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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-३, ब्राह्मण-४

६० शतपथ ब्राह्मण
स्त्स्मादेतेषां वृ॒क्षाणां भवन्ति ॥ २०॥ ब्राह्मणम् ॥ ६ [३.३.]॥ ॥ द्वितीयः प्रपाठ-
कः ॥ ॥ कण्डिकासंख्या १२२ ॥ ॥
ते वाऽआर्द्राः स्युः । एतद्ध्येषां जीव॑नेन॒ स॒तेजस॒ एतेन॒ वी॒र्यवन्तस्तस्मादार्द्राः
स्युः ॥ १॥ स॒ मध्यममेवाग्रे । परिधिं परिदधाति गन्धर्वस्त्वा विश्वावसुः॒ परि॑दधातु
विश्व॒स्यारि॑ष्ट्यै य॒जमानस्य परि॒धिर॒स्य॒ग्निरिड॒ ईडित इति॑ ॥ २॥ अथ॒ दक्षिणं परि॑-
दधाति । इन्द्र॑स्य बा॒हुर॑सि॒ दक्षि॑णो विश्व॒स्यारि॑ष्ट्यै यजमानस्य परि॒धिर॒स्य॒ग्निरिड॒
ईडित इति॑ ॥ ३॥ अयो॒त्तरं परिदधाति । मित्रावरुणौ वोत्तरतः॒ परि॑धत्तां ध्रुवेण॒
ध॒र्मणा विश्व॒स्यारि॑ष्ट्यै यजमानस्य परि॒धिर॒स्य॒ग्निरिड॒ ईडित इत्यग्नयो॒ हि त्स्मा-
दाहा॒ग्निरिड॒ ईडित इति॑ ॥ ४॥ अथ स॒मिधमभ्यादधाति । स॒ मध्यममवापि परिधि-
मुपस्पृशति तेनैतानग्रे॒ स॒मिन्धेऽथाग्रावभ्यादधाति तेनो॒ऽअग्निं प्रत्य॒क्तं स॒मिन्धे
॥ ५॥ सोऽभ्या॑दधाति । वीतिहोत्रं त्वा कवे द्युमन्तं॒ समिधीमहि । अग्ने बृ॒हन्त-
मध्वर॒ऽइत्येतया गायत्र्या गायत्रीमेवैतत्त्समिन्धे सा गायत्री समिद्धान्य॒ानि छन्दां॑-
सि स॒मिन्धे छन्दां॑सि समिद्धानि देवेभ्यो यज्ञं वहन्ति ॥ ६॥ अथ यां द्वितीयाᳪ स॒मिध-
मभ्यादधाति । वस॒न्तमिव तथा स॒मिन्धे स॒ वस॒न्तः स॒मिद्धोऽन्या॒नृतूंत्स॒मिन्ध्यृतवः स-
मिद्धाः प्र॒जाश्च प्र॒जनयन्त्योषधीश्च पचन्ति सोऽभ्यादधाति समिदसीति समिद्धि वस॒न्तः
॥ ७॥ अथाभ्याधाय जपति । सूर्यस्त्वा पुरस्तात्पातु कस्याश्चिदभिशस्त्याऽइति गुप्तिं वा-
ऽअभितः परिधयो भवन्त्येतत्सूर्यमेव॒ पुरस्ताद्गोप्तारं करोति ने॒त्पुरस्तान्नाष्ट्रा॒ रक्षां-
स्यभ्यवचरान्निति सूर्यो हि नाष्ट्राणाᳪ रक्षसामपहन्ता ॥ ८॥ अथ यमिवामूं॒ तृती-
याᳪ स॒मिधमभ्यादधाति । अनूयाजेषु ब्राह्मणमेव तथा स॒मिन्धे स ब्राह्मणः स॒मि-
द्धो दे॒वेभ्यो यज्ञं वहति ॥ ९॥ अथ स्तीर्णां वे॒दिमुपावम॑र्ते । स द्वे तृ॒णेऽआदाय
ति॒रश्ची॒ निद॑धाति सवितुर्बा॒हू स्थ इत्ययं वै स्तूपः प्रस्तरोऽथास्यैते भुवाविव ति-
र॒श्ची॒ निद॑धाति तस्मादिमे तिर॒ञ्चौ भुवौ क्षत्रं वै प्रस्तरो विशोऽनतरं बर्हि क्ष-

कां० १, अ० ३, ब्रा० ४, कं० १-१० शतपथब्राह्मण / ६१
से परिधियाँ लेनी चाहिएँ ॥२०॥
अध्याय ३-ब्राह्मण ४
वे हरी होनी चाहिएँ । यही हरापन उनका जीवन है। इसी से उनमें शक्ति रहती है।
इसीलिए हरी होनी चाहिएँ ॥१॥
बीच की परिधि के पहले (अग्नि के पश्चिम की ओर) यह मंत्र (यजु० २।३) पढ़कर
रखता है—"गन्धर्व विश्वावसु तुझको विश्व के कल्याण के लिए रक्खे । तू यजमान की परिधि
(रक्षक) है। तू पूज्य अग्नि है" ॥२॥
दक्षिण की परिधि को यह पढ़कर रखता है—"तू इन्द्र की दाहिनी भुजा है, विश्व की
शान्ति के लिए। तू यजमान की परिधि (रक्षक) है। तू पूज्य अग्नि है" ॥३॥
अब उत्तर की ओर परिधि को यह पढ़कर रखता है—"मित्र और वरुण देवता तुझको
उत्तर की ओर रक्खें, ध्रुव नियम से विश्व के कल्याण के लिए। तू यजमान की परिधि है। तू
अग्नि है। ये परिधियाँ अग्नि ही हैं।" इसीलिये कहता है कि 'तुम पूज्य अग्नि हो' ॥४॥
अब एक समिधा रखता है। पहले वह समिधा से बीच की परिधि को छूता है। इस
प्रकार वह तीन परिधियों को जलाता है। फिर वह उस समिधा को आग पर रख देता है। इससे
वह प्रत्यक्ष अग्नि को जलाता है ॥५॥
वह इसको गायत्री छन्द से (यजु० २।४) रखता है—"हे कवि अग्नि, तुझ देवों को बुलाने
वाले, प्रकाश-स्वरूप को हम जलाते हैं, यज्ञ में बलवान् तुझको।" इस प्रकार वह गायत्री को
जलाता है। गायत्री जलकर दूसरे छन्दों को जला देती है और दूसरे छन्द जलकर यज्ञ को देवों
तक ले जाते हैं ॥६॥
अब वह दूसरी समिधा रखता है। उससे वह वसन्त को प्रज्वलित करता है। वह प्रज्वलित
वसन्त दूसरी ऋतुओं को प्रज्वलित करता है। प्रज्वलित ऋतुएँ सन्तान को उत्पन्न करती हैं,
ओषधियों को पकाती हैं। वह इस मन्त्र (यजु० २।५) को पढ़कर रखता है—"तू समित् ।" वस्तुतः
वसन्त समित् है ॥७॥
अब उसको रखकर जपता है—"सूर्य तेरी पूर्व की ओर से रक्षा करे और अन्य बुराई से
भी।" परिधियाँ चारों ओर से रक्षा के लिए होती हैं। इस प्रकार वह पूर्व में सूर्य को रक्षक बना
देता है कि कहीं पूर्व से दुष्ट राक्षस विघ्न न करें। सूर्य दुष्ट राक्षसों को मारनेवाला है ॥८॥
यह जो तीसरी समिधा को अनुयाज के पीछे रखता है, उससे वह ब्राह्मण को प्रज्वलित
करता है। प्रज्वलित होकर ब्राह्मण देवों तक हवि ले जाता है ॥९॥
अब वह कुशों से ढकी हुई वेदी तक लौटता है। दो तृणों को लेकर टेढ़ा रख देता है,
इस मन्त्र (यजु० २।५) से—"तुम सविता की भुजाएँ हो।" प्रस्तर स्तूप या चोटी है। वह इन
दोनों को भौंहों के समान तिरछा रख देता है। इसीलिये भौंहें टेढ़ी होती हैं। प्रस्तर क्षत्रिय है