शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-४, ब्राह्मण-२
७६ शतपथ ब्राह्मण
हव्य॒वाह॒नो यद॒ग्निस्तस्मा॒दाह॑ वृणी॒ध्व॑ꣳ हव्य॒वाहन॒मिति॑ ॥ ३१॥ ते वाऽए॒तम् ।
अध्रु॒वन्तं॑ त्रिच॒मन्वा॑हुर् देवा॒न् ह॒ वै य॒ज्ञेन॒ यज॑मानान्त्सप॒त्ना अ॑सु॒रा दुधूर्षां च॒क्रुस्ते
दुधूर्षन्त एव॒ न शे॑कुर्धूर्वितुं ते परा॑बभूवुस्तस्मा॒द्य॒ज्ञोऽधु॒रो नाम॑ दुधूर्ष॒न्ह वा
ऽएनंꣳ स॒पत्नः परा॑भवति॒ यस्यै॒वं वि॒दुषो॒ऽध्रु॒वन्तं॑ त्रिच॒मन्वा॑हुर्याव॒देव सौम्येना-
ध्व॒रेणो॒पा जय॑ति॒ ताव॑ज्जयति ॥ ४० ॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ ३ [४. १.] ॥
ए॒तद् वै दे॒वा अ॒ग्निं ग॑रि॒ष्ठेऽयु॑ञ्जन् । य॒दोत॒न्व॒ऽइदं॑ नो ह॒व्यं व॑हेति॒ तमे॒तद्-
रि॒ष्ठे यु॒क्त्वोपा॑मदन्वी॒र्य॑वा॒न्वै त्वम॑स्यल॑ वै त्व॒मेत॒स्मा॒ऽअसीति॑ वी॒र्ये समाद॑धतो य-
थेद॒मप्ये॑त॒र्हि ज्ञा॒तीनां॒ यं गरि॑ष्ठे यु॒ञ्जन्ति॒ तमुप॒मद॑न्ति वी॒र्य॑वा॒न्वै त्वम॑स्यल॑ वै त्व-
मेत॒स्मा॒ऽअसीति॑ वी॒र्ये समाद॑धतः स यद॑त ऊ॒र्ध्वमन्वा॒होप॑स्तौत्ये॒वैनमेतद्वी॒र्य॑मेवा-
स्मिन्दधाति ॥ १॥ अ॒ग्ने म॒हाँ२॥ऽअ॑सि ब्रा॒ह्म॒ण भा॑र॒तेति॑ । ब्र॒ह्म॒ ह्यग्निस्तस्मा॒दाह॑
ब्रा॒ह्म॒णेति॒ भार॒तेत्ये॒ष हि दे॒वेभ्यो॑ ह॒व्यं भर॑ति॒ तस्मा॒द्भार॒तोऽग्नि॒रित्या॑हुरे॒ष उ॑ वा
ऽइ॒माः प्र॒जाः प्रा॒णो भू॒त्वा बिभ॑र्ति॒ तस्मा॒द्देवा॒ह भा॑र॒तेति॑ ॥ २॥ अ॒थार्षे॒यं प्रवृ॑-
णीते । ऋ॒षिभ्य॑श्चै॒वैनमेतद्दे॒वेभ्य॑श्च निवे॒दय॑त्य॒यं म॒हावी॒र्यो यो य॒ज्ञं प्राप॒दिति॒ त-
स्मा॒दार्षे॒यं प्रवृ॑णीते ॥ ३॥ परस्ता॒दर्वा॒क्प्रवृ॑णीते । प॒रस्ता॒द्ध्यर्वा॑च्यः प्र॒जाः प्र॒जा-
यन्ते॒ ज्याय॑स॒स्तत्पु॒त्रोऽथ॑ चै॒वैतं॒ निष्कृत॒ऽइ॒ह हि पि॒तैवाग्रे॒ऽथ पु॒त्रोऽथ पौत्र॒स्तस्मा॑-
त्परस्ता॒दर्वा॒क्प्रवृ॑णीते ॥ ४॥ स आर्षे॒यमु॒क्त्वाह॑ । दे॒वेद्धो म॑न्वि॒द्ध इति॑ दे॒वा ह्ये-
तमग्र॒ऽऐन्ध॑त॒ तस्मा॑दाह दे॒वेद्ध॒ इति॑ मन्वि॒द्ध इति॑ मनु॒र्ह्येतमग्र॒ऽऐन्ध॒ तस्मा॑दाह
मन्वि॒द्ध इति॑ ॥ ५॥ ऋ॑षि॒ष्टुत इति॑ । ऋषयो॒ ह्येतमग्र॒ऽस्तु॑वंस्तस्मा॒दाह॒र्ऋषि॑ष्टुत॒ इति॑
॥ ६॥ विप्रा॑नुम॒दित इति॑ । ए॒ते वै विप्रा॒ यदृष॑य ए॒ते ह्येतमन्वम॑दंस्तस्मा॒दाह॒
विप्रा॑नुम॒दित इति॑ ॥ ७॥ क॑वि॒शस्त॒ इति॑ । ए॒ते वै क॒वयो॒ यदृष॑य ए॒ते ह्येतम॑-
शꣳसंस्तस्मा॒दाह कवि॑शस्त॒ इति॑ ॥ ८॥ ब्र॒ह्मसं॑शित॒ इति॑ । ब्र॒ह्मसं॑शितो॒ ह्येष॑
घृ॒ताह्व॑न॒ इति॑ घृ॒ताह्व॑नो॒ ह्येषः॑ ॥ ९॥ प्रणी॑र्यज्ञा॒नाꣳ रथी॑रध्व॒राणा॒मिति॑ । ए॒तेन॑
कां० १, अ० ४, ब्रा० २, क० १-१० शतपथब्राह्मण / ७७
अग्नि हव्य का ले जाने वाला है। इसीलिए कहा 'वृणीध्वं हव्यवाहनम्' ॥३६॥
'अध्वर' शब्द वाले तृच् (तीन ऋचाओं के समूह) को पढ़ता है। जब देव यज्ञ कर रहे
थे तो उनके शत्रु असुरों ने उस यज्ञ का विध्वंस करना चाहा 'दुधूर्षाञ्चक्रुः' । परन्तु विध्वंस की
इच्छा करते हुए भी वे विध्वंस न कर सके। वे हार गए। इसलिए यज्ञ का नाम अध्वर हुआ (न
शेकुर्धूर्तितम्)। जो इस रहस्य को समझता है और अध्वर शब्द वाले तृच् को पढ़ता है उसके
शत्रु उसका विध्वंस चाहते हुए भी उसका विध्वंस नहीं कर सकते। वे परास्त हो जाते हैं। वह
सौम्य-अध्वर को करके विजय प्राप्त कर लेता है, जीत जाता है। (सौम्येन अध्वरेण = सोम-
याग = सम्बन्धी अध्वर) ॥४०॥
अध्याय ४-ब्राह्मण २
पहले देवों ने अग्नि को मुख्य होता के पद पर नियुक्त किया, और उसको इस मुख्य पद
पर नियुक्त करके कहा, 'तू हमारी हवि को ले जा' और यह कहकर बड़ाई करने लगे, 'निश्चय
करके तू वीर्यवान् है। निश्चय करके तू इस काम के योग्य है।' इस प्रकार उसको बल देते हुए
जैसा कि आजकल की जातियों में जब किसी को मुख्य पद पर चुनते हैं तो यह कहकर बड़ाई
करते हैं, 'आप वीर्यवान् हैं, आप इसी कार्य के लिए हैं' और उसको बल-सम्पन्न करते हैं।
इसलिए जो कुछ पढ़कर वह उसकी बड़ाई करता है, मानो उसकी स्तुति करता है अर्थात् उसको
बल से सम्पन्न करता है ॥१॥
वह स्तुति यह है—'अग्ने महाँऽअसि ब्राह्मण भारत'-'हे ब्राह्मण, भारत, अग्नि, तू बड़ा
है।' अग्नि ब्रह्म है इसलिए कहा 'ब्राह्मण'। 'भारत' इसलिए कहा कि यही देवों के लिए हव्य
रखता है (भरति)। इसलिए कहता है 'अग्नि भारत है'। इन प्रजाओं का प्राण बनकर पोषण
करता है इसलिए भारत है ॥२॥
अब वह (अग्नि को) आर्ष होता चुनता है, अर्थात् ऋषियों की शैली के अनुसार। इस
प्रकार वह ऋषियों और देवों से उसका परिचय कराता है (निवेदयति) - 'यह महावीर्य है
जो यज्ञ को कराता है।' यही कारण है कि यह (अग्नि को) आर्ष होता बनाता है ॥३॥
वह अति पुराने से नये तक का वरण करता है (अर्थात् ऋषियों में सबसे प्रथम से
लेकर पीढ़ी-पर-पीढ़ी आज तक के ऋषि का वरण करता है) क्योंकि प्राचीन से ही तो नई पीढ़ी
उत्पन्न होती है। इस प्रकार वह सबसे बड़े को नियुक्त करता है, क्योंकि पहले पिता होता है,
फिर पुत्र, फिर पौत्र। इसलिए पूर्वजों से लेकर नई पीढ़ी तक का वरण करता है ॥४॥
उसको आर्ष होता बनाकर कहता है-'देवेद्धो मन्विद्धः'-'तुझे देवों ने प्रज्वलित किया,
तुझे मनु ने प्रज्वलित किया।' देवों ने पहले इसे जलाया। इसलिए कहा 'देवेद्धः' । मनु ने पहले
इसे जलाया इसलिए कहा 'मन्विद्धः' ॥५॥
अब कहता है—'ऋषिष्टुत' - 'ऋषियों से स्तुति किया गया'। पहले ऋषियों ने ही
इसकी स्तुति की। इसलिए इसको कहा 'ऋषिष्टुत' ॥६॥
अब कहा—'विप्रानुमदित'—'विप्रों से प्रसन्न किया गया'। ये विप्र ऋषि ही थे
जिन्होंने उसे प्रसन्न किया। इसलिए कहा 'विप्रानुमदित' ॥७॥
अब कहा—'कविशस्त'-'कवियों से प्रशंसित'। ये कवि ऋषि ही थे जिन्होंने इसकी
प्रशंसा की। इसलिए कहा 'कविशस्त' ॥८॥
अब कहा—'ब्रह्मसंऽशित'—'वेद से प्रशंसित', क्योंकि वह ब्रह्म अर्थात् वेदमंत्रों से
प्रशंसित होता है। 'घृताहवन' भी कहा क्योंकि वह घी को लेता है ॥६॥
अब कहा-'प्रणीर्यज्ञानांऽ रथीरध्वराणाम्' - 'यज्ञों का प्राणी और अध्वरों का रथी' ।
७८ शतपथ ब्राह्मण
वै सर्वा॒न्यज्ञा॒न्प्रण॑यन्ति ये॑ च पाकय॒ज्ञा ये चेत॑रे॒ तस्मा॑दाह प्र॒णीर्यज्ञाना॒मिति॑
॥१०॥ र॒थीर॑ध्व॒राणा॒मिति॑ । र॒थो ह वाऽए॒ष भू॒त्वा दे॒वेभ्यो॑ य॒ज्ञं वह॑ति॒ तस्मा॑दाह
र॒थीर॑ध्व॒राणा॒मिति॑ ॥११॥ अतूर्त्तो॒ होता॒ तूर्णि॑र्हव्य॒वाडि॑ति॒ । न ह्येत॒ꣳ रक्षा॑ꣳसि
त॒रन्ति॒ तस्मा॑दाहातूर्त्तो॒ होतेति॒ तूर्णि॑र्हव्य॒वाडि॑ति सर्व्व॒ꣳ ह्ये॑ष पा॒प्मानं॑ तर॑ति
तस्मा॑दाह॒ तूर्णि॑र्हव्य॒वाडि॑ति ॥१२॥ आ॒स्या॒त्रं जु॒हूर्द्दे॒वाना॒मिति॑ । दे॒वपात्रं॒ वाऽए॒ष
यद॒ग्निस्तस्मा॑द॒ग्नौ सर्व्वेभ्यो दे॒वेभ्यो॑ जु॒ह्वति॑ दे॒वपात्र॒ꣳ ह्ये॑ष प्राप्नो॑ति ह॒ वै तस्य॑
पात्रं॒ यस्य॒ पात्रं॒ प्रेप्स्य॑ति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥१३॥ चम॒सो दे॑व॒पान॒ इति॑ । चम॒सेन॑
ह वाऽए॒तेन भू॒तेन॑ दे॒वा भ॒क्षय॑न्ति॒ तस्मा॑दाह चम॒सो दे॑व॒पान॒ इति॑ ॥१४॥ अ-
रा॑ꣳश॒इवाग्ने॒ नेमि॑र्द्दे॒वांस्त्वं प॑रि॒भूरसीति॑ । य॒थारा॒न्नेमि॑ः सर्व्व॑तः परि॒भूरे॒वं त्वं दे॒वां-
त्सर्व्व॑तः परि॒भूरसी॒त्येवैतदा॑ह ॥१५॥ आवह॑ दे॒वान्यज॑माना॒येति॑ । तद॒स्मै॑ य॒ज्ञाय॑
दे॒वानावा॑ह॒व्हाऽऽग्निम॒ग्नऽआवह॒ति॒ तद॒ग्निमाया॑ज्यभागाया॒ग्निमावा॑ह॒व्हाऽऽह
सोम॒माव॑हे॒ति तत्सौम्या॒याज्य॑भागाय॒ सोम॒मावा॑ह॒व्हाऽग्निमाव॑हे॒ति तद्य॒देष
उभ॑यत्राच्यु॒तो॒ऽग्निः पुरो॒डाशो भव॑ति॒ तस्मा॑द॒ग्निमावा॑ह॒व्हाऽऽह॑ ॥१६॥ अथ॑
य॒थादैव॒तम् । दे॒वां२ऽश्राज्य॑पां२ऽआवह॒ति तत्प्र॒याजानुयाजानावा॑ह॒व्हाऽऽह प्र-
या॒जानुया॒जा वै दे॒वा आ॑ज्य॒पा अ॒ग्निꣳ होत्रा॑याव॒हेति॒ तद॒ग्निꣳ होत्रा॑यावा॑ह॒व्हा
ऽऽह॒ स्वं म॑हि॒मान॒माव॑हे॒ति तत्स्वं॑ महि॒मान॒मावा॑ह॒व्हाऽऽह वाग्वाऽअ॒स्य स्वो
महि॒मा तद्वाच॑मावा॑ह॒व्हाऽऽहाऽऽ च॒ वह॑ जातवेदः सु॒यजा॑ च य॒जेति॒ तया॒ ह्येतद्दे-
वता आ॒वाहो॑व्हाऽऽह॒ ता ए॒वैतदा॑ह॒ चेना वहानु॒ध्या च॑ य॒जेति॒ यदा॑ह सु॒यजा॑
च य॒जेति॑ ॥१७॥ स वै ति॒ष्ठन्न॒न्वाह॑ । अन्वा॒ह ह्येतद॒सौ ह्यनु॒वाक्या॒ तदस॑वि-
वैतद्भूत्वा॒न्वाह॒ तस्मा॑त्ति॒ष्ठन्न॒न्वाह॑ ॥१८॥ आसी॑नो या॒ज्यां य॑जति । इ॒यꣳ हि या-
ज्या॒ तस्मान्न कश्च॒न तिष्ठ॑न्या॒ज्यां य॑जती॒यꣳ हि या॒ज्या त॑दि॒यमे॒वैतद्भू॒त्वा य॑जति॒ त-
स्मादासी॑नो या॒ज्यां य॑जति ॥१९॥ ॥ ब्राह्मणम् ॥४ [३. २.]॥ ॥
कां० १, अ० ४, ब्रा० २, कं० १०-१९ शतपथब्राह्मण / ७६
इसी से सब यज्ञों को प्राण देते हैं अर्थात् पाक-यज्ञ (खाना पकाने के यज्ञ) को और दूसरे यज्ञों
को । इसलिए कहा, 'प्रणीर्यज्ञानाम्' ॥१०॥
'रथीरध्वराणाम्'—'रथ बनकर देवों के यज्ञ को ले जाता है'। इसलिए कहा, 'रथी-
रध्वराणाम्' ॥११॥
अब कहा—'अतूर्तो होता तूर्णिर्हव्यवाट्'—'इसको राक्षस नहीं रोक सकते, इसलिए
कहा 'अतूर्तः' अर्थात् न रुकनेवाला होता । सब पापियों को परास्त कर देता है इसलिये कहा
'तूर्णिर्हव्यवाट्', अर्थात् ऐसा हव्य ले-जानेवाला जो दूसरों को परास्त कर देता है ॥१२॥
अब कहा—'आस्यात्त्रं जुहूद्देवानाम्'—'देवों के खाने की थाली या मुख-पात्र' । यह
अग्नि जो है वह देवों का पात्र है । इसलिए अग्नि में सब देवों के लिए हवि देते हैं, क्योंकि वह
देवपात्र है, निश्चय करके जो इस बात को जानता है वह उसके पात्र को ले लेता है जिसके पात्र
को वह चाहता है ॥१३॥
अब कहा—'चमसो देवपानः'—'देवो के पीने का चमचा' । इसी चमचे अर्थात् अग्नि से
देव भोजन करते हैं इसलिए इसको कहा 'देवपानः' ॥१४॥
अब कहा—'अराँऽइवाग्ने नेमिर्देवांस्त्वं परिभूरसि'—'हे अग्नि, जिस प्रकार पहिये की
परिधि अरों के चारों ओर लगी रहती है उसी प्रकार तू देवों के चारों ओर है' ॥१५॥
अब कहा—'आवह देवान् यजमानाय'—'देवों को यजमान के लिए बुला ।' यह इसलिये
कहा कि अग्नि देवों को यज्ञ के लिए बुलावे । अब कहा—'अग्निमग्नऽआवह'—'हे अग्नि ! अग्नि
को बुला ।' यह इसलिए कहा कि अग्नि के लिए जो 'आयाज्य भाग' था उस तक अग्नि को लाया
जाय । अब कहा—'सोममावह'—'सोम को ला', जिससे यह सोम के आयाज्य भाग को सोम
तक लावे । अब कहा—'अग्निमावह'—'अग्नि को ला ।' यह इसलिए कहा कि अग्नि के लिए
जो दोनों समय (दर्श और पूर्णमास यज्ञों में) आवश्यक पुरोडाश है उस तक अग्नि को
लावे ॥१६॥
इसी प्रकार और देवों के लिए भी । अब कहा—'देवाँऽआज्यपाँऽआवह'—'आज्य के
पीनेवाले देवों को ला ।' यह इसलिए कहा कि प्रयाज और अनुयाज को ला सके (पहली
आहुति को प्रयाज और पिछली को अनुयाज कहते हैं) क्योंकि प्रयाज और अनुयाज ही आज्य
के पान करनेवाले देव हैं। अब कहा—'अग्नि ँ होत्रायावह'—'अग्नि को होत्र के लिए ला ।' यह
इसलिए कहा कि अग्नि को होता के लिए लावे । अब कहा—'स्वं महिमानमावह'—'अपनी
महिमा को ला ।' यह इसलिए कहा कि अपनी महिमा को ला सके । वाणी ही इसकी अपनी
महिमा है। इसके कहने का तात्पर्य हुआ 'अपनी वाणी को ला' । अब कहा—'आ च वह जातवेदः
सुयजा च यज'—'हे जातवेद अग्नि, (देवों को) ला और अच्छे प्रकार यज्ञ कर ।' जिस-जिस
देवता को लाने के लिए कहता है उस-उसको लाने के लिए आदेश करता है । 'सुयजा' कहने से
तात्पर्य है यथाविधि यज्ञ करना ॥१७॥
वह खड़े-खड़े पढ़ता है। क्योंकि वह (द्यौलोक) है जिसके लिए पढ़ता है, इसलिए खड़े-
खड़े पढ़ता है (अर्थात् दूर की चीज को खड़े होकर बुलाते हैं। द्यौ दूर है। उसके बुलाने के लिए
खड़ा हो जाना चाहिए ॥१८॥
याज्य आहुति को बैठकर अर्पित करता है। यह (अर्थात् पृथिवी) ही याज्य है । इस-
लिए याज्य को खड़े-खड़े न पढ़े। चूंकि याज्य ही यह है इसलिए बैठकर ही याज्य को पढ़ता
है । ('असौ' अर्थात् 'वह' का अर्थ है 'द्यौ' । 'इयं' अर्थात् 'यह' का अर्थ है पृथिवी) ॥१९॥