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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-४, ब्राह्मण-२

वि॑ꣳशती च॒ । ति॒सृभि॑श्च वहसे त्रि॒ꣳशता॑ च नि॒युद्भि॑र्वायवि॒ह ता वि॑मुञ्चेति त-
दे॒तस्यां॑ वाय॒व्याया॑मृ॒चि पात्रा॑णि वि॒मुच्य॑न्ते वायुप्र॒णेत्रा॒ वै प॒शवः॑ प्रा॒णो वै वा॒-
युः प्रा॒णेन॒ हि प॒शव॑श्च॒रन्ति॑ ॥ १५॥ स ह दे॒वेभ्यः॑ प॒शुरि॑रपचक्राम । तं दे॒वाः
प्रातःसव॒ने॒ऽन्व॑मन्त्रयन्त॒ स नोपा॑ववर्त॒ तं मा॑ध्यन्दि॒ने सव॑ने॒ऽन्व॑मन्त्रयन्त॒ स नै-
वोपा॑ववर्त॒ तं तृ॑तीयसव॒ने॒ऽन्व॑मन्त्रयन्त ॥ १६॥ स हो॒पाव॑र्त्स्य॒न्नुवा॑च । यद्व उ-
पावर्तेय॒ किं मे॒ ततः॑ स्या॒दिति॒ त्वयै॒वैता॑नि पात्रा॑णि यु॒ज्येर॒ꣳस्त्वया॑ वि॒मुच्ये॑र॒न्निति॑
तदे॒नेनैतत्पात्रा॑णि यु॒ज्यन्ते॒ यदि॑न्द्रवाय॒वाग्रा॒न्प्रातः॑सव॒ने गृ॑ह्ण॒न्त्येने॑नैतत्पात्रा॑णि
वि॒मुच्य॑न्ते यदा॒ह नि॒युद्भि॑र्वायवि॒ह ता वि॑मुञ्चेति प॒शवो॒ वै नि॒युत॒स्तत्प॒शुभि॑रे॒-
वैतत्पात्रा॑णि वि॒मुच्य॑न्ते ॥ १७॥ स यत्प्रातः॑सव॒नऽउपाव॑र्त्स्यत् । गाय॒त्रं वै प्रातः॑-
सव॑नं॒ ब्रह्म॑ गाय॒त्री ब्रा॑ह्म॒णेषु॑ ह प॒शवो॑ऽभविष्य॒न्नथ॒ यन्मा॑ध्यन्दि॒ने सव॑न॒ऽउपा॒-
वर्त्स्य॒दैन्द्रं॒ वै मा॑ध्यन्दि॒नं सव॑नं क्ष॒त्रमिन्द्रः॑ क्ष॒त्रियेषु॑ ह प॒शवो॑ऽभविष्य॒न्नथ॒ य-
त्पृ॑तीयसव॒नऽउपा॑वर्तत वैश्वदे॒वं वै तृ॑तीयसव॒नꣳ सर्व॑मि॒दं विश्वे॑ दे॒वास्तस्मा॑दि॒ने
सर्व॑त्रे॒व प॒शवः॑ ॥ १८॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [४. १.] ॥ ॥
सौम्ये॑न च॒रुणा॑ प्रचरति । सोमो॒ वै दे॒वाना॒ꣳ ह॒विर्यदे॒तत्सोमा॑येव॒ हविर्नि-
र्वप॑ते तथा॒तः सोमो॒ऽनन्त॑र्हितो भवति च॒रुर्भव॑ति च॒रुर्वै दे॒वाना॒मन्न॒मोद॑नो हि
च॒रुरोद॑नो॒ हि प्र॒त्यक्षमन्नं॒ तस्मा॑च्च॒रुर्भव॑ति ॥ १॥ तेन॒ न प्रातः॑सव॒ने प्र॑चरति ।
न मा॑ध्यन्दि॒ने सव॑न॒ऽए॒ते वै दे॒वानां॑ निष्केव॒ल्ये॑ सव॑ने॒ यत्प्रातः॑सव॒नं च मा॒-
ध्यन्दि॑नं च सव॑नं पितृदे॒वत्यो॒ वै सोमः॑ ॥ २॥ स यत्प्रातः॑सव॒ने वा॒ प्रच॑रेत् ।
माध्यन्दि॑ने वा सव॑ने सम॒दꣳ ह कुर्या॑द्दे॒वेभ्य॑श्च पि॒तृभ्य॑श्च॒ तेन॑ तृतीयसव॒ने प्र॑च-
रति वैश्वदे॒वं वै तृ॑तीयसव॒नं तथा॒ हासम॑दं करोति नानुवा॒क्यामन्वाह सकृद्
द्येव पराञ्चः पितरस्तस्मान्नानुवा॒क्यामन्वाह ॥ ३॥ अथ चतुर्गृहीतमाज्यं गृही-
त्वा । आश्राव्याह घृतस्य यजेति वषट्कृते जुहोति तथा अतः प्राच्य आहुतयो

कां० ४, अ० ४, ब्रा० १-२, कं० १५-१८ व १-४ शतपथब्राह्मण / ६०६
च नियुद्भिर्वायविह ता विमुंचः।”—“एक और दस (ग्यारह) से अपने लिए, दो और बीस
(बाईस) से इष्टि के लिए, तीन और तीस (तैंतीस) से देवों के लिए। हे वायु, तू अपने घोड़ों की
जोड़ी के द्वारा इनको छोड़।” जब होता इस वायुवाली ऋचा को पढ़ता है तो पात्र छूट जाते हैं
(जैसे घोड़े हल या रथ से छोड़ दिये जाते हैं उसी प्रकार)। पशु वायु के ही अनुचर हैं (वायु ही
उनका अगुआ है)। वायु प्राण है। प्राण से ही पशु चलते हैं ॥१५॥
एक बार (प्राण) देवों से निकलकर पशुओं के साथ चला गया। देवों ने उसे प्रातः-
सवन में बुलाया, वह नहीं आया। दोपहर के सवन में बुलाया, वह नहीं आया। तीसरे सवन में
बुलाया, तब—॥१६॥
लौटने की इच्छा करके उसने कहा, 'यदि लौट आऊँ तो मुझे क्या मिलेगा?' उन्होंने
उत्तर दिया कि 'तेरे ही द्वारा ये पात्र नियुक्त हो सकेंगे और तेरे ही द्वारा खुल सकेंगे।' इसलिए
ये पात्र (वायु के) द्वारा ही नियुक्त होते हैं जब प्रातःसवन में इन्द्र, वायु आदि के लिए ग्रहों
को निकालते हैं। और जब कहा कि 'हे वायु, तू अपनी जोड़ियों को खोल दे' तो इसी (वायु) के
द्वारा वे खुलते हैं। जोड़ी का अर्थ है पशु। इस प्रकार पशुओं द्वारा ये पात्र खोले जाते हैं ॥१७॥
अगर वह प्रातःसवन में ही लौट आया होता—प्रातःसवन गायत्री का है और गायत्री
ब्राह्मण है-तो पशु केवल ब्राह्मण के ही हो जाते। यदि वह दोपहर के सवन में लौट आया होता-
दोपहर का सवन इन्द्र का है, इन्द्र क्षत्रिय है-तो पशु केवल क्षत्रिय के ही हो जाते। परन्तु चूंकि
वह तीसरे सवन में लौटा-तीसरा सवन विश्वेदेवों का है और विश्वेदेव का अर्थ है 'सब-कुछ',
इसलिए पशु भी सर्वत्र ही होते हैं ॥१८॥
सौम्यश्चरुः, पात्नीवतग्रहश्च
अध्याय ४-ब्राह्मण २
अब सोम के चरु का कृत्य आरम्भ हुआ। सोम देवों की हवि है। अब यह सोम के लिए
हवि बनाई जाती है। इस प्रकार सोम इससे अलग नहीं होता। यह चरु होता है क्योंकि चरुदेवों
का अन्न है। चरु भात है। भात तो प्रत्यक्ष में अन्न है। इसलिए चरु बनाया जाता है ॥१॥
यह (चरु.को) न तो प्रातःसवन में बनाते हैं, न दोपहर के सवन में, क्योंकि प्रातःसवन
और दोपहर का सवन केवल देवों के ही हैं। सोम पितरों का है ॥२॥
यदि (चरु) प्रातःसवन में बनाता या दोपहर के सवन में, तो देवों और पितरों में झगड़ा
हो जाता। वह इसको तीसरे सवन में बनाता है क्योंकि तीसरा सवन विश्वेदेवों का है। इस
प्रकार वह झगड़ा नहीं होने देता। अनुवाक नहीं पड़ता, क्योंकि पितर तो एक बार ही चले गये।
इसलिए अनुवाक नहीं पढ़ता ॥३॥
पहले चार पात्रों में घी लेकर और (आग्नीध्र से) श्रौषट् कहलवाकर आदेश देता है कि
'घी की आहुति दे' और वषट्कार करके आहुति देता है। अब तक जितनी आहुतियां दी जा चुकीं

६१० शतपथ ब्राह्मण
हुता भव॑न्ति ताभ्य ए॒वैतद्द॑धाति तथा हासमदं करोति ॥४॥ ॥ शतम् २६००॥॥
स आज्यस्योपस्तीर्य॑ । द्विर्श्वरो॒ऽवद्य॑त्यथो॒परिष्टादाज्यस्याभिघारयत्याश्राव्याह॒ सौ-
म्यस्य॒ यजेति वषट्कृते जुहोति ॥५॥ अथापरं॑ चतुर्गृहीतंमाज्यं गृहीत्वा । श्रा-
व्याव्राह घृ॒तस्य यजेति वषट्कृते जुहोति तथा अत ऊर्ध्वा आहुतीर्होष्यान्भवति
ताभ्य ए॒वैतद्द॑धाति तथा हासमदं करोति स यदि कामयेतोभयतः॒ परि॑यजेयु-
र्यु कामयेतान्यतरतः परि॑यजेत् ॥६॥ अथ प्रचरणीति स्रुग्भवति । त्स्यां चतुर्गृ-
हीतंमाज्यं गृहीत्वाध्वर्युः शालाकैर्द्धिष्ण्यान्व्याघारयति तद्यच्छालाकैर्र्द्धिष्ण्यान्व्याघा-
रयति यद्दे॒वैनानदो देवा अब्रुवंस्तृतीयसव॑नं वो घृत्याहुतिः प्राप्स्यति न सौ-
म्यापहतो हि यु॒ष्मत्सोमपीथ॒स्तेन सोमाहुतिं नार्हथेति सैनानिशा तृतीयसवन॒
ऽएव घृत्याहुतिः प्राप्नोति न सौम्या यच्छालाकैर्र्द्धिष्ण्यान्व्याघारयति तानेवैरेव
यजु॑र्भिर्य॒थोपकीर्णा यथापूर्वं व्याघारयति मार्जालीयऽए॒वोत्तमम् ॥७॥ तदैके ।
आग्नीध्रीये पुनराघारयन्त्युदग्ऽइदं कर्मानुसंतिष्ठाता॒ऽइति तडु तथा न कुर्यान्मा-
र्जालीयऽए॒वोत्तम॒७ ॥८॥ स यत्राध्वर्युः । शालाकैर्र्द्धिष्ण्यान्व्याघारयति तत्प्रतिप्र-
स्थाता पत्नीवतं ग्रहं गृह्णाति यज्ञाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते यज्ञात्प्रजायमाना मिथुनात्प्र-
जायन्ते मिथुनात्प्रजायमाना अन्ततो यज्ञस्य प्रजायन्ते तदेना एतदन्ततो॑ यज्ञस्य मि-
थुनात्प्रजननात्प्रजनयति तस्मान्मिथुनात्प्रजननादन्ततो॑ यज्ञस्येमाः प्रजाः प्रजायन्ते
तस्मात्पत्नीवतं गृह्णाति ॥९॥ तं वाऽउपा॒ꣳशुपात्रेण गृह्णाति । यदि सावित्रमुपा॒ꣳ-
शुपात्रेण गृह्णीयादन्तर्यामपात्रेणैतं यदि सावित्रमन्तर्यामपात्रेण गृह्णीयादुपाꣳशुपा-
त्रेणैतꣳ समानꣳ ह्येतद्यदुपाꣳश्वन्तर्यामौ प्राणो हि यो वै प्राणः स उदानो वृषा
वै प्राणो योषा पत्नी मिथुनमेवैतत्प्रजननं क्रियते ॥१०॥ तं वाऽञ्चपुरोरुकं गृ-
ह्णाति । वीर्यं वै पुरोरुङ्तेखीषु वीर्यं दधानीति तस्मादपुरोरुकं गृह्णाति ॥११॥
अथातो गृह्णात्येव । उपयामगृहीतोऽसि॒ बृह॒स्पति॑सुतस्य देव सोम तऽइति ब्रह्मण

का० ४, अ० ४, ब्रा० २, कं० ४-१२ शतपथब्राह्मण / ६११
उनसे इसको अलग कर देता है। इस प्रकार झगड़ा नहीं होने देता ॥४॥
घी की एक तह लगाकर चरु के दो भाग करता है, और ऊपर से भी घी लगा देता है।
श्रौषट् कहलवाकर कहता है 'सौम्य की आहुति दे' और वषट्कार से आहुति देता है ॥५॥
फिर चार जगह घी लेकर, श्रौषट् कहलवाकर और 'आहुति दे' ऐसा आदेश देकर वषट्-
कार से आहुति देता है। इस प्रकार जो आहुतियां आगे दी जानेवाली हैं उनसे इसको अलग कर
देता है। इससे झगड़ा नहीं होने पाता। चाहे तो चरु के आगे और पीछे दोनों बार घी की आहुति
दे दे, चाहे एक बार ॥६॥
एक स्रुक् का नाम है 'प्रचरणी'। उसमें चारों भाग घी लेकर अध्वर्यु शलाकाओं (लकड़ी
की चीपटी) से धिष्ण्या में घी छोड़ता है। धिष्ण्या में शलाकों द्वारा घी छोड़ने का कारण यह है
कि पहले कभी देवों ने उन (गन्धर्व सोम-संरक्षकों) से कहा था कि तीसरे सवन में एक घृत-
आहुति तुम्हारी होगी, लेकिन सोम की नहीं। सोम-पान तो तुमसे छाना जा चुका है। तुम सोम
की आहुति के योग्य नहीं हो। वही घी की आहुति तीसरे सवन में उनको प्राप्त होती है, न सोम
की, क्योंकि वह धिष्ण्या में शलाकाओं पर घी छोड़ता है। उनको उन्हीं यजुओं से क्रमशः पूर्व की
भांति घी से युक्त करता है। सबसे पीछे मार्जालीय को ॥७॥
कुछ लोग आग्नीध्रीय पर फिर घी छोड़ते हैं जिससे अग्नि के उत्तर की ओर इस कार्य
की समाप्ति हो। परन्तु ऐसा न करे। मार्जालीय ही सबसे अन्त में होना चाहिए ॥८॥
जब अध्वर्यु शलाकाओं द्वारा धिष्ण्या में घी छोड़े, तब प्रतिप्रस्थाता पत्नीवत ग्रह को
लेवे। यज्ञ से ही प्रजा उत्पन्न होती है। यज्ञ से उत्पन्न होते हुए मिथुन (जोड़े) से पैदा होते हैं।
जोड़े से पैदा होते हुए यज्ञ के पिछले भाग से पैदा होते हैं। इसलिए यहाँ वह इसको मिथुन से,
यज्ञ के अन्तिम भाग से उत्पन्न करता है। इसलिए वह पत्नीवत ग्रह को लेता है ॥९॥
वह इसको उपांशु पात्र के साथ लेता है। यदि उपांशु पात्र के साथ सावित्र पात्र को लिया
हो तो अन्तर्याम पात्र के साथ। यदि अन्तर्याम पात्र के साथ सावित्र को ले तो इसको उपांशु पात्र
के साथ। यह सब एक ही बात है। उपांशु और अन्तर्याम दोनों ही प्राण हैं। जो प्राण है वही
उदान है। प्राण नर है (प्राणः-पुंल्लिंग) और पत्नी नारी है। इस प्रकार जोड़े से ही उत्पत्ति
होती है ॥१०॥
इस ग्रह को पुरोरुक् के बिना ही लेता है। पुरोरुक् वीर्य है। स्त्री में तो वीर्य होता नहीं।
इसलिए बिना पुरोरुक् के लेता है ॥११॥
इस मन्त्र से लेता है, "उपयामगृहीतोऽसि बृहस्पतिसुतस्य देव सोम ते" (यजु० ८।६)

६१२ शतपथ ब्राह्मण
वै बृह॒स्पति॑र्ब्रह्मप्रसूतस्य देव सोम तऽइत्ये॒वैतदाहेन्दो॒रिन्द्रि॑यावत॒ इति॑ वी॒र्य॑-
वत इत्ये॒वैतदाह यदा॒हेन्दो॒रिन्द्रि॑यावत॒ इति॑ पत्नीवतो ग्र॒हां२ऽऽऋध्यासमिति॒ न
सम्प्रति॒ पत्नीभ्यो गृह्णाति॒ नेत्स्त्रीषु वी॒र्यं दधानीति॒ तस्मा॒न्न सम्प्रति पत्नीभ्यो गृ॒-
ह्णाति ॥ १२॥ अथ यः प्रचरण्‍या॒ᳵ सꣳस्रवः परिशि॒ष्टो भव॑ति। तेनै॒नꣳ श्रीणाति
समर्थयति वाऽअन्योन्यम॒ह्नाऽक्रीणन्त्यैतं व्य॑र्धयति व॒ज्रो वाऽआज्य॑मे॒तेन वै दे॒वा
वज्रेणाज्ये॒नाघ्न॒न्नेव पत्नीर्नि॒राद्ध्णुवंस्ता ऋ॒ता निर॒ष्टा नात्मनश्च॒नैशत न दाय॑स्य
च॒नैशत तयो॑ऽए॒वैष ए॒तेन वज्रेणाज्ये॑न घ्न॒न्नेव पत्नीर्नि॒र्ऋद्ध्णोति ता ऋ॒ता नि॒-
र॒ष्टा नात्मनश्च॒नेशते न दाय॑स्य च॒नेशते ॥ १३॥ स श्रीणाति। अहं॑ पर॒स्ताद॒ह-
म॒वस्ता॒द्यद॒न्तरि॑क्षं॒ तदु॑ मे पि॒ताभूत् । अहꣳ सूर्य॑मुभय॒तो द॒दर्शाहं दे॒वानां॑ पर॒मं
गुहा॒ यदिति॒ स यद॒हम॒हमिति॑ श्रीणाति पु॒ष्ठ्वेवैतद्वी॒र्यं द॑धाति ॥ १४॥ अथाहा॒-
ग्नीत्पत्नीवतस्य यजेति। वृषा वाऽअ॒ग्नीद्योषा पत्नी॑ मिथुन॒मेवैतत्प्र॒जननं॑ क्रियते
स जु॑होत्यग्ना३इ पत्नी॑व॒न्निति॒ वृषा वाऽअ॒ग्नीर्योषा पत्नी॑ मिथुन॒मेवैतत्प्र॒जननं॑
क्रियते ॥ १५॥ सन्त॒र्द्देन वष॑ट्करोति । त्वष्टा वै सिक्तꣳ रेतो वि॒करो॑ति॒ तदे॒ष ए॒वै-
तत्सिक्तꣳ रेतो वि॒करो॑ति॒ सोमं॑ पिब॒ स्वाहेत्युत्तरार्धे जुहोति या इतरा आहुत-
यस्ते दे॒वा अथैताः पत्न्य ए॒वमिव हि॒ मिथुनं॑ कृत॒मुत्तरतो हि स्त्री पुमाꣳसमुपशे-
तऽआ॒ह्वय॒त्यध॑र्युराग्नी॒ध्रे भक्षꣳ स आ॒ह्वाध्र्य॑ऽउप मा ह्वय॒स्वेति॒ तं न प्रत्युप॒ह्वयेत
को हि हृतस्य॒ निर॒ष्टस्य प्रत्युपह्ववस्तं वै प्रत्ये॒वोप॑ह्वयेत जुह्व॒त्यस्याग्नौ वषट्कु-
र्वन्ति तस्मात्प्रत्ये॒वोप॑ह्वयेत ॥ १६॥ अथ सम्प्रेष्यति । अग्नीन्निष्टुरुपस्थमासीद नेष्टः
पत्नीमुदानयोद्गात्रा संख्यापयेतर्त्वी१॒ꣳस्त्वं च॒मसमून्नय सोमं मातिरीरिच इति यद्य॒-
ग्निष्टोमः स्यात् ॥ १७॥ यद्युक्थ्यः स्यात् । सोमं॑ प्रभावयेति ब्रूयात्स बिभ्र॒द्वैत-
त्यात्रमग्नीन्निष्टुरूपस्थमासीदत्यग्नि॒र्वाऽए॒ष निदा॒नेन यदाग्नीध्रो योषा नेष्टा वृषा वा
ऽअग्नीद्योषा नेष्टा मिथुन॒मेवैतत्प्र॒जननं क्रियतऽउदानयति नेष्टा पत्नीं तामुद्गात्रा

कां० ४, अ० ४, ब्रा० २, कं० १२-१८ शतपथब्राह्मण / ६१३
“तू आश्रय के लिए लिया गया है, हे बृहस्पति से उत्पन्न हुए सोम तुझको ।” बृहस्पति ब्रह्म है ।
इसका तात्पर्य यह हुआ कि हे ब्रह्म से उत्पन्न हुए सोम । “इन्दोरिन्द्रियावतः ।” (यजु० ८।६)
अर्थात् “वीर्यवाले को ।” “पत्नीवतो ग्रहाँ २ ऽऋध्यासम्” (यजु० ८।६)—“पत्नीवत ग्रहों को मैं
पाऊँ ।” वह पत्नियों के लिए नहीं निकालता क्योंकि स्त्रियों में तो वीर्य होता नहीं । इसलिए इस
समय पत्नियों के लिए नहीं निकालता ॥१२॥
अब प्रचरणी में जो घी शेष रह गया हो उसमें इसको मिलाता है । घी मिलाने से और
आहुतियों को तो बढ़ाता था, परन्तु इसको घटा देता है । घी वज्र है । इसी घी रूपी वज्र से देवों
ने पत्नियों को मारा था । और इस प्रकार वे इतनी नष्ट हुईं कि न उनमें अपना आत्मा रहा, न
वे दायभाग की भागी हुईं । इस प्रकार यह भी घी रूपी वज्र से पत्नियों को मारता है जिससे
वे इतनी क्षीण हो जायें कि न उनका अपना आत्मा रहे और न उनको दायभाग मिले ॥१३॥
वह इस मन्त्र से मिलाता है, “अहं परस्तादहमवस्ताद्यदन्तरिक्षं तदु मे पिताभूत् ।
अह॑ᳵ सूर्यमु॒भयतो॑ ददर्शा॒हं दे॒वानां॑ परमं गुहा यत्” (यजु० ८।६)—“मैं ऊपर हूँ । मैं नीचे हूँ ।
जो अन्तरिक्ष है वह मेरा पिता था । मैंने सूर्य को दोनों ओर देखा । गुहा में जो कुछ है उसमें मैं
देवों के लिए सर्वोत्तम हूँ ।” ‘अहं’-‘अहं’ (मैं-मैं) कहकर मिलाता है, इस प्रकार नर में ही वीर्य
को रखता है ॥१४॥
अब कहता है, ‘अग्नीध् ! पत्नीवत् आहुति दे ।’ अग्नीध् नर है, पत्नी नारी है । इस
प्रकार उत्पत्ति के लिए जोड़ा मिल गया । वह इस मन्त्र से आहुति देता है—‘‘अग्ना३इ
पत्नीवत्” (यजु० ८।१०)—“हे पत्नीवाले अग्नि !” अग्नि नर है, पत्नी नारी है । इस प्रकार
उत्पत्ति के लिए जोड़ा मिल गया ॥१५॥
“सजूद्देवेन त्वष्ट्रा” (यजु० ८।१०)—“त्वष्ट्रा देव के साथ ।” त्वष्ट्रा ही सींचे हुए वीर्य
को बनाता है (विकरोति, प्रकृति से विकृत करता है) । यह भी इसी प्रकार यहाँ सींचे हुए वीर्य
को बनाता है । “सोमं पिब स्वाहा” (यजु० ८।१०)—इससे उत्तर की ओर आहुति देता है । जो
और आहुतियाँ हैं वे देव हैं, और ये पत्नियां हैं। इसी प्रकार जोड़ा मिलता है। क्योंकि स्त्री
पुरुष के बायें ओर सोती है। अध्वर्यु सोम का एक घूंट अग्नीध् के पास ले जाता है । अग्नीध्
कहता है ‘अध्वर्यु, मुझे बुला ।’ यह हो सकता है कि उसे न बुलाया जाय क्योंकि क्षीण और वीर्य-
हीन को कौन बुलाता है ! परन्तु उसको बुलाना चाहिए । वे उसकी अग्नि में आहुति देते और
वषट्कार करते हैं । इसलिए उसको बुलावा देना चाहिए ॥१६॥
अब वह आदेश देता है—‘अग्नीध्, नेष्टा की गोद में बैठ ! नेष्टा पत्नी को ले चल,
और उद्गाता से मिला । उन्नेता होता के चमसे को भर । कुछ भी सोम शेष न रहे ।’ अगर
अग्निष्टोम हो तो ऐसा करे ॥१७॥
लेकिन अगर उक्थ्य हो तो कहे, ‘सोम को बढ़ा ।’ उसी पात्र को लाकर वह अग्नीध् की
गोद में बैठ जाता है । अग्नीध् ही अग्नि है और नेष्टा स्त्री है । अग्नीध् नर और नेष्ट्रा रानी ।
इस प्रकार उत्पत्ति के लिए जोड़ा मिल जाता है । नेष्टा पत्नी को ले चलता है और उद्गाता से