शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-१, ब्राह्मण-४
यत्सूर्य॑स्य र॒श्मयस्त॒स्मादाह॒ सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॒रिति॑ ॥ ६॥ ताः स॒व्ये पा॒णौ कृ॒त्वा ।
दक्षि॑णेनोदि॒ङ्ग्यत्युप॒स्तौत्ये॒वैना ए॒तन्म॒हय॑त्येव दे॒वीरापो॒ऽअग्रे॑गुवो॒ऽअग्रे॑पुव॒ इति॑
दे॒व्यो ह्यप॒स्तस्मा॑दाह दे॒वीराप इत्य॑ग्रेगुव॒ इति॑ ता यत्समु॒द्रं गच्छ॑न्ति तेना॑ग्रेगुवो
ऽग्रे॑पुव॒ इति॑ ता यत्प्र॑थमाः सो॒मस्य॒ राज्ञो भ॒क्षय॑न्ति तेना॑ग्रेपुवो॒ऽग्रऽइ॒मम॒द्य य॒ज्ञं
न॑यताग्रे य॒ज्ञप॑तिं सु॒धातुं य॒ज्ञप॑तिं देव॒युव॒मिति॑ साधु य॒ज्ञꣳ साधु यज॑मानमित्ये॒वैत-
दाह॒ ॥ ७॥ यु॒ष्मा इन्द्रो॒ऽवृणीत वृ॒त्रतूर्य॒ऽइति॑ । ए॒ता उ हीन्द्रो॒ऽवृणीत वृ॒-
त्रेण॒ स्पर्ध॑मान ए॒ताभि॒र्ह्येन॑महंस्त॒स्मादाह यु॒ष्मा इन्द्रो॒ऽवृणीत वृ॒त्रतूर्य॒ऽइति॑
॥ ८॥ यू॒यमिन्द्र॑मवृणीध्वं वृ॒त्रतूर्य॒ऽइति॑ । ए॒ता उ हीन्द्र॑मवृणत वृ॒त्रेण॒ स्पर्ध॑मान-
मे॒ताभि॒र्ह्येन॑महंस्त॒स्मादाह यू॒यमिन्द्र॑मवृणीध्वं वृ॒त्रतूर्य॒ऽइति॑ ॥ ९॥ प्रोक्षिता स्थेति॑ ।
तदे॒ताभ्यो॒ निह्नु॑ते ऽथ ह॒विः प्रोक्ष॑त्येको वै प्रोक्षण॑स्य बन्धुर्मेध्य॑मे॒वैतत्क॑रोति ॥ १०॥
स प्रोक्ष॑ति अ॒ग्नये॑ त्वा जुष्टं॒ प्रोक्षा॒मीति॑ तद्य॒स्यै दे॒वता॑यै ह॒विर्भव॑ति॒ तस्यै॑ मे॒ध्यं क-
रोत्ये॒वमे॒व यथा॒पूर्व॑ꣳ ह॒वीꣳषि प्रोक्ष्य॑ ॥ ११॥ अथ यज्ञपात्रा॑णि प्रोक्ष॑ति । दैव्या॑य
कर्म॑णे शुन्धध्वं देव॒यज्या॑या॒ऽइति॑ दैव्या॑य हि कर्म॑णे शुन्ध्य॑ति देव॒यज्या॑यै यद्वो
ऽशुद्धाः परा॑जघ्नुरि॒दं वस्तच्छुन्धामीति॑ तद्य॒द्वैषा॑मत्रा॒शुद्ध॑स्त॒क्षा वा॒न्यो वामेध्यः क-
श्चित्परा॑ह॒न्ति तदे॒वैषा॑मे॒तद॒द्भिर्मेध्यं॑ करोति॒ तस्मा॑दाह॒ यद्वो॒ऽशुद्धाः परा॑जघ्नुरि॒दं
व॒स्तच्छुन्धामीति॑ ॥ १२॥ ब्राह्मणम् ॥३॥
अथ कृष्णाजिनमादत्ते । य॒ज्ञस्यै॒व सर्व॑त्वाय य॒ज्ञो ह दे॒वेभ्यो॒ऽपच॑क्राम स कृ॒ष्णो
भू॒त्वा च॑चार॒ तस्य॑ दे॒वा अनु॑विद्य॒ त्वच॑मे॒वाव॑च्छायाञ्चक्रुः ॥ १॥ तस्य॒ यानि॑ शु॒क्लानि॑
च कृ॒ष्णानि॑ च लोमा॑नि । ता॒न्यृचां च साम्नां च रू॒पं यानि॑ शु॒क्लानि॒ तानि॒ साम्नाꣳ
रू॒पं यानि॑ कृ॒ष्णानि॒ तान्यु॒चां यदि॑ वेत॒रथा॒ यान्ये॑व कृ॒ष्णानि॒ तानि॒ साम्नाꣳ रू॒पं
या॑नि शु॒क्लानि॒ तान्यु॒चां यान्ये॑व ब॒भ्रूणी॑व ह॒रीणि॒ तानि॒ यजु॑षाꣳ रू॒पम् ॥ २॥
सैषा त्रयी वि॒द्या य॒ज्ञः । तस्या ए॒तत्छिल्प॑मे॒ष व॒र्णिस्तद्यत्कृ॑ष्णाजि॒नं भव॑ति य॒ज्ञस्यै॒व
का० १, अ० १, ब्रा० ४, कं० १-३ शतपथब्राह्मण / १५
वायु जो बहता है छिद्ररहित पवित्रा है। "सूर्य की किरणों से" क्योंकि सूर्य की किरणें पवित्र करने
वाली हैं ॥६॥
बायें हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से उछालता है, स्तुति करते हुए और महत्ता दर्शाते
हुए (यजु० १।१२)—"देवी जलो ! आगे चलनेवाले, आगे पवित्र करनेवाले।" जल दिव्य हैं।
इसलिए कहा 'देवी रायः'। आगे चलकर समुद्र में जाते हैं इसलिए कहा 'अग्रे गुवः'। 'अग्रे पुवः',
क्योंकि पहले वे सोम का पान करते हैं। अब 'इस यज्ञ को आगे बढ़ाओ, यज्ञपति को, जो सुधातु
और देवों का प्रिय है।' इसके कहने का तात्पर्य है कि यज्ञ और पति ठीक हों ॥७॥
अब जपता है (यजु० १।३)—"हे जलो ! तुमको इन्द्र ने वृत्र की लड़ाई में साथी चुना।"
जब इन्द्र ने वृत्र को मारना चाहा तो जलों को चुना कि इन्हीं की सहायता से मैं वृत्र को मारूँगा।
इसलिए कहता है कि "हे जलो, वृत्र की लड़ाई में तुम इन्द्र के साथी हो" ॥८॥
"तुमने भी इन्द्र को वृत्र की लड़ाई में चुना"—(यजु० १।१३)। जब इन्द्र वृत्र से लड़ाई
कर रहा था तो जलों ने भी इन्द्र को चुना और उनकी सहायता से इन्द्र ने वृत्र को मारा। इसलिए
कहता है कि 'तुमने भी इन्द्र को वृत्र की लड़ाई में चुना' ॥९॥
यजु० १।१३ का यह अंश पढ़ता है—"तुम पवित्र हो गये।" हवि के ऊपर जल
छिड़ककर उसको पवित्र करता है। इस पवित्रीकरण का भी वही तात्पर्य है। इसीलिए ऐसा करता
है ॥१०॥
वह पवित्र करते समय इस मन्त्रांश को पढ़ता है—"अग्नि के लिए तुझको पवित्र करता
हूँ।" जिस देवता के लिए हवि होती है उसी के लिए पवित्र की जाती है। यथापूर्व सब हवियों को
पवित्र करके ॥११॥
यज्ञ-पात्रों को पवित्र करता है इस मन्त्रांश (यजु० १।१३) को पढ़कर—"दिव्य कर्म के
लिए, देव-यज्ञ के लिए पवित्र होओ।" दिव्य कर्म के लिए शुद्ध करता है। देव-यज्ञ के लिए
तुम्हारा जो भाग छूने से अपवित्र हो गया, उसको मैं इस मन्त्र के द्वारा शुद्ध करता हूँ। बढ़ई ने
या किसी और ने छूकर इनको अशुद्ध कर दिया हो। इस अशुद्धि को वह इस प्रकार दूर करता
है। इसीलिए कहा कि 'अपवित्रों ने जो तुम्हारा अंश पवित्र किया हो उसको मैं पवित्र करता
हूँ' ॥१२॥
अध्याय १—ब्राह्मण ४
अब यज्ञ की पूर्णता के लिए काले मृग का चमड़ा लेता है। एक बार यज्ञ देवताओं से
भाग गया और काले मृग के रूप में विचरता रहा। देवताओं ने उसको खोज लिया और उसका
चमड़ा ले आये ॥१॥
उसके जो सफेद और काले लोम हैं वे ऋक् और साम का रूप हैं—सफेद साम का और
काले ऋक् का, या इससे उलटा अर्थात् काले साम का और सफेद ऋक् का। जो भूरे या खाकी
हैं वे यजुः का रूप हैं ॥२॥
यह त्रयी विद्या यज्ञ है। उसका जो शिल्प है वह काले मृग-चर्म के रूप में है। वह इस
१६ शतपथ ब्राह्मण
स॒र्व॒त्वाय॒ तस्मा॑त्कृष्णाजिनमधि॒ दीक्ष॑न्ते यज्ञस्यै॒व स॒र्व॒त्वाय॒ तस्मा॒द्यदव॑रुननमधि॒पे-
षणां भवत्यस्कन्नꣳ ह॒विरा॒सदिति॒ तय्द्ये॑वात्र॒ तण्डु॑लो वा पि॒ष्टं वा स्कन्दा॒त्तद्य॒ज्ञे
यज्ञः प्रति॑तिष्ठा॒दिति॒ तस्मा॒द्यदव॑रुननमधि॒पेष॑णं भवति ॥ ३॥ • अथ कृष्णाजिनमा-
द॒त्ते । शर्मा॒सीति॒ चर्म॒ वाऽए॒तत्कृ॒ष्णस्य॒ तद॑स्य तन्मानुषꣳ॒ शर्म॑ दे॒वत्रा तस्मा॑दाह
शर्मा॒सीति॒ तद॑वधूनोत्यवधूतꣳ॒ रक्षो॒ऽवधू॑ता॒ अरातय॒ इति॒ तन्ना॒ष्ट्रा ꣱ए॒वैत॒दप्ता॒-
स्यतो॒ऽपह॑न्त्यनिन्येव पात्राण्यवधूनोति य॒ज्ञास्यामेध्यमभूत्त॒द्द्वास्यै॒तदव॑धूनोति
॥ ४॥ तत्प्र॒तीची॒नग्रीव॒मुप॑स्तृणाति । अ॒दित्या॒स्त्वग॑सि॒ प्रति॒ त्वादि॑तिर्वे॒त्त्विति॒ वै
पृथि॒व्यदि॑तिस्तस्या अस्ये॒ लग्यदि॒दमस्या॒मधि॒ किंच॒ तस्मा॑दाहा॒दित्यास्त्वग॒सीति॒ प्रति॑
त्वादि॑तिर्वे॒त्त्विति॒ प्रति॒ हि स्वः सं॑ जानी॒ते तत्सं॑जाना॒मेवैतत्कृ॑ष्णाजिनाय च वदति
नेद॒न्यो॒ऽन्यꣳ॑ हि॒ꣳसा॒त॒ऽइत्य॒भिनि॑हितमेव॒ सव्ये॑न पाणिना भवति ॥ ५॥ अथ
दक्षि॑णेनो॒लूख॑ल॒माह्व॑रति । नेद्दि॒क्षु पु॒रा नाष्ट्रा॒ रक्षा॒ꣳस्यावि॑शानिति ब्राह्म॒णो
हि रक्ष॑सामपह॒न्ता तस्मा॑द॒भिनि॑हितमेव॒ सव्ये॑न पाणिना भवति ॥ ६॥ अथो-
लूख॑लं निद॑धाति । अद्रि॑रसि वानस्पत्यो॒ ग्रावा॑सि पृथुबु॒ध्न इति॒ वा तय्द्यै॒वादः
सोमꣳ॒ राजा॑नं॒ ग्राव॑भिरभिषु॒ण्वन्त्ये॒वमे॒वैत॒दुलूखलमुसलाभ्यां॒ दृषदुपलाभ्याꣳ॑ ह॒-
वि॒र्यज्ञ॑मभिषु॒णोत्य॒द्रय॒ इति॒ वै तेषा॒मेकं॒ नाम॒ तस्मा॑दाहा॒द्रिर॑सीति वानस्प॒त्य इति॑
वानस्प॒त्यो ह्येष॒ ग्रावा॑सि पृथुबु॒ध्न इति॒ ग्रावा॒ ह्येष॒ पृथु॑बु॒ध्नो ह्येष॒ प्रति॒ वादि॑-
त्यास्त्वग्वेद्वीति॒ तत्सं॑जाना॒मेवैतत्कृ॑ष्णाजिनाय च वदति ने॒दन्यो॒ऽन्यꣳ॑ हिꣳसात॒
ऽइति ॥ ७॥ अथ ह॒विराव॑पति । अ॒ग्नेस्त॒नूर॑सि वाचो विस॒र्जन॒मिति॑ यज्ञो॒ हि
तैनाग्नेस्त॒नूर्वाचो॑ विस॒र्जन॒मिति॒ यां वाऽअ॒मृतꣳ॑ ह॒विर्गृही॒ष्वन्वाचं॑ य॒त्यत्र॒ वै तां॑
विसृ॑जते॒ तय्द्ये॑ताम॒त्र वाचं॑ विसृ॒जत॒ऽएष हि यज्ञ उलूखले प्रत्यष्ठा॑दिष हि॒ प्रा-
सारि॒ तस्मा॑दाह वाचो विस॒र्जन॒मिति॑ ॥ ८॥ स यदि॒दं पु॒रा मानु॑षीं वाचं॒ व्याहृ॒-
त्तेत् । तत्रो॑ वैष्ण॒वीमृचं॑ वा॒ यजु॑र्वा जपेद्य॒ज्ञो वै वि॒ष्णुस्तद्य॒ज्ञं पुन॒रार॑भते तस्यो
का० १, अ० १, ब्रा० ४, कं० ३-६ शतपथब्राह्मण / १७
चमड़े को यज्ञ की पूर्णता के लिए लेता है, इसलिए काले मृग-चर्म पर ही दीक्षा ली जाती है। यज्ञ
की पूर्णता के लिए चर्म को लेते हैं, इसलिए चावलों के कूटने-फटकने का काम भी इसी पर किया
जाता है, जिससे हवि न फैले। यदि कुछ भाग गिरेगा भी, तो इसी पर गिरेगा और यज्ञ की पूर्णता
नष्ट न होगी। इसीलिए कूटने-फटकने का काम चर्म पर किया जाता है ॥३॥
कृष्ण मृग-चर्म लेते समय यजु० १।१४ के इस अंश का जाप करता है—"तू शर्म या
कल्याणकारक है।" इसका मानुषी नाम है चर्म और दैवी नाम है शर्म। इसीलिए कहा 'तू शर्म¹
हैं'। अब इसी मन्त्र के अगले टुकड़े को बोलकर उसे झाड़ता है—'राक्षस झाड़ दिये गये, शत्रु
झाड़ दिये गये।' ऐसा करके वह राक्षस या शत्रुओं को दूर करता है। पात्रों से हटकर झाड़ता है,
जो कुछ उसमें अपवित्र हो उसको झाड़ता है ॥४॥
अब उसकी गर्दन का भाग पश्चिम की ओर करके इस प्रकार बिछाता है कि बाल ऊपर
को रहें, यजु० १।१४ का अगला भाग पढ़कर—'तू अदिति का चमड़ा है। अदिति तुझको स्वीकार
करें।' पृथिवी अदिति है। उसके ऊपर जो कुछ हो वह उसका चमड़ा है। इसीलिए कहता है, 'तू
अदिति का चर्म है, अदिति तुझे स्वीकार करे।' अपना अपने को स्वीकार करता है। कृष्ण मृग-
चर्म को इसलिए ऐसा करता है कि चर्म और पृथिवी में सम्बन्ध स्थापित किया जाय और एक-
दूसरे को न सतावें। जब वह बायें हाथ में पकड़ा होता है उसी समय—॥५॥
दाहिने हाथ से उखली पकड़ता है कि कहीं इस बीच में राक्षस वहाँ न आ जायें। ब्राह्मण
राक्षसों का घातक होता है, अतः जबकि बायें हाथ में चमड़ा पकड़ा होता है, तभी—॥६॥
उखली को रख देता है, यह कहकर—"तू पत्थर है वनस्पति का—चौड़ा पत्थर" (यजु०
१।१४)। जैसे सोमयज्ञ में सोमलता को पत्थरों पर पीसते हैं, उसी प्रकार यहाँ भी हवि को उखली
और मूसल से कूटते हैं; इनका सामान्य नाम 'अद्रि' है। इसलिए कहा 'तू अद्रि (पत्थर) है'।
'वनस्पति का' इसलिए कहा कि वह सिल लकड़ी की होती है। 'चौड़ा पत्थर है' इसलिए 'चौड़ा
पत्थर' कहा। 'अदिति का चमड़ा तुझे स्वीकार करे'—यह इसलिए कहा कि चमड़े और उखली में
सम्बन्ध हो जाय और एक-दूसरे को हानि न पहुँचायें ॥७॥
अब यजु० १।१५ के एक टुकड़े को पढ़कर हवि डालता है—"तू अग्नि का शरीर है, वाणी
को मुक्त करनेवाला।" चावल यज्ञ के लिए हैं, इसलिए उसको 'अग्नि का शरीर' कहा। 'वाणी
को मुक्त करनेवाला' इसलिए कहा कि जब गाड़ी से चावल लेने गया था, उस समय मौन धारण
किया था। अब उस मौन को तोड़ता है। मौन तोड़ने का हेतु यह है कि अब यज्ञ उखली में
स्थापित हो गया उसका प्रसार हो गया। इसीलिए कहा कि 'तू वाणी को मुक्त करनेवाला
हैं' ॥८॥
यदि इस बीच में (मौन के समय) कुछ लौकिक शब्द मुँह से निकल जायें तो ऋक् या
यजुः से कोई विष्णु का मन्त्र बोलना चाहिए। यज्ञ विष्णु है। इस प्रकार यज्ञ का आरम्भ हो जाता
१. शर्म का अर्थ है कल्याणकारक। चर्म और शर्म में थोड़ा ही भेद है। चर्म भी शरीर के लिए
कल्याणकारक होता है।
१८ शतपथ ब्राह्मण
द्वेषा प्राय॑श्चित्तिर्देव॒वीत॑ये त्वा गृ॒ह्णा॒मीति॑ दे॒वानव॑दित्य॒ हि ह॒विर्गृह्णाति॑ ॥ ९ ॥ अथ॑
मु॒सल॒माद॑त्ते । बृह॒द्ग्रावा॑सि वानस्प॒त्य इति॑ बृह॒द्ग्रावा॒ ह्येष॑ वानस्प॒त्यो ह्येष॑ त-
द्वद॑धाति॒ स इदं दे॒वेभ्यो॑ ह॒विः शमी॑ष्व सु॒शमि॑ शमी॒ष्वेति॑ स॒ इदं दे॒वेभ्यो॑ ह॒विः
सꣳस्कु॑रु साधुसꣳस्कृतꣳ॑ सꣳस्कु॒र्वित्ये॒वैतदा॑ह ॥ १० ॥ अथ॑ हवि॒ष्कृत॒मुद्वा॑दयति । ह-
वि॒ष्कृदेहि॑ हवि॒ष्कृदेहीति॒ वाग्वै ह॑वि॒ष्कृद्वाच॑मे॒वैतद्विसृ॑जते॒ वागु॒ वै य॒ज्ञस्तद्य॒ज्ञ-
मे॒वैतत्पुन॒रुप॑ह्वयते ॥ ११ ॥ तानि वाऽए॒तानि॑ । च॒त्वारि॑ वाच ए॒हीति॑ ब्राह्म॒ण-
स्याग॒ह्याद्र॑वेति वैश्य॑स्य च राज॒न्यब॑न्धोश्चाधा॒वेति॑ शू॒द्रस्य॒ स यदे॒व ब्राह्म॑णस्य॒ त-
द्धैतद्धि य॒ज्ञिय॑तममे॒तदु॑ ह॒ वै वाचः॒ शान्त॑तमं यदे॒हीति॒ तस्मा॑दे॒हीत्ये॒व ब्रू॑यात्
॥ १२ ॥ तद्ध॒ स्मैतत्पु॒रा । जा॒यैव ह॑वि॒ष्कृदुपोत्ति॑ष्ठति॒ तदि॒दमप्ये॒तर्हि॒ य ए॒व कश्चो-
पोत्ति॑ष्ठति॒ स यत्रै॒ष ह॑वि॒ष्कृत॒मुद्वा॑दयति॒ तदे॒को दृष॑दुप॒ले समा॒हन्ति॒ तद्यदे॒तामत्र॑
वाचं॑ प्रत्यु॒द्वाद॑यन्ति ॥ १३ ॥ मनो॒र्ह वाऽऋ॒षभ आ॑स । तस्मि॑न्नसुर॒घ्नी स॑पत्न॒घ्नी वा-
क्यप्र॑विष्टास॒ तस्य॑ ह स्म श्वस॒थाद॑वथादसुररक्ष॒सानि॑ मृ॒द्यमा॑नानि यन्ति॒ ते हासु॑-
राः समू॑दिरे पा॒पं वत नो॒ऽयमृ॑ष॒भः सच॑ते क॒थं न्वि॒मं द॑भ्नुया॒मेति॑ किलाताकुली
ऽइति॑ हासुरब्रह्म॒सावा॑सतुः ॥ १४ ॥ तौ हो॑चतुः । श्रद्धादे॒वो वै म॒नुरावं॒ नु वे॑दावे-
ति॒ तौ हा॑गत्योचतुर्मनो याजयाव वेति॒ केने॒त्यने॒नर्ष॑भेणेति॒ तथेति॒ तस्यालब्ध॑स्य
सा वाग॑पचक्राम ॥ १५ ॥ सा मनो॒रेव जा॒यां म॑ना॒वीं प्र॑विवेश । तस्यै॑ ह॒ स्म यत्र॑
वद॑न्त्यै शृ॒ण्वन्ति॒ ततो॑ ह॒ स्मैवा॑सुररक्ष॒सानि॑ मृ॒द्यमा॑नानि यन्ति॒ ते हासु॑राः समू॑दिरे
ऽइ॒तो वै नः पापी॑यः सचते॒ भूयो॒ हि मानु॑षी॒ वाग्वद॒तीति॑ किलाताकुली॒ हैवो॑चतुः
श्रद्धादे॒वो वै म॒नुरावं॒ न्वेव॑ वेदावेति॒ तौ हा॑गत्योचतुर्मनो याजयाव वेति॒ केने॑-
त्य॒नयै॑व जा॒ययेति॒ तथेति॒ तस्याऽआल॑ब्धायै॒ सा वाग॑पचक्राम ॥ १६ ॥ सा य॒ज्ञमेव॑
य॒ज्ञपात्रा॑णि प्र॒विवेश॑ । ततो॒ हैनां॒ न शे॑कतुर्नि॒र्हर्तुꣳ सैषा॑सुर॒घ्नी वागुद्व॑दति॒ स
यस्य॒ हैवं॑ वि॒दुष ए॒तामत्र॒ वाचं॑ प्रत्यु॒द्वाद॑यन्ति पा॒पीयाꣳ॑सो है॒वास्य स॒पत्न॑ा भव-
कां० १, अ० १, ब्रा० ४, कं० ६-१७ शतपथब्राह्मण / १६
है, और यह मौन तोड़ने का प्रायश्चित्त भी है। अब जपता है—"देवों की प्रसन्नता के लिए मैं
तुझको लेता हूँ।" वस्तुतः देवों की प्रसन्नता के लिए ही यज्ञ किया जाता है ॥६॥
अब यजु० १।१४ के इस अंश को पढ़कर मूसली पकड़ता है—"तू लकड़ी का बड़ा पत्थर
हैं।" क्योंकि यह लकड़ी का भी है और बड़ा भी। अब इस मन्त्रांश (यजु० १।१४) को पढ़कर
मूसली ऊखली में डालता है—"देवों के लिए हवि तैयार कर। अच्छी तरह तैयार कर।" तात्पर्य
यह है कि इस हवि को देवों के लिए तैयार कर, जल्दी से तैयार कर ॥१०॥
अब वह हविष्कृत् (हवि तैयार करनेवाले) को बुलाता है—"हविष्कृत् आ, हविष्कृत्
आ।" वाणी ही हविष्कृत् है, इस प्रकार वाणी को मुक्त करता है। वाणी यज्ञ है, इस प्रकार वह
यज्ञ को फिर बुलाता है ॥११॥
बुलाने के चार प्रकार हैं—ब्राह्मण को बुलाना हो तो कहेंगे 'एहि', वैश्य के लिए
'आगहि', क्षत्रिय के लिए 'आद्रव', शूद्र के लिए 'आधाव'। इस स्थल पर ब्राह्मणवाला निमंत्रण
देना चाहिए, क्योंकि यही यज्ञ के उपयुक्त है और शान्ततम है। अतः कहता है, 'एहि' (यहाँ
आइये) ॥१२॥
पहली प्रथा यह थी कि इस निमन्त्रण पर यजमान की पत्नी ही उठकर हविष्कृत् बनती
थी। इसलिए यहाँ भी वह (पत्नी) या कोई ऋत्विज उठता है। जब अध्वर्यु हविष्कृत् को बुलाता
है तो एक ऋत्विज दोनों सिलों को पीटता है। ऐसा शोर क्यों करते हैं ? इसलिए कि—॥१३॥
मनु के पास एक बैल था। उसमें असुर को मारनेवाली और शत्रु को मारनेवाली
वाणी घुस गई। जब वह हुङ्कारता और चिल्लाता तो असुर राक्षस मर जाते थे। तब असुरों ने
कहा—"यह बैल तो हमारा बड़ा अनर्थ करता है, इसको कैसे मारें ?" 'असुरों के ऋत्विज थे
'किलात' और 'आकुली' ॥१४॥
ये दोनों बोले—"कहते हैं कि मनु श्रद्धालु है, इसको जांचें।" तब वे मनु के पास गये
और कहा—"हे मनु, हम तुम्हारे लिए यज्ञ करना चाहते हैं।" मनु ने पूछा—'किससे ?' उन्होंने
कहा—"इस बैल से।" उसने कहा-"अच्छा।" बैल के मरने पर वाणी वहाँ से चली गई ॥१५॥
वह मनु की पत्नी मनावी में घुस गई। जब वह उसको बोलते हुए सुनते तो राक्षस
और असुर मर जाते। तब असुरों ने कहा—"यह तो और भी बुरा हुआ, क्योंकि (बैल की अपेक्षा)
मनुष्य अधिक बोलता है।" तब किलात और आकुली ने कहा—"मनु को श्रद्धालु कहते हैं, चलो
इसकी जाँच करें।" वे उसके पास गये और कहा—"हम तुम्हारे लिए यज्ञ करना चाहते हैं।"
मनु ने पूछा—"किससे ?" उन्होंने कहा—"इस तेरी पत्नी से।" उसने कहा—"अस्तु !" उसके
मर जाने पर वाणी उसमें से निकल गई ॥१६॥
अब यह यज्ञ और यज्ञ-पात्रों में घुस गई और वे दोनों (किलात और आकुली) उसको
न निकाल सके। यही असुर और शत्रु को मारनेवाली वाणी इन पत्थरों से निकलती है। जो
इस रहस्य को समझता है, उसके लिए जब यह शोर किया जाता है तो उसके शत्रुओं को बहुत