शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-६, ब्राह्मण-१
१०६ शतपथ ब्राह्मण
ह॒ वै तमर्थं॑ कुरुते॒ श्रियै॒ऽन्नाद्या॑य॒ यस्मि॑न्न॒र्थे भ॑वति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥ ५॥ दे॒वाश्च
वा॒ऽसुरा॑श्च । उ॒भये॑ प्राजाप॒त्याः प॑स्पृधिरे ते द॒ण्डैर्धनु॑र्भि॒र्न व्य॑जयन्त ते हा॒विज्ञा॑-
यमाना उचुर्हन्त॒ वाचेव॑ ब्र॒ह्मान्वि॑जिगीषामहै॒ स यो नो॒ वाचं॒ व्याहृ॑तां मिथु॒नि-
न् नानु॒निष्क्रा॑मात्स सर्वं॒ परा॑जयाता॒ऽथ सर्व॑मितरे जयानिति॒ तथेति॑ दे॒वा अब्रु॑-
वंस्ते॑ दे॒वा इन्द्र॑मब्रुवन्व्या॒हरेति॑ ॥ ६॥ स इन्द्रो॑ऽब्रवीत् । एको॒ ममे॒त्यथा॒स्माक॒-
मेकेती॒तरे॑ऽब्रुवं॒स्तदु॒ तन्मिथु॑नमे॒वावि॑न्दन्मिथु॒नं ह्येक॑श्चैका च ॥ ७॥ द्वौ ममेती-
न्द्रो॑ऽब्रवीत् । अथा॒स्माकं॒ द्वेऽइती॒तरे॑ऽब्रुवं॒स्तदु॒ तन्मिथु॑नमे॒वावि॑न्दन्मिथु॒नं हि
द्वौ च॒ द्वे च॑ ॥ ८॥ त्रयो॒ ममेतीन्द्रो॑ऽब्रवीत् । अथा॒स्माकं॑ तिस्र इती॒तरे॑ऽब्रुवं॒स्तदु॒
तन्मिथु॑नमे॒वावि॑न्दन्मिथु॒नं हि त्रय॑श्च तिस्र॑श्च ॥ ९॥ च॒त्वारो॒ ममेतीन्द्रो॑ऽब्रवीत् ।
अथा॒स्माकं॒ चत॑स्र इती॒तरे॑ऽब्रुवं॒स्तदु॒ तन्मिथु॑नमे॒वावि॑न्दन्मिथु॒नं हि च॒त्वार॑श्च च॒-
तस्र॑श्च ॥ १०॥ पञ्च॒ ममेतीन्द्रो॑ऽब्रवीत् । तत॒ इत॑रे मिथु॒नं नावि॑न्द॒न्नो ह्य॑त ऊ॒र्ध्वं
मिथु॑नमस्ति पञ्च॒ पञ्चेति॒ ह्येवैतदु॑भयं भ॑वति॒ ततो॒ऽसुराः॒ सर्वं॒ परा॑जयन्त॒ सर्व॑स्मा-
द्देवा॒ऽसुरा॑नजयन्त्सर्वस्मात्सप॒त्नानसु॑रान्नि॒रभ॑जन् ॥ ११॥ तस्मा॑त्प्रथ॒मे प्रया॒जाऽइ॑ष्टे
ब्रूयात् । एको॒ ममे॒त्येका॒ तस्य॒ यम॒हं द्वेष्मीति॒ यश्च॑ न द्वि॒ष्याद्यो॒ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च
व॒यं द्वि॒ष्म इति॑ ब्रूयात् ॥ १२॥ द्वौ ममेति॑ द्विती॒ये प्र॑या॒जे । द्वे तस्य॒ यो॒ऽस्मान्द्वे-
ष्टि यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्म इति॑ ॥ १३॥ त्रयो॒ ममेति॑ तृती॒ये प्र॑या॒जे । ति॒स्रस्तस्य॒ यो॒-
ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्म इति॑ ॥ १४॥ च॒त्वारो॒ ममेति॑ चतु॒र्थे प्र॑या॒जे । चत॑स्र-
स्तस्य॒ यो॒ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्म इति॑ ॥ १५॥ पञ्च॒ ममेति॑ पञ्च॒मे प्र॑या॒जे । न
तस्य॒ किं च॒न यो॒ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्म इति॒ स पञ्च॒ पञ्चेत्ये॑व भ॑वन्त्यरा॒भ-
व॑ति॒ तथा॑स्य॒ सर्वं॒ संवृ॑ङ्क्ते॒ सर्व॑स्मात्सप॒त्नान्निर्भ॑जति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥ १६॥ ब्राह्म-
णम् ॥ ५ [५.४.] ॥ ॥ अध्यायः ॥ ५॥ ॥
ऋ॒तवो॒ ह वै दे॒वेषु॑ य॒ज्ञे भा॒गमी॑षिरे । आ नो॑ य॒ज्ञे भ॑जत॒ मा नो॑ य॒ज्ञाद॒न्तर्ग॑-
का० १, अ० ५, ब्रा० ४, कं० ५-१६ शतपथब्राह्मण / १०७
स्थान को जहाँ वह रहता है अपने वश में कर लेता है, और श्री तथा अन्न से अपने को युक्त कर
लेता है ॥५॥
देव और असुर दोनों प्रजापति की सन्तान महत्त्व के लिए लड़ पड़े। वे डण्डों और
धनुष से एक-दूसरे को नहीं जीत सके। वे (असुर) न जीतनेवाले होकर कहने लगे—‘अब हम
ब्रह्म-वाणी से जीतेंगे। जो हमारी कही हुई वाणी को जोड़े में (दो-दो मिलकर) अर्थात् पुंल्लिङ्ग
वा स्त्रीलिङ्ग न समझ सकेगा, वह पराजित हो जायेगा और सब-कुछ खो बैठेगा, और विपक्षी
सब-कुछ ले लेंगे।” देवों ने कहा ‘अच्छा’। देवों ने इन्द्र से कहा, ‘बोलो’ ॥६॥
इन्द्र बोला, 'एको मम' (एक मेरा)। औरों ने कहा, 'अस्माकं एका' (एक हमारी)।
इस प्रकार जोड़े को प्राप्त किया। एक पुंल्लिङ्ग और एक (स्त्रीलिङ्ग) मिलकर जोड़ा होता
है ॥७॥
इन्द्र ने कहा, 'द्वौ मम' अर्थात् 'दो मेरे' (यहाँ 'द्वौ' पुंल्लिङ्ग है)। दूसरों ने कहा, 'अस्माकं
द्वे' अर्थात् 'दो हमारी' (यहाँ "द्वे' स्त्रीलिङ्ग है)। इस प्रकार उन्होंने जोड़े को प्राप्त किया
क्योंकि 'द्वौ' और 'द्वे' मिलकर जोड़ा होता है ॥८॥
इन्द्र ने कहा, 'त्रयो मम' अर्थात् 'मेरे तीन' (यहाँ 'त्रय' पुंल्लिङ्ग है)। औरों ने कहा,
'अस्माकं तिस्रः' अर्थात् 'हमारी तीन' (यहाँ 'तिस्रः' स्त्रीलिङ्ग है)। इस प्रकार उन्होंने जोड़े
को पा लिया क्योंकि 'त्रयः' और 'तिस्रः' मिलकर जोड़ा हो जाता है ॥६॥
इन्द्र ने कहा, 'चत्वारो मम' (मेरे चार)। औरों ने कहा, 'अस्माकं चतस्रः' (हमारी
चार)। इस प्रकार जोड़े को प्राप्त किया क्योंकि पुंल्लिङ्ग 'चत्वारः' और स्त्रीलिङ्ग 'चतस्रः'
मिलकर जोड़ा हो जाता है ॥१०॥
इन्द्र ने कहा, 'पंच मम' (पाँच मेरा)। अब औरों को जोड़ा न मिला। इससे आगे
जोड़ा होता ही नहीं। दोनों लिंगों में 'पंच' ही होता है। इस प्रकार सब असुर पराजित हो गये।
देवों ने असुरों का सब-कुछ ले लिया। उन शत्रुओं से सब-कुछ छीन लिया ॥११॥
इसलिए पहले प्रयाज में कहे, 'एको मम। एका तस्य यमहं द्वेष्मि।' (मेरा एक। एक
उसकी जिसको हम द्वेष करें), और यदि किसी को द्वेष न करे तो कहे, 'योऽस्मान् द्वेष्टि यं च
वयं द्विष्मः।' (जो हमारे साथ द्वेष करता है और जिसको हम द्वेष करते हैं) ॥१२॥
दूसरे प्रयाज में कहे, 'द्वौ मम। द्वे तस्य योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः।' (दो मेरे।
दो उसकी जो हमसे द्वेष करता है या जिसको हम द्वेष करते हैं) ॥१३॥
तीसरे प्रयाज में कहे, 'त्रयो मम। तिस्रस्तस्य योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः।' (तीन
मेरे। तीन उसकी जो हमको द्वेष करे और हम जिसके साथ द्वेष करते हैं) ॥१४॥
चौथे प्रयाज में कहे, 'चत्वारो मम। चतस्रस्तस्य योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः।'
(चार हमारे। चार उसकी जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं) ॥१५॥
पाँचवें प्रयाज में कहे, 'पंच मम' (पाँच मेरे)। उसके लिए कुछ नहीं जो हमसे द्वेष
करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं। पाँच-पाँच करके शत्रु पराजित होता है। जो इस रहस्य
को समझता है उसको सब मिल जाता है। वह सब शत्रुओं को परास्त कर देता है ॥१६॥
अध्याय ६—ब्राह्मण १
ऋतुओं ने देवों से यज्ञ में भाग माँगा, 'हमको यज्ञ में भाग दो। हमको यज्ञ से न
ता॒स्स्वेव नो॑ऽपि य॒ज्ञे भा॒ग इति॑ ॥ १॥ तद्ध॑ दे॒वा न ज॑ज्ञुः । तऋतवो दे॒वेष्व॑ता-
नत्सु॑सु॒रानुप॒ावर्त॑न्ताप्रियान्दे॒वान्यं द्विषतो भ्रातृ॑व्यान् ॥ २॥ ते॒ हैतामृ॑तु॒मेधां च-
क्रिरे । य॒न्निषा॑मेतामनुशृण्वन्ति॒ कृष॑न्तो ह॒ स्मैव पूर्वे॑ व॒पन्तो॒ यन्ति॑ लु॒नन्तो॑ऽपरे॒
मृ॒णन्तः॑ शश्व॒द्धेभ्यो॑ऽकृष्टपच्या॒ एवौष॑धयः पेचिरे ॥ ३॥ तद्ध॑ दे॒वानामाग॑ आस ।
क॒नीय॒ इन्नु॑तो द्विषन्द्धि॒षते॒ऽरातीयति॒ किम्मे॒तावन्मात्रमुप॒ज्ञानीत॒ यथे॒दमितो॒ऽन्यथा॑-
स॒दिति॑ ॥ ४॥ ते॒ होचुः । ऋ॒तूनैवानुम॑न्त्रयामहा॒ऽइति॒ केनेति॑ प्रथ॒माने॑वैनान्य॒ज्ञे
य॒जामेति॑ ॥ ५॥ स॒ ह्वाग्नि॑रुवाच । अथ॒ यन्मां पु॒रा प्रथ॒मं य॒ज्ञस्य॒ ह्वातुं भ॑वानीति॑ न
त्वा॒माय॑तना॒च्चाव॑याम॒ इति॑ ते॒ यदृ॒तून॒भिक्लृ॒प्यमा॑ना अथा॒ग्निमाय॑तना॒न्नाच्या॑वय॒स्त-
स्माद॒ग्निरच्युतो॒ न ह॒ वाऽआ॑यतना॒च्च्यवते॒ यस्मि॒न्नाय॑तने॒ भव॑ति॒ य ए॒वमे॒तम॒ग्नि-
मच्युतं वे॒द ॥ ६॥ ते देवा अग्नि॑मब्रुवन् । परे॑ह्ये॒नांस्त्वमे॒वानुम॑न्त्रय॒स्वेति॒ स हे॒त्या-
ग्निरु॑वाच॒ऽर्तवो॒ऽवि॑दं वै वो दे॒वेषु य॒ज्ञे भा॒गमिति॑ क॒थं नो॑ऽविद॒ इति॑ प्रथ॒माने॑व
वो य॒ज्ञे य॑क्ष्यन्तीति॑ ॥ ७॥ तऋ॒तवो॒ऽग्निम॑ब्रुवन् । आ व॒यं त्वा॒मस्मासु॑ भजामो
यो नो दे॒वेषु य॒ज्ञे भा॒गमविद॒ इति॒ स ए॒षो॑ऽग्नि॒रृतु॒ष्वाभ॑क्तः स॒मिधो॑ऽअ॒ग्ने तनू॒न-
पाद॒ग्नऽइडो॑ऽअ॒ग्ने ब॒र्हिर॑ग्ने॒ स्वाहा॒ग्निमि॒त्याभ॑क्तो ह॒ वै तस्यां॑ पुण्यकृ॒त्यायां भवति
यामस्य॑ समा॒नो ब्रुवाणः॑ करो॒त्य॒ग्निम॑ते ह॒ वाऽअ॒स्माऽअ॒ग्निमन्त॑ ऋ॒तव॒ ओष॑धीः
पचन्तीदग्ँ सर्वं य ए॒वमे॒तम॒ग्निमृ॒तुष्वाभ॑क्तं वे॒द ॥ ८॥ तदा॒हुः । यदु॑त्त॒मान्प्र॒याजा॑ना-
त्रावृ॑त्त्य॒त्य कस्मा॑देनान्प्रथ॒मान्य॒जन्ती॒त्युत्त॑मान्ह्ये॒नान्य॒ज्ञेऽवा॑कल्पयन्प्रथ॒मान्वो य-
ज्ञामि॒त्यृ॒तूंस्तस्मा॑दुत्त॒मानावा॒वृत्त्य॑ प्रथ॒मान्य॑जन्ति ॥ ९॥ चतुर्थेन॒ वै प्र॒यजे॑न दे॒-
वाः । य॒ज्ञमा॑प्नुवंस्तं प॒ञ्चमेन॒ सम॑स्थापय॒न्नथ॒ यदूत॑ ऊ॒र्ध्वमस॑त्थ्सि॒तं य॒ज्ञस्य॒ स्वर्ग॒मिव
तेन लोकग्ँ समा॑श्नुवत ॥ १०॥ ते स्वर्गं लो॒कं य॒न्तः । असुरर॒क्षसेभ्य आस॑ङ्गाद्द्वि-
भयां चक्रुस्ते॒ऽग्निं पु॒रस्ता॑दकुर्वत रक्षोह॒णग्ँ वृत्त॒सांमपह॒न्तारम॒ग्निं म॑ध्य॒तोऽकु॑र्वत
रक्षोह॒णग्ँ वृत्त॒सामपह॒न्तारम॒ग्निं प॒श्चाद॑कुर्वत रक्षोह॒णग्ँ वृत्त॒सामपहन्तारग्ँ ॥ ११॥
का० १, अ० ६, ब्रा० १, कं० १-११ शतपथब्राह्मण / १०६
निकालो। हमारा भी यज्ञ में भाग हो' ॥१॥
देवों ने न माना। देवों के न मानने पर ऋतुएँ असुरों के पास चली गईं जो अप्रिय तथा
देवों के शत्रु और अहितकारी थे ॥२॥
उन (असुरों) ने ऐसी उन्नति की कि देवों ने भी सुना। जो असुर आगे-आगे जोतते-
बोते जाते थे, पीछे से उसी को दूसरे असुर काटते और इकट्ठा करते जाते थे। इनके लिए मानो
बिना जोते ही ओषधियाँ झट से पक जाती थीं (अर्थात् असुर ज्यों ही बोते थे त्यों ही बिना
समय बीते फसल पक जाती थी। आगे-आगे बोते थे, पीछे-पीछे काटते थे क्योंकि ऋतुएँ उनके
साथ थीं) ॥३॥
इससे देवों को चिन्ता हुई कि इस प्रकार शत्रु, शत्रु को हानि पहुँचावें यह तो छोटी बात
है। परन्तु इसकी हद बढ़ गई। अब कोई ऐसा उपाय होना चाहिए जिससे इस प्रकार की अवस्था
न रहे ॥४॥
उन्होंने कहा, 'पहले ऋतुओं को बुलावें।' कैसे ? 'पहले इनको यज्ञ में भाग दें' ॥५॥
अग्नि ने कहा, 'तुम पहले मुझको आहुति देते हो, अब मैं कहाँ जाऊँ?' उन्होंने कहा,
'हम तुमको तुम्हारे स्थान से नहीं हटायेंगे।' और क्योंकि ऋतुओं के बुलाने में अग्नि को उन्होंने
उसकी जगह से नहीं हटाया, इसलिए अग्नि अच्युत है। जो पुरुष समझता है कि अग्नि अच्युत है
वह अपने स्थान से च्युत नहीं होता ॥६॥
देवों ने अग्नि से कहा, 'जाओ और उन्हें यहाँ बुला लाओ।' अग्नि उनके पास गया
और बोला, 'हे ऋतुओ, मैंने तुम्हारे लिए यज्ञ में भाग प्राप्त कर लिया।' उन्होंने पूछा, 'तुमने
हमारा भाग हमारे लिए कैसे प्राप्त किया?' अग्नि ने उत्तर दिया, 'वे पहले तुम्हारे लिए आहुति
देंगे' ॥७॥
ऋतुओं ने अग्नि से कहा, 'हम तुमको अपने साथ यज्ञ में भाग देंगे, क्योंकि तुमने हमारे
लिए यज्ञ में देवों के साथ भाग दिलाया है' और क्योंकि अग्नि को ऋतुओं के साथ-साथ आहुति
मिली, इसलिए कहते हैं, 'समिधोऽअग्ने', 'तनूनपादग्ने', 'इडोऽअग्ने', 'बर्हिरग्ने', 'स्वाहाग्निम्'।
जो इस रहस्य को समझता है उसका उस पुण्य कार्य में भाग होता है जो वह पुरुष करता है, जो
अपने को उसके समान कहता है, क्योंकि वह अग्निमान् (अग्निवाला) है। अग्निमान् ऋतुएँ ही
ओषधियों तथा अन्य पदार्थों को पकाती हैं ॥८॥
इस पर कुछ लोग आक्षेप करते हैं कि जब ये पिछले प्रयाज हैं तो पहले ही आहुतियाँ क्यों
दी जाती हैं ? इसका उत्तर यह है कि इन प्रयाजों की कल्पना ही सबसे पीछे की थी, इसलिए ये
पिछले प्रयाज हैं, और क्योंकि कहा कि हम पहले आहुति देंगे इसलिए पहले प्रयाज-आहुतियाँ
दी गईं ॥९॥
देवों ने चौथे प्रयाज से यज्ञ को प्राप्त किया और पांचवें प्रयाज से उसकी स्थापना की।
उसके बाद जो कुछ असंस्थित (बिना स्थापित हुआ) बच रहा, उसके द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त
किया ॥१०॥
वे स्वर्गलोक को जाने लगे तो असुर और राक्षसों से डरे। उन्होंने अग्नि को अगुवा
बनाया, क्योंकि वह राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है। उन्होंने अग्नि को मध्य में रक्खा
क्योंकि अग्नि राक्षसों का मारनेवाला और भगानेवाला है। उन्होंने अग्नि को पीछे रक्खा, क्योंकि
वह अग्नि राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है ॥११॥
११० शतपथ ब्राह्मण
स॒ यद्ये॑नान्पुर॒स्तात् । अ॒सुररक्ष॒सान्यासि॑संक्षन्नग्निरि॑व तान्य॒पाहन्ग् रक्षो॒हा रक्ष॑साम-
पह॒न्ता यदि॑ मध्यत॒ आ॑सि॒संक्षन्नग्निरि॑व॒ तान्य॒पाहन्ग् रक्षो॒हा रक्ष॑सामपह॒न्ता यदि॑ प-
श्चादासि॑संक्षन्नग्निरि॑व॒ तान्य॒पाहन्ग् रक्षो॒हा रक्ष॑सामपह॒न्तात् एव॒ग्॒ सर्व॑तोऽग्निभिर्गू-
र्ध्यमा॑नः स्व॒र्गं लो॒कं स॒माश्व॑वत ॥ १२॥ तयो॒ऽत्वै॑ष ए॒तत् । च॒तुर्थेनै॑व॒ प्रया॒-
जेन य॒ज्ञमाप्नो॑ति॒ तं प॑ञ्च॒मेन॒ संस्ता॒पयत्य॑थ॒ यद॑त ऊ॒र्ध्वमस॑ऽस्थितं य॒ज्ञस्य स्व॒र्गमे॒-
व ते॑न लो॒कं स॒मश्रु॑ते ॥ १३॥ स यद॒ग्नेयम॒ाज्यभा॒गं यज॑ति । अ॒ग्निमे॒वैतत्पुर॒स्ता-
त्कुरुते रक्षो॒हणं रक्ष॑सामपह॒न्तार॒मथ॒ यदा॑ग्ने॒यः पु॑रो॒डाशो भव॑त्य॒ग्निमे॒वैतन्मध्य॑तः
कुरुते रक्षो॒हणं रक्ष॑सामपह॒न्तार॒मथ॒ यद॒ग्निः॑ स्विष्ट॒कृत् यज॑त्य॒ग्निमे॒वैतत्पश्चात्कु-
रुते रक्षो॒हणं रक्ष॑सामपहन्ता॒रं ॥ १४॥ स यद्ये॑नं पु॒रस्ता॑त् । अ॒सुररक्ष॒सान्या-
सि॑संक्षन्त्य॒ग्निरि॑व॒ तान्यप॑हन्ति रक्षो॒हा रक्ष॑सामपह॒न्ता यदि॑ मध्य॒त अ॒सुररक्ष॒सा-
न्यासि॑संक्षन्त्य॒ग्निरि॑व॒ तान्यप॑हन्ति रक्षो॒हा रक्ष॑सामपह॒न्ता यदि॑ प॒श्चादसुररक्ष॒सा-
न्यासि॑संक्षन्त्य॒ग्निरि॑व॒ तान्यप॑हन्ति रक्षो॒हा रक्ष॑सामपह॒न्ता स एव॒ग्॒ सर्व॑तोऽग्निभि-
र्गु॑प्यमा॑नः स्व॒र्गं लो॒कं स॒मश्रु॑ते ॥ १५॥ स यद्ये॑नं पु॒रस्ता॑त् । य॒ज्ञस्यानुव्याहुरे॑तं
प्रति॑ ब्रूयान्मुख्यामार्तिम॑रिष्य॒न्त्यो वा ब॑धि॒रो वा भ॑विष्यसीत्ये॒ता वै मु॑ख्या आ-
र्तयस्तथा॒ हैव स्यात् ॥ १६॥ यदि॑ मध्य॒तो य॒ज्ञस्यानुव्याहुरे॑त् । तं प्रति॑ ब्रूयात्प्र-
जा अ॑प॒शुर्भवि॑ष्यसी॑ति प्र॒जा वै प॒शवो॒ मध्यं॒ तथा॒ हैव॒ स्यात् ॥ १७॥ यद्यन्त॑तो
य॒ज्ञस्यानुव्याहुरे॑त् । तं प्रति॑ ब्रूयादप्रति॑ष्ठितो द॒रिद्रः क्षि॒प्रेऽमुं लो॒कमे॑ष्यसी॑ति त-
था॒ हैव स्यात्तस्मादङ्ग॒ नानु॑व्याहा॒रीव स्यादुत॒ ह्येवं॑वि॒त्परो भव॑ति ॥ १८॥ संव-
त्स॒रो ह वै प्र॑या॒जैर्जय॑मान्त्स॒न्तनो॑ति । स ह॒ त्वे॒वैनं॑ जय॑ति योऽस्य द्वारा॑णि वे॒द किग्
हि स तैर्गृ॒हैः कुर्या॒द्यानन्तरतो न व्यव॑विद्या॒द्यास्य ते भव॑न्ति तस्य वस॒न्त ए॒व
द्वार॒ग्॒ हेम॒न्तो द्वारं॒ तं वा॒ऽए॒तग्ं संवत्सर॒ग्॒ स्वर्गं॑ लो॒कं प्र॒पद्य॑ते सर्वं॒ वै संवत्स॒-
रः सर्वं वा॒ऽअक्षय्य॑मे॒तेन हास्याक्षय्य॒ग्ं सु॒कृतं भवत्यक्षय्यो॑ लो॒कः ॥ १९॥ तदा-
कां० १, अ० ६, ब्रा० १, क० १२-१६ शतपथब्राह्मण / १११
यदि असुर और राक्षस सामने आक्रमण करते तो अग्नि उनको हटा देता, क्योंकि अग्नि
राक्षसों को मारने तथा भगानेवाला है। यदि बीच से आक्रमण करते तो अग्नि उनको हटा देता,
क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारने तथा भगानेवाला है। यदि पीछे से आक्रमण करते तो अग्नि
उनको हटा देता, क्योंकि राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है। इस प्रकार सब ओर से
अग्नियों से रक्षित होकर वे स्वर्ग में पहुँच गये ॥१२॥
इसी प्रकार यह (यजमान) भी चौथे प्रयाज से यज्ञ को प्राप्त करता है, पांचवें
यज्ञ को स्थापित करता है और जो यज्ञ से बच रहता है उससे स्वर्गलोक को प्राप्त करता
है ॥१३॥
वह जब आग्नेय आज्यभाग से यज्ञ करता है तो अग्नि को सामने रखता है, क्योंकि अग्नि
राक्षसों को मारने और भगानेवाला है। वह जब आग्नेय पुरोडाश से यज्ञ करता है तो अग्नि को
बीच में रखता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारने और भगानेवाला है। जब वह स्विष्टकृत् अग्नि
में यज्ञ करता है तो अग्नि को पीछे रखता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारनेवाला और भगाने-
वाला है ॥१४॥
असुर राक्षस जब आगे से आक्रमण करते हैं तो अग्नि उनको हटा देता है, क्योंकि अग्नि
राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है। जब असुर राक्षस बीच से आक्रमण करते हैं तो
अग्नि उनको पीछे हटा देता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है। जब
असुर राक्षस पीछे से आक्रमण करते हैं तो अग्नि उनको हटा देता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों को
मारनेवाला और हटानेवाला है। इस प्रकार सब ओर से अग्नि द्वारा सुरक्षित होकर स्वर्गलोक
को प्राप्त होता है ॥१५॥
यदि कोई उसके साथ यज्ञ के पहले दुष्ट व्यवहार करे तो उसको उत्तर दें—'मुख
के रोग तुझे लग जायें । तू अन्धा या बहरा हो जायगा ।' यही मुख के रोग हैं। ऐसा ही हो
जाय ॥१६॥
यदि कोई उसके साथ यज्ञ के बीच दुष्ट व्यवहार करे तो उसको उत्तर दें—'तू प्रजाहीन
और पशुहीन हो जायगा।' क्योंकि प्रजा और पशु मध्य के हैं। ऐसा ही हो जायगा ॥१७॥
यदि कोई उससे यज्ञ के पीछे दुष्ट व्यवहार करे तो उससे कहना चाहिए—'तू-
प्रतिष्ठाहीन और दरिद्र शीघ्र ही दूसरे लोक को चला जायगा।' ऐसा ही होवे। इसलिए
किसी को दुष्ट व्यवहार नहीं करना चाहिए। जो इस रहस्य को जानता है वही लाभ में रहता
है ॥१८॥
प्रयाजों से संवत्सर को जीतता है। वही जीतता है जो उसके द्वारों को जानता है। वे
लोग घरों से क्या लाभ उठा सकते हैं जो भीतर घुसने के द्वारों को नहीं जानते ? जिस प्रकार यज्ञ
के द्वार प्रयाज हैं उसी प्रकार संवत्सर के द्वार वसन्त और हेमन्त हैं। इस संवत्सर में स्वर्गलोक
करके प्रविष्ट होता है, क्योंकि वस्तुतः संवत्सर 'सब' है। 'सब' अक्षय है। इस प्रकार उसको
अक्षय पुण्य और अक्षय लोक की प्राप्ति होती है ॥१९॥