत्क॒नीयो॒ ह्यङ्गैत॑र्य॒थे-
दꣳ स्या॒दिति॑ ॥ ५ ॥ ते हो॑चुः । भगा॑यैनद्दक्षिण॒त आसी॑नाय॒ परि॑हरत॒ तद्भग॑: प्रा-
शि॒ष्यति॒ तथ्याथा॑ऽङ्गतमे॒वं भ॑वि॒ष्यती॑ति॒ तद्भगा॑य दक्षिण॒त आसी॑नाय॒ पर्या॑जह्रु॒स्तद्-
गोऽवेक्षां॑ चक्रे तस्या॒क्षिणी॑ निर्ददाह॒ तथै॒तन्नू॒नं त॒दास॒ तस्मा॑दाहुरद॒न्तो भग॒ इति॑
॥ ६ ॥ ते हो॑चुः । नो न्वे॒वात्रा॑शमत्पू॒ष्ण ऽएनत्परि॑हर॒तेति॒ तत्पू॒ष्णे पर्या॑जह्रु॒स्तत्पूषा॒
प्राश॒ तस्य॒ दतो॒ निर्ज॑घान॒ तथै॒तन्नू॒नं त॒दास॒ तस्मा॑दाहुरद॒न्तः पू॒षेति॒ तस्मा॒द्यं पू॒ष्णे
च॒रुं कुर्व॑न्ति प्रपि॒ष्टाना॑मे॒व कुर्व॑न्ति यथाद॒न्तक॑यै॒वम् ॥ ७ ॥ ते हो॑चुः । नो न्वे॒वा-
त्राश॑मद्बृह॒स्पतय॑ ऽएनत्परि॑हर॒तेति॒ तद्बृह॒स्पत॑ये॒ पर्या॑जह्रुः स॒ बृह॒स्पति॑: सवि॒तार॑-
मे॒व प्रस॒वायोपा॑धावत्सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒तेदं मे॑ प्रसु॒वीति॒ तद॑स्मै सवि॒ता
प्र॒सवि॒ता प्रासु॑वत्त॒देनꣳ॑ सवि॒तृप्र॑सूतं॒ नाहि॑न॒त्ततो॒ऽर्वाची॑नꣳ शा॒न्तं तदे॒तन्निदा॑नेन

कां० १, अ० ७, ब्रा० ४, कं० १-८ शतपथब्राह्मण / १४७
क्या है ?' (उसने उत्तर दिया) 'मेरे चारों ओर कुशा दो।' इसलिए यज्ञ के चारों ओर कुश बिछाते
हैं। (यज्ञ ने कहा), 'मुझे प्यास से डर लगता है।' (उन्होंने पूछा) 'तेरी तृप्ति कैसे होती है?'
(उसने उत्तर दिया) 'ब्राह्मण की तृप्ति से मेरी तृप्ति होती है।' इसलिए यज्ञ की समाप्ति के
पश्चात् ब्राह्मण की तृप्ति करने के लिए बोलना चाहिए, क्योंकि इससे यज्ञ की तृप्ति होती
है ॥२८॥
अध्याय ७—ब्राह्मण ४
प्रजापति अपनी लड़की अर्थात् द्यौ या उषा पर मोहित हो गये और प्रसंग की इच्छा हुई;
उससे प्रसंग किया ॥१॥
देवों के लिए यह पाप था कि यह अपनी ही लड़की, हमारी बहिन के साथ ऐसा करता
है ॥२॥
उन देवों ने उस देव से जो पशुओं का अधिष्ठाता (रुद्र) है कहा कि यह जो पाप करता
है कि अपनी ही लड़की, हमारी बहिन के साथ ऐसा करता है, उसको बांध दो। रुद्र ने निशाना
ताककर उसे बींध दिया। उसका आधां वीर्य गिर पड़ा। यह ऐसे हुआ ॥३॥
इसीलिए ऋषि ने ऐसा कहा, 'जब पिता ने अपनी ही लड़की से प्रसंग किया तो उसका
वीर्य भूमि पर गिर पड़ा' (ऋग्वेद १०।६१।७)। यह अग्नि-मारुत् उक्थ (गीत) हो गया। इसी
सम्बन्ध में आख्यायिका है कि किस प्रकारदेवों ने इस वीर्य को उपजाया। जब देवों का क्रोध कम
हुआ तो प्रजापति का इलाज किया और उस (रुद्र) का तीर निकाला, क्योंकि यज्ञ ही प्रजापति
है ॥४॥
उन्होंने कहा, 'कोई ऐसा उपाय सोचना चाहिए कि यह (यज्ञ अर्थात् प्रजापति के शरीर
का वह भाग जो तीर से छिद गया था) नष्ट न हो जाय। छोटी-सी आहुति से यह काम कैसे
हो ? ॥५॥
उन्होंने कहा, 'दक्षिण की ओर बैठे हुए 'भग' के पास इसे ले जाओ। भग इसको खा
लेगा। यह आहुति दिये हुए के समान हो जायगा।' बस वे उसको दक्षिण की ओर बैठे हुए भग
के पास ले गये। भग ने उसकी ओर देखा। उसने (भग की) आँखें जला दीं। ऐसा ही हुआ।
इसीलिए कहते हैं कि भग अन्धा है ॥६॥
उन्होंने कहा, 'यह अभी शान्त नहीं हुआ। इसको पूषा के पास ले जायेंगे।' वे पूषा के
पास ले गये। पूषा ने उसे चखा। उसने (पूषा का) दाँत तोड़ दिया। यह ऐसा ही हुआ।
इसीलिए कहते हैं कि पूषा (अदन्तक) बिना दाँतवाला है। इसीलिए पूषा के लिए जो चरु बनाते
हैं वह पिसे हुए अन्न की बनाते हैं जैसे बिना दाँतवालों के लिए बनाया जाता है ॥७॥
उन्होंने कहा, 'वह अभी शान्त नहीं हुआ। बृहस्पति के पास इसे ले जाओ।' ये बृहस्पति
के पास ले गये। बृहस्पति ने सविता के पास प्रसव (प्रेरणा) के लिए भेज दिया। सविता ही देवों
का प्रेरक (प्रसविता) है। उसने कहा, 'इसकी मुझे प्रेरणा करो।' प्रेरक सविता ने उसकी उसके
लिए प्रेरणा की। चूंकि वह सविता से प्रसूत अर्थात् प्रेरित हुआ था, इसीलिए उसने सविता को
हानि नहीं पहुँचाई। इसीलिए अब वह शान्त हो गया। निदान में यह वही है जो प्राशित्र (पहला

यत्प्राशित्रग्ं ॥८॥ स यत्प्राशित्रमवद्यति । य॒दे॒वात्रावि॑द्धं य॒ज्ञस्य॒ यद्रुद्रियं॒ तद्दे॒वैत-
न्निर्मिमी॒तेऽथाप॑ उप॒स्पृश॑ति॒ शान्ति॒राप॒स्तद॒द्भिः श॑मयत्यथे॒डां प॒शून्त्स॒मव॑द्यति ॥९॥
स वै यावन्मा॒त्रमि॑वै॒वाव॑द्येत् । तथा शल्यः प्र॒च्यव॑ते॒ तस्मा॒द्यावन्मा॒त्रमि॑वै॒वाव॑-
द्ये॒दन्यत॑र॒तऽआ॒ज्यं कुर्यादध॒स्ताद्बोपरि॑ष्टाद्वा तथा खदु॒न्निःस॑रणवद्भवति॒ तथा॒ नि-
स्रव॑ति॒ तस्मा॑दन्यत॒रत॒ आज्यं॑ कुर्यादध॒स्ताद्बोपरि॑ष्टाद्वा ॥१०॥ स आ॒ज्यस्योप॒स्तीर्य॑ ।
द्वि॒र्हविषो॒ऽवदा॒याथोपरि॑ष्टादा॒ज्यस्या॑भि॒घारय॑ति॒ तद्यथै॒व य॒ज्ञस्यावदा॒नमे॒वमे॒तत्त् ॥११॥
तन्न पूर्वे॑ण परि॒हरे॑त् । पूर्वे॑ण ह्यैके॑ परि॒हर॑न्ति पुर॒स्ताद्धि प्रत्यञ्चो॒ यज॑मानं प॒शव॑
उपति॑ष्ठन्ते रु॒द्रिये॑ण ह प॒शून्प्र॒सञ्ज॒येत्पूर्वे॑ण परि॒हरे॒त्तेऽस्य गृ॒हाः प॒शव॑ उपमूर्च्छ-
माणा इ॑यु॒स्तस्मा॑दित्ये॒व तिर्य॑क्प्रजि॒ही॑त॒ तथा॑ ह रु॒द्रिये॑ण प॒शून्न प्रस॑ञ्जति तिर्य॑गे-
वैने॑ निर्मि॒मीते॑ ॥१२॥ तत्प्रति॑गृह्णाति । दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वे॒ऽश्विनो॑र्बा॒हु-
भ्यां पू॒ष्णो हस्ता॑भ्यां॒ प्रति॑गृह्णामीति॑ ॥१३॥ तद्य॒थैवा॒दो बृह॒स्पति॑ः । सवि॒तारं॑
प्र॑सवा॒योपा॑धावत्सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒तेदं मे॑ प्रसु॒वेति॒ तद॑स्मै सवि॒ता प्रस॑-
विता प्रासु॑वत्त॒देनग्ं॑ सवितृप्रसूतं॒ ना॒हिन॑दे॒वमे॒वैष ए॒तत्सवता॑रमे॒व प्रसवा॒योप॑-
धावति सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒तेदं मे॑ प्रसु॒वेति॒ तद॑स्मै सवि॒ता प्रस॑विता प्र-
सौति॒ तदे॑नग्ं सवितृप्रसूतं॒ न हि॑नस्ति ॥१४॥ तत्प्राश्नाति । अ॒ग्नेस्त्वा॒स्येन॒ प्राश्ना-
मीति॒ न वाऽअ॒ग्निं किं च॒न हि॑न॒स्ति तथो॑ हैनमेत॒न्न हि॑नस्ति ॥१५॥ तन्न द॒द्भिः
खादेत् । नेन्म॒ऽइदग्ं॑ रु॒द्रियं॑ द॒तो हि॒नस॒दिति॒ तस्मान्न द॒द्भिः खादेत् ॥१६॥ अ-
थाप॒ आचा॑मति । शान्ति॒राप॒स्तद॒द्भिः शान्त्या श॑मय॒तेऽथ परि॑क्षाल्य पा॒त्रम् ॥१७॥
अथास्मै ब्रह्मभागं पर्याहरन्ति । ब्रह्मा वै यज्ञस्य दक्षिणत आस्तेऽभिगोप्ता स एतं
भागं प्रतिविदान आस्ते यत्प्राशित्रं तदस्मै पर्याहार्षुस्तत्प्राशीदथ यमस्मै ब्रह्मभागं
पर्याहरन्ति तेन भागी स यदुत ऊर्ध्वम॒संस्थितं य॒ज्ञस्य त॒दभिगोपायति तस्माद्वा॒
ऽअ॒स्मै ब्रह्मभागं पर्या॒हर॑न्ति ॥१८॥ स वै वाच॑यंम ए॒व स्यात् । ब्र॒ह्मन्व्रस्त्या॒स्या-

कां० १, अ० ७, ब्रा० ४, क० ८-१६ शतपथब्राह्मण / १४६
भाग) है ॥८॥
जब वह प्राशित्र को काटता है तो मानो यज्ञ का वह भाग काटता है जो (तीर से)
बिंधा हुआ था जो रुद्र का भाग था । अब वह जलों को छूता है। जल शान्ति है। इस प्रकार जलों
के द्वारा शान्त करता है। अब इडा को जो पशु (का प्रतिनिधि) है, काटता है ॥९॥
उसको बहुत थोड़ा भाग काटना चाहिए । इससे तीर निकल आता है। इसलिए थोड़ा-
सा ही काटना चाहिए। अब एक ओर घी रखे, चाहे नीचे, चाहे ऊपर । इस प्रकार जो कठोर
है वह नरम हो जाता है और बहने लगता है। इसलिए एक ओर घी रखे, चाहे नीचे, चाहे
ऊपर ॥१०॥
घी से चुपड़कर हवि से दो टुकड़े काटकर ऊपर घी लगाता है, क्योंकि ऐसा करने से ही
वह यज्ञ का भाग होता है ॥११॥
उसको (आहवनीय अग्नि के) पूर्व में न ले जाये । कुछ लोग पूर्व में ले जाते हैं, क्योंकि
पूर्व में पशु यजमान की ओर मुंह करके खड़े होते हैं। यदि पूर्व को ले जायगा तो पशुओं में रुद्र
की शक्ति दे देगा, और उसके घरवाले पशु नष्ट हो जायेंगे। इसलिए उसको इस प्रकार मुड़कर
ले जाना चाहिए। इससे वह पशुओं में रुद्र की शक्ति न देगा और इस (तीर) को मुड़कर निकाल
देगा ॥१२॥
उसको वह इस मंत्र से ग्रहण करता है, "देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्याम्पूष्णो
हस्ताभ्यां प्रतिगृह्णामि" (यजु० २।११)- "तुझको सविता देव की प्रेरणा से, अश्विनों की
भुजाओं से, पूषा के हाथों से ग्रहण करता हूँ" ॥१३॥
अब जैसे बृहस्पति पहले प्रेरणा के लिए सविता के पास गया, क्योंकि देवताओं का प्रेरक
सविता है और उससे कहा, 'प्रेरणा कर', उसने प्रेरणा की और सविता से प्रेरित होकर उसने हानि
नहीं पहुँचाई, इसी प्रकार यह पुरोहित भी सविता के पास प्रेरणा के लिए जाता है, और कहता
है, 'मुझे प्रेरणा कर ।' क्योंकि सविता देवों का प्रेरक है, सविता उसको प्रेरणा करता है और प्रेरित
होकर वह उसको हानि नहीं पहुँचाता ॥१४॥
उस प्राशित्र को इस मन्त्र से खाता है, "अग्नेष्ट्वास्येन प्राश्नामि" (यजु० २।११)-"मैं
तुझे अग्नि के मुँह से खाता हूँ।" अग्नि को कोई हानि नहीं पहुँचाता । इसी प्रकार इस पुरोहित
को भी यह हानि नहीं पहुँचाता ॥१५॥
इसको दाँतों से न चबावे । 'कहीं यह रुद्र का भाग मेरे दाँतों को हानि न पहुँचावे !'
इसलिए वह इसको दाँतों से न चबावे ॥१६॥
अब जल से आचमन करता है। जल शान्ति है, इसलिए जलरूपी शान्ति से शान्त
करता है। अब पात्रों को धोकर- ॥१७॥
वे उसके पास ब्रह्म-भाग को लाते हैं। वस्तुतः ब्रह्मा यज्ञ के दक्षिण भाग में संरक्षक
होकर बैठता है। वह इस भाग के सामने बैठता है। जो प्राशित्र था वे उसके पास ले आये और
उसने खा लिया। अब जो ब्रह्म-भाग वे उसके पास लाते हैं वह उसको अपने भाग के रूप में लेता
है। अब यज्ञ का जो भाग अधूरा रहता है वह उसकी रक्षा करता है। इसलिए वे उसके लिए ब्रह्म-
भाग को लाते हैं ॥१८॥
अब वह चुपचाप रहे जब तक (अध्वर्यु) न कहे कि, 'हे ब्रह्म ! मैं आगे चलूँ?' जो