शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-६, ब्राह्मण-४
स्यादे॒वमे॒वैन॑मे॒तद्ब॑हू॒नां म॑ध्या-
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त्सा॒धवे॒ कर्म॑णे जु॒षते॒ स रा॑तमना॒ ऋश्वनाय॒ भव॑ति ॥ ७॥ दे॒वास्त्वा॑ देव॒यज्या॑यै जु-
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षन्ता॒मिति॑ । तद्धि समृ॑द्धं॒ यं दे॒वाः सा॒धवे॒ कर्म॑णे जु॒षन्ते॒ तस्मा॑दाह दे॒वास्त्वा॑ देव-
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य॒ज्या॑यै जुषन्ता॒मिति॑ ॥ ८॥ अथ॑ स्रु॒वेणो॑प॒स्पृश॑ति । विष्ण॑वे॒ त्वेति॑ वै॒ष्ण॒वो हि यू-
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पो य॒ज्ञो वै विष्णु॑र्य॒ज्ञाय॒ ह्येनं॑ वृ॒श्चति॒ तस्मा॑दाह॒ विष्ण॑वे॒ त्वेति॑ ॥ ९॥ अथ॑ दर्भत-
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रु॒णक॒मन्त॑र्दधाति । ओष॑धे॒ त्राय॑स्वेति॒ वज्रो॒ वै प॑र॒शुस्तथो॒ हैन॑मे॒ष वज्रः॑ पर॒शुर्न॑
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हि॒नस्त्यथ॑ पर॒शुना॒ प्रह॑रति स्वधि
काँ० ३, अ० ६, ब्रा० ३-४, कं० २१ व १-११ शतपथब्राह्मण / ४५५
नहीं खाते क्योंकि जब तक आहुति न पड़ जाय, हवि का भाग न खाना चाहिए। इसलिए दीक्षित
का अन्न नहीं खाना चाहिए। अब वह अँगुलियों को ढीला कर लेता है ॥२१॥
अध्याय ६-ब्राह्मण ४
यूप को काटते हुए विष्णु-सम्बन्धी ऋचा से आहुति देता है। यूप विष्णु का है। इसलिए
विष्णु की ऋचा से आहुति देता है ॥१॥
वह विष्णु की ऋचा से क्यों आहुति देता है ? यज्ञ ही विष्णु है। इस प्रकार यज्ञ के द्वारा
ही यूप तक पहुँचता है। इसलिए विष्णु की ऋचा से आहुति देता है ॥२॥
यदि स्रुच् से आहुति देता है तो चार चमचे की लेकर आहुति देता है। और यदि स्रुवा
से आहुति देता है तो स्रुवा से ही घी में से थोड़ा भाग लेकर आहुति देता है, इस मन्त्र से—
“ऊरु विष्णो विक्रमस्वोरु क्षया॑य॒ नस्कृधि। घृतं घृतयोने पिब प्रप्र य॒ज्ञप॑तिं तिर॒ स्वाहा॑” (यजु०
५।४१)—“हे यज्ञ ! तुम फूलो-फलो। तुम हमारे लिए विस्तृत घर बनाओ। हे घृत के घर, घृत
पियो और यजमान को तारो” ॥३॥
जो घी बच रहता है उसे ले लेता है। जो औजार बढ़ई का है उसे बढ़ई ले लेता है। अब
वे चलते हैं। और जो लकड़ी यूप के लिए निश्चित की जाती है—॥४॥
उसको इस मन्त्र का जाप करते हुए छूते हैं। ये पीछे खड़े होकर और पूर्व की ओर मुँह
करके उसको नमस्कार करते हैं—‘‘अत्य॒न्वाँ२ऽ अगां नाभ्याँ२ऽ उपागाम् (यजु० ५।४२)—‘‘मैं
दूसरों को छोड़ आया। मैं दूसरों के पास तक नहीं गया।” वस्तुतः वह दूसरों को छोड़ जाता है
और उनके पास तक नहीं जाता। इसलिए वह कहता है कि ‘अत्यन्वां’ इत्यादि ॥५॥
“अर्वा॑क् त्वा परे᳭भ्योऽविदं परो᳭ऽवरेभ्यः” (यजु० ५।४२)—“तुझको मैंने दूर चीजों से
निकट और निकटों से दूर पाया।” वस्तुतः जब वह इसको काटकर गिराता है तो जो दूर हैं
उनकी अपेक्षा निकट गिराता है और जो निकट हैं उनकी अपेक्षा दूर गिराता है। इसलिए कहता
है ‘अर्वाक् त्वा’ इत्यादि ॥६॥
“तं त्वा जुषामहे देव॒ वनस्पते देव॒यज्या॑यै” (यजु० ५।४२)—‘‘हे वनस्पते, देवों के यज्ञ के
लिए हम तुझको पसन्द करते हैं।” जैसे किन्हीं अच्छे कार्यों के लिए कई पदार्थों में से एक को
छाँट लेते हैं और वह छँटा हुआ पदार्थ उत्तमता से उस कार्य को सम्पादित करता है, इसी प्रकार
इस वृक्ष को कई वृक्षों में से शुभ-कर्म के लिए छाँटते हैं, और यह वृक्ष काटने के लिए उपयुक्त
होता है ॥७॥
“दे॒वास्त्वा देवय॒ज्यायै॑ जुषन्ताम्” (यजु० ५।४२)—“तुझको देव देवताओं के यज्ञ के लिए
पसन्द करें।” जिसको देवतागण किसी साधु कर्म के लिए पसन्द कर लेते हैं वह अवश्य ही सफल
होता है, इसलिए कहा ‘देवास्त्वा’ इत्यादि ॥८॥
अब वह स्रुवा से उसको छूता है—‘‘विष्णवे त्वा” (यजु० ५।४२)—“विष्णु के लिए
तुझको।” विष्णु का यूप है। विष्णु यज्ञ है। यज्ञ के लिए ही उसको काटता है, इसलिए कहता है
‘विष्णवे’ ॥६॥
अब वह बीच में एक दर्भ रख देता है—‘‘ओषधे॒ त्राय॑स्व” (यजु० ५।४२)—‘‘हे ओषधे,
तू बचा।” परशु वज्र है। इस प्रकार वह वज्र परशु उसको हानि नहीं पहुँचाता। अब परशु से
मारता है “स्वधि॑ते॒ मैनं॒ हि॑ सीः” (यजु० ५।४२)—‘‘हे परशु, इसको न मार।” परशु वज्र है।
परन्तु वह परशु वज्र इस प्रकार उसे हानि नहीं पहुँचाता ॥१०॥
पहली चीपुटी जो काटता है उसे अलग रख देता है। उसको इस प्रकार काटना चाहिए
तं वाऽअन॒नस्तम्भं वृश्चेद्यदे॒नेनमनसा वृण॒क्ति तथानो न प्रति॒बाध॑ते ॥ ११॥
तं प्राचं॑ पातयेत् । प्राची॒ हि दे॒वानां॒ दिग्थोऽउदच॑मुदीची॒ हि म॑नु॒ष्याणां॒ दिग्-
थो प्रत्य॑ञ्चं दक्षिणायै त्वे॒वैनं दिशः॒ परि॑ब्रिवाधिषेतेषा वै दिक् पि॒तृणां॒ तस्मा॑देनं
दक्षि॑णायै दिशः परि॑ब्रिब्राधिषेत ॥ १२॥ तं प्रच्यव॑मानमनुमन्त्रयते । द्यां मा ले-
खौर॒न्तरि॑क्षं मा हिंसीः पृथि॒व्या सम्भ॑वेति वज्रो॒ वाऽए॒ष भव॑ति यं यूपाय॑ वृश्च॒-
न्ति तस्मा॒द्धवा॒त्प्रच्यव॑मानादि॒मे लोकाः स॒म्त्र॑सन्ते तदे॒भ्य ए॒वैनमेतल्लोकेभ्यः शम-
यति तथै॒मांल्लोका॒ञ्छा॒न्तो न॑ हिनस्ति ॥१३॥ स यदाह । द्यां मा लेखी॒रिति दि-
वं मा॑ हिं॒सीरित्ये॒वैतदा॒हान्तरि॑क्षं मा हिं॒सीरिति नात्र॑ तिरो॒हित॑मिवास्ति पृ-
थिव्या सम्भ॑वेति पृथिव्या संजा॒नीष्वेत्ये॒वैतदा॒हाथ॑ हि वा स्वधि॑तिस्तेति॒जानः
प्रणिणाय॒ महते॒ सौभ॑गायेत्येष ह्ये॑नꣳ स्वधि॑तिस्तेज॒मानः प्र॒णय॑ति ॥ १४॥ अथा-
व्र॒श्चनम॑भिहु॒होति । नेद॒तो नाष्ट्रा रक्षा॑ꣳस्यनूत्ति॒ष्ठानी॑ति वज्रो वाऽआज्यं॒ तद्व॒जे-
णैवैतन्नाष्ट्रा रक्षा॑ꣳस्यवबाधते॒ तथातो नाष्ट्रा रक्षा॑ꣳसि॒ नानूत्तिष्ठ॑न्त्यथो रे॒तो वा
ऽआज्यं॒ तद्वनस्प॒तिष्वे॒वैतद्रेतो॑ दधाति तस्मा॑देतस आव्र॒श्चनाद्वनस्पतयॊऽनु॒ प्रजाय-
न्ते ॥ १५॥ स जु॒होति । अत॑स्त्वं देव वनस्पते श॒तव॑ल्शो विरोह सहस्र॑वल्शा
वि व॒यꣳ रु॑हे॒मेति॒ नात्र॑ तिरो॒हित॑मिवास्ति ॥ १६॥ तं प॒रिवासयति । स याव-
न्तमे॒वाग्रे परि॑वासयेत्तावा॒न्त्स्यात् ॥ १७॥ प॒ञ्चार॑त्निं प॒रिवासयेत् । पाङ्क्तो य॒ज्ञः पा-
ङ्क्तः प॒शुः प॒ञ्चर्त्तवः संवत्स॒रस्य तस्मात्प॒ञ्चार॑त्निं प॒रिवासयेत् ॥ १८॥ षडर॑त्निं प॒-
रिवासयेत् । षडा॒ऽऋतवः संवत्स॒रस्य संवत्स॒रो व॒ज्रो व॒ज्रो यूपस्तस्मा॑त्षड॒रत्निं
प॒रिवासयेत् ॥ १९॥ अ॒ष्टार॑त्निं प॒रिवासयेत् । अ॒ष्टाक्ष॑रा वै गाय॒त्री पूर्वा॒र्धो वै य-
ज्ञस्य गाय॒त्री पूर्वा॒र्ध ए॒ष य॒ज्ञस्य तस्मा॑दष्टा॒रत्निं परि॑वासयेत् ॥ २०॥ नवा॒रत्निं प॒-
रिवासयेत् । त्रिवृद्वै य॒ज्ञो नव॒ वै त्रिवृत्तस्मा॒न्नवा॒रत्निं परि॑वासयेत् ॥ २१॥ एका-
दशार॑त्निं प॒रिवासयेत् । ए॒काद॑शाक्षरा वै त्रि॒ष्टुब्व॒ज्रस्त्रिष्टुब्व॒ज्रो यूपस्तस्मा॑देकाद-
का० ३, अ० ६, ब्रा० ४, कं० ११-२२ शतपथब्राह्मण / ४५७
कि धुरे को हानि न पहुँचे। चूंकि वे गाड़ी में ले जाते हैं, इसलिए ऐसा करने से गाड़ी में कोई
रुकावट नहीं होती। (अर्थात् वृक्ष को काटते समय नीचे से काटना चाहिए जिससे गाड़ी उस ठूंठ
के ऊपर से निकल सके और गाड़ी का धुरा अटक न जाय) ॥११॥
उसको पूर्व की ओर गिरावे क्योंकि पूर्व देवों की दिशा है, या उत्तर की ओर क्योंकि
उत्तर मनुष्यों की दिशा है, या पश्चिम की ओर। परन्तु दक्षिण की ओर गिरने से बचाना
चाहिए क्योंकि दक्षिण पितरों की दिशा है। इसलिए दक्षिण की ओर गिराना नहीं
चाहिए ॥१२॥
उस गिरते हुए वृक्ष को सम्बोधन करके यह मन्त्र पढ़े—"द्यां मा लेखीरन्तरिक्षं मा
हिँ॒सीः पृथिव्या सम्भव” (यजु० ५।४३)—“द्योलोक को मत छील, अन्तरिक्ष को हानि मत
पहुँचा। पृथिवी से मिल।” जो वृक्ष यूप के लिए काटा जाता है वह वज्र हो जाता है। इस वज्र से
ये लोक काँप जाते हैं। इसलिए वह इस प्रकार इन लोकों के लिए उसको शान्त करता है। इस
प्रकार शान्त हुआ वह इनको हानि नहीं पहुँचाता ॥१३॥
‘द्यां मा लेखी:’ का तात्पर्य है कि द्योलोक को हानि न पहुँचा। ‘अन्तरिक्षं मां हिँ॒सी:’
तो स्पष्ट है। ‘पृथिव्या सम्भव’ से मतलब है कि तू पृथिवी के अनुकूल हो जा। “अयँ॒ हि त्वा
स्वधितिस्तेतिजानः प्रणिनाय महते सौभागाय” (यजु० ५।४३)—“इस तेज परशु ने तुझको बड़े
सौभाग्य के लिए आगे बढ़ाया है।” क्योंकि वह तेज कुल्हाड़ी ही तो इसको आगे को बढ़ाती
है ॥१४॥
अब ठूंठ पर आहुति देता है कि कहीं वहाँ से दुष्ट राक्षस न निकल पड़ें। घी वज्र है।
इस वज्ररूपी घी से दुष्ट राक्षसों को रोकता है। इस प्रकार दुष्ट राक्षस उसमें से उत्पन्न नहीं
होते। या घी वीर्य है। वह इस प्रकार वृक्ष को वीर्य-युक्त करता है, और उस ठूंठ के वीर्य में से
वृक्ष उत्पन्न होते हैं ॥१५॥
इस मन्त्र से आहुति देता है—“अतस्त्वं देव वनस्पते शतवल्शो विरोह सहस्रवल्शा वि
वयँ॒ रुहेम’ (यजु० ५।४३)—“हे वनस्पते, तू इसमें से सौ कुल्होंवाला होकर उग, और हम
हजार कुल्हेवाले होकर उगें।” यह स्पष्ट है ॥१६॥
अब वह उसे काटता है। जितना पहले काटा जाय उतना ही रहने देना चाहिए ॥१७॥
पाँच हाथ (अरत्नि) भरके काटना चाहिए। यज्ञ पाँच अंगोंवाला है। पशु भी पाँच
अंगोंवाला है। साल में ऋतुएँ भी पाँच होती हैं। इसलिए पाँच हाथ का काटना चाहिए ॥१८॥
या छः हाथ-भर काटे। वर्ष में छः ऋतुएँ होती हैं। वर्ष वज्र है। यूप वज्र है। इसलिए
छः हाथ का काटना चाहिए ॥१९॥
या आठ हाथ-भर काटे। आठ अक्षर की गायत्री होती है। गायत्री यज्ञ का पूर्वार्ध है।
इसलिए आठ हाथ-भर काटे ॥२०॥
या नौ हाथ का काटे। यज्ञ तीन अंगवाला होता है, और नौ तीन अंगोंवाला है। इस-
लिए नौ हाथ का काटे ॥२१॥
या ग्यारह हाथ का काटे। त्रिष्टुप् में ११ अक्षर होते हैं। त्रिष्टुभ् वज्र है। यूप भी