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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-३, ब्राह्मण-३

भृता॒ नु जु॑होतीति॑ स॒ यद्धो॑पभृता जुहुयात्पृ॑थग्ध्ये॒माः प्र॒जाः स्युर्नैवा॑त्ता स्यान्नाद्यः॑
स्या॒द्यद्य॒त्तज्जु॑ह्वे॒व समा॒नीय॑ जु॒होति॒ तस्मा॑दि॒मा विशः॑ क्षत्रि॒याय॒ बलिं॑ हरन्त्या॒-
ड्गु॑पभृति॒ गृह्णा॑ति॒ तस्मा॑ड् क्षत्रि॒यस्यै॒व वशे॑ सति वैश्यं॑ प॒शव॑ उपतिष्ठन्तेऽथ॒ यत्त-
ज्जु॒ह्वे॑व समा॒नीय॑ जु॒होति॒ तस्माद्यदोत क्षत्रि॑यः काम॑यते॒ऽथा॒ह वैश्यं॒ मयि॑ गृ॒हे
परो॒ निहि॑तं तदाह॒रेति॒ तं जि॑नाति॒ सय॑था व॒त्कामय॑ते तथा॒ सचतऽऋ॒तेना॑ रु॒-
तद्वीर्ये॑ण ॥ १५॥ तानि॒ वाऽए॒तानि॑ । छन्दो॑भ्य॒ आऽज्या॑नि गृह्यन्ते स॒ यच्च॒तुर्जुह्वां
गृह्णा॑ति गायत्र्यै॒ तद्गृह्णात्य॒ यद॒ष्टौ कृत्व॒ उप॑भृति गृह्णा॑ति त्रि॒ष्टुब्जग॒तीभ्यां॒ तद्गृह्णा-
त्यथ॒ यच्च॒तुर्ध्रुवायां॑ गृह्णा॒त्यनु॑ष्टुभे॒ तद्गृह्णा॑ति वाग्वा॒ऽअनु॑ष्टुब्वाचो वा॒ऽइदं॒ सर्वं॒
प्रभव॑ति॒ तस्मा॑द्ध्रुवाया ए॒व सर्वो॑ य॒ज्ञः प्रभव॑तीयं वा॒ऽअनु॑ष्टुबस्यै वा॒ऽइदं॒ सर्वं॒
प्रभव॑ति॒ तस्मा॑द्ध्रुवाया ए॒व सर्वो॑ य॒ज्ञः प्रभव॑ति ॥ १६॥ स गृह्णाति । धाम॑ ना-
मासि प्रियं दे॒वाना॒मित्ये॒तद्वै दे॒वानां॑ प्रि॒यत॑मं॒ धाम॒ यदाज्यं॒ तस्मा॑दाह॒ धाम॒ नामा॑-
सि प्रि॒यं दे॒वाना॒मित्य॒नाधृ॑ष्टं देव॒यज॑नमसीति व॒ज्रो व्याज्यं॒ तस्मा॑दाहा॒नाधृ॑ष्टं देव॒-
यज॑नमसीति ॥ १७॥ स ए॒तेन॒ यजु॑षा । स॒कृज्जुह्वां गृह्णा॑ति त्रिस्तूष्णी॑मे॒तेनैव॒ यजु॑-
षा स॒कृदुप॑भृति गृह्णा॑ति स॒प्त कृत्व॒स्तूष्णी॑मे॒तेनैव॒ यजु॑षा स॒कृद्ध्रुवायां॑ गृह्णा॑ति त्रि॒-
स्तूष्णीं तदा॑ञ्जि॒स्त्रिरेव यजु॑षा गृह्णीया॒त्विद्धि॑ य॒ज्ञ इति॒ तदु॒ नु सकृ॑त्स॒कृदे॒वाञ्जी॑-
त्वेव त्रिर्गृहीतं संपद्यते ॥ १८॥ ब्राह्मणम् ॥ ५ [३. २]॥
प्रोक्ष॑णीर॒र्धमाद॑त्ते । स इ॒ध्ममे॒वाग्रे॒ प्रोक्ष॑ति कृ॒ष्णो॒ऽस्याखरे॒ष्ठो॒ऽग्नये॑ त्वा॒ जुष्टं॑
प्रोक्षा॒मीति॒ तन्मेध्य॑मे॒वैतद॒ग्नये॑ करोति ॥ १॥ अथ वेदिं॒ प्रोक्ष॑ति । वेदि॑रसि ब॒र्हिषे॑
त्वा जुष्टां॒ प्रोक्षा॑मि तन्मे॒ध्यामे॒वैतद्व॒र्हिषे॑ करोति ॥ २॥ अथास्मै॑ ब॒र्हिः प्रयच्छ॑ति ।
तत्पुर॒स्ताद्ग्रन्ध्यासा॒दय॑ति तत्प्रोक्ष॑ति बर्हिरसि सुसम्भ्या॑स्त्वा जुष्टं प्रोक्षा॑मि तन्मे॒ध्य॑मे-
वैतत्सुसम्भ्यः॑ करोति ॥ ३॥ अथ याः प्रोक्ष॑ण्यः परि॒शिष्य॑न्ते । ताभि॒रोष॑धीनां मू-
लान्युप॒निन॒यत्यदि॑त्यै॒ व्युन्द॑नमसीतीयं॒ वै पृ॑थि॒व्यदि॑तिस्तद॒स्या ए॒वैतदोष॑धीनां

कां० १, अ० ३, ब्रा० ३, कं० १-४ शतपथब्राह्मण / ५५
यदि उपभृत् से आहुति देवे तो इसका अर्थ यह होगा कि प्रजा राजा से छूट जाय । न खानेवाला
रहे, न खाद्य । यह जो साथ-साथ जुहू से आहुति देता है, यह ऐसा ही है जैसे वैश्य लोग राजा को
कर देवें । उपभृत् में जो लेता है उसका अर्थ यह है कि राजा के अधीन प्रजा पशु आदि की प्राप्ति
करती है, और जब उपभृत् के आज्य की भी जुहू द्वारा आहुति दी जाय तो इसका तात्पर्य यह है
कि राजा जब चाहे वैश्य से कहे 'जो इकट्ठा किया है उसको मुझे दो' । इस प्रकार वह उसको
वश में भी रखता है और जो चाहता है उसको इस शक्ति के द्वारा ले लेता है ॥१५॥
वे आज्य छन्दों के लिए लिये जाते हैं। जो जुहू में चार बार लिये जाते हैं वे गायत्री
के लिए होते हैं। जो उपभृत् में आठ बार लिये जाते हैं वे त्रिष्टुम् और जगती के लिए। जो ध्रुवा
में चार बार लिये जाते हैं वे अनुष्टुभ् के लिए। वाणी अनुष्टुभ् है। वाणी में ही यह सब प्रजा
जन्म लेती है। ध्रुवा से ही सब यज्ञ उत्पन्न होता है। अनुष्टुभ् पृथिवी है। पृथिवी से सब जगत्
उत्पन्न होता है, अतः ध्रुवा से ही सब यज्ञ उत्पन्न होता है ॥१६॥
स्रुवा में आज्य इस मन्त्रांश (यजु० १।३१) को पढ़कर लेते हैं—"तू देवों का धाम है।"
आज्य देवों का प्रियतम धाम है। इसीलिए कहा कि 'तू देवों का प्रियतम धाम है', 'तू देवों के यज्ञ
का अजेय स्थान है'। आज्य वज्र है, इसीलिए ऐसा कहता है ॥१७॥
जुहू में एक बार मन्त्र पढ़कर भरता है और तीन बार मौन । उपभृत् में एक बार मन्त्र
बोलकर, सात बार मौन । ध्रुवा में एक बार मन्त्र बोलकर, तीन बार मौन । कुछ लोग कहते हैं
कि तीन बार मन्त्र बोले क्योंकि यज्ञ त्रिवृत् है । परन्तु यह उद्देश्य तो एक बार मन्त्र बोलकर भी
पूरा हो जाता है (क्योंकि जुहू, उपभृत् और ध्रुवा में तीन बार मन्त्र हो जाते हैं) ॥१८॥
अध्याय ३—ब्राह्मण ३
अध्वर्यु प्रोक्षणी को लेकर पहले समिधों पर जल छिड़कता है यह मन्त्र (यजु० २।१)
बोलकर—"तू खर में रहनेवाला कृष्ण मृग है । तुझे अग्नि की तृप्ति के लिए पवित्र करता हूँ।"
इस प्रकार वह उसको अग्नि के लिए पवित्र करता है ॥१॥
फिर वेदी पर जल छिड़कता है (यजु० २।१) से—"तू वेदी है, बर्हि के लिए तुझे पवित्र
करता हूँ।" इस प्रकार उसको बर्हि के लिए पवित्र करता है ॥२॥
अब (अग्नीध्र) बर्हि को (अध्वर्यु को) देता है। वह उसको इस प्रकार वेदी पर रख
देता है कि उनकी ग्रन्थियाँ पूर्व की ओर रहें। अब उन पर जल छिड़कता है (यजु० २।१) से—
"तू बर्हि है। मैं तुझे स्रुचों के लिए पवित्र करता हूँ।" इस प्रकार वह उस बर्हि को स्रुचों के
लिए पवित्र करता है ॥३॥
अब जो पानी बच रहता है उसको ओषधियों की जड़ में डालता है इस मन्त्र (यजु०
२।२) से —"तू अदिति के लिए रस है।" यह पृथिवी ही अदिति है। वह पृथिवी पौधों के मूलों

मूलान्यु॒पोन॑त्ति॒ ता इ॒मा आर्द्रमूला ओषधयस्त॒स्माद्य॒द्यपि शुष्काण्यग्राणि॒ भवन्त्या-
र्द्राण्येव मूलानि भवन्ति ॥ ४ ॥ अथ विस्रंस्य ग्रन्थिम् । पुरस्तात्प्रस्तरं गृह्णाति
विष्णो॒ स्तूपो॑ऽसीति य॒ज्ञो वै विष्णु॒स्तस्येयमेव शिखा स्तूप ए॒तमेवास्मिन्नेतद्दधाति
पुरस्ताद्गृह्णाति पुरस्ताद्ध्ययं स्तूपस्तस्मात्पुरस्ताद्गृह्णाति ॥ ५॥ अथ संनहनं विस्रं-
सयति । प्र॒क्लृप्तं ह॒वास्य स्त्री वि॒जायत॒ऽइति तस्मात्संनहनं विस्रंसयति तद्दि-
क्षिणायाᳪ श्रोणौ निदधाति नीविर्ह्यवास्यैषा दक्षिणत-इव हीयं नीविस्तस्माद्दि-
क्षिणायाᳪ श्रोणौ निदधाति तत्पुनरभ्छादयत्यभ्छन्नेव हीयं नीविस्तस्मात्पुनर-
भ्छादयति ॥ ६॥ अथ बर्हि स्तृणाति । अयं वै स्तूपः प्रस्तरोऽथ यान्यवाञ्चि
लो॒मानि तान्ये॒वास्य॒ यदि॒दन्तरं॑ बर्हि॒स्तान्ये॒वास्मि॒न्नेत॒द्दधा॑ति॒ तस्मा॒द्बर्हि॒ स्तृणा॑ति
॥७॥ योषा वै वे॑दिः । तमि॑तदे॒वाश्च॒ पर्या॑सते॒ ये चेमे॒ ब्राह्म॑णाः शुश्रुवाᳪसो॒ऽनू-
चाना॒स्तैश्चै॒वैना॑मे॒तत्प॒र्यासी॑ने॒घ्नन्नां॑ क॒रोत्यन॑म्रतायाऽए॒व तस्मा॒द्बर्हि॒ स्तृणा॑ति
॥८॥ यावती वै वे॑दिः । तावती पृथिव्यो॒षध॑यो बर्हि॒स्तद॒स्यामे॒वैतत्पृ॑थि॒व्यामो॑ष-
धीर्द॑धाति॒ ता इ॒मा अस्यां॑ पृथिव्या॒मोष॑धयः प्रति॑ष्ठिता॒स्तस्मा॒द्बर्हि॒ स्तृणा॑ति ॥९॥
तद्वै॑ बहुलᳪ स्तृणीयादित्याहुः॑ । यत्र॒ वाऽअ॒स्यै बहु॑लतमा॒ ओष॑धय॒स्तद॒स्या उप॑-
जीवनि॑यतमं॒ तस्मा॒द्बहुलᳪ॑ स्तृणीया॒दिति॒ तद्वै॒ तदा॑ह्वर्तयै॒वाधि॑ त्रिवृ॒त्स्तृणा॑ति त्रि-
वृद्धि य॒ज्ञोऽथो॒ऽअपि॑ प्रवर्हᳪ॑ स्तृणीयात्स्तृ॒णन्ति॑ ब॒र्हिरानु॑ष॒गिति॑ वृ॒षणा॒मभ्य॑नूक्त-
म॒धरमू॑लᳪ स्तृणात्यधरमूला-इव॒ हीमा अस्यां॑ पृथिव्या॒मोष॑धयः प्रति॑ष्ठिता॒स्तस्मा॑-
द॒धरमू॑लᳪ स्तृणाति ॥ १०॥ स॒ स्तृणा॑ति । ऊर्ण॑म्रदसं त्वा स्तृणामि स्वास॒त्स्थां दे॒-
वेभ्य॒ऽइति॑ साध्वीं दे॒वेभ्य॑ इत्ये॒वैतदा॑ह॒ यदा॒होर्ण॑म्रदसं॒ त्वेति॑ स्वास॒त्स्थां दे॒वेभ्य॒ इति॑
स्वास॒दां दे॒वेभ्य॑ इत्ये॒वैतदा॑ह॒ ॥ ११॥ अ॒था॒ग्निं क॑ल्पयति । शिरो॒ वै य॒ज्ञस्या॑हव-
नीयः॑ पूर्वां॒र्द्धो वै शिरः॑ पूर्वा॒र्धमे॒वैतद्य॒ज्ञस्य॑ कल्पयत्यु॒पर्यु॒परि॒ प्रस्तरं॑ धार॒यन्कल्प॑-
यत्य॒यं वै स्तूपः॒ प्रस्त॑र ए॒तमे॒वास्मि॑न्ने॒तत्प्रति॑दधाति॒ तस्मा॑दु॒पर्यु॒परि॒ प्रस्तरं॑ धार॒य-

का० १, अ० ३, ब्रा० ३, कं० ४-१२ शतपथब्राह्मण / ५७
को तर करता है। पौधों की जड़ें तर होती हैं। आगे के भाग शुष्क भी हों, तो भी जड़ें तर ही
रहती हैं ॥४॥
अब ग्रन्थियों को खोलकर बर्हि के सिरों से प्रस्तरों को लेता है यह मन्त्र पढ़कर (यजु०
२।२) - "तू विष्णु की चोटी है।" यज्ञ विष्णु है। यह उसका स्तूप या शिखा है। इस यज्ञ में वह
इसको शिखा बनाता है। आगे के सिरे से लेता है क्योंकि शिखा आगे होती है। इसीलिए आगे से
लेता है ॥५॥
वह बर्हि के पूले को खोलता है, यह सोचकर कि यजमान की पत्नी बिना कष्ट के बच्चा
जने। उसको वेदी की दाहिनी श्रोणि में रखता है, क्योंकि यह यजमान की कमर का प्रतिनिधि
है। इसलिए दाहिनी श्रोणि में रखता है। वह उसको बर्हि से छा देता है, क्योंकि कमर भी कपड़ों
से ढकी रहती है। उसके छा देने का दूसरा हेतु यह हैं ॥६॥
अब वह बर्हि को वेदी पर बिछाता है। प्रस्तर आगे का सिरा है। यज्ञ के लिए दूसरी
घास ऐसी ही है जैसे चोटी से इतर स्थान के लोम। यह उन लोमों का सम्पादन करता है। इस-
लिए बर्हि को बिछाता है ॥७॥
वेदी स्त्री है। उसके चारों ओर देवता और वेद के विद्वान् ब्राह्मण बैठते हैं। स्त्री को
नग्न नहीं होना चाहिए, इसलिए भी बर्हि को बिछाता है ॥८॥
जितनी वेदी है उतनी ही पृथिवी है। बर्हि ओषधि का रूप हैं। मानो वह पृथिवी में
ओषधियां रखता है। इस पृथिवी में ये ओषधियां स्थापित हो जाती हैं। इसलिए वह बर्हि को
बिछाता है ॥६॥
कुछ लोग कहते हैं कि बहुत-से कुश बिछाना चाहिए। क्योंकि पृथिवी पर जहां पौधे बहुत
होते हैं वहां जीविका भी बहुत होती है, इसलिए बहुत बिछाना चाहिए। तीन बार बिछाना
चाहिए क्योंकि यज्ञ त्रिवृत् है। ऐसा बिछावें कि सिरे ऊपर को रहें। ऋषि ने कहा था (यजु०
७।३२) 'जड़ को नीचे की ओर रखना चाहिए।' पृथिवी में पौधों की जड़ें भी नीचे को होती हैं।
इसीलिए जड़ों को नीचे की ओर करके ही बिछाना चाहिए ॥१०॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर बिछाता है (यजु० २।२)—"ऊन के समान नरम तुझको देवों
के लिए प्रिय बिछाता हूँ।" ऊन के समान नरम इसलिए कहा कि देव सुख से बैठ सकें ॥११॥
अब अग्नि को ठीक करता है। आहवनीय अग्नि यज्ञ का सिर है - पूर्वार्ध सिर। इसको
यज्ञ का पूर्वार्ध करता है। जब आग को ठीक करता है तो ऊपर प्रस्तर को उठाये रखता है। प्रस्तर
स्तूप या चोटी है। मानो वह उसको धारण कराता है। इसीलिए प्रस्तर को इसके ऊपर-ऊपर

५८ शतपथ ब्राह्मण
न्क॑ल्पयति ॥१२॥ अथ॑ परि॒धीन्प॑रि॒दधा॑ति । तद्य॒त्परि॒धीन्प॑रि॒दधा॑ति॒ यत्र॒ वै दे॒वा
अग्रे॒ऽग्निग्ं॑ होत्रा॑य॒ प्रावृ॑णत॒ तद्धो॑वाच॒ न वा॒ऽअ॒हम॒लमि॒दमु॑त्सहे॒ यद्धो होता॒ स्यां
यद्धो ह॒व्यं वहे॑यं॒ त्रीन्पूर्वा॒न्प्रावृ॑ङ्क्त॒ ते प्राध्व॑न्विपु॒स्तान्नु मे॒ऽवक॑ल्पय॒ताथ॑ वा॒ऽअ॒ह-
मे॒तदु॑त्साह्ये॒ यद्धो होता॒ स्यां यद्धो ह॒व्यं वहे॑य॒मिति॒ तथेति॒ तान॑स्मा॒ऽए॒तान॑वा-
कल्प॒यंस्त॒ऽए॒ते प॑रि॒धयः॑ ॥१३॥ स हो॑वाच । व॒ज्रो वै ता॒न्वष॑ट्कारः॒ प्रावृ॑ण॒ग्व-
ज्राद्धि वष॑ट्कारा॒द्बिभे॑मि॒ यन्मा॒ व॒ज्रो वष॑ट्कारो॒ न प्र॒वृञ्ज्या॒त्तैरे॒व मा॒ परि॑धत्त॒ तथा॑
मा॒ व॒ज्रो वष॑ट्कारो॒ न प्र॒वर्क्ष्य॑तीति॒ तथेति॒ तमे॒तैः पर्य॑दधु॒स्तं न व॒ज्रो वष॑ट्कारः॒ प्रा-
वृ॑णा॒त्तद्धर्मै॒वैतदग्रे॑ नह्यति॒ यदे॒तैः परि॒दधा॑ति ॥१४॥ तऽउ॒ हैतू॑चुः । इ॒दमु॑ चे-
द॒स्मान्य॒ज्ञे यु॒ङ्क्थास्त्वे॒वास्मा॑कमपि य॒ज्ञे भाग॒ऽइति॑ ॥१५॥ तथेति॑ दे॒वा अ॑ब्रुवन् ।
यद्वहि॑ष्परि॒धि स्कन्त्स्य॑ति॒ तद्यु॒ष्मासु॑ हु॒तमथ॒ यद॑ उप॒र्युप॑रि हो॒ष्यन्ति॑ तद्वो॒ऽविष्य॑-
तीति॒ स यद॒ग्नौ जु॒होति॒ तदे॑नानवत्यथ॒ यदे॑नाननुप॒र्युप॑रि जु॒होति॒ तदे॑नानव-
त्यथ॒ यद्वहि॑ष्परि॒धि स्कन्द॑ति॒ तदे॑तेषु॑ हु॒तं तस्मा॑दु ह॒ नाग-इ॑व स्क॒न्नग्ं॑ स्यादि॒-
मां वै ते प्रावि॑श॒न्यद्वा॒ऽइ॒दं किं॑च॒ स्कन्द॑त्य॒स्यामे॒व तत्सर्वं॒ प्रति॑तिष्ठति ॥१६॥ स
स्क॒न्नम॑भि॒मृश॑ति । भुव॑पतये॒ स्वाहा॒ भुव॑नपतये॒ स्वाहा॑ भू॒तानां॒ पत॑ये॒ स्वाहेत्ये॒-
तानि॒ वै तेषा॑म॒ग्नीनां॒ नामा॑नि॒ यद्भुव॑पति॒र्भुव॑नपतिर्भू॒तानां॒ पति॒स्तद्यथा॑ वषट्कृ॒तग्ं॑
हु॒तमे॒वम॑स्यै॒तेष्व॒ग्निषु॑ भवति ॥१७॥ तद्धैके॑ । इ॒ध्मस्यै॒वैतान्परि॒धीन्प॑रि॒दध॑ति॒ तदु॑
तथा॒ न कु॑र्याद॒नवकॢ॑प्ता ह॒ तस्यै॒ते भ॑वन्ति॒ यानि॑ध्मस्य परि॒दधा॒त्यभ्या॑धानाय॒ ह्ये-
वेध्मः॑ क्रि॒यते॒ तस्यो॒ हैवैनैते॒ऽवकॢ॑प्ता भवन्ति॒ यस्यै॒तान॒न्याना॒हर॑ति॒ परि॒धय॒ऽइति॑
तस्मा॑द॒न्यानि॒वाह॑रेयुः ॥१८॥ ते वै पा॑ला॒शाः स्युः॑ । ब्रह्म॒ वै प॒लाशो॒ ब्रह्मा॒ग्नि-
र॒ग्नयो॒ हि तस्मा॑त्पाला॒शाः स्युः॑ ॥१९॥ यदि॑ पाला॒शान्न वि॒न्देत् । अथो॒ऽअपि॑
वैक॑ङ्कता स्यु॒र्यदि॑ वैक॑ङ्कता॒न्न वि॒न्देदथो॒ऽअपि॑ कार्ष्मर्यम॒याः स्यु॒र्यदि॑ कार्ष्मर्यम॒यान्न
वि॒न्देदथो॒ऽअपि॑ बैल्वाः॑ स्यु॒स्थो खा॑दि॒रा अथो॒ऽऔदु॑म्बरा ए॒ते हि वृ॒क्षा य॒ज्ञिया॑-

कां० १, अ० ३, ब्रा० ३, क० १२-२० शतपथब्राह्मण / ५६
उठाये रखकर अग्नि को ठीक करता है ॥१२॥
अब आग के चारों ओर तीन परिधियाँ (लकड़ियाँ) रखता है। परिधियां इसीलिए रखी
जाती हैं। जब देवों ने अग्नि को होता के रूप में वरण किया तो अग्नि बोला-“मुझे उत्साह नहीं
कि होता बनूँ और हव्य को ले जाऊँ । तुमने पहले तीन होता बनाये थे, वे लुप्त हो गये। उनको
मुझे दिला दो, तब मैं तुम्हारा होता बनूँगा और हव्य को ले जाऊँगा।" तब उन्होंने इन तीन
परिधियों की कल्पना की ॥१३॥
उसने अब कहा-“वषट्कार रूपी वज्र ने उन तीनों (होताओं) को मार डाला था। मुझे
डर है कि वषट्कार मुझे भी मार डाले। इसीलिए इन तीन परिधियों की स्थापना कर दो। तब
वषट्कार मुझे मार नहीं सकेगा।" उन्होंने इसीलिए इन तीन परिधियों की स्थापना कर दी और
वषट्कार उसको मार न सका। ये तीन परिधियाँ मानो उस अग्नि के लिए वर्म हैं ॥१४॥
तब (दूसरी अग्नियों ने) कहा- "यदि तुम हमारे साथ इस प्रकार यज्ञ में शामिल हो तो
हमको भी यज्ञ में भाग दो" ॥१५॥
देवों ने उत्तर दिया- "अच्छा, जो परिधियों के बाहर गिर जाय वह तुम्हारा, और जो
आहुति तुममें ही दी जाय वह तुम्हारी, जो आहुति अग्नि में दी जाय वह तुम्हारी।" इस प्रकार
जो आहुति अग्नि में दी जाती है वह इन अग्नियों की तृप्ति के लिए होती है। जो आहुतियां उन्हीं
परिधियों पर दी जाती हैं वे भी उनकी तृप्ति के लिए होती हैं, और जो परिधियों के बाहर
गिर जाता है वह भी उन्हीं की आहुति है। इस प्रकार जो आज्य गिर पड़ता है उसका पाप नहीं
लगता, क्योंकि जब अग्नियां जाने लगीं तो पृथिवी में प्रविष्ट हो गईं। जो गिरा वह पृथिवी में
ही तो रहेगा ॥१६॥
जो गिर जाता है उसको वह इस मन्त्रांश (यजु० २।२) को पढ़कर स्पर्श करता है—
'भुवपतये स्वाहा, भुवनपतये स्वाहा, भूतानां पतये स्वाहा।' भुवपति, भुवनपति और भूतपति
अग्नियों के नाम हैं। वषट्कार कहकर जो आहुति दी जाती है वह उसी देवता की होती है
जिसका नाम लिया जाता है। यहाँ ये आहुतियां इन्हीं अग्नियों की हैं जिनका नाम लिया जाता
है ॥१७॥
कुछ लोग समिधाओं में से ही लेकर परिधियाँ बना देते हैं। उनको ऐसा नहीं करना
चाहिए। समिधाएँ अग्नि पर रखने के लिए बनाई जाती हैं, अतः वे परिधियों के योग्य नहीं होतीं।
अतः अलग से ही परिधियाँ बनानी चाहिएँ ॥१८॥
ये पलाश वृक्ष की होनी चाहिएँ। पलाश ब्राह्मण है। अग्नि भी ब्राह्मण है। इसलिए
अग्नियां पलाश की होनी चाहिएँ ॥१९॥
यदि पलाश न मिले तो विकंकत की हों। विकंकत की न हों तो कार्ष्मर्य की हों। कार्ष्-
मर्य की न हों तो बेल की हों, या खदिर की, या उदुम्बर की। यही वृक्ष यज्ञ के योग्य हैं। इन्हीं