शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-७, ब्राह्मण-२
१३४. शतपथ ब्राह्मण
ति॒ यदाइ॒न्द्रस्य॑ वा॒ भागमि॑ति सोमे॑नात॒नच्मीति॑ स्व॒दय॑त्ये॒वैन॑दे॒तद्दे॒वेभ्यः॑ ॥ १९ ॥
अथो॑दकवतोत्ताने॑न पात्रे॒णापि॑दधाति । नेदे॑नदुपरि॒ष्टा॒न्नाष्ट्रा॒ रक्षाँ॒स्यव॑मृशा॒निति॑
वज्रो वाऽआपस्तद्वज्रे॑णैवैत॒न्नाष्ट्रा॒ रक्षाँ॒स्यतो॑ऽपह॒न्ति तस्मा॑दुदकवतोत्ताने॑न पा-
त्रे॒णापि॑दधाति ॥ २० ॥ सोऽपि॑दधाति । विष्णो ह॒व्यँ॒ रक्षेति॑ य॒ज्ञो वै विष्णु॒स्तद्य-
ज्ञायै॒वैतद्ध॒विः परि॑ददाति गु॒प्त्यै तस्मा॑दाह विष्णो ह॒व्यँ॒ रक्षेति॑ ॥ २१ ॥ ब्राह्म-
णम् ॥ ४ [७. १.] ॥ ॥
ऋणँ ह॒ वै जायते योऽस्ति॑ । स जाय॑मान एव दे॒वेभ्य॒ ऋषि॑भ्यः पितृभ्यो॑ म-
नु॒ष्येभ्यः॑ ॥ १ ॥ स य॑दे॒व यजे॑त । तेन॑ दे॒वेभ्य॒ ऋणं॑ जायते॒ तद्ध्ये॑भ्य ए॒तत्क॑रोति य-
दे॑नान्यन॒क्ति य॑देभ्यो जु॒होति॑ ॥ २॥ अथ य॑दे॒वानु॒ब्रुवी॑त । तेन॒र्षिभ्य॒ ऋणं॑ जायते
तद्ध्ये॑भ्य ए॒तत्क॑रोत्यृषीणां निधिगोप इ॒ति ह्य॑नूचा॒नमा॑हुः ॥ ३॥ अथ य॑दे॒व प्र॒जा-
मिच्छे॑त । तेन॑ पितृभ्य॒ ऋणं॑ जायते॒ तद्ध्ये॑भ्य ए॒तत्क॑रोति॒ यदे॑षा॒ संत॑तावव्यवच्छिन्ना
प्र॒जा भव॑ति ॥ ४॥ अथ य॑दे॒व वास॑येत । तेन॑ मनु॒ष्येभ्य॒ ऋणं॑ जायते॒ तद्ध्ये॑भ्य ए॒त-
त्क॑रोति॒ यदे॑नान्वासय॑ते॒ यदे॑भ्यो॒ऽशनं॑ द॒दाति॒ स य॒ एता॑नि॒ सर्वा॑णि क॒रोति॒ स
कृ॒तकर्मा॒ तस्य॒ सर्व॒माप्तँ॒ सर्वं॑ जि॒तम् ॥ ५॥ स येन दे॒वेभ्य॒ ऋणं॑ जाय॑ते । तद्दे॒र्ना-
स्तदव॑दयते॒ यद्यजे॑ते॒ऽथ यद॒ग्नौ जु॒होति॒ तद्दे॒नाँस्तदव॑दयते॒ तस्मा॒द्यत्किं चा॒ग्नौ जु॒-
ह्वति॒ तद॑व॒दानं॒ नाम॑ ॥ ६॥ तद्वै च॑तुर॒वत्तं॑ भवति । इ॒दं वाऽअनु॑वाक्याथ याज्याथ
वषट्का॒रोऽथ॒ सा दे॒वता॑ चतु॒र्थी यस्यै॑ दे॒वता॑यै ह॒विर्भव॑त्ये॒वँ हि दे॒वता॒ अव॑दा-
नान्यन्वाय॑त्ता॒ अव॑दानानि वा दे॒वता॒ अन्वाय॑त्तान्यतिरि॒क्तँ ह॒ तद॑व॒दानं॒ यत्य-
क्षमं॒ कस्मा॒ऽड हि तदव॑द्येत्तस्माच्च॑तुर॒वत्तं॑ भवति ॥ ७॥ उ॒तो प॑ञ्चाव॒त्तमे॒व भ॑व-
ति । पा॒ङ्क्तो य॒ज्ञः पा॒ङ्क्तः प॒शुः प॒ञ्चर्तवः॑ संवत्स॒रस्यैषो प॑ञ्चाव॒त्तस्य॒ संप॒दङ्ग॒र्हैव॑ प्र॒-
जया॑ प॒शुभि॑र्भवति॒ यस्यै॒वं वि॒दुषः॑ पञ्चाव॒त्तं क्रिय॑त॒ऽएत॒द्वे॒ न्वेव प्र॒ज्ञातं॑ कौरूपा-
ञ्चा॒लं यच्च॑तुर॒वत्तं॒ तस्मा॑च्चतुर॒वत्तं॑ भवति ॥ ८॥ स वै यावन्मा॒त्रमि॑वैवाव॒द्येत् ।
कां० १, अ० ७, ब्रा० २, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / १३५
कहा था, इसी प्रकार इस देवता के लिए भी कहता है कि 'इन्द्र के तुझ भाग को सोम से गाढ़ा
करता हूँ।' वह इसको देवताओं के लिए स्वादिष्ट कर देता है ॥१६॥
अब वह उसको ऐसे पात्र से, जो ऊपर को खुला हो और जिसमें पानी हो, ढक देता
है कि ऊपर से दुष्ट राक्षस उसे छू न लें। जल वज्र है। इस प्रकार वह वज्र से दुष्ट राक्षसों को
उससे दूर भगा देता है। इसीलिए जल से भरे हुए पात्र से उसे ढकता है ॥२०॥
वह यह मन्त्र पढ़कर ढकता है—"विष्णो हव्यꣳ रक्ष" (यजु० १।४)—"हे विष्णु ! हवि
की रक्षा कर।" यज्ञ ही विष्णु है। इस प्रकार वह इस हवि को रक्षा के लिए यज्ञ के हवाले कर
देता है। इसलिये कहा—'विष्णु, हवि की रक्षा कर' ॥२१॥
अध्याय ७-ब्राह्मण २
जो कोई मनुष्य है वह उत्पन्न होते ही देवताओं, ऋषियों, पितरों और मनुष्यों का ऋणी
हो जाता है ॥१॥
उनको यज्ञ करना चाहिए। क्योंकि देवों का ऋणी होता है, इसलिये ऐसा करता है—
उनके लिए यज्ञ करता है, उनके लिए आहुति देता है ॥२॥
अब उसको (वेद) पढ़ना चाहिए। क्योंकि ऋषियों का ऋणी होता है, इसलिये ऐसा
करता है। जो वेद पढ़ता है उसको ऋषियों के कोष का रक्षक (ऋषीणाम् निधि-गोप) कहते
हैं ॥३॥
अब उसको सन्तान की रक्षा करनी चाहिए। क्योंकि पितरों का ऋणी होता है, इसलिये
ऐसा करता है जिससे उसके वंश का सिलसिला (परम्परा) बराबर जारी रहे ॥४॥
अब उसको (लोगों का) सत्कार करना चाहिए। क्योंकि मनुष्यों का ऋणी होता है,
इसलिये ऐसा करता है कि उनको बसाता है, उनको खाना देता है, वह उनके लिए सब-कुछ
करता है। इससे वह अपने कर्तव्य को पूरा करता है। उसको सब-कुछ मिल जाता है, वह विजयी
हो जाता है ॥५॥
क्योंकि वह देवताओं का ऋणी होता है, इसलिये देवताओं को प्रसन्न करता है (अवदयते)
यज्ञ करता है, अग्नि में आहुति देता है, उनको प्रसन्न करता है। इसलिये जो कुछ अग्नि में आहुति
दी जाती है उसको अवदान कहते हैं ॥६॥
इस यज्ञ के चार टुकड़े होते हैं—पहला अनुवाक्य, दूसरा यज्ञ, तीसरा वषट्कार, चौथा
वह देवता जिसके लिए हवि दी जाती है। इस प्रकार अवदान के अधीन देवता है या अवदान
देवता के अधीन हैं। (कुछ लोग पाँचवाँ भाग बताते हैं) यह पाँचवाँ भाग व्यर्थ है क्योंकि वह
किसके लिए है ? इसलिये अवदान के चार भाग ही होते हैं ॥७॥
परन्तु (कुछ लोगों के मत में) पाँच टुकड़े भी होते हैं। पाँच भाग वाला यज्ञ होता है,
पाँच भाग वाला पशु, वर्ष में पाँच ऋतुएँ—ये पाँच भाग पूरे हुए। जो इस रहस्य को जानकर
पाँच भाग करता है उसके सन्तान और पशु बहुत होते हैं। परन्तु कुरु और पांचालों में चार ही
टुकड़े होते हैं। इसलिये (हमारे मत में भी) चार टुकड़े ही होते हैं ॥८॥
उनको मात्रा के अनुकूल ही काटना चाहिए। यदि मात्रा से अधिक काटेगा तो यज्ञ को
मानु॑ष॒ꣳ ह कुर्याद्यन्महदवद्येद्यद्वै॒ तद्य॒ज्ञस्य॒ यन्मानु॑षं॒ नेद्य॒ज्ञं य॒ज्ञे क॒रवा॒णीति॑
तस्माद्यावन्मात्रमिवैवावद्येत् ॥ ९॥ स आज्यस्योपस्तीर्य । द्विरु॑विषो॒ऽवदा॒याथो॑-
परि॒ष्टादा॒ज्यस्या॑भिघा॒रयति द्वे वाऽआहुती सोमाहुति॒रिवान्याऽहुति॒रन्या तत
ए॒षा केव॑ली यत्सोमाहुति॒स्तैषाऽप्याहुतिर्यद्धविर्यज्ञो यत्पशुस्तदाज्यमे॒वैतत्क॒रोति
तस्मादुभयत॒ आज्यं॑ भवत्येतद्धि जुष्टं॑ दे॒वानां॒ यदाज्यं॑ तज्जुष्टमे॒वैतद्दे॒वेभ्यः॑ करोति
तस्मादुभयत॒ आज्यं॑ भवति ॥ १०॥ असौ वाऽअनुवा॒क्यैयं याज्या॑ । ते॒ऽउभे योषे
तयोर्मिथुनमस्ति वषट्कार एव तद्वाऽएष एव वषट्कारो य एष तपति स उद्यन्न्ने॒-
वामूम॒भिद्र॑वत्यस्तं यन्निमा॒मभिद्र॑वति तदि॒तेन वृष्टिमां॑ प्र॒जातिं॑ प्र॒जन॑यति॒ येनयोरियं॑
प्र॒जातिः॑ ॥ ११॥ सोऽनु॑वा॒क्यामनूच्य॑ । याज्या॑मनुद्रुत्य प॒श्चाद्वषट्करोति प॒श्चाद्धि प॒-
रीत्य॑ वृषा॒ योषा॑मभि॒द्रव॑ति तदेने॒ऽउभे पु॒रस्ता॒त्कृत्वा॒ वृषा॑ वषट्कारेणाभि॒द्राव॑यति
तस्मादु सहै॒ वैव वषट्कारेण जुहुयाद्वषट्कृते वा ॥ १२॥ दे॒वपात्रं॒ वाऽए॒ष यद्व-
षट्कारः॑ । तय॑था पात्र॒ऽउद्धृ॑त्य प्रय॒च्छेदेवं तद्यत्पुरा वषट्काराज्जुहुयाद्याथो भू-
मौ निदि॒ग्धं तद॒मुषा स्यादे॒वं तत्त्तस्मादु सहै॒ वैव वषट्कारेण जुहुयाद्वषट्कृते वा
॥ १३॥ ॥ शतम् ६०० ॥ ॥ तय॑था योनौ॒ रेतः॑ सिञ्चे॒त् । एवं तद्यत्पुरा वष-
ट्काराज्जुहुयाद्याथा योनौ॒ रेतः॑ सिक्तं तद॒मुषा स्यादे॒वं तत्त्तस्मादु सहै॒ वैव वषट्का॒रे-
ण जुहुयाद्वषट्कृते वा ॥ १४॥ असौ वाऽअनूवा॒क्यैयं याज्या॑ । सा वै गायत्री॑यं
त्रि॒ष्टुब॒सौ स वै गायत्रीमन्वाह तदमुमनुब्रुवन्न॒सौ ह्यनुवा॒क्यैमामन्वा॒ह्येयं॑ हि
गायत्री ॥ १५॥ अथ त्रि॒ष्टुभा यज॑ति । तद॒नया यज॑न्निय॒ꣳ हि याज्यामुष्या॒ अधि॒
वषट्करोत्यसा॒वु हि त्रि॒ष्टुत्तदि॑ने सयुजौ करोति॒ तस्मा॑दि॒मे संभु॑ञ्जाते॒ऽअनयो॒रनु
संभो॒गम॒िमाः प्र॒जा अनु॑ संभुञ्जते ॥ १६॥ स वाऽअ॒ङ्गुष्ठपर्वमात्रैवा॒नुवा॒क्यामनु॑-
ब्रूयात् । असौ ह्यनुवा॒क्या बृ॒हत्य॒सौ बा॑र्हत॒ꣳ हि तद्रू॒पं क्षिप्र॒ऽएव याज्या त्व-
रेतिय॒ꣳ हि याज्या रथन्त॒रꣳ ह्ये॑त॒ꣳ रा॑थन्त॒रꣳ हि तद्रू॒पं ह्वय॑ति वाऽअनुवा॒क्या
कां० १, अ० ७, ब्रा० २, कं० ९-१७ शतपथब्राह्मण / १३७
मानुषी कर देगा। वह यज्ञ ऋद्धि-शून्य हो जायगा। इसलिये मात्रा के अनुकूल ही काटना
चाहिए ॥९॥
(आज्य) अर्थात् घी की एक तह नीचे रखकर दो बार हवि काटकर उस पर घी
डालता है। दो आहुतियां होती हैं-एक सोम की, दूसरी घी की। जो सोम-आहुति है वह तो स्वयं
है ही। और जो आज्य आहुति है वह हवि है, वह पशु है। इसलिये दोनों ओर घी होता है।
आज्य अर्थात् घी देवों को प्रिय है। इसलिये घी को दोनों ओर इसलिये लगाते हैं कि देवता
प्रसन्न हो जायें ॥१०॥
वह (अर्थात् द्यौ) अनुवाक्य है, यह (अर्थात् पृथिवी) याज्य है। ये दोनों स्त्रीलिंग हैं।
उनमें से हर एक का जोड़ा वषट्कार है। अब वषट्कार वही सूर्य है जो तपता है। जब वह
निकलता है तो उस (द्यौ) से सम्पर्क होता है; जब डूबता है तो इस (पृथिवी) से सम्पर्क होता
है। इसलिये जो कुछ ये दोनों (द्यौ और पृथिवी) उत्पन्न करते हैं, उस नर (सूर्य) की सहायता
से ही उत्पन्न करते हैं ॥११॥
अनुवाक्य को बोलकर और याज्य को करके वषट्कार को करता है। पीछे से ही घूमकर
नर मादा के पास जाता है। इसलिये उन दोनों को पहले रखके पुंल्लिङ्ग वषट्कार से पीछे से
उनको मिलाता है। इसलिये या तो वषट्कार के साथ आहुति दे या वषट्कार के पीछे ॥१२॥
वषट्कार देवताओं का पात्र है। जैसे (भोजन) पात्र में निकालकर दिया करते हैं उसी
प्रकार यहाँ भी। यदि वषट्कार के पहले ही आहुति देवे तो वह ऐसा (निरर्थक) हो जाय जैसे
जमीन पर गिरकर (भोजन) हो जाता है। इसीलिये या तो वषट्कार के साथ आहुति दे या
वषट्कार के पीछे ॥१४॥
जैसे योनि में वीर्य-सिंचन होता है वैसे ही यहाँ भी। यदि वषट्कार से पहले आहुति दे
तो ऐसा हो जाय मानो योनि में वीर्य गया ही नहीं। इसलिये या तो वषट्कार के साथ आहुति दें
या वषट्कार के पीछे ॥१४॥
वह (अर्थात् द्यौ) अनुवाक्य है। यह (पृथिवी) याज्य है। यह (पृथिवी) गायत्री है।
यह (द्यौ) त्रिष्टुभ् है। यह जो गायत्री पढ़ता है वह मानो द्यौ को पढ़ता है, क्योंकि अनुवाक्य
द्यौ है। इस (पृथिवी) को पढ़ता है क्योंकि गायत्री यह (पृथिवी) है ॥१५॥
त्रिष्टुभ् से यज्ञ करता है। इस प्रकार इस (पृथिवी) से यज्ञ करता है, क्योंकि याज्य
पृथिवी है। उस (द्यौ) के ऊपर वषट्कार को रखता है, क्योंकि द्यौ त्रिष्टुभ् है। इस प्रकार वह
इन दोनों (पृथिवी और द्यौ) को सयुज कर देता है, और इस प्रकार वे सह-भोजी हो जाते
हैं। इन्हीं के सहभोज के पश्चात् सब प्रजा भोजन प्राप्त करती है ॥१६॥
अब वह लड़खड़ाती हुई वाणी से अनुवाक्य को बोलता है। वह (द्यौ) ही अनुवाक्य है।
बृहत् (साम) भी वही (द्यौ) है, क्योंकि उसका बृहत् रूप है। याज्य को जल्दी-जल्दी पढ़े।
याज्य यही (पृथिवी) है और रथन्तर भी यही (पृथिवी) है, क्योंकि इसका रूप रथन्तर है।
अनुवाक्य से वह आवाहन करता है और याज्य से देता है, इसीलिये अनुवाक्य में ऐसे शब्द होते
१३८ शतपथ ब्राह्मण
प्र॒यज॑ति॒ याज्या॑या तस्मा॒दनु॑वा॒क्या॑यै रू॒पं ह्वे ह्वाम॒हेऽआग॑ही॒दं ब॒र्हिः सी॑दे॒ति
यद्व॑यति॒ हि॒ तया॒ प्र॒यज॑ति॒ याज्या॑या तस्मा॒द्याज्या॑यै रू॒पं वी॒हि ह॒विर्जु॒षस्व॑ ह॒वि-
र्वृ॑धाय स्वाहि पिव॒ प्रेति॒ यत्र॒ हि॒ तया॒ यज॑ति ॥ १७॥ सा या पु॒रस्ता॑ल्लक्षणा ।
सानु॑वा॒क्या स्याद॒सौ ह्यनु॑वा॒क्या॒ तस्या॒ अमु॒ष्या अ॒वस्ता॑ल्ल॒क्ष्म च॒न्द्रमा॒ नक्ष॑त्राणि
सूर्य॑ः ॥ १८॥ अथ॒ योप॑रि॒ष्टा॑ल्लक्षणा । सा याज्या स्यादि॒यं हि॒ याज्या॒ तस्या॒ अस्या॒
उप॑रि॒ष्टा॑ल्ल॒क्ष्मौषधयो वन॒स्पत॑य॒ आपो॑ऽग्निरि॒माः प्र॒जाः ॥ १९॥ सा॒ ह॒ न्वेव समृ॑-
द्धानु॑वा॒क्या । यस्यै प्रथम॒ात्पदा॑द्देव॒ताम॑भि॒व्याह॑रति॒ सोऽए॒व समृ॑द्धा॒ याज्या॒ यस्या॒
ऽउत्तमा॒त्पदा॑द्देव॒ताया॒ अधि॒ वष॑ट्करोति वी॒र्यं वै दे॒वत॒ार्थंस्तद॒भयत॑ ए॒वैतद्वी॒र्येण॑
प॒रिगृह्य॒ यस्यै दे॒वता॑यै ह॒विर्भव॑ति॒ तस्यै॑ प्र॒यज॑ति ॥ २०॥ स वै वौगिति॑ करो-
ति । वाग्वै वषट्कारो वागेतो रेत॑ ए॒वैतत्सि॑ञ्चति षदित्यृतवो वै षट्तदृ॒तुष्वे-
तद्रेतः सिच्यते॒ तदृत॑वो रेतः सि॒क्तमि॒माः प्र॒जाः प्र॒जनय॑न्ति॒ तस्मा॑दे॒वं वष॑ट्करोति
॥ २१॥ दे॒वाश्च॒ वा॒ऽसुरा॑श्च । उ॒भये॑ प्राजाप॒त्याः प्र॒जाप॑तेः पि॒तुर्दाय॑मु॒पेयु॒रेत॑द्वि॒वा-
र्धमासौ य॒ श्वापूर्यते॒ तं दे॒वा उ॒पाय॒न्योऽप॑क्षीयते॒ तम॑सु॒राः ॥ २२॥ ते दे॒वा अ॑-
कामयन्त । क॒थं न्वि॒मम॑पि॒ संवृ॑ञ्जीमहि॒ योऽय॒मसु॑राणामिति॒ तेऽर्च॑न्तः श्राम्य॑न्तश्चे-
रुस्तऽए॒तत् ह॒विर्य॒ज्ञं द॑दृशुर्दर्शपूर्णमासौ ताभ्यामयजन्त ताभ्यामिष्ट्वैतमपि॒ सम॑वृ-
ञ्जत ॥ २३॥ य ए॒षोऽसु॑राणामासीत् । यदा वाऽए॒ताऽउ॒भौ परि॒प्लवेतेऽअथ॒ मासो॑
भ॑वति मासशः संवत्स॒रः सर्वं वै सं॑वत्स॒रः सर्व॑मेव॒ तद्दे॒वा अ॑सुराणाँ संम॑वृञ्जत
सर्वस्मात्सपत्नानसुरा॒न्निर॑भज॒न्सर्व॑म्वे॒वैष ए॒तत्त्सप॑त्नानाँ संवृ॑ङ्क्ते॒ सर्व॑स्मात्सप॒त्नान्नि॑-
र्भज॑ति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥ २४॥ स यो दे॒वाना॑मासी॒त् । स यवा॑युवत॒ हि ते॑न दे॒वा
योऽसु॑राणाँ॒ सोऽय॑वा॒ न हि तेना॑सुरा॒ अयु॑वत ॥ २५॥ अथो॑ऽइ॒तर॒थाहुः॑ । य
ए॒व दे॒वाना॑मासीत्स॒ोऽय॑वा॒ न हि तम॑सुरा॒ अयु॑वत॒ योऽसु॑राणाँ॒ स यवा॑युवत
हि॒ तं दे॒वाः स॒ङ्क्रमः स॒गरा रात्रिरि॒यव्या मासाः सुमेकाः संवत्सरः इ॒को ह॒ वै
कां० १, अ० ७, ब्रा० २, क० १७-२६ शतपथब्राह्मण / १३६
हैं—'हुवे' (मैं बुलाता हूँ), 'हवामहे' (हम बुलाते हैं), 'आगच्छ' (आ), 'इदं बर्हिः सीद' (इस
आसन पर बैठो)। क्योंकि इन शब्दों द्वारा बुलाता है, याज्य से देता है, इसलिये याज्य में ऐसे
शब्द आते हैं—'वीहि हविः' (हवि को स्वीकार करो), 'जुषस्व हविः' (हवि को ग्रहण करो),
'आवॄषा यस्व' (ग्रहण करो), 'अद्धि' (खाओ), 'पिब' (पियो), 'प्र' (वहाँ), क्योंकि इसी
(याज्या) द्वारा तो वह उसको देता है जो 'प्र' अर्थात् दूर हैं ॥१७॥
अनुवाक्य को 'पुरस्ताल्लक्षण' अर्थात् आदि में सामने लक्षणवाला होना चाहिए। वह
(द्यौ) ही अनुवाक्य हैं और उस (द्यौ) के नीचे के चिह्न हैं—चाँद, नक्षत्र (सूर्य) ॥१८॥
'याज्य' को 'उपरिष्टाल्लक्षण' अर्थात् ऊपर लक्षणवाला होना चाहिए। याज्य यही
(पृथिवी) है और इसके ऊपर के लक्षण हैं-ओषधि, वनस्पति, जल, अग्नि और यह प्रजा ॥१९॥
वही अनुवाक्य श्रेष्ठ होता है जिसके पहले पद में देवता का नाम आता है। याज्य वही
श्रेष्ठ होती है जिसके अन्तिम पद में देवता के लिए वषट् किया जाता है। देवता ऋक् ही वीर्य
है। मानो दोनों ओर से बल से पकड़कर हवि को उस देवता के अर्पण करता है जिसके लिए वह
हवि होता है ॥२०॥
अब कहता है 'वौक्'। वाणी ही वषट्कार है। वाणी ही वीर्य है। इस प्रकार वह वीर्य-
सिंचन करता है। फिर कहता है 'षट्', क्योंकि छः ऋतुएँ होती हैं। इस प्रकार वह ऋतुओं में
हीं वीर्य-सिंचन करता है। ऋतुओं से सींचा हुआ यह वीर्य इन प्रजाओं को उत्पन्न करता है,
इसलिये वषट् करता है ('वषट्' के दो भाग हैं—'व' और 'षट्') ॥२१॥
अब प्रजापति की दोनों सन्तान देव और असुर अपने पिता के दायभाग अर्थात् दोनों
अर्द्धमासों (पक्षों) को प्राप्त हुए। जो बढ़ता है उसको देव, जो घटता है उसको असुर ॥२२॥
देवों ने चाहा कि किस प्रकार उस भाग को भी ले लें जिसको असुर लिये हुए हैं। वे
पूजा और परिश्रम करते रहे। उन्होंने इस हविर्यज्ञ अर्थात् दर्शपूर्णमास यज्ञ को देखा और
उनको किया। इनको करके उन्होंने उस एक को ले लिया— ॥२३॥
जो असुरों का था। जब ये दोनों चलते हैं तो महीना होता है। महीने से साल होता
है। संवत्सर का अर्थ है 'सब'। इसलिये इस प्रकार देवों ने असुरों का सब लेकर मानो अपने शत्रु
असुरों का सब ले लिया। इस प्रकार वह भी जो इस रहस्य को समझता है अपने शत्रुओं का
सब-कुछ ले लेता है। अपने शत्रुओं को सबसे वंचित कर देता है ॥२४॥
जो देवों का अर्द्धमास था उसे 'यवा' कहते हैं, क्योंकि देव उससे युक्त थे ('यु' का अर्थ
हैं जुड़ना)। जो असुरों का था उसे 'अयवा' कहते हैं, क्योंकि असुर उससे युक्त न रह सके ॥२५॥
परन्तु अन्यथा भी कहते हैं। जो देवों का था उसे 'अयवा' कहते हैं, क्योंकि असुर उसको
न ले सके, और जो असुरों का था उसे 'यवा' कहते हैं क्योंकि देवों ने उसे ले लिया। दिन को
'सब्द' कहते हैं, रात्रि को 'सागरा', महीने को 'ग्रव्य', और वर्ष को 'सुमेक'। 'स्वेक' ही 'सुमेक'