शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-४, ब्राह्मण-५
८६ शतपथ ब्राह्मण
नैव ॥ १५॥ ब्राह्मणम् ॥ ६ [३.४.] ॥ ॥ तृतीयः प्रपाठकः ॥ ॥ कण्डिकासंख्या
१२०॥ ॥
स सु॒चोत्त॑रमा॒घा॒रमा॑घा॒रयि॒ष्यन् । पूर्वे॑ण स्रुचाव॒ञ्जलिं॑ नि॒दधा॑ति॒ नमो॑ दे॒वेभ्यः॑
स्व॒धा पि॒तृभ्य॒ इति॒ तद्दे॒वेभ्य॑श्चै॒वैतत्पि॒तृभ्य॑श्चा॒र्त्विज्यं॑ क॒रिष्यन्नि॒हुते॑ सुय॒मे मे॑ भूया॒-
स्त॒मिति॑ स्रुचावा॒दत्ते॑ सु॒भरे॑ मे भूयास्तं भर्तुं वा॒७ शके॑यमि॒त्येवैतदा॒हास्क॑न्नम॒द्य दे॒-
वेभ्य॒ आज्यँ॒ सम्प्रिया॑स॒मित्य॑वि॒क्षुभ्यम॒द्य दे॒वेभ्यो॑ य॒ज्ञं त॑नवा॒ऽइत्ये॒वैतदा॑ह ॥ १॥
अङ्घ्रि॑णा विष्णो॒ मा त्वाव॑क्रमिष॒मिति॑ । य॒ज्ञो वै विष्णु॒स्तस्मा॑ऽए॒वैतन्नि॒हुते॒ मा
त्वाव॑क्रमिष॒मिति॑ वसुमतीम॒ग्ने ते॑ छा॒यामुप॑स्थेष॒मिति॑ साधीम॒ग्ने ते॑ छा॒यामुप॑स्थेषमि॒-
त्ये॒वैतदा॑ह ॥२॥ विष्णो॒ स्थान॑मसी॒ति॑ । य॒ज्ञो वै विष्णु॒स्तस्यै॒वैतद॑न्तिक॒ तिष्ठ॑-
ति॒ तस्मा॑दाह विष्णो॒ स्थान॑मसीती॒त इन्द्रो॑ वी॒र्य॑मकृणोदित्यू॒र्ध्वोऽध॑र॒ आस्थ॑ादि॒-
त्यध॑रो॒ वै य॒ज्ञ ऊ॒र्ध्वो य॒ज्ञ आस्थ॒ादित्ये॒वैतदा॑ह ॥३॥ अ॒ग्ने वेर्होत्रं वेर्वैत्य॑मिति ।
उ॒भयं॒ वाऽए॒तद॒ग्नि॒र्देवानाँ॑ होता च दू॒तश्च॒ तदु॑भयं वि॒द्धि यद्दे॒वाना॑मसी॒त्येवैतदा॑-
हावतां॑ त्वां द्यावापृथि॒वीऽअव॑ त्वं द्यावापृथि॒वीऽइति॒ नात्र॑ ति॒रोहि॑तमिव॒ास्ति
स्वि॑ष्टकृद्दे॒वेभ्य॒ इन्द्र॒ आज्ये॑न ह॒विषा॑भूत्स्वाहेतीन्द्रो॒ वै य॒ज्ञस्य॑ दे॒वता॒ तस्मा॑दा॒हेन्द्र॒
आज्ये॒नेति॑ वा॒चे वाऽए॒तमा॒घा॒रमा॑घा॒रयतीन्द्रो॒ वागित्यु॒ वाऽआ॒हुस्तस्मा॑द्दिवा॒हेन्द्र॒
आज्ये॒नेति॑ ॥४॥ अथातऽउप॑स्पृ॒शन्त्स्रुचौ पर्येत्य॑ । ध्रुव॒या स॒मन॑क्ति॒ शिरो॒ वै य॒ज्ञ-
स्योत्त॑र आघा॒र् आत्मा॒ वै ध्रुवा तदा॒त्मन्ये॒वैतच्छिरः॒ प्रति॑दधाति॒ शिरो॒ वै य॒ज्ञस्यो-
त्तर आघा॒रः श्रीर्वै शिरः॒ श्रीर्हि वै शिर॒स्तस्मा॒द्योऽर्ध॑स्य॒ श्रेष्ठो॑ भव॒त्यसा॑वमु॒ष्यार्ध॑-
स्य॒ शिर॒ इत्या॑हुः ॥५॥ य॒जमा॑न ए॒व ध्रुवामनु॑ । योऽस्मा़़ऽअरा॑ती॒यति॒ स उप॒भृ-
तम॒नु स य॒द्योप॒भृता सम॑ञ्ज्या॒द्यो य॒जमाना॑यारा॒तीयति॒ तस्मि॑न्क्रियं दध्यात्तद्य॒जमा॑न
ऽए॒वैतत्क्रियं॑ दधाति॒ तस्मा॒द्ध्रुव॒या सम॑नक्ति ॥६॥ स सम॑नक्ति । सं ज्योति॑षा
का० १, अ० ४, ब्रा० ५, कं० १-७ शतपथब्राह्मण / ८७
अध्याय ४—ब्राह्मण ५
वह (अध्वर्यु) स्रुच् से दूसरी आधार-आहुति देते समय पहले अपने हाथों (अञ्जलि)
को दोनों स्रुचों (अर्थात् जुहू और उपभृत्) के सामने जोड़ता है, और यह मन्त्रांश (यजु० २।७)
पढ़ता है—"नमो देवेभ्यः स्वधा पितृभ्यः ।"—"देवों के लिए नमस्कार, पितरों के लिए स्वधा।" इस
प्रकार वह ऋत्विज का कर्म करने से पहले देव और पितरों को प्रसन्न करता है। "सुयमे मे
भूयास्तम्।" (यजु० २।७)—"आप दोनों मेरे लिए सुयम अर्थात् नियम में रहनेवाले हों।" ऐसा
कहकर दोनों स्रुचों को लेता है। इससे अभिप्राय यह है कि मेरे ये दोनों स्रुच् अच्छी तरह भर
जायें या मैं इनको अच्छी तरह भर सकूँ। अब वह कहता है—"अस्कन्नमद्य देवेभ्य आज्यꣳ
सम्भ्रियासम्" (यजु० २।८)—"मैं आज देवों के लिए न फैलनेवाला घी अर्पण करूँ।" इसके
कहने का तात्पर्य यह है कि मैं आज देवों के लिए क्षोभरहित अर्थात् पूर्ण यज्ञ करूँ। (अर्थात् यज्ञ
में कोई विघ्न या त्रुटि न रहे) ॥१॥
अब वह कहता है—"अङ्घ्रिणा विष्णो मा त्वावक्रमिषम्।" (यजु० २।८)—"हे विष्णु,
मैं पैर से आपके साथ अत्याचार न करूँ" अर्थात् आज्ञा भङ्ग न करूँ। यज्ञ ही विष्णु है। इसलिए
तात्पर्य यह हुआ कि मैं पैर से यज्ञ के प्रति कोई अनाचार न करूँ। अब कहता है—"वसुमतीमग्ने
ते छायामुपस्थेषम्" (यजु० २।८)—"हे अग्नि, मैं तेरी वसुमती छाया (शरण) में आ जाऊँ।"
इससे तात्पर्य है कि 'हे अग्नि, मैं तेरी साधु अर्थात् अच्छी छाया में आ जाऊँ' ॥२॥
अब वह कहता है—"विष्णोः स्थानमसि" (यजु० २।८)—"तू विष्णु का स्थान है।" यज्ञ
ही विष्णु है। वह उसी के निकट खड़ा होता है, इसीलिए कहता है कि 'तू विष्णु का स्थान है'।
अब कहता है—"इत इन्द्रो वीर्यमकृणोत्" (यजु० २।८)—"यहाँ इन्द्र ने पराक्रम किया।" इन्द्र ने
यहीं खड़े होकर दक्षिण से विघ्नकारी राक्षसों को दूर किया था। इसीलिए कहता है 'यहाँ इन्द्र ने
पराक्रम किया'। अब कहता है—"ऊर्ध्वोऽध्वर आस्थात्" (यजु० २।८)—"अध्वर ऊँचा उठा।"
अध्वर नाम है यज्ञ का, इसलिए इसका तात्पर्य हुआ कि यज्ञ ऊँचा उठा, अर्थात् यज्ञ भली प्रकार
किया गया ॥३॥
अब कहता है—"अग्ने वेर्होत्रं वेर्दृत्यम्" (यजु० २।६)—"हे अग्नि, होता का और दूत का
काम जानो" (वेः का अर्थ है समझो)। अग्नि देवों का होता भी है और दूत भी। इसके कहने
का तात्पर्य यह है कि 'हे अग्नि, तुम होता का और दूत का दोनों काम समझ लो।' अब कहता
है—"अवतां त्वां द्यावापृथिवी" "अव त्वां द्यावापृथिवी" (यजु० २।६)—"द्यौ लोक और पृथिवी
लोक तेरी रक्षा करें।" तू द्यौ लोक और पृथिवी लोक की रक्षा कर, यह स्पष्ट है। अब पढ़ता है—
"स्विष्टकृद् देवेभ्य इन्द्र आज्येन हविषाभूत् स्वाहा" (यजु० २।६)—"हे इन्द्र, घी हवि से देवों के
लिए स्विष्टकृत् आहुति हो, स्वाहा।" इन्द्र यज्ञ-देवता है, इसीलिए कहा 'इन्द्र आज्येन' इत्यादि।
यह आहुति वाणी के लिए देता है। इन्द्र नाम है वाणी का। यह कुछ लोगों की सम्मति है। इसी-
लिए कहा 'इन्द्र आज्येन' इति ॥४॥
अब लौटकर दोनों स्रुचों को बिना छुवाये हुए ध्रुवा (के घी) से जुहू (का घी) मिलाता
है। दूसरी आधार-आहुति यज्ञ का शिर है, और ध्रुवा शरीर है। इस कृत्य से यह तात्पर्य हुआ
कि शरीर के ऊपर शिर रख देता है। दूसरी आधार-आहुति यज्ञ का शिर है। शिर कहते हैं 'श्री'
को। श्री ही शिर होती है। इसीलिए जो कोई अङ्गों या परिवार का श्रेष्ठ होता है उसको कहते हैं
कि यह अङ्गों या परिवार का शिर है ॥५॥
यजमान ध्रुवा के पीछे खड़ा होता है, और जो उसके लिए शत्रुता करे वह उपभृत् के
पीछे। इसलिए अगर जुहू के घी को उपभृत् के घी से मिला देता तो उसको श्री देता जो यजमान
का शत्रु है। परन्तु उसे यजमान को श्री देनी है, इसलिए वह ध्रुवा के घी से मिलाता है ॥६॥
वह मिलाते समय यह मन्त्रांश (यजु० २।६) पढ़ता है—"सं ज्योतिषा ज्योतिः"—"ज्योति