सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-३, ब्राह्मण-३

क॒नीयाग्॑सो॒ हि दे॒वा मनु॒ष्येभ्यो॑ऽथ॒ यद्भूय॑ऽइ॒वोत्त॑रां॒ भूयाग्॑सो॒ हि मनु॒ष्या॑ दे॒वे-
भ्योऽथ॒ यद्भूय॑ इव सुचि॒ परि॑शि॒नष्टि॒ भूयाग्॑सो॒ हि पश॑वो मनु॒ष्येभ्यः॑ क॒नीयाग्॑सो
ह॒ वाऽअ॒स्य भार्या॑ भवन्ति॒ भूयाग्॑सः प॒शवो॒ य ए॒वं वि॒द्वान॒ग्निहोत्रं॑ जु॒होति॒ तद्ध॑
समृद्धं॒ यस्य॑ क॒नीयाग्॑सो भा॒र्या अ॑स॒न्भूयाग्॑सः प॒शवः॑ ॥ १८ ॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ ४ [३.२.] ॥
॥ द्वितीयः प्रपाठकः ॥ ॥ कण्डिकासंख्या १०३ ॥ ॥
यत्र॒ वै प्र॒जाप॑तिः प्र॒जाः स॑सृ॒जे । स य॒त्राग्निग्॑ ससृ॒जे स इदं॒ जातः॒ सर्व॑मेव दु॒-
ग्धुं द॑धृ॒ऽइत्ये॒वाबि॑लमेव ता यास्तर्हि॑ प्र॒जा आ॑सु॒स्ता ह्ये॑नग्ं स॒म्पेष्टुं॑ दधिरे सो॒-
ऽतिति॑क्षमाणः पु॒रुष॑मे॒वाभ्ये॑याय ॥ १ ॥ स होवाच । न वाऽअ॒र्हमि॒दं तितिक्षे
ह॒न्त वा प्रवि॑शानि॒ तं मा॑ जनयि॒त्वा बि॑भृहि॒ स य॑थैव॒ मां त्वम॒स्मिल्लो॒के ज॑नयि॒-
त्वा भ॑रि॒ष्यस्ये॒वमे॒वाहं त्वा॑म॒मुष्मिंल्लो॒के ज॑नयि॒त्वा भ॑रिष्या॒मीति॒ तथेति॒ तं ज॑नयि॒-
त्वा॑बिभ्रः ॥ २ ॥ स यद॒ग्नीऽआ॒धत्ते॑ । तदे॑नं॒ जन॑यति॒ तं ज॑नयि॒त्वा बिभ॑र्ति॒ स यथा॒
है॒वैष ए॒तम॒स्मिल्लो॒के ज॑नयि॒त्वा बिभ॒र्त्येव॒मु है॒वैष ए॒तम॒मुष्मिंल्लो॒के ज॑नयि॒त्वा बि-
भ॑र्ति ॥ ३ ॥ तन्न स॒म्युद्वा॑सयेत । सा॒मि ह्य॑स्मे॒ स ग्ला॑यति॒ स यथा॒ है॒वैष ए॒तस्मा॒-
ऽअ॒स्मिल्लो॒के सा॒मि ग्लाय॑त्ये॒वमु॒ है॒वैष ए॒तस्मा॒ऽअ॒मुष्मिंल्लो॒के सा॒मि ग्ला॑यति॒
तस्मा॒न्न स॒म्युद्वा॑सयेत ॥ ४ ॥ स यत्र॒ म्रिय॑ते । यत्रैनम॒ग्नावभ्याद॑धति॒ तद्दे॒षोऽग्ने॑रधि॒-
जाय॑ते॒ स ए॒ष पु॒त्रः स॒न्पिता॑ भवति ॥ ५ ॥ तस्मा॑दे॒तदृषि॑णा॒भ्यनू॑क्तम् । श॒तमिन्नु
श॒रदो॒ऽअन्ति॑ दे॒वा यत्रा॑ नश्च॒क्रा ज॒रसं॑ तनू॒नाम् । पु॒त्रासो॒ यत्र॑ पि॒तरो॒ भव॑न्ति॒ मा
नो॒ मध्या री॑रिष॒तायु॒र्गन्तो॒रिति॑ पु॒त्रो ह्ये॑ष स॒न्त्स पुन॑: पि॒ता भव॑त्ये॒तन्नु॒ तद्य॑स्मा-
द॒ग्नीऽआ॒दधी॑त ॥ ६॥ तद्वाऽए॒ष ए॒व मृत्युः॑ । य ए॒ष तप॑ति॒ तद्य॑दे॒ष ए॒व मृत्यु॒-
स्तस्मा॒द्या ए॒तस्माद॑र्वाच्यः प्र॒जास्ता म्रिय॑न्ते॒ऽथ याः परा॑च्य॒स्ते दे॒वास्तस्मा॒डु ते॒ऽमृ-
तास्त॒स्यिमाः सर्वा॑: प्र॒जा र॒श्मिभि॑: प्रा॒णेष्व॒भिहि॑ता॒स्तस्मा॒डु र॒श्मय॑: प्रा॒णानन्व॑वताय॒-
न्ते ॥ ७ ॥ स यस्य॑ काम॒यते॑ । तस्य॑ प्रा॒णमा॒दायोदे॑ति॒ स म्रिय॑ते॒ स यो॒ हैतं मृत्यु॒म्-

कां० २, अ० ३, ब्रा० ३, कं० १-८ शतपथब्राह्मण / २४३
अधिक इसलिए डालता है कि मनुष्य देवों से अधिक हैं। स्रुक् में सबसे अधिक इसलिए छोड़ता
है कि पशु मनुष्यों से भी अधिक हैं। जो कोई समझकर अग्निहोत्र करता है उसके आश्रित मनुष्यों
(भार्य) की अपेक्षा पशु अधिक होते हैं। जिसके भार्य (आश्रित मनुष्य) कम और पशु अधिक
हों, उसी को समृद्ध पुरुष कहते हैं ॥१८॥
अध्याय ३—ब्राह्मण ३
जब प्रजापति ने प्रजा उत्पन्न की और अग्नि उत्पन्न की तो यह उत्पन्न होते ही सबको
जलाने लगी, और सबने उससे बचना चाहा, और जो प्रजा थी उसने उसको बुझाना चाहा। यह
सहन न करके वह पुरुष के पास आई ॥१॥
उसने कहा—"मैं यह सहन नहीं कर सकती। तुझमें घुस जाऊँ। तू मुझे उत्पन्न करके
पालन कर। जैसा तू इस लोक में मुझे जन्म देकर पालन करेगा वैसा ही परलोक में तुझे जन्म
देकर पालन करूँगी।" उसने कहा-"अच्छा।" उसने उसे उत्पन्न किया और पालन किया ॥२॥
जब वह दो अग्नियों का आधान करता है तो उनको उत्पन्न करता है और उत्पन्न करके
उनका पालन करता है। और जैसा वह इसका इस लोक में उत्पन्न करके पालन करता है, वैसा
ही वह (अग्नि) उस लोक में उसको उत्पन्न करके उसका पालन करता है।
इस अग्नि को अधूरा न हटावे। यदि इसको अधूरा हटा देगा तो जिस प्रकार अग्नि को
इस लोक में ह्रास करेगा, उसी प्रकार अग्नि उस लोक में उसका भी ह्रास कर देगा। इसलिए
उसको अग्नि को अधूरा न हटाना चाहिए ॥४॥
और जब वह मरता है और उसे अग्नि पर रखते हैं तो वह अग्नि से ही उत्पन्न होता
है। जो (अग्नि) अब तक उसका पुत्र था, वह अब उसका पिता हो जाता है ॥५॥
इसीलिए ऋषि ने कहा था-"शतमिन्नु शरदोऽअन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः" (यजु० २५।२२; ऋ० १।८६।६)
—"हे देवताओ, सौ वर्ष हमारे सामने हैं जब तुम हमारे शरीरों के बुढ़ापे को करते हो। जब पुत्र
पिता हो जाते हैं आप हमारी पूरी होनेवाली आयु को बीच में मत काटो।" क्योंकि जो (अग्नि)
अब तक पुत्र था अब पिता हो गया। यही कारण है कि अग्न्याधान करना चाहिए ॥६॥
यह जो सूर्य है वह मृत्यु है, इसलिए उससे इस ओर की प्रजा मर जाती है। और जो
उससे परली ओर हैं अर्थात् देव, वे अमर रहते हैं। ये सब प्रजाएँ किरणों द्वारा प्राणों में स्थित
हैं। इसीलिए किरणें प्राणों तक जाती हैं ॥७॥
यह सूर्य जिसको चाहता है उसके प्राण लेकर उदय होता है और वह मर जाता है। जो

२४४ शतपथ ब्राह्मण
न॑तिमुच्या॒थामुं लो॒कमे॑ति॒ यथा॑ है॒वास्मिं॑ल्लो॒के न संय॑तमाद्रियते॒ यदा॒ यदै॑व का-
म॒येते॒ऽथ मार॑यन्त्येव॒मु है॒वामुष्मिं॑ल्लो॒के पु॑नःपुनरे॒व प्र॑मारयति ॥ ८॥ स य॒त्साय-
म॒स्तमि॑ते द्वेऽआहु॑ती जु॒होति॑ । त॒देताभ्यां पूर्वाभ्यां पद्भ्या॑मे॒तस्मिन्मृ॒त्यौ प्रति॑ति-
ष्ठ॒त्यथ य॒त्प्रात॑रनुदिते द्वेऽआहु॑ती जु॒होति॒ तदेताभ्याम॒पराभ्यां पद्भ्या॑मे॒तस्मिन्मृ॒त्यौ
प्रति॑तिष्ठति स॒ एन॒मेष उ॒द्यन्ने॒वादा॒योदे॑ति॒ तदे॒तं मृ॒त्युमति॑मुच्यते॒ तेषा॑ग्निहो॒त्रे
मृ॒त्योरति॑मुक्ति॒रिति॑ ह॒ वै पु॑नर्मृ॒त्युं मु॑च्यते॒ य ए॒वमे॒ताम॑ग्निहो॒त्रे मृ॒त्योरति॑मुक्तिं
वे॒द ॥ ९॥ यथा वाऽइ॒षोरनी॑कम् । ए॒वं य॒ज्ञानाम॑ग्निहो॒त्रं येन॒ वाऽइ॒षोरनी॑कमे-
ति॒ सर्व्वा॒ वै तेने॒षुरेत्ये॒तेनो॑ हास्य॒ सर्वे॑ य॒ज्ञक्रत॑व ए॒तं मृ॒त्युमति॑मुक्ताः ॥ १०॥ अ-
होरा॒त्रे ह॒ वाऽअ॒मुष्मिं॑ल्लो॒के परि॑प्लवमाने । पु॒रुष॑स्य सुकृ॒तं क्षि॑णुतो॒ऽर्वाची॑नं वा
ऽअ॒तोऽहो॑रा॒त्रे तथो॑ हास्या॒होरा॒त्रे सुकृ॒तं न क्षि॑णुतः ॥ ११॥ स यथा॒ रथो॑प॒स्थे
तिष्ठ॑न् । उ॒परिष्टा॑द्रथच॒क्रे प॒ल्यङ्ग॑माने॒ऽउपा॑वे॒क्षेतै॒वं प॒रस्ता॑द॒र्वाची॑नो॒ऽहोरा॒त्रेऽउ-
पावे॑क्षते॒ न ह॒ वाऽअ॒स्याहो॑रा॒त्रे सुकृ॒तं क्षि॑णुतो॒ य ए॒वमे॒ताम॑होरा॒त्रयोरति॑मुक्तिं
वे॒द ॥ १२॥ पूर्वे॑णा॒हव॑नीयं परी॒त्य । अ॒न्तरे॑ण गा॒र्हप॑त्यं चैति॒ न वै दे॒वा म॑नु॒ष्यं॑
वि॒दुस्त॒ऽएन॑मेतद॒न्तरे॑णाति॒यन्तं॑ वि॒दुरयं वै न इदं जु॑होतीत्य॒ग्निर्वै पा॒प्मनो॑ऽप॒ह-
न्ता ताव॒स्याहव॑नीयश्च गा॒र्हप॑त्यश्चा॒न्तरे॑णाति॒यतः पा॒प्मान॒मप॑हतः॒ सोऽप॑हतपा-
प्मा ज्योति॑रेव॒ श्रिया य॒शसा॑ भवति ॥ १३॥ उत्त॑रतो वाऽअ॒ग्निहो॒त्रस्य॒ द्वार॑म् ।
स॒ यथा॒ द्वारा॒ प्रप॑द्येतै॒वं तद्यो दक्षि॑णात ए॒त्यास्ते॒ यथा॑ बहि॒र्धा च॑रेदे॒वं तत्
॥ १४॥ नौर्ह वाऽए॒षा स्व॒र्ग्या । यद॑ग्निहो॒त्रं त॒स्याऽए॒तस्यै ना॒वः स्व॒र्ग्याया आहु॑-
वनी॒यश्चै॑व गा॒र्हप॑त्यश्च नौम॒ण्डेऽअ॒थैष ए॒व ना॑वा॒जो यत्क्षी॑र॒होता ॥ १५॥ स य-
त्प्राङ्पोद॑िति । तदे॑नां प्राची॑म॒भ्यज॑ति स्व॒र्गं लो॒कम॒भि तया॑ स्व॒र्गं लो॒कं सम॑-
श्नुते॒ तस्या॒ उत्त॑र॒त् आरो॑हण॒ꣳ सेन॑ꣳ स्व॒र्गं लो॒कं स॒माप॑यत्यथ॒ यो दक्षि॑णात
ए॒त्यास्ते॒ यथा॑ प्रती॒र्णाया॒माग॒हेत्स वि॒हीये॑त स त॒त ए॒व बहि॒र्धा स्यादे॒वं तत् ॥ १६॥

कां० २, अ० ३, ब्रा० ३, क० ८-१६ शतपथब्राह्मण / २४५
इस मृत्यु से न बचकर उस लोक में जाता है, उसको बार-बार मारा जाता है, उसी प्रकार जैसे
इस लोक में कैदी पर सख्ती करते हैं और जब चाहते हैं तब मार डालते हैं ॥८॥
यह जो शाम को सूर्यास्त होने पर दो आहुतियां देता है वह इन दो अगले पैरों से इस
मृत्यु पर प्रतिष्ठा पाता है। और यह जो सूर्योदय से पूर्व ही आहुतियां देता है वह पिछले दो
पैरों से इस मृत्यु पर प्रतिष्ठा पाता है, और जब सूर्य निकलता है तो उसको लेकर मृत्यु से छूट
जाता है। यह अग्निहोत्र के द्वारा मृत्यु से छूटने का विधान है। जो इस प्रकार अग्निहोत्र द्वारा
मृत्यु से छुटकारे का ज्ञान रखता है, वह बार-बार की मौत से छूट जाता है ॥६॥
जैसे तीर की नोक होती है वैसे ही यज्ञ और अग्निहोत्र का सम्बन्ध है। जिधर तीर की
नोक जाती है उसी ओर तीर जाता है। इस (अग्निहोत्र) द्वारा सब यज्ञ मृत्यु से छूटने के साधन
हैं ॥१०॥
रात और दिन घूमते हुए मनुष्य के सुकृत को उस लोक में क्षीण कर देते हैं। परन्तु दिन
और रात उसके इस ओर हैं, इसलिए दिन-रात उसके सुकृत को क्षीण नहीं करते ॥११॥
और जैसे रथ में बैठे हुए ऊपर से रथ के घूमते हुए पहियों को देखता है, उसी प्रकार वह
ऊपर से दिन और रात को देखता है। और जो इस प्रकार दिन और रात से छुटकारा पाने का
भेद जानता है, उसके सुकृत को दिन और रात क्षीण नहीं कर सकते ॥१२॥
(यजमान) पूर्व की ओर से आहवनीय का चक्कर लगाकर उसके और गार्हपत्य के बीच
में होकर (अपने स्थान को) जाता है, क्योंकि (अभी) देव (इस) मनुष्य को पहचानते नहीं।
परन्तु जब वह बीच में से जाता है तो पहचानते हैं कि यही हमको आहुति देगा। अग्नि पाप का
नाशक है और आहवनीय और गार्हपत्य उसके पाप को नष्ट कर देते हैं जो उन दोनों के बीच में
होकर निकलता है। और उसका पाप नष्ट हो जाने पर भी वह श्री और यश से युक्त होकर
ज्योति हो जाता है ॥१३॥
अग्निहोत्र का द्वार उत्तर की ओर है। इसलिये वह ऐसे घुसता है मानो द्वार में होकर
घुसा। और जो दक्षिण से जाकर बैठ जाय तो मानो वह बाहर चला गया ॥१४॥
अग्निहोत्र स्वर्ग की नाव है। आहवनीय और गार्हपत्य उस स्वर्ग की नाव की दो तरफें
हैं, और दूध की आहुति देनेवाला मल्लाह है ॥१५॥
जब वह पूर्व की ओर चलता है तो मानो वह इस नाव को पूर्व की ओर स्वर्ग की ओर ले
जाता है और उसके द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त कर लेता है। उस पर उत्तर से चढ़ना उसको
स्वर्गलोक में ले जाना है। जो दक्षिण से घुसकर उसमें बैठता है तो ऐसा समझना चाहिए मानो
वह उस समय नाव में घुसने लगा जब वह चल पड़ी और वह पीछे ओर बाहर रह गया ॥१६॥