शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-४, ब्राह्मण-४
६१५ शतपथ ब्राह्मण
कुर्याद्य॒थाचमस॒ वाऽअन्य॑ भ॒क्षा अ॑थैषोऽतिरिक्त॒स्तस्मा॑देत॒स्मिन्त्सर्वे॑षामेव भक्ष॑स्त-
स्माद्धाना विलिम्प॑न्ते भक्षा॑य ॥१०॥ ता न द॒द्भिः खादेयुः । प॒शवो॒ वाऽए॒ते ने-
त्पशून्प्रमृदे॒ करवा॑महा॒ऽइति प्रा॒णैरेव भ॑क्षयन्ति यस्ते॑ऽअश्वस॒निर्भक्षो॒ यो गोस॒-
निर्निति॑ पश॒वो ह्ये॑ते तस्मादाह यस्ते॑ऽअश्वस॒निर्भक्षो॒ यो गोस॒निर्निति॒ तस्य॑ त
ऽइ॒ष्टयजुष स्तुत॒स्तोम॒स्येतीष्टानि॑ हि य॒जूंषि भव॑न्ति स्तु॒ता स्तोमा॑: शस्तो॒क्थ्य॒-
स्येति शस्तानि॒ ह्युक्थानि॒ भव॑न्त्युपहूतस्योपहूतो भक्षयामीत्युपहूतस्य ह्येतद॒-
पहूतो भ॑क्षयति ॥ ११॥ ता नाग्नौ प्रकिरेयुः । नेदु॑च्छिष्टम॒ग्नौ जुहु॒वामेत्युत्तरवेद्या-
मेव निव॑पन्ति त॒था न ब॒र्हिर्धा य॒ज्ञाद्भव॑न्ति ॥ १२॥ अथ पूर्णपात्रात्स॒मव॑मृशन्ति
। ए॒तकेऽप्सुषोमा इत्या॑चक्षते यथा वै युक्तो वहे॒देव॑मेते य॒ऽआत्विज्यं कुर्वन्त्युत
वै युक्तः क्षणुते॒ वा वि वा लिशते शान्तिरापो भेषजं तद्यद्देवात्र क्षाण्वते वा वि
वा लिश॑न्ते शान्तिरापस्तद्भिः शान्त्या शमयन्ते तदद्भिः संद॑धते तस्मात्पूर्णपात्रात्स-
मव॑मृशन्ति ॥१३॥ ते सम॒वमृ॑शन्ति । सं वर्च॑सा॒ पय॑सा॒ सं तनू॑भि॒रग॑न्महि॒ मन॑सा
सं शि॒वेन॑ । त्वष्टा॑ सु॒दत्रो॒ विद॑धातु॒ रायोऽनु॑मार्टु त॒न्वो॒ यद्विलि॑ष्ट॒मिति॒ यद्विवृढं
तत्संद॑धते ॥ १४॥ अथ मुखान्युपस्पृशन्ते । द्वयं तद्यस्मान्मुखान्युपस्पृशन्त्य॒मृतं वा
ऽआपो॒ऽमृते॑नै॒वैतत्सं॑स्पृशन्त॒ऽएतद् धैवैतत्कर्मात्मन्कुर्व॑ते त॒स्मान्मुखान्युप॑स्पृश-
न्ते ॥ १५॥ ब्राह्मणम् ॥५ [४. ३.] ॥ ॥
तानि वाऽए॒तानि॑ । नव॑ समिष्टयजूंषि जुहोति तद्यन्नव समिष्टयजूंषि जु-
होति न॒व वाऽअ॒मूर्बहि॑ष्पवमाने स्तो॒त्रिया भव॑न्ति सैषोभयतो॒ न्यूना वि॒राट्
प्र॒जननायैतस्माद्वाऽउभयतो॑ न्यूनात्प्र॒जननात्प्रजापतिः प्रजाः ससृज॒ऽइतश्चोर्ध्वा इत-
श्चावाचीस्तद्योऽय॒मैष एतस्मादुभयत ए॒व न्यूनात्प्रजननात्प्रजाः सृजत इतश्चोर्ध्वा
इतश्चावाचीः ॥ १॥ हिङ्कार स्तोत्रिया॑णां दश॒मः । स्वाहाकार एतेषां तथो हा-
स्यैषा न्यूना वि॒राड्दशंदशिनी भवति ॥२॥ अथ यस्मात्समिष्टयजूंषि नाम । या
कां० ४, अ० ४, ब्रा० ३-४, कं० १०-१५ व १-३ शतपथब्राह्मण / ६१७
वाले के लिए है। परन्तु ऐसा न करना चाहिए, क्योंकि और पान तो चमसों के अनुसार होते हैं
और यह अतिरिक्त है। इसलिए इसमें सबका भाग शामिल है। इसलिए धानों को सोम-पान के
लिए बाँट लेते हैं ॥१०॥
उनको दाँत से न चबाना चाहिए। ये पशु हैं। कहीं ऐसा न हो कि पशुओं को हानि
पहुंचे। केवल प्राणों के द्वारा पीते हैं, इस मन्त्र से- "यस्ते ऽ अश्वसनिर्भक्षो यो गोसनिः" (यजु०
८।१२) - "जो तेरा पान घोड़ों का दाता और गौओं का दाता है।" यह पशु है। इसलिए कहा
यह घोड़ों का दाता है, गौओं का दाता है। "त ऽ इष्टयजुष स्तुतस्तोमस्य" (यजु० ८।१२) -
"यजु से आहुति दी गई और स्तोमों से स्तुति की गई।" क्योंकि यजुओं से आहुति दी गई और
स्तोमों से स्तुति की गई। "शस्तोक्थस्य ।" (यजु० ८।१२) - क्योंकि उक्थ्य कहे गये।
"उपहूतस्योपहूतो भक्षयामि" (यजु० ८।१२) - "बुलाया हुआ मैं बुलाये हुए को पीता हूँ।"
क्योंकि निमन्त्रित निमन्त्रित को पीता है ॥११॥
उनको आग में न डालना चाहिए। ऐसा न हो कि अग्नि में उच्छिष्ट (जूठा) वस्तु पड़
जाय। उनको उत्तर वेदी में रख देते हैं। इस प्रकार ये यज्ञ से बहिष्कृत नहीं होते ॥१२॥
अब वे भरे हुए पात्रों को छूते हैं जिनको कुछ लोग 'अप्पु षोमा' (जलों में सोम) कहते
हैं। जैसे जुता हुआ घोड़ा ले जाता है इसी प्रकार ये भी ऋत्विज का काम करते हैं। परन्तु
जुते हुए घोड़े के घाव हो जाता है या वह खुजलाता है। जल शान्ति और ओषधि है। यहाँ यज्ञ
में भी जब कभी घाव हो जाय या खुजलावें तो जल शान्तिदायक होने के कारण जलों से ही
शान्ति लेते हैं; जलों को ही धारण करते हैं इसलिए वे भरे हुए पात्रों को छूते हैं ॥१३॥
वे इस मन्त्र से छूते हैं "सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि मनसा सं॒ शिवेन । त्वष्टा
सुदत्रो विदधातु रायोऽनुमार्ष्टु तन्वो यद् विलिष्टम्" (यजु० ८।१४) - "तेज, रस और शरीरों
से तथा कल्याणकारी मन से हम मिलें। अच्छा दानी त्वष्टा हमको धन दे और हमारे शरीर
में जो घाव (त्रुटियाँ) हों उनको चंगा कर दे।" इस प्रकार जो घाव है उसको चंगा करता
है ॥१४॥
अब वे अपने मुंह को छूते हैं। दो कारण हैं जिनसे मुख को छूते हैं। जल अमृत है। अमृत
से ही वे छूते हैं। इसके अतिरिक्त वे इस कर्म (यज्ञ) को अपने में धारण करते हैं। इसलिए
मुखों को छूते हैं ॥१५॥
समिष्टयजुर्होमः
अध्याय ४-ब्राह्मण ४
इस अवसर पर वह नौ समिष्ट यजुओं से आहुति देता है। नौ समिष्ट यजुओं से आहुति
देने का तात्पर्य यह है कि ये बहिष्पवमाने स्तोत्र नौ होते हैं। इस प्रकार दोनों ओर विराट्
न्यून रहता है उत्पत्ति के लिए (विराट् में १० अक्षर चाहिएँ)। इसी दो ओर की न्यूनता से
प्रजापति ने प्रजा को उत्पन्न किया। एक से ऊर्ध्व (ऊपर को चढ़ानेवाले) और दूसरे से नीचे
जानेवाले ॥१॥
स्तोत्रों में हिङ्कार दसवाँ है। इन समिष्ट-यजुओं में स्वाहा दसवाँ है। इस प्रकार यह
न्यून विराट् रसवाला हो जाता है ॥२॥
समिष्ट-यजु नाम इसलिए पड़ा कि इस यज्ञ से जिस देवता को बुलाते हैं या जिन देवताओं
वाऽए॒तेन॑ य॒ज्ञेन॑ दे॒वता॑ ह्वयति॒ याभ्य॑ ए॒ष य॒ज्ञस्ताय॑ते॒ सर्वा॒ वै तत्ताः स॒मिष्टा॒ भ-
वन्ति॒ तद्यत्तासु॒ सर्वा॑सु स॒मिष्टा॒स्वे॒तानि॑ जु॒होति॒ तस्मा॑त्समिष्टयजुं॒षि नाम॑ ॥३॥
अथ॒ यस्मा॑त्समिष्टयजुं॒षि जु॒होति॑ । रि॒रिचा॒नऽइ॑व वाऽए॒तद्दी॑क्षा॒नस्या॒त्मा भ॑वति
य॒द्वास्य॒ भव॑ति॒ तस्य॑ हि ददा॑ति॒ तमे॒वातस्त्रिभिः॑ पुन॒राप्या॑ययति ॥४॥ अथ॒ या-
न्युत्त॑राणि॒ त्रीणि॑ जु॒होति॑ । या वाऽए॒तेन॑ य॒ज्ञेन॑ दे॒वता॑ ह्वय॑ति॒ याभ्य॑ ए॒ष य॒ज्ञ-
स्ताय॑त॒ऽउप॑ ह॒वै ता आ॑सते॒ याव॑त् समिष्टयजुं॒षि जुहु॑ती॒मानि॒ नु नो॑ जुहु॒वि-
ति॒ ता ह्यै॒वैतद्य॑थाय॒थं व्यव॑सृजति॒ यत्र॑-यत्रासां॒ चरणं॒ तदनु॑ ॥५॥ अथ॒ यान्यु॑त्तमा-
नि॒ त्रीणि॑ जु॒होति॑ । य॒ज्ञं वाऽए॒तद॒जी॑जनत॒ यदि॑नम॒तन॒ तं ज॑नयि॒त्वा यत्रा॑स्य प्र-
ति॒ष्ठा तत्प्र॑ति॒ष्ठाप॑यति॒ तस्मा॑त्समिष्टयजुं॒षि जु॒होति॑ ॥६॥ स जु॑होति । स॒मिन्द्र॑
णो॒ मन॑सा नेषि॒ गोभि॒रिति॒ मन॑सेति॒ तन्मन॑सा रिरिचान॒माप्या॑ययति॒ गोभि॒रिति॑
तद्गोभी॑ रिरिचान॒माप्या॑ययति॒ सꣳ सू॒रिभि॑र्मघवन्त्सꣳ स्व॒स्त्या॑ । सं ब्रह्म॑णा दे॒व-
कृतं॒ यदस्तीति॒ ब्रह्म॑णेति॒ तद्ब्रह्म॑णा रिरिचान॒माप्या॑ययति॒ सं दे॒वानाꣳ॑ सु॒मतौ
य॒ज्ञिया॑नाꣳ स्वाहा॑ ॥७॥ सं वर्च॑सा । पय॑सा॒ सं तनूभि॒रिति॒ वर्च॑सेति॒ तद्वर्च॑सा
रिरिचान॒माप्या॑ययति॒ पय॒सेति॑ र॒सो वै पय॒स्तत्पय॑सा रिरिचान॒माप्या॑ययत्य॒गन्म॑हि
मन॑सा॒ सꣳ शि॒वेन॑ । त्वष्टा॑ सु॒दत्रो॒ विद॑धातु॒ रायोऽनु॑मार्ष्टु त॒न्वो॒ यद्वि॒लिष्ट॒मिति॑
वि॒वृढं॒ तत्सं॑दधाति ॥८॥ धाता रा॒तिः॑ । सवि॒तेदं जु॑षन्तां प्र॒जाप॑तिर्निधि॒पा दे॒वो
ऽअ॒ग्निः॑ । त्वष्टा॒ विष्णुः॑ प्र॒जया॒ सꣳररा॒णा यज॑मानाय॒ द्रवि॑णं दधात॒ स्वाहेति॑ तद्दे॒व
रिरिचा॒नं पुन॒राप्या॑ययति॒ यदा॑ह॒ यज॑मानाय॒ द्रवि॑णं दधात॒ स्वाहेति॑ ॥९॥ सु॒गा
वो॑ दे॒वाः । सद॑ना अकर्म॒ यऽआ॒ग्मदꣳ सव॑नं जुषा॒णा इति॑ सु॒गानि॑ वो दे॒वाः
सद॑नान्यकर्म॒ यऽआ॒ग्मते॒दꣳ सव॑नं जुषा॒णा इ॒त्ये॒वैतदा॑ह भुर॒माणा॒ वह्न॑माना ह॒-
वीꣳषीति॑ तद्दे॒वता॒ व्यव॑सृजति भुर॒माणा॒ अहू॑ ते य॒न्तु येऽवाह्व॑ना वह्न॑माना उ
ते य॒न्तु ये वाह॑नवन्त इ॒त्ये॒वैतदा॑ह॒ तस्मा॑दाह भुर॒माणा॒ वह्न॑माना ह॒वीꣳष्य॒स्मे
कां० ४, अ० ४, ब्रा० ४, कं० ३-१० शतपथब्राह्मण / ६१६
के लिए यज्ञ रचाते हैं वे सब समिष्ट (चाहे हुए) हो जाते हैं। उन सब समिष्टियों में इनकी आहुति
दी जाती है इसलिए इनको समिष्ट-यजु कहते हैं ॥३॥
समिष्ट यजुओं की आहुति इसलिए दी जाती है कि यज्ञ करनेवाले का आत्मा तो खाली
हो जाता है, क्योंकि जो कुछ उसका होता है उसको वह दे चुकता है, इनमें से तीन आहुतियों से
उसी की पूर्ति की जाती है ॥४॥
और जो अन्य तीन आहुतियां दी जाती हैं, इस यज्ञ से जिस देवता को बुलाता है, या
जिन देवताओं के लिए यज्ञ रचता है, वे सब देवता प्रतीक्षा करते रहते हैं जब तक कि समिष्ट-
यजुओं की आहुति नहीं पड़ती कि यह हमारे लिए आहुतियां देगा। इन्हीं देवताओं का वह
यथाविधि विसर्जन कर देता है। जहां-जहां वे जाना चाहें क्रम से ॥५॥
और जो तीन अन्तिम आहुतियां हैं, उनसे यज्ञ की उत्पत्ति की, और उत्पत्ति करके उसने
यहां उसकी प्रतिष्ठा की। चूंकि वह उसकी प्रतिष्ठा करता है इसलिए वह समिष्ट-यजुओं से
आहुति देता है ॥६॥
वह इस मन्त्र से आहुति देता है—‘‘समिन्द्र णो मनसा नेषि गोभिः’’ (यजु० ८।१५,
ऋ० ५।४२।४)—‘‘हे इन्द्र, तू हमको मन से और गौओं से प्राप्त होता है।’’ जो मन (विचार)
से खाली था उसको मन से और जो गौओं से खाली था उसको गौओं से भरता है। ‘‘स॒ँ सूरि-
भिर्मघवन्त्सं स्वस्त्या। सं ब्रह्मणा देवकृतं यदस्ति’’ (यजु०८।१५)—‘‘हे इन्द्र, विद्वानों से, कल्याण
से और देवकृत-स्तुति।’’ जो स्तुति से खाली था उसकी स्तुति द्वारा पूर्ति करता है। ‘‘सं देवानाँ
सुमती यज्ञियानाँ स्वाहा’’ (यजु० ८।१५)—‘‘यज्ञ करनेवाले देवों की सुमति से’’ ॥७॥
‘‘सं वर्चसा पयसा सं तनूभिः’’ (यजु० ८।१६)—‘‘तेज से खाली को तेज से, रस से
खाली को रस से भरता है क्योंकि ‘पय’ नाम है रस का।’’ ‘‘अग्न्महि मनसा संशिवेन। त्वष्टा
सुदत्रो विदधातु रायोऽनुमार्ष्टु तन्वो यद्विलिष्टम्’’ (यजु० ८।१६)—‘‘(यह वही है जो
८।१४ है। इसका अर्थ ऊपर आ चुका) उस प्रकार जो व्रण था उसको चंगा करता है ॥८॥
तीसरी आहुति इस मन्त्र से—‘‘धाता रातिः सवितेदं जुषन्तां प्रजापतिर्निधिपा देवो-
ऽअग्निः। त्वष्टा विष्णुः प्रजया सँ रराणो यजमानाय द्रविणं दधात स्वाहा’’ (यजु० ८।१७,
अथर्व ७।१७।४)—‘‘कृपालु धाता, सविता, कोष की रक्षा करनेवाला प्रजापति, अग्निदेव इस
आहुति को लेवे। त्वष्टा विष्णु यजमान के लिए धन और सन्तान दे।’’ ‘यजमान को धन दे’ ऐसा
कहने से प्रयोजन यह है कि यह जो खाली हो गया था उसको भरता है ॥६॥
चौथी आहुति इससे—‘‘सुगा वो देवाः सदना ऽअकर्म य ऽआजग्मेदँ॒ सवनं जुषाणाः’’
(यजु० ८।१८)—‘‘अर्थात् हे देवो ! जो इस सोम-भाग में आये हुए हो, तुम्हारे लिए हमने ऐसे
घर बनाये हुए हैं जिनमें तुम सुगमता से जा सको।’’ ‘‘भरमाणा वहमाना हवीँषि’’ (यजु०
८।१८)—‘‘हवियों को ढोते हुए या गाड़ियों में ले-जाते हुए।’’ ऐसा कहकर वह कतिपय देवों
का विसर्जन करता है। जिनके पास सवारियां नहीं हैं वे स्वयं हवियों को ढोते हैं और जिनके
पास सवारियां हैं वे सवारी में ले जाते हैं। इसलिए कहा ‘भरमाणा’ अर्थात् ढोते हुए और