शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-५, ब्राह्मण-४
२६८ शतपथ ब्राह्मण
त्य॒वदान॒मतिक्रामत्यतिक्र॒म्याश्राव्याहा॒ग्निꣳ॒ स्वि॑ष्ट॒कृतं॒ यजेति॑ वषट्कृ॒ते जुहोति
॥१५॥ अथे॑डा॒मवा॒वद्य॑ति॒ न प्रा॒शित्र॑म् । उप॑ह्वय॒ प्राश्न॑न्ति॒ याव॑न्तो गृ॒ह्या॑ ह॒विर्-
च्छि॒ष्टाशाः॑ स्युस्ताव॑न्तः प्राश्नीयु॒रथो॑ऽअप्यु॒त्विजः॑ प्राश्नीयु॒रथो॑ऽअप्य॒न्ये ब्रा॑ह्म॒णाः प्रा-
श्नीयु॒र्यदि॑ बहु॒रोद॑न स्यादैताम॒निर॑शितां कुम्भीमपिधाय॑ नि॒दधा॑ति पू॒र्णद॒र्वाय॑ मा-
तृ॑भर्व्वत्सा॒त्समवा॑र्त्ति॒ तद्यु पश॑वो मेधमा॒त्मन्ध॑धते यवा॒ग्वैताꣳ रा॒त्रिमग्निहो॒त्रं
जुहोति नित्वान्यां प्रात॒र्जुह्व॑ति पितृयज्ञाय॑ ॥१६॥ अथ प्रात॒र्जुह्व॑ते वाहुते वा । य-
तर॒था काम॑येत॒ सोऽस्या॑ऽअ॒निर॑शितायै कुम्भ्यै द॒र्व्योप॑हन्ति॒ पूर्ग्णा द॑र्व्वि परा॑पत॒
सुपूर्ग्णा पुन॒राय॑त । व॒स्नेव॑ विक्रिणावहा॒ऽइष॒मूर्ज्जꣳ॑ शतक्रत॒विति॒ यथा पुरोऽनु-
वाक्यै॑वमे॒वैतेनै॒वैतस्मै॑ भा॒गाय॒ ह्वय॑ति ॥१७॥ अथर्षभमाह्ला॑पि॒तवे॑ ब्रूयात् । स
यदि॑ रुयात्- वषट्कार इत्यु हैक॒ऽआहुस्तस्मिन्वषट्कारे॑ जुहुयादित्यथोऽइन्द्रमे॒वैत-
त्स्वेन॑ रू॒पेण॑ ह्वयति वृ॒त्रस्य॑ ब॒धायैतद्धाऽइन्द्रस्य रूपं यदृष॑भस्त॒त्स्वेनै॒वैनमेतद्रू॒पे-
ण ह्वयति वृ॒त्रस्य॑ बधाय॒ स यदि॑ रुयादा॒ मऽइन्द्रो॑ य॒ज्ञमग॒न्त्सेन्द्रो॑ मे य॒ज्ञ इति॑
ह वि॒द्याद्ययु॒ न रुयाद्ब्राह्मण ए॒व दक्षिणत॒ आसी॑नो ब्रूयाञ्जुहुधीति॒ सैवेन्द्री
वाक् ॥१८॥ स जु॑होति । दे॒हि मे॒ ददा॑मि ते॒ नि मे॑ धेहि॒ नि ते॑ दधे । नि॒हारं
च॒ हरा॑सि मे नि॒हारं निहरा॑णि ते स्वाहेति॑ ॥१९॥ अथ म॒रुद्द्यः क्रीडिभ्यः॑ । स-
त्कपा॒लं पु॒रोडाशं॒ निर्व॑पति म॒रुतो ह॒ वै क्रीडि॑नो वृ॒त्रꣳ ह॑निष्य॒न्तम॑न्द्र॒माग॑तं
त॒मभि॑तः प॒रिचि॑क्रीडु॒र्मह्यतस्तथोऽए॒वैतं पा॒प्मानं॑ द्विषन्तं॑ भ्रातृ॑व्यꣳ हनिष्यन्त॒म-
भितः॑ प॒रिक्री॑डन्ते मह्यन्तस्त॒स्मान्म॒रुद्द्यः॑ क्रीडिभ्योऽथातो म॒हाह॒विषा॑ ए॒व तद्य-
था म॒हाह॒विषस्तथो॒ तस्य॑ ॥२०॥ ब्राह्मणम् ॥४ [५.३.]॥ चतुर्थः प्रपाठकः समा-
प्तः ॥ कण्डिकासंख्या १०५ ॥ ॥
महाह॒विषा ह॒ वै दे॒वा वृ॒त्रं जघ्नुः । तेनो॑ऽए॒व व्य॑जयन्त॒ येयमे॑षां विजि॑ति-
स्तां तथो॑ऽए॒वैष ए॒तेन पा॒प्मानं॑ द्विषन्तं॑ भ्रातृ॑व्यꣳ हन्ति॒ तथो॑ऽएव वि॒जय॑ते त-
कां० २, अ० ५, ब्रा० ३-४, कं० १५-२० व १ शतपथब्राह्मण / २६६
जाकर श्रौषट् कहकर कहता है, 'अग्नि॒-स्विष्टकृतं यज।' वषट्कार कहकर आहुति दे देता
हैं ॥१५॥
अब इडा में से काटता है परन्तु आगे का भाग नहीं। (इडा को) कहकर वे (ऋत्विज)
खाते हैं। घर के जितने लोग बची हुई हवि को खानेवाले हों वे खावें, या ऋत्विज लोग खावें।
यदि भात अधिक हो तो अन्य ब्राह्मण भी खावें। जब तक कुम्भी (पात्र) बिल्कुल खाली न होने
पावे उसे ढककर 'पूर्णदर्व' के लिए रख देते हैं। अब गायों के लिए बछड़ों को छोड़ देते हैं। इस
प्रकार पशु भोजन को जाते हैं। उस रात को वह यवागू (जो और गुड़ का मिला हुआ) से अग्नि-
होत्र करता है। प्रातःकाल पितृयज्ञ के लिए निवान्या गौ को (जो गौ दूसरे के बछड़े को पिलाती
है) दुहता है ॥१६॥
इसके बाद, प्रातः के समय, अग्निहोत्र करने के बाद अथवा उससे पहले, जैसा भी वह
चाहे, वे (शेष चरु को) दर्वी चमचे से बिना खाली हुई कुम्भी में से काटता है, यह कहकर (यजु०
३।४६) "पूर्णा दर्व्वि परापत सुपूर्णा पुनरापत ! वस्नेव विक्रीणावहा ऽइषमूर्ज॒ शतक्रतो।" अर्थात्
"पूर्ण हे दर्वि ! दूर उड़ो। अच्छी तरह पूर्ण, वापस हम तक उड़ो; हे शतक्रतु इन्द्र, वस्ना या
व्यापार वस्तु के समान हम दोनों भोज्य और पेय का मोल-भाव करें।" उसी प्रकार अनुवाक्य
के समान इस ऋचा को कहकर वह उसे (इन्द्र को) भाग के लिए बुलाता है ॥१७॥
अब वह यजमान से कहे, 'बैल को बुलवा।' कुछ लोग कहते हैं कि 'यदि बैल डकारे तो
यह वषट्कार है। इसी वषट्कार के पश्चात् आहुति देनी चाहिए।' इस प्रकार वह वृत्र के वध के
लिए इन्द्र को उसी के रूप में बुलाता है। ऋषभ (बैल) इन्द्र का ही रूप है। इस प्रकार वह वृत्र
के वध के लिए इन्द्र को उसी के रूप में बुलाता है। यदि वह डकारे तो जानना चाहिए कि मेरे
यज्ञ में इन्द्र आ गया, मेरा यज्ञ इन्द्र-युक्त हो गया। और यदि (बैल) न डकारे तो दक्षिण की ओर
बैठा हुआ ब्राह्मण कहे 'जुहुधि' (आहुति दो)। यह वस्तुतः इन्द्र की वाणी है ॥१८॥
वह इस मन्त्र से आहुति देता है, "देहि मे ददामि ते नि मे धेहि नि ते दधे । निहारं च
हरासि मे निहारं निहराणि ते स्वाहा" (यजु० ३।५०) - "मुझे दे। मैं तुझे देता हूँ। मेरे अर्पण
कर। मैं तेरे अर्पण करता हूँ। मेरे लिए उपहार ला। मैं तेरे लिए उपहार लाऊँ। स्वाहा" ॥१९॥
अब सात कपालों का पुरोडाश खेलनेवाले मरुतों के लिए देता है, क्योंकि जब इन्द्र वृत्र
को मारने के लिए गया तो खेलनेवाले मरुत् उसके चारों ओर खेलते थे और उसकी प्रशंसा करते
थे। ऐसे ही वे यजमान के चारों ओर प्रशंसा करते हुए खेलते हैं। क्योंकि वह अपने दुष्ट और
अहितकर शत्रु को मारने जा रहा है, इसलिए 'खेलनेवाले मरुतों' के लिए आहुति दी जाती है।
इसके पश्चात् महाहविष् होता है। यह उसी प्रकार है जैसे महाहविष् की अलग आहुति दी
जाय ॥२०॥
अध्याय ५-ब्राह्मण ४
देवों ने वृत्र को महाहवि के द्वारा मारा। उसी से उन्होंने वह विजय प्राप्त की जो उनको
मिली हुई है। इसलिए वह अपने पापी, अहितकारी शत्रु को मार डालता और उस पर विजय पा
३०० शतपथ ब्राह्मण
स्माद्वाऽए॒ष ए॒तेन॒ यज॑ते ॥ १॥ तस्या॒वृत् । उ॒पकि॑रन्त्युत्तरवे॒दिं गृ॒ह्लन्ति॑ पृषदा॒ज्यं
म॒न्थ्य॑त्य॒ग्निं नव॑प्रया॒जं भव॑ति॒ नवा॑नुया॒जं त्रीणि॑ समिष्टयजूं॒षि भव॑न्त्ये॒तान्ये॒व
पञ्च॑ ह॒वीꣳषि॒ भव॑न्ति ॥२॥ स य॒दाग्ने॒योऽष्टाक॑पालः पु॒रोडाशो॑ भव॑ति । अ॒ग्निना
ह॒ वाऽए॒नं ते॒जसा॑प्र॒न्त्स तेजो॑ऽग्नि॒र्नाव्य॑थत॒ तस्मा॑दाग्ने॒यो भव॑ति ॥३॥ अथ॒ यत्सौ-
म्यश्च॒रुर्भव॑ति । सोमे॑न ह॒ वाऽए॒नꣳ राजा॑प्र॒न्त्सोम॒ꣳ राजा॑न मे॒व तस्मा॑त्सौ॒म्यश्च॒रुर्भ-
व॑ति ॥४॥ अथ॒ यत्सा॑वि॒त्रः । द्वाद॑शकपालो वा॒ष्टाक॑पालो वा पु॒रोडाशो॑ भव॑ति
सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता स॑वितृप्रसूता ह्यैवेन॒मघ्नं॒स्तस्मा॑त्सावि॒त्रो भव॑ति ॥५॥
अथ॒ यत्सा॑रस्व॒तश्च॒रुर्भव॑ति । वाग्वै सर॑स्वती॒ वागु॒ ह्यैवा॑नुममाद॒ प्रहर॑ ज॒हीति॑
तस्मा॑त्सारस्व॒तश्च॒रुर्भव॑ति ॥६॥ अथ॒ यत्पौ॒ष्णश्च॒रुर्भव॑ति । इ॒यं वै पृ॑थि॒वी पू॒षेयꣳ
ह्यैवेनं॒ बधा॑य प्रति॒प्रद॑दावनया॒ ह्यैवेनं॒ प्रति॑प्रत्तं जघ्नु॒स्तस्मा॑त्पौ॒ष्णश्च॒रुर्भव॑ति ॥७॥
अथैन्द्रा॒ग्नो द्वाद॑शकपालः पु॒रोडाशो॑ भव॑ति । ए॒तेन॒ ह्यैवेन॑मघ्नंस्ते॒जो वाऽअ॒ग्निरी-
न्द्रि॒यं वी॒र्य॑मिन्द्र॒ ए॒ताभ्या॑मेनम॒भाभ्यां॑ वी॒र्या॑भ्यामघ्न॒न्ब्रह्म॒ वाऽअ॒ग्निः क्ष॒त्रमिन्द्र॒स्ते
ऽउ॒भे सꣳर॑भ्य॒ ब्रह्म॑ च क्ष॒त्रं च॒ सयु॑जौ कृ॒त्वा ताभ्या॑मेनम॒भाभ्यां॑ वी॒र्या॑भ्यामघ्नं॒स्त-
स्मा॑दैन्द्रा॒ग्नो द्वाद॑शकपालः पु॒रोडाशो॑ भव॑ति ॥८॥ अथ माहे॒न्द्रश्च॒रुर्भव॑ति । इ॒न्द्रो
वाऽए॒ष पु॒रा वृ॒त्रस्य॑ ब॒धाद॑थ वृ॒त्रं ह॒त्वा यथा॑ महारा॒जो वि॑जिग्या॒न ए॒वं म॒हे-
न्द्रो॑ऽभव॒त्तस्मान्मा॑हे॒न्द्रश्च॒रुर्भव॑ति महा॒त्म्यं॒ ह्यैवेन॑मे॒तत्खलु करो॑ति वृ॒त्रस्य॑ ब॒धाय॑
तस्मा॑द्वैव माहे॒न्द्रश्च॒रुर्भव॑ति ॥९॥ अथ वैश्वकर्मण ए॒कक॑पालः पु॒रोडा॒शो भ॑व-
ति । वि॒श्वं वाऽए॒तत्कर्म॑ कृ॒तꣳ सर्वं॑ जि॒तं दे॒वाना॑मासीत्साकमे॒धैरी॑जाना॒नां वि॑-
जिग्याना॒नां वि॒श्वमे॒वैतद्य॑त्कर्म॑ कृ॒तꣳ सर्वं॑ जि॒तं भव॑ति साकमे॒धैरी॑जा॒नस्य॑ वि॑-
जिग्या॒नस्य॒ तस्मा॑द्वैश्वकर्मण ए॒कक॑पालः पु॒रोडाशो॑ भव॑ति ॥१०॥ ए॒तेन॒ वै दे॒-
वाः । य॒ज्ञेने॒ष्ट्वा येयं दे॒वानां॑ प्र॒जाति॒र्या श्रीरे॑तदुभ॒यमैताꣳ ह वै प्र॒जातिं॑ प्र॒जा-
कां० २, अ० ५, ब्रा० ४, कं० १-११ शतपथब्राह्मण / ३०१
लेता है जो इस यज्ञ को करता है ॥१॥
उसकी विधि इस प्रकार है, एक उत्तर वेदी बनाते हैं। घी की नवनी लेते हैं, और अग्नि
को मथते हैं। नौ प्रयाज होते हैं, नौ अनुयाज और तीन समिष्ट-यजु। पहले पाँच हवियें होती
हैं ॥२॥
अग्नि के लिए आठ कपालों का पुरोडाश होता है। अग्नि को तीक्ष्ण करके उन्होंने (वृत्र
को) मारा था, और अग्नि-तेज विफल नहीं हुआ। इसलिए अग्नि की हवि होती है ॥३॥
अब सोम का चरु होता है। सोम राजा की सहायता से उसको मारा था, इसलिए सोम
राजा की हवि होती है ॥४॥
अब सविता के लिए बारह कपालों या आठ कपालों का पुरोडाश होता है। सविता देवों
का प्रेरक है। सविता की प्रेरणा से ही उसको मारा था, इसलिए यह सविता की हवि हुई ॥५॥
अब सरस्वती का चरु हुआ। वाणी ही सरस्वती है और वाणी ने ही उनको यह कहकर
उत्साह दिलाया, 'मारो। मारो।' इसलिए सरस्वती का चरु हुआ ॥६॥
अब पूषा का चरु होता है। पृथिवी ही पूषा है। इसी ने वध के लिए वृत्र को पेश कर
दिया। और पृथिवी के पेश कर देने पर उन्होंने उसे मारा। इसलिए पूषा का चरु हुआ ॥७॥
अब बारह कपालों का पुरोडाश इन्द्र और अग्नि के लिए हुआ। इसी अग्नि के द्वारा
उन्होंने उसे मारा था। अग्नि ही तेज है और इन्द्र वीर्य। इन्हीं दोनों शक्तियों के द्वारा उन्होंने
उसे मारा। अग्नि ब्राह्मण है, इन्द्र क्षत्रिय। इन दोनों को मिलाकर अर्थात् ब्रह्म-शक्ति और क्षत्र-
शक्ति को मिलाकर उन्होंने उसको इन दो शक्तियों के द्वारा मारा था, इसलिए बारह कपालों
का पुरोडाश इन्द्र और अग्नि के लिए हुआ ॥८॥
अब महेन्द्र के लिए चरु होता है। वृत्र के वध से पहले वह केवल इन्द्र था। वृत्र के वध
के अनन्तर महेन्द्र हो गया, जैसे विजय के पीछे महाराजा। इसलिए महेन्द्र के लिए चरु हुआ।
इससे वह वृत्र के मारने के लिए उसको बड़ा (बलिष्ठ) भी कर देता है। इसलिए महेन्द्र के लिए
चरु हुआ ॥६॥
अब विश्वकर्मा के लिए एक कपाल का पुरोडाश होता है। देवों ने साकमेध यज्ञ करके
और (वृत्र पर) विजय पाकर अपने काम को पूरा कर लिया ('विश्वं कृतं' का अर्थ है पूरा कर
लेना) और सब-कुछ जीत लिया। इसी प्रकार जो पुरुष साकमेध यज्ञ कर लेता है और विजय
पा लेता है, वह अपने काम को पूरा कर लेता है। इसीलिए विश्वकर्मा के लिए एक कपाल का
पुरोडाश होता है ॥१०॥
देवों की जो प्रजाति (फूलना-फलना) और श्री इस समय है, वह सब इसी यज्ञ को करके
हुई है। इसी प्रकार जो इस रहस्य को समझकर इस यज्ञ को करता है उसकी सन्तान फूलती-