शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-४, ब्राह्मण-३
४०२ शतपथ ब्राह्मण
तत्त्वे॒तस्मा॑ऽउ हि गृह्णा॑ति॒ तस्मा॑दाहा॒पत॑ये त्वा॒ परि॑पतये गृह्णामीति ॥१०॥ त॒नू-
नप्त्रे॑ शाक्व॒रेति॑ । यो वाऽअ॒यं पव॑तऽए॒ष तनू॒नप्ता शाक्व॑र॒ ए॒तस्मा॑ऽउ हि गृ॒-
ह्णाति॒ तस्मा॑दाह त॒नूनप्त्रे॑ शाक्व॒रेति॑ ॥११॥ शक्वान॒ऽओजि॑ष्ठायेति॑ । ए॒ष वै
शक्वो॑जि॒ष्ठ ए॒तस्मा॑ऽउ हि गृह्णा॑ति॒ तस्मा॑दाह शक्वान॒ऽओजि॑ष्ठायेति॑ ॥१२॥ अथा॑-
तः सम॑वमृशन्त्येव॑ । ए॒तद् देवा भूयः॒ समा॑मिर॒ऽइत्थं नः सोऽमु॒थास॒द्यो न ए॒त-
द॑तिक्रामा॒दिति॒ तथोऽए॒वैत॒ऽएतत्स॑ममन्त॒ऽइत्थं नः सोऽमु॒थास॒द्यो न ए॒तद॑तिक्रा-
मा॒दिति॑ ॥१३॥ ते सम॑वमृशन्ति । अना॑धृष्टमस्यनाधृ॒ष्यं दे॒वाना॒मोज॑ इत्यनाधृ॒ष्टा
हि दे॒वा आस॒न्नना॑धृष्याः सह॒ सत्तः समा॑नं वदन्तः समा॑नं दधाना दे॒वाना॒मोज॒
इति दे॒वानां वै जुष्टास्तन्वः॑ प्रि॒याणि॒ धामा॑न्यनभिशस्त्यभिशस्तिपा अनभिशस्ते-
न्य॒मिति॒ सर्वा॑ऽउ हि दे॒वा अ॑भिशस्तीं स्ती॒र्णा अ॑ञ्जसा स॒त्यमु॑पगेष॒मिति स॒त्यं वदा-
नि॒ मेद॒मतिक्र॑मिष॒मित्ये॑वैत॒दाह॒ स्वि॒ते मा धा॒ इति॑ स्वि॒ते हि तद्दे॒वा आ॒त्मान-
मद॑धत य॒त्सत्य॑मवद॒न्यत्स॒त्यम॑कुर्वं॒स्तस्मा॑दाह स्वि॒ते मा धा॒ इति॑ ॥१४॥ अथ या-
स्तद्दे॒वाः । जु॒ष्टास्त॒नूः प्रि॒याणि॒ धामा॑नि सार्धं॒ सम॑वददिरे॒ तद्दि॒न्द्रे संन्य॑दध॒तैष
वाऽइ॒न्द्रो य ए॒ष तप॑ति॒ न ह वाऽए॒षोऽग्रे॑ तताप॒ यथा॒ हैवे॒दमन्य॒त्कृष्ण॑मेव॒ꣳ
हैवा॑स तेनै॒वैतद्वीर्ये॑ण तपति॒ तस्मा॑द्यदि ब॒ह्वो दी॒क्षेरन्गृहपतयऽएव व्रतमभ्यु-
त्सिच्य॑ प्रयच्छेयुः स हि तेषामिन्द्रभाजनं भवति॒ यद्यु दक्षिणावता दी॒क्षेत यज॑मा-
नायै॒व व्रतम॒भ्युत्सिच्य॑ प्रय॒च्छेयु॒रिद॒ꣳ ह्यङ्ग॒रिन्द्रो॑ यज॑मान॒ इति॑ ॥१५॥ अथ या-
स्तद्दे॒वाः । जुष्टा॑स्त॒नूः प्रि॒याणि॒ धामा॑नि सार्धं॒ सम॑वददिरे॒ तत्सार्धं॒ संन॑प्त्रे तत्सा-
मभवत्तस्मादाहुः स॒त्यꣳ साम दे॒वꣳ सामेति॑ ॥१६॥ ब्राह्मणम् ॥३ [४. २]॥ ॥
आतिथ्येन॒ वै दे॒वा इ॒ष्ट्वा । तात्त्समद॑विन्दन्त तानून॒त्रैः सम॑शाम्यं॒स्तऽए॒तस्य॑
प्राय॑श्चित्तिमीह॒न्यदन्योऽन्यं॑ पापमवद॒न्नाह पुरा॑वभृथा॒त्तु दी॒क्षामवा॒कल्प॑यं॒स्तऽए-
तामवा॑न्तरां दी॒क्षाम॑पश्यन् ॥१॥ ते॒ऽग्निनैव त्वचं विपु॑ल्याऽङ्कयत । तपो॒ वाऽअ-
कां० ३, अ० ४, ब्रा० २-३, कं० १०-१६ व १-२ शतपथब्राह्मण / ४०३
चलता है, चारों ओर चलता है। इसीलिए कहा कि 'आपतये त्वा' आदि ॥१०॥
“तनूनप्त्रे शाक्वराय” (यजु० ५।५)-“बलवान् तनूनप्तृ के लिए।” 'तनूनप्तृ शाक्वर'
से तात्पर्य है वायु। यह आज्य उसी के लिए ग्रहण करता है, इसलिए कहा 'तनूनप्त्रे' इति ॥११॥
“शक्वनेऽओजिष्ठाय” (यजु० ५।५)-“शक्तिवाले और ओज के लिए।” वस्तुतः वही
(वायु) शक्तिवाला और ओजवाला है। उसी के लिए वह ग्रहण करता है, इसलिए कहता है-
'शक्वने' इति ॥१२॥
अब वे इसको छूते हैं। देवतागण इस बात पर एकमत हो गये थे कि जो हममें से इसका
उल्लङ्घन करेगा उसकी यह गति होगी। इसी प्रकार यह होता और यजमान भी इस बात पर
एकमत हो जाते हैं कि जो कोई हममें से इसका उल्लङ्घन करेगा उसकी ऐसी गति होगी ॥१३॥
वे इस मन्त्र को बोलकर छूते हैं-“अनाधृष्ट मस्यनाधृष्यं देवानामोजः” (यजु० ५।५)-
“तू अजेय है (कोई तुझको जीत नहीं सकता) क्योंकि देवताओं का ओज अजेय होता है।”
क्योंकि देवता-गण जब एक मिलकर बोलते और एक-साथ रहते हैं तो अजेय होते हैं, कोई उन-
पर आक्रमण नहीं कर सकता। 'देवों के ओज' का अर्थ है उनके प्यारे शरीर और धाम अर्थात्
शक्तियाँ। अब कहा-“अनभिशस्त्यभिशस्तिपा ऽअनभिशस्तेन्यम्” (यजु० ५।५)-“जिन पर
शाप नहीं लगा, जो शाप से रक्षा करते हैं और जिनपर शाप नहीं लग सकता।” क्योंकि सब देव
शाप को पार कर जाते हैं। “अञ्जसा सत्यमुपगेषम्” (यजु० ५।५)-“सीधा सच को प्राप्त हो
जाऊँ।” इसका तात्पर्य है कि सत्य ही बोलूँ और व्रत का उल्लङ्घन न करूँ। अब कहा-“स्वित्ते
मा धाः” (यजु० ५।५)-“मुझे कल्याण में स्थापित कर।” क्योंकि निश्चय ही देवों ने अपने को
कल्याण में स्थापित किया जब उन्होंने सत्य बोला और जो सत्य था उसी को किया। इसीलिए
कहा-‘स्वित्ते मा धाः’ ॥१४॥
देवों ने जिन प्यारे शरीरों और धामों को इकट्ठा किया था उनको उन्होंने इन्द्र में स्थापित
कर दिया। निश्चय करके इन्द्र वही है जो वह तपता है. (अर्थात् सूर्य)। यह पहले तपता
(चमकता) नहीं था। यह ऐसा ही काला (अन्धकारमय) था जैसे अन्य सब। यह वही (देवों
का दिया हुआ) पराक्रम है जिससे वह चमकता है। इसलिए यदि बहुत-से दीक्षित होते हों तो
इस (तानूनप्त्र आज्य) को दूध मिलाकर गृहपति को ही देना चाहिए, क्योंकि गृहपति ही इन्द्र
के तुल्य है; और यदि दक्षिणा के साथ दीक्षा हो तो इस (आज्य) को दूध मिलाकर गृहपति को
ही देना चाहिए क्योंकि कहा भी है कि 'यजमान ही इन्द्र है' ॥१५॥
देवों ने जिन प्यारे शरीरों और धामों (शक्तियों) को इकट्ठा किया वह सब मिलाया
गया और वह साम हो गया। इसीलिए कहा है 'साम सत्य है, साम देवज (देवों से उत्पन्न हुआ)
है' ॥१६॥
अध्याय ४-ब्राह्मण ३
जब देव आतिथ्य-इष्टि कर चुके तो उनमें झगड़ा हो गया। इसको उन्होंने तानूनप्त्र
द्वारा शान्त किया और इच्छा करने लगे कि यह जो हमने एक-दूसरे की बुराई की है, उसका
प्रायश्चित्त होना चाहिए। अवभृथ स्नान से पहले उन्होंने कोई और प्रायश्चित्त रखा नहीं था।
इसलिए उन्होंने अवान्तरा-दीक्षा निकाली ॥१॥
अग्नि के द्वारा उन्होंने त्वचा से शरीर को ढक लिया। अग्नि का अर्थ है 'तप' और दीक्षा
४०४ शतपथ ब्राह्मण
ग्निस्त॒पो दी॒क्षा त॒दवान्तरां दी॒क्षामुपायंस्तद्यदवान्तरां दी॒क्षामुपायंस्तस्मादवान्तरदी-
क्षा संतरा॒मङ्गुलीराचन्त संतरां मेखलां पर्य॒स्तामेवैनामेतत्सतं पर्य॒स्यन्त तथो
ऽहैवैष एतद्यद॒तः प्राचीनमव्र॒त्यं वा करोत्यव्र॒त्यं वा वद॑ति तस्यै॒वैतत्प्रायश्चित्तिं
कुरुते ॥२॥ सोऽग्निनेव॒ त्वचं विपल्या॒ङ्ग्यते । तपो वाऽअ॒ग्निस्तपो दी॒क्षा त॒दवा-
न्तरां दी॒क्षामुपैति संतरा॒मङ्गुलीरचते संतरां मेखलां पर्य॒स्तामेवैनामेतत्सतं पर्य्-
स्यते प्र॒जाम् हैव तद्देवा उपा॑यन् ॥३॥ तेऽग्निनेव त्वच॒ विपल्या॒ङ्ग्यन्त । अ॒ग्निर्वै
मिथुन॒स्य क॒र्ता प्रजनयिता तत्प्र॒जामुपायंत्संतरा॒मङ्गुलीराचन्त संतरां मेखलां तत्प्र-
जामात्म॑न्नकुर्वत तथोऽहैवैष एतत्प्र॒जामेवो॑पैति ॥४॥ सोऽग्निनेव॒ त्वचं विपल्य-
ङ्ग्यते । अ॒ग्निर्वै मिथुनस्य कर्ता प्रजनयिता तत्प्र॒जामुपैति संतरा॒मङ्गुलीरचते संत-
रां मेखलां तत्प्र॒जामात्मन्कुरुते ॥५॥ दे॒वानाम् ह स्म दीक्षितानाम् । यः समि-
न्धारो वा स्वाध्यायं वा विमृ॒जते त॒द्ध स्मैतरस्यैवेतरꣳ रूपेणेतरस्येतरमसुररक्ष-
सानि जिघाꣳसन्ति ते ह पापं वदत उपसमे॑युरिति वै मां त्वम॒चिकीर्षीरिति मा-
जिघाꣳसीरित्यग्नि॒र्हैव तथा नान्यमुवादाग्नि॑स्तथा नान्यः ॥६॥ ते होचुः । अ॒पीत्थं
त्वाम॒ग्नेऽवादिषू॒रिति नैवा॒हमन्यं न मामन्य इति ॥७॥ तेऽविदुः । अ॒यं वै नो
वि॒रक्षस्तमोऽ॒ग्न्येव रूपम॑साम॒ तेन रक्षाꣳस्यतिमोक्ष्यामहे तेन स्वर्गं लोकꣳ सम-
श्रविष्यामह॒ऽइति तेऽग्ने॒रेव रूपम॑भवंस्तेन रक्षाꣳस्यत्य॑मुच्यन्त तेन स्वर्गं लोकꣳ
समाश्रुवत तथोऽहैवैष एतदग्ने॒रेव रूपं भवति तेन रक्षाꣳस्यतिमुच्यते तेन स्वर्गं
लोकꣳ समश्नुते स वै समिधमेवाभ्यादधदवान्तरदीक्षामुपैति ॥८॥ स समिधमभ्या-
दधाति । अग्ने व्रतपा॒स्त्वे व्रतपा इत्य॒ग्निर्हि दे॒वानां व्रतपतिस्तस्मादाहाग्ने व्रतपा-
स्त्वे व्रतपा॒ इति या तव तनूरियꣳ सा मयि यो मम तनू॒रेषा सा त्वयि । सह
नौ व्रतपते व्रतानीति तद॒ग्निना त्वचं विपल्या॒ङ्ग्यतेऽनु मे दीक्षां दीक्षापतिर्मन्य-
तामनु तप॒स्तप॑स्पतिरिति त॒दवान्तरां दीक्षामुपैति संतरा॒मङ्गुलीरचते संतरां मे-
का० ३, अ० ४, ब्रा० ३, कं० २-६ शतपथब्राह्मण / ४०५
'तप' है। इस प्रकार उन्होंने अवान्तरा-दीक्षा को प्राप्त किया; और चूंकि अवान्तरा-दीक्षा
को प्राप्त किया इसलिये अवान्तरा-दीक्षा की जाती है। उन्होंने अँगुलियों को कड़ा करके मोड़
लिया (मुट्ठी बाँध ली) और मेखला को कस लिया, जैसा कि पहले था। इसी प्रकार वह भी
प्रायश्चित्त करता है, उस सबके लिए जो व्रत के विरुद्ध उसने किया हो या कहा हो ॥२॥
उन्होंने अग्नि के द्वारा त्वचा को शरीर के चारों ओर लपेटा। अग्नि तप है। दीक्षा तप
है। इस प्रकार वह अवान्तरा-दीक्षा को प्राप्त करता है। अँगुलियों को भीतर की ओर मोड़ता है
और मेखला को कसता है जैसे पहले था। देवों ने इसके द्वारा प्रजा की प्राप्ति की थी ॥३॥
अग्नि के द्वारा उन्होंने शरीर पर त्वचा लपेटी। अग्नि मिथुन (जोड़े) का कर्त्ता या
जनक है। इससे उनको सन्तान की प्राप्ति हुई। उन्होंने अपनी मुट्ठी बाँध ली और मेखला कस
ली और अपने लिए सन्तान उत्पन्न की। इसी प्रकार यजमान भी सन्तान की प्राप्ति करता
है ॥४॥
अग्नि के द्वारा वह त्वचा को शरीर पर लपेटता है। अग्नि मिथुन (स्त्री-पुरुष के प्रसंग)
का कर्त्ता और जाननेवाला है। वह मुट्ठी को बाँधता और मेखला को कसता है। इस प्रकार
सन्तान को प्राप्त करता है ॥५॥
जब देव दीक्षित हो गये तो उनमें जो कोई समिधा लाता या स्वाध्याय का मन्त्र पढ़ता
उसका ही वह-वह रूप धारण करके असुर राक्षस उसको मारते। और देवता-गण आपस में कहते
कि तुमने मेरा अहित किया, तुमने मुझे मारा। केवल अग्नि ने किसी से ऐसा नहीं कहा, न किसी
ने अग्नि से कहा ॥६॥
उन्होंने पूछा—'हे अग्नि, क्या तुझसे भी उन्होंने ऐसा कहा ?' उसने उत्तर दिया कि 'न
मैंने किसी से ऐसा कहा, न किसी ने मुझसे ऐसा कहा' ॥७॥
उन्होंने जान लिया कि यही हमारे बीच में ऐसा है जो राक्षसों को मार सकता है। हमको
इसी का रूप धारण करना चाहिए। इससे हम राक्षसों से बच सकेंगे और स्वर्ग को प्राप्त कर
सकेंगे। उन्होंने अग्नि का रूप धारण कर लिया और राक्षसों से बच गये और स्वर्ग प्राप्त कर
लिया। इसी प्रकार यह भी अग्नि का रूप धारण करता, राक्षसों से बचता और स्वर्ग की प्राप्ति
करता है। वह समिधा को (आहवनीय अग्नि पर) रखकर अवान्तरा-दीक्षा को प्राप्त करता
है ॥८॥
वह यह मन्त्र पढ़कर समिधा रखता है—"अग्ने व्रतपास्त्वे व्रतपाः” (यजु० ५।६)—"हे
अग्नि, व्रत के पालनेवाले, तुझ पर, हे व्रत के पालनेवाले !" अग्नि देवों का व्रतपति है, इसलिए
कहा—"अग्ने व्रतपा' इत्यादि। "या तव तनूरियं सा मयि यो मम तनूरेषा सा त्वयि । सह नौ
व्रतपते व्रतानि" (यजु० ५।६)—"जो तेरा शरीर है, वह मेरा हो। जो मेरा शरीर है, वह तेरा
हो। हे व्रतपते ! हम दोनों के व्रत एक-से हों।" इस प्रकार वह अग्नि के द्वारा अपने को त्वचा से
ढकता है। "अनु मे दीक्षां दीक्षापतिर्मन्यतामनु तपस्तपस्पतिः" (यजु० ५।६)—"दीक्षा-पति मेरी
दीक्षा को स्वीकार करे और तप का पति मेरे तप को स्वीकार करे।" इस प्रकार वह अवान्तरा-
!
Yes! 'यै' + 'क' = 'यैक' (looks like 'धिक' because the top matras of 'यै' combine with 'क').
And before that: 'ꣳशुमꣳशुमेवाप्याययन्तीन्द्रायैकधनविदऽइतीन्द्रो वै य-'!
Wait, in line 21, let's transcribe exactly what is printed:
It has: "तदस्याꣳशुमꣳशुमेवाप्याययन्तीन्द्रायैकधनविदऽइतीन्द्रो वै य-"
Wait, does it have double underline under 'तदस्या'?
Under 'तदस्या': there is an anudatta under 'स्या': "तदस्या॒"? No, under 'स्या' there is an underline (anudatta). Under 'ꣳशुमꣳशुमेवाप्याययन्तीन्द्रा' there is an anudatta under 'न्द्रा': 'न्द्रा॒'!
Under 'यक' there is double horizontal line (pluta / svarita / anudatta): 'यै॒'?
Under 'वि': 'वि॒'.
Line 22:
ज्ञस्य देवता तस्मादाहेन्द्रा॒यैत्येकधनविद॒ऽइति शतꣳ-शतं ह स्म वाऽए॒ष दे-
Let's check svaras:
"ज्ञस्य देवता तस्मादाहेन्द्रा॒
कां० ३, अ० ४, ब्रा० ३, कं० ९-१८ शतपथब्राह्मण / ४०७
दीक्षा को करता है। मुट्ठी को कड़ा बाँधता हैऔर मेखला को कसता है जैसे वह पहले था ॥९॥
अब वे उसका मदन्ती जल (गरम जलों) से सत्कार करते हैं। अग्नि तप है, मदन्ती
जल तप हैं। इसलिए मदन्ती जलों से सत्कार करता है ॥१०॥
मदन्ती जलों को छूकर वे सोम राजा को सम्पुष्ट करते हैं। वे मदन्ती जलों को छूकर
सोम राजा को क्यों सम्पुष्ट करते हैं ? इसलिए कि घी वज्र है और सोम वीर्य। मदन्ती जलों को
छूकर वे सोम राजा को इसलिए सम्पुष्ट करते हैं कि कहीं वज्ररूपी घी से वीर्यरूपी सोम को
हानि न पहुँचे ॥११॥
कुछ लोग कहते हैं कि पहले सोम को सम्पुष्ट करना चाहिए जिसके लिए आतिथ्य किया
जाता है, फिर अवान्तर दीक्षा, फिर तानूनप्त्र। परन्तु ऐसा न करना चाहिए। यज्ञ का कर्म
ऐसा ही था। उसमें झगड़ा हो गया। पहले पुरानी शान्ति मिली, फिर अवान्तरा दीक्षा, फिर
सम्पुष्टि ॥१२॥
वे उसकी सम्पुष्टि क्यों करते हैं ? सोम देव है। सोम द्यौलोक में है। सोम वृत्र था। जो
पहाड़ और पत्थर थे, वे उसके शरीर थे, क्योंकि उसपर उशान औषध उगती है। उद्दालक के
पुत्र श्वेतकेतु ने कहा—'वे इसको लाते और निचोड़ते हैं और दीक्षा, उपसद, तनूनप्त्र और
सम्पुष्टि द्वारा वे इसका सोम बनाते हैं' ॥१३॥
कहते हैं कि यह मक्खियों का शहद है। यज्ञ ही मक्खियों का शहद है; बनानेवाली
मक्खियाँ ऋत्विज हैं। जैसे मक्खियाँ मधु की पुष्टि करती हैं उसी प्रकार ऋत्विज यज्ञ की पुष्टि
करते हैं ॥१४॥
यज्ञ के द्वारा ही देवों ने वह विजय पाई जो उनको प्राप्त है। उन्होंने सोचा कि यह कैसे
हो कि मनुष्य हमारे इस स्थान तक न चढ़ सके ? उन्होंने यज्ञ के रस को इस प्रकार चूस लिया
जैसे शहद की मक्खियाँ शहद को चूस लेती हैं और यज्ञ को यूप के द्वारा बिखेरकर अन्तर्धान हो
गये। यूप को यूप इसलिए कहते हैं कि इसके द्वारा यज्ञ को बिखेरा गया ॥१५॥
ऋषियों ने इसको सुन लिया। उन्होंने यज्ञ को इकट्ठा किया। इसी प्रकार वह भी यज्ञ
को इकट्ठा करता है जो दीक्षित होता है। वाणी ही यज्ञ है। इस प्रकार यज्ञ का जो भाग चूस लिया
गया था उसकी पूर्ति कर देता है ॥१६॥
वे छः होकर [अर्थात् ब्रह्मा, उद्गाता, होता, अध्वर्यु, आग्नीध्र और यजमान] (सोम
की) पुष्टि करते हैं। छः ऋतुएँ बनकर वे इसकी पुष्टि करते हैं ॥१७॥
वे इस मन्त्र को पढ़कर पुष्टि करते हैं—"अँ॒शुरँ॒शुष्टे देव सोमाप्यायताम्" (यजु०
५।७)—"हे देव सोम, तेरा अंशु-अंशु (प्रत्येक डण्ठल) पुष्ट हो।" ऐसा कहकर वे सोम का प्रत्येक
डंठल पुष्ट करते हैं।" 'इन्द्रायैकधनविदे" (यजु० ५।७)—"एक-धन प्राप्त करनेवाले इन्द्र के
लिए।" (या तो इसका अर्थ यह है कि सोम-मात्र जो धन है उसको लेनेवाला, या उस घड़े का
नाम भी 'एक-धन' है जिसमें सोम मिलाने के लिए जल होता है, उसको प्राप्त करनेवाला)। इन्द्र
ही यज्ञ का देवता है, इसलिए कहा 'एक-धन इन्द्र के लिए।' क्योंकि देवों के प्रति एक-एक डेण्ठल
सौ-सौ या दस-दस 'एक-धन' घोड़ों को भर देता है। "आ तुभ्यमिन्द्रः प्यायताम् त्वमिन्द्राय