शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-२, ब्राह्मण-१
५४८ शतपथ ब्राह्मण
ष्यति स्तु॒ते हि ब॑हिष्पवमा॒नेऽआ॑ग॒हताम् ॥ १५॥ तौ हो॑चतुः । मु॒ख्यौ वा॒ऽआवा॑-
ञ्द्य॒ज्ञस्य॒ स्वो याव॑ध॒र्युङ्ङ॒हू नावि॒मं पु॒रस्ता॒दहं पर्येाहर॒ताभि॑ द्विदे॒वत्या॑नीति॒ ता-
भ्यामे॒तं पु॒रस्ता॒दहं पर्याज॑हुर॒भि द्विदे॒वत्यां॑स्तस्मादे॒ष द॑श॒मो ग्र॒हो गृ॑ह्यते तृती॑य
एव वषट्क्रियतॆऽथ यद॑श्विना॒विती॒मे ह॒ वै द्यावा॑पृथि॒वी प्र॒त्यक्ष॑मश्वि॒नावि॒मे ही-
दꣳ सर्व॒माश्नु॑वातां पुष्करस्रजा॒वित्य॒ग्निर्हैवास्यै॒ पुष्क॑रमादि॒त्योऽमुष्यै॑ ॥ १६॥ अथा॑-
तो गृ॒ह्णात्ये॒व । या वां॑ क॒शा मधु॑मत्यश्विना सू॒नृता॑वती । तया॑ य॒ज्ञं मि॑मिक्षतम् ।
उ॒पया॒मगृ॑हीतोऽस्य॒श्विभ्यां॑ त्वै॒ष ते॒ योनि॒र्माध्वीभ्यां॒ त्वेति॑ सादयति॒ तं वै मधु॑मत्य॒-
ऽर्चा गृ॑ह्णाति माध्वीभ्यां॒ त्वेति॑ सादयति तद्यन्मधु॑मत्य॒ऽर्चा गृ॑ह्णाति माध्वीभ्यां॒ त्वेति॑
साद॒यति॑ ॥ १७॥ दध्यङ् ह वा॒ऽआ॑भ्या॒माथा॑र्वणः । मधु॒ नाम॑ ब्रा॒ह्मण॑मुवाच॒ तद्दे॒-
नयोः प्रि॒यं धाम॒ तद्दे॒वेनयोरे॒तेनो॑पग॒ह्यत॒ तस्मान्मधु॑मत्य॒ऽर्चा गृ॑ह्णाति माध्वीभ्यां॑
त्वेति॑ सादयति ॥ १८॥ तानि वा॒ऽए॒तानि॑ । षड्ढानि पात्रा॑णि भवन्ति॒ राज्ञाव-
मैन्द्रवायवपात्रं तत्तस्य द्वितीयꣳ रूपं तेन तद्विदेवत्यमथैकाग्रं मैत्रावरुणपात्रं त-
त्तस्य द्वितीयꣳ रूपं तेन तद्विदेवत्यमौष्ठमाश्विनपात्रं तत्तस्य द्वितीयं रूपं तेन त-
द्विदेवत्यमथ यदश्विना॒विति मुख्यौ वा॒ऽअ॒श्विनावौष्ठमिव वा॒ऽइदं मुखं तस्मादौ-
ष्ठमाश्विनपात्रं भवति ॥ १९॥ ब्राह्मणम् ॥ ५॥ प्रथमोऽध्यायः [६५.] ॥ ॥
चक्षु॑षी ह वा॒ऽअ॒स्य शुक्रा॒मन्थिनौ॑ । तद्या॒ऽए॒ष ए॒व शुक्रो य॒ एष॒ तपति त-
द्येदे॒ष एतत्तप॑ति तेनै॒ष शु॒क्रश्च॒न्द्रमा ए॒व मन्थी॑ ॥ १॥ तꣳ सक्तुभिः श्रीणाति ।
तदेनं मन्थं करोति तेनोऽएष मन्ध्येतौ ह वाऽआसां प्रजानां चक्षुषी न यदिदौ
नोदियातां न हैवेह स्वौ चन पाणी निर्जानीयुः ॥ २॥ तयोरत्तैवान्यतरः । आ-
द्योऽन्यतरोऽत्तैव युक्त आद्यो मन्थी ॥ ३॥ तयोरत्तैवान्यतरमनु । आद्योऽन्यत-
रमन्वतैव शुक्रमन्वाद्यो मन्थिनमनु तौ वाऽअन्यस्मै गृह्येतेऽअन्यस्मै हूयेते श-
ण्डामर्कावित्यसुररक्षसे ताभ्यां गृह्येते देवताभ्यो हूयेते तद्यत्तथा ॥ ४॥ यत्र वै
कां० ४, अ० १-२, ब्रा० ५-१, कं० १५-१६ व १-४ शतपथब्राह्मण / ५४६
की स्तुति के पश्चात् ही वे आये थे ॥१५॥
वे बोले, 'हम अध्वर्यु हैं, हमीं यज्ञ में मुख्य हैं । हमारे इस पहले ग्रह को द्विदेवतों के लिए
दे दो ।' उन्होंने उस पहले ग्रह को द्विदेवतों को दे दिया । इसलिए यह दसवाँ ग्रह है और तीसरा
वषट्कार होता है । ये अश्विन कौन हैं ? द्यौ और पृथिवी । यही दो तो हैं जो सबको अश्नुवातां
या प्राप्त करते हैं । यह पुष्कर स्रज अर्थात् पुष्कर की माला वाले हैं, क्योंकि पृथिवी का पुष्कर
अग्नि है और द्यौ का सूर्य ॥१६॥
वह अश्विन ग्रह को इस मन्त्र से लेता है— “या वां कशा मधुमत्यश्विना सूनूतावती ।
तया यज्ञं मिमिक्षतम्” (यजु० ७।११, ऋ० १।२२।३) — 'हे अश्विन, यह जो तुम्हारी मीठी
और प्रसन्न करनेवाली कशा या वाणी है उससे यज्ञ को मिलाओ ।' "उपयामगृहीतोऽस्यश्विभ्यां
त्वा” (यजु० ७।११) — 'तुझे आश्रय के लिए ग्रहण किया है। दोनों अश्विनों के लिए तुझको ।'
इस मन्त्रांश से उसको रख देता है— “एष ते योनिर्मध्वीभ्यां त्वा” (यजु० ७।११) — 'यह तेरी
योनि है, मधु-प्रियों के लिए तुझे ।' 'मधु' शब्द वाली ऋचा के साथ क्यों उठाता है और 'मधु-
प्रियों के लिए तुझे' ऐसा कहकर क्यों रख देता है ? ॥१७॥
दध्यङ् अथर्वा ने 'मधु-ब्राह्मण' को अश्विनों को बताया था । यह इनका प्रिय धाम है ।
उनके इसी प्रिय से वह उनके पास जाता है। इसलिए मधु शब्द वाली ऋचा से उठाता है और
'मधुप्रियों के लिए तुझको' यह कहकर रखता है ॥१८॥
ये पात्र चिकने होते हैं । इन्द्र और वायु के पात्र के बीच में मेखला होती है । यह
इसका दूसरा रूप है । इसलिए यह दो देवों का होता है। मित्र-वरुण का पात्र बकरी की आकृति
का होता है। यह इसका दूसरा रूप है। इसलिए यह दो देवताओं का है। आश्विनों का ग्रह होंठ
की आकृति का होता है। यह उसका दूसरा रूप है, इसलिए यह दो देवताओं का है। यह पात्र
अश्विनों का इसलिए होता है कि अश्विन यज्ञ का मुख (मुख्य) हैं और मुख में होंठ होते हैं ।
इसलिए आश्विन-ग्रह होंठ की आकृति का होता है ॥१९॥
शुक्रामन्थि ग्रहौ
अध्याय २–ब्राह्मण १
शुक्र और मन्थिन् ग्रह उसकी आँख हैं। यह जो तपता है अर्थात् सूर्य, वह शुक्र है। चूँकि
तपता है इसलिए इसका नाम सूर्य है । चन्द्रमा मन्थी है ॥१॥
उसमें सत्तू मिलाता है। यह जो मथता है इसलिए इसका नाम मन्थी है। ये दोनों सूर्य
और चाँद इन प्रजाओं की आंख हैं, क्योंकि यदि दोनों उदय न हों तो लोगों को अपने दोनों हाथ
भी न दीखें ॥२॥
इनमें एक खानेवाला है और एक खाद्य । शुक्र खानेवाला है और मन्थी खाद्य ॥३॥
एक इनमें से खानेवाले के अनुकूल है, दूसरा खाद्य के—शुक्र खानेवाले के, मन्थिन् खाद्य
के । ये ग्रह एक के लिए जाते हैं और दूसरे के लिए इनकी आहुति दी जाती है । शण्ड और मर्क
दो असुर राक्षस हैं । इनके लिए ग्रह लिये जाते हैं और देवों के लिए इनकी आहुति दी जाती है ।
यह इस प्रकार से—॥४॥
दे॒वाः । असुर॒रक्ष॒सान्यप॑जघ्निरे तदे॒तावेव न॒ शेकु॒रपह॑न्तुं यद्ध स्म दे॒वाः किं च
कर्म॒ कुर्व॑ते॒ तद्ध॒ स्म मो॒हयि॒त्वा क्षिप्र॒ऽएव पुन॒रप॑द्रवतः ॥५॥ ते ह॒ देवा॑ ऊचुः ।
उप॑जानीत यथे॒मावपह॑नामहा॒ऽइति॒ ते होचुर्गृहा॑वे॒वाभ्यां॒ गृहाम॒ ताव॒भ्यवै॑ष्यत-
स्तौ स्वी॒कृत्या॒पह॑निष्यामहा॒ऽइति॒ ताभ्यां॒ ग्रहौ॑ जगृहू॒स्ताव॒भ्यवै॑तां तौ स्वी॒कृत्या॑-
पाघ्नत॒ तस्मा॑च्छण्डा॒मर्का॑भ्या॒मिति॑ गृह्येते दे॒वता॑भ्यो हूयेते ॥६॥ अ॒पि होवाच
याज्ञवल्क्यः । नो स्त्वि॑द्दे॒वता॑भ्य ए॒व गृह्णीयामा३ विजि॑तरूपमिव॒ हीद॒मिति॒ तद्धे
स तन्मीमाꣳसा॑मेव॒ चक्रे नेत्तु चकार ॥७॥ इ॒मामु॒ हैके शुक्रस्य पुरोरुचं कुर्व-
न्ति । अ॒यं वे॒नश्चोद्य॒त्पृश्नि॑गर्भा॒ ज्योति॑र्जरायू॒ रज॑सो वि॒मान॒ऽइति॒ तदे॒तस्य रू॒पं
कुर्मो य ए॒ष तप॑तीति॒ यदा॒ह ज्योति॑र्जरा॒युरिति॑ ॥८॥ इमां त्वे॒व शुक्रस्य॑ पुरो॒रुचं
कुर्या॒त् । तं प्र॒त्नथा॒ पूर्व॑था वि॒श्वथे॒मथाᳵ ज्येष्ठता॑तिं बर्हि॒षद॒ꣳ स्व॑र्वि॒दमित्ये॒ता ह्ये॑-
तम॒न्वत्ता हि ज्येष्ठस्तस्मादाह॒ ज्येष्ठता॑तिं बर्हि॒षद॒ꣳ स्व॑र्विदम् प्रती॒चीनं॑ वृज॒नं
दोहसे धुनि॒माशुं जय॑न्त॒मनु॒ यासु॒ वर्ध॑से । उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि॒ शण्डा॑य त्वै॒ष ते॒
योनि॑र्वी॒रतां पा॒हीति॑ सादयत्ये॒ता ह्ये॑तम॒न्वत्ता हि वी॒रस्तस्मा॒दाहै॒ष ते॒ योनि॑-
र्वी॒रतां पा॒हीति॒ दक्षि॑णार्धे सादयत्ये॒ताꣳ ह्ये॑ष दि॒शम॑नु॒ संचर॑ति ॥९॥ अथ म-
न्थि॒नं गृह्णा॑ति । अ॒यं वे॒नश्चोद॑य॒त्पृश्नि॑गर्भा॒ ज्योति॑र्जरायू॒ रज॑सो वि॒माने॑ । इ॒मम॒-
पाꣳ स॑ङ्ग॒मे सूर्य॑स्य॒ शिशुं न विप्रा॑ म॒तिभी रिहन्ति । उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि म॒र्काय॑
त्वेति॑ ॥१०॥ तꣳ स॒क्तुभिः॑ श्रीणाति । तद्यत्स॒क्तुभिः॑ श्रीणा॒ति वरु॑णो ह॒ वै सो-
मस्य॒ राज्ञो॒ऽभीवा॒द्धि प्र॑तिपि॒पेष॒ तद॒श्वय॑त्ततो॒ऽश्वः॒ सम॑भवत्तद्य॒ङ्कूय॒यात्स॒मभ॑वत्त-
स्मादश्वो॒ नाम॒ तस्या॒श्रु प्रास्क॑न्दत्ततो॒ यवः॒ सम॑भवत्तस्मादाहु॒र्वारु॒ण्यो॒ यव॒ इति॑
तद्यद्दे॒वाःस्यात्र॑ चक्षुषो॒ऽमीयत॒ तेनै॒वैनमेतत्सम॑र्धयति कृ॒त्स्नं क॑रोति॒ तस्मात्स॒क्तु-
भिः॑ श्रीणाति ॥११॥ स॒ श्री॑णाति । मनो॒ न येषु॒ हव॑नेषु ति॒ग्मं विपः॒ शच्या॑
वनुथो द्र॒वता॑ । आ यः शर्या॑भिस्तुविनृ॒म्णोऽअ॒स्याश्रीणीता॒दिशं॒ गभ॑स्तावे॒ष ते॒
का० ४, अ० २, ब्रा० १, क० ५-१२ शतपथब्राह्मण / ५५१
जब देवों ने असुर राक्षसों को मार भगा दिया तो वे इन दोनों को न भगा सके। देवता
जो कुछ करते, ये दोनों उनमें विघ्न डालते और फिर झट से भाग जाते ॥५॥
तब देवों ने कहा-‘क्या तुम कोई उपाय कर सकते हो कि इन दोनों को भगा सकें?’ वे
कहने लगे-‘इन दोनों के लिए दो ग्रह लें। वे इन दोनों को लेने के लिए आवेंगे। हम इनको
पकड़कर मार भगायेंगे।’ उन दोनों के लिए ग्रह लिये और जब वे आये तो उनको पकड़कर मार
भगाया। इसलिए षण्ड और मर्क के लिए ये दो ग्रह लिये जाते हैं और देवताओं के लिए इनकी
आहुति दी जाती है ॥६॥
याज्ञवल्क्य ने यह भी कहा है कि हम इनको देवताओं के लिए ही क्यों न न लें। यह तो
जीत का चिह्न है। परन्तु उन्होंने इतनी मीमांसा मात्र की है। व्यवहार में इसको कभी नहीं
लाये ॥७॥
कुछ लोग इस ऋचा को शुक्र की पुरोरुक् या स्तुति में लाते हैं, “अयं वेनश्चोदयत् पृश्नि-
गर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने” (यजु० ७।१६)—यहाँ ‘ज्योतिर्जरायुः’ (प्रकाश है जरायु
जिसका) कहा, इससे तात्पर्य यह है कि वह इसको तपनेवाले सूर्य के समान करता है ॥८॥
परन्तु शुक्र की पुरोरुक् या स्तुति इस मन्त्र से होनी चाहिए, “तं प्रत्नथा पूर्वथा विश्व-
थेमथा ज्येष्ठतातिं बर्हिषद॑ स्व॒र्विदम्” (यजु० ७।१२, ऋ० ५।४४।१)—“पुरानी रीति से,
पहली रीति से, सब रीति से, आजकल की रीति से बड़े, यज्ञधारी, स्वर्ग विद्या के जाननेवाले
यजमान को।” यह शुक्र खानेवाला है, और खानेवाला ही बड़ा है। इसलिए कहा कि ‘बड़े, यज्ञ-
धारी, स्वर्ग विद्या के जाननेवाले को’। “प्रतीचीनं वृजनं दोहसे धुनिमाशुं जयन्तमनु यासु वर्धसे।
उपयामगृहीतोऽसि षण्डाय त्वैष ते योनिर्वीरतां पाहि” (यजु० ७।१२)—“जो उपस्थित है,
बलवान् है, शत्रुओं को जीतनेवाला और शीघ्रगामी है, ऐसे यजमान को तू दुहता है उन यज्ञ-
क्रियाओं में जिनमें तू बढ़ता है। तुझे रक्षा के लिए ग्रहण किया गया है। षण्ड के लिए तुझे। यह
तेरी योनि है। तू वीरता की रक्षा कर।” यह पढ़कर वह रख देता है। यह खानेवाला है। खाने-
वाला वीर होता है। इसलिए कहा कि ‘यह तेरी योनि है, तू वीरता की रक्षा कर।’ दक्षिण के
कोने में इसको रखता है, क्योंकि इसी दिशा में सूर्य चलता है ॥६॥
अब इस मन्त्र से मन्थी को लेता है, “अयं वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो
विमाने। इममपा॑७ संगमे सूर्यस्य, शिशुं न विप्रा मतिभी रिहन्ति। उपयामगृहीतोऽसि मर्काय
त्वा” (यजु० ७।१६)—“यह वेनः (चन्द्र) पृश्निगर्भा (द्यौलोक या सूर्य के सहारे स्थित) ज्योतिर्ज-
रायु (ज्योति से लिपटा हुआ), (विमाने) अन्तरिक्ष में (रजसः) जलों को (चोदयत्) प्रेरणा
करता है। विद्वान् लोग शिशु के समान इसकी सूर्य के जलों के साथ संगम के समय में बुद्धियुक्त
वाणियों से स्तुति करते हैं। रक्षार्थ लिया. गया है। मर्क के लिए तुझको” ॥१०॥
उसमें सत्तू मिलाता है। सत्तू इसलिए मिलाता है कि वरुण ने सोम राजा की आँख में
मारा और वह सूज गई (अश्वयत्)। उसमें से अश्व (घोड़ा) निकला। चूंकि यह सूजन में से
निकला इसलिए इसका ‘अश्व’ नाम पड़ा। उसका एक आँसू गिरा। उसमें से जौ उत्पन्न हुए।
इसलिए जौ (वरुण) वरुण का समझा जाता है। इस प्रकार आँख का जितना भाग उस समय
दुख गया था उसी की पूर्ति करता है। उसे चंगा करता है। इसलिए सत्तूओं को मिलाता है ॥११॥
वह इस मन्त्र से मिलाता है, “मनो न येषु हवनेषु तिग्मं विपः शच्या वनुथो द्रवन्ता। आ
यः शर्याभिस्तु विन्दुमणो ऽ अस्याश्रीणीतादिशं गभस्तौ” (यजु० ७।१७, ऋ० १।६१।३) “जिन
योनि॒: प्र॒जाः पा॒हीति॑ सादयत्या॒व्यो ह्ये॑त॒मन्वा॒द्या ह्यी॒माः प्र॒जा विश॒स्तस्मा॑दाहै॒ष
ते योनि॒: प्र॒जाः पा॒हीति॑ ॥ १२॥ द्वौ प्रोक्षि॑तौ यूपशकलौ भवतः । द्वावप्रोक्षितौ
प्रोक्षि॑तं चै॒वाध्व॒र्युराद॒त्तेऽप्रोक्षि॑तं चै॒वमे॒व प्र॑तिप्रस्था॒ता प्रोक्षि॑तं चै॒वाद॒त्तेऽप्रोक्षि॑तं
च शुक्रमै॒वाध्व॒र्युराद॒त्ते म॒न्थिनं॑ प्रतिप्रस्था॒ता ॥ १३॥ सोऽध्व॒र्युः। अप्रॊक्षितेन यूप-
शकलेनापमार्ष्ट्यपमृष्टः शण्ड इत्येवमेव प्रतिप्रस्थातापमृष्टो मर्क इति तदाददा-
नावेवासुररक्षसेऽपघ्नतो देवास्त्वा शुक्रपाः प्रणयन्त्वित्येवाध्वर्युर्निष्क्रामति देवा-
स्त्वा मन्थिपाः प्रणयन्त्विति प्रतिप्रस्थाता तदेतौ देवताभ्य एव प्रणयतः ॥ १४॥
तौ जघनेनाहवनीयमरत्नी संधत्तः । तावुत्तरवेदी सादयतो दक्षिणायामेव श्रो-
णावध्वर्युः सादयत्युत्तरायां प्रतिप्रस्थाताननुसृजन्तावेवानाधृष्टासीति तद्रक्षोभिरेवै-
तदुत्तरवेदिमनाधृष्टां कुरुतो विपर्येष्यन्तौ वाऽएतावग्निं भवतोऽत्येष्यन्तौ तस्मा
ऽएवैतन्निह्नुवाते तथो हैनौ विपरीयन्तावग्निर्न हिनस्ति ॥ १५॥ सोऽध्वर्युः पर्यै-
ति । सुवीरो वीरान्प्रजनयन्यरीहीत्येता ह्येतमन्वक्ता हि वीरस्तस्मादाह सुवीरो
वीरान्प्रजनयन्यरीहीत्यभि रायस्पोषेण यजमानमिति तद्यजमानायाशिषमाशास्ते
यदाहाभि रायस्पोषेण यजमानमिति ॥ १६॥ अथ प्रतिप्रस्थाता पर्यैति । सुप्रजाः
प्रजाः प्रजनयन्यरीहीत्याव्यो ह्येतमन्वाद्या ह्यीमाः प्रजा विशस्तस्मादाह सुप्रजाः
प्रजाः प्रजनयन्यरीहीत्यभि रायस्पोषेण यजमानमिति तद्यजमानायाशिषमाशास्ते
यदाहाभि रायस्पोषेण यजमानमिति ॥ १७॥ तावपिधाय निष्क्रामतः । तिर ऽ
वैनावितत्कुरुतस्तस्मादिमौ सूर्याचन्द्रमसौ प्राञ्चौ यन्तौ न कश्चन पश्यति तौ पु-
रस्तात्परीत्यापोर्णुतः पुरस्तात्तिष्ठन्तौ जुहुत आविरेवैनावितत्कुरुतस्तस्मादिमौ सू-
र्याचन्द्रमसौ प्रत्यञ्चौ यन्तौ सर्व एव पश्यति तस्मात्पराचेतः सिच्यमानं न कश्चन
पश्यति तदु पश्चात्प्रजायमान सर्व एव पश्यति ॥ १८॥ तौ जघनेन यूपमरत्नी
संधत्तः । यद्य॒ग्नि॒र्नाद्रि॑येत यद्यु॑ऽअ॒ग्नि॒रुद्रि॑येतोपा॒य्ये॑नैव यूप॑मर॒त्नी संद॑ध्याताꣳ संज्ञ-
का० ४, अ० २, ब्रा० १, कं० १२-१६ शतपथब्राह्मण / ५५३
हवनों में विचार के समान तेज तुम दोनों अध्वर्यु कर्म के द्वारा जाते हो। जिस बहुत धनवाले
अध्वर्यु ने अंगुलियों से हाथ में लिये हुए (मन्थि में) सत्तू मिलाये हैं।" इस मन्त्र से रख देता है,
“एष ते योनिः प्रजाः पाहि” (यजु० ७।१७) - "यह तेरी योनि है। प्रजा को पाल।" यह ग्रह
खाद्य है। यह प्रजा भी खाद्य है। इसलिए कहा कि यह योनि है, तू प्रजा को पाल ॥१२॥
यूप के दो टुकड़े प्रोक्षित (जल छिड़के) होते हैं और दो अप्रोक्षित (बिना जल के
छिड़के)। अध्वर्यु एक प्रोक्षित और एक अप्रोक्षित लेता है। इसी प्रकार प्रतिप्रस्थाता भी एक
प्रोक्षित और अप्रोक्षित लेता है। अध्वर्यु शुक्र को लेता है और प्रतिप्रस्थाता मन्थि को ॥१३॥
अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता दोनों राक्षसों को इस प्रकार निकालते हैं कि अध्वर्यु अप्रोक्षित
यूप-शकल से उस ग्रह को मांजता है और कहता है 'अपमृष्टः शंडः' (शंड भगा दिया गया) और
इसी प्रकार प्रतिप्रस्थाता कहता है 'अर्क भगा दिया गया'। अध्वर्यु यह कहकर बाहर जाता है,
“देवास्त्वा शुक्रपाः प्रणयन्तु"- "शुक्र पीनेवाले देव तुझे ले जावें।" प्रतिप्रस्थाता यह कहकर बाहर
जाता है, “देवास्त्वा मन्थिपाः प्रणयन्तु"- "मन्थि पीनेवाले देव तुझे ले जावें।" इस प्रकार ये
दोनों देवताओं के निमित्त हवियों को ले जाते हैं ॥१४॥
वे दोनों आहवनीय के पीछे उत्तर वेदी पर (दाहिनी हाथ की) कुहनी मिलाकर उन
ग्रहों को रखते हैं। दक्षिण श्रोणी में अध्वर्यु रखता है और उत्तर में प्रतिप्रस्थाता बिना छोड़े
हुए, यह कहकर, “अनाधृष्टाऽसि" (यजु० ७।१७) - "तू आक्रमण से सुरक्षित है।" इस प्रकार
ये दोनों वेदी को राक्षसों से सुरक्षित करते हैं। ये अग्नि की परिक्रमा करनेवाले हैं। इसलिये
इनको प्रसन्न करता है। इस प्रकार जब वे परिक्रमा करते हैं तो अग्नि इनको नहीं
सताती ॥१५॥
अध्वर्यु इस मंत्र से परिक्रमा करता है, "सुवीरो वीरान् प्रजनयन्" (यजु० ७।१३)—
"वीर वीरों को उत्पन्न करता हुआ।" यह हवि खानेवाले की स्थानी है और खाने वाला वीर
है। इसलिए कहा कि वीरों को उत्पन्न करता हुआ। "परीह्यभि रायस्पोषेण यजमानम्” (यजु०
७।१३)-"यजमान को धन से युक्त कर।" यह जो कहा कि यजमान को धन से युक्त कर,
इससे यजमान को आशीर्वाद देता है ॥१६॥
प्रतिप्रस्थाता इस मन्त्र से परिक्रमा करता है, "सुप्रजाः प्रजाः प्रजनयन्” (यजु०
७।१८) - "अच्छी प्रजावाले, प्रजाओं को उत्पन्न करते हुए।" यह हवि खाद्य का स्थानी है, और
ये प्रजा के लोग खाद्य हैं। इसलिए कहा कि प्रजा को उत्पन्न करते हुए। "परीह्यभि रायस्पोषेण
यजमानम्" (यजु० ७।१८)- "यजमान को धन से युक्त कर।" यह जो कहा कि यजमान को
धन से युक्त कर, इससे यजमान को आशीर्वाद देता है ॥१७॥
वे दोनों ग्रहों को (हाथ से) ढककर ले जाते हैं। वह इनको छिपा लेता है। इसीलिए
जब सूर्य और चन्द्र आगे की ओर चले जाते हैं तो छिप जाते हैं। (यूप के) सामने जाकर वे
(ग्रहों को) खोल देते हैं और सम्मुख खड़े होकर आहुति देते हैं। इससे वे उनको 'दृष्ट' बनाते
हैं। इसीलिए जब सूर्य और चन्द्र पीछे लौटते हैं तो उसको सब कोई देखता है। इसीलिए जब
वीर्य सींचा जाता है तो कोई नहीं दिखता, परन्तु जब उत्पत्ति होती है तो सब देखते हैं ॥१८॥
वे यूप के पीछे अपनी कुहनियां रखते हैं कि कहीं आग भड़क न उठे। लेकिन अगर आग
भड़क उठे तो यूप के सामने कुहनी कर लें— अध्वर्यु इस मन्त्र से, "संजग्मानो दिवा पृथिव्या
५५४ शतपथ ब्राह्मण
ग्म॒ानो दि॒वा पृ॑थि॒व्या शु॒क्रः शु॒क्रशो॑चिषे॒त्येवा॑ध्व॒र्युः सं॒ग्मानो॑ दि॒वा पृ॑थि॒व्या म-
न्थी म॑न्थि॒शोचि॑षेति प्रतिप्रस्थाता॒ चक्षु॑षोरे॒वैत॒दाऽऽर॑मणे कुरुतश्चक्षुषी॒ऽएवैत-
त्संधत्त॒स्तस्मा॑दि॒मे॒ऽअभितो॒ऽस्थिनी॒ चक्षु॑षी स॒ꣳहि॑ते ॥१९॥ सोऽध्व॒र्युः । अ॒प्रोक्षि॑तं
यूपशकलं॒ निर॑स्यति॒ निर॑स्तः॒ शण्ड॒ इत्ये॒वमे॒व प्रतिप्रस्थाता॒ निर॑स्तो॒ मर्क॒ इति॑
तत्पु॒राहु॑तिभ्यो॒ऽसुर॑रक्ष॒से॒ऽअप॑हतः ॥ २०॥ अथा॑ध्व॒र्युः । प्रोक्षि॑तं यूपशकल॒माहव॑-
नी॒ये प्रास्य॑ति शु॒क्रस्या॑धिष्ठानमसी॒त्येव॑मे॒व प्रतिप्रस्थाता॒ मन्थि॒नो॒ऽधिष्ठानमसीति॑
चक्षु॑षोरे॒वैते॒ समि॑धौ चक्षुषी॒ऽएवैतत्स॑मिन्धे॒ तस्मा॑दि॒मे समि॑द्धे चक्षु॑षी ॥२१॥ त-
त्र॒ जपति॑ । अ॒हिन्र॑स्य ते देव सोम सुवीर्य॑स्य रायस्पोष॑स्य ददि॒तारः स्यामेत्या॒शी-
रे॒वैषा॑तस्य॒ कर्म॑ण आ॒शिष॑मे॒वैतदाशा॑स्ते ॥ २२॥ अथा॑श्रा॒व्याह॑ । प्रातः-प्रातः स-
व॒स्य शु॒क्रव॑तो मधुश्चुत॒ इन्द्रा॑य सोमा॒न्प्रस्थि॑तान्प्रे॒ष्येति॒ वष॑ट्कृते॒ऽध्व॒र्युर्जु॑होति त-
दनु॑ प्रतिप्रस्थाता॒ तद॑नु चमसाध्व॒र्यवः॑ ॥ २३॥ तौ वै पु॒रस्ता॑त्ति॒ष्ठन्तौ॑ जुहुतः । च-
क्षुषी॒ वा॒ऽए॒तौ तत्पु॒रस्ता॑दे॒वैतच्चक्षु॑षी धत्त॒स्तस्मा॑दि॒मे पु॒रस्ता॑च्चक्षु॑षी ॥ २४॥ अ॒-
भितो॒ यूपं॒ तिष्ठ॑न्तौ जुहुतः । य॒था वै ना॑सि॒कैवं यूप॒स्तस्मा॑दि॒मे॒ऽअभितो॒ नासि॑कां
चक्षु॑षी ॥ २५॥ तौ वै॒ वष॑ट्कृतौ सन्तौ म॒लेन॑ हूयेते । ए॒तेनो॒ हैतौ तद्य॑द॒क्षुवा॑ते
य॑दे॒नौ सर्वꣳ॒ सव॑नम॒नुहूयेते॒ यद्धैवैतौ॒ सर्वꣳ॒ सव॑नम॒नुहूयेते॒ऽए॒तौ वै प्र॒जाप॑तेः
प्रत्य॑क्षतमां॒ चक्षु॑षी ह्ये॒तौ स॒त्यं वै चक्षुः॑ स॒त्यꣳ हि प्र॒जाप॑ति॒स्तस्मा॑दे॒नौ सर्वꣳ॒
सव॑नम॒नुहूयेते ॥ २६॥ स जु॑होति । सा प्र॑थ॒मा सं॑स्कृ॒तिर्विश्व॑वारा॒ स प्र॑थ॒मो व-
रु॑णो मि॒त्रोऽअ॒ग्निः । स प्र॑थ॒मो बृह॒स्पति॑श्चिकि॒त्वाꣳस्तस्मा॒ऽइन्द्रा॑य सु॒तमाजु॑होत
स्वाहेति॑ ॥ २७॥ स यज्जुहो॑ति । सा प्र॑थ॒मा स प्र॑थम॒ इति॑ शश्व॒द्व वै रेत॑सः सि-
क्तस्य॒ चक्षु॑षी॒ऽएव प्रथ॑मे॒ सम्भव॑तस्त॒स्माज्जुहो॑ति सा प्र॑थ॒मा स प्र॑थम॒ इति॑ ॥ २८॥
अथ॒ सम्प्रेष्य॑ति । प्रेतु॒ होतु॑श्चम॒सः प्र ब्रह्म॑णः॒ प्रोद्गातॄणां॒ प्र यज॑मानस्य॒ प्रय॑न्तु
सद॒स्यानाꣳ॑ होत्रा॒णां च॑मसाध्वर्यव॒ उपाव॑र्तध्वꣳ शु॒क्रस्याभ्यु॑न्नयध्व॒मिति॒ सम्प्रेष॑ ऽए॒वैष
कां० ४, अ० २, ब्रा० १, कं० १६-२६ शतपथब्राह्मण / ५५५
शुक्रः शुक्रशोचिषा" (यजु० ७।१३)-"शुक्र प्रकाशस्वरूप द्यौ और पृथिवी के साथ संयुक्त
होकर।" और प्रतिप्रस्थाता इस मन्त्र से, "संजग्मानो दिवा पृथिव्या मन्थी मन्थिशोचिषा"
(यजु० ७।१८)-"मन्थी मन्थी के समान दीप्तिवाले द्यौ और पृथिवी के साथ संयुक्त
होकर।" इस प्रकार ये इन ग्रहों को आँखों के ठहरने का स्थान बनाते हैं। इनको आँखों के
समान पास-पास जोड़कर रखते हैं। इसीलिए आँखें पास-पास हड्डियों द्वारा मिली होती
हैं ॥१९॥
अध्वर्यु अप्रोक्षित यूप-शकल को यह कहकर फेंक देता है, "निरस्तः षण्डः" (यजु०
७।१३)-"षण्ड भगा दिया गया।" प्रतिप्रस्थाता यह कहकर फेंकता है, "निरस्तो मर्कः"
(यजु० ७।१८)-"मर्क भगा दिया गया।" इस प्रकार आहुतियों के पहले इन दोनों राक्षसों को
भगा देते हैं ॥२०॥
अध्वर्यु प्रोक्षित यूप-शकल को यह कहकर आहवनीय अग्नि में छोड़ता है, "शुक्र-
स्याधिष्ठानमसि" (यजु० ७।१३)-"तू शुक्र का अधिष्ठान है।" इसी प्रकार प्रतिप्रस्थाता यह
कहकर "मन्थिनोऽधिष्ठानमसि" (यजु० ७।१८)-"मन्थि का अधिष्ठान है तू।" ये दोनों
को प्रकाश देनेवाले हैं। इससे वह आँखों को प्रकाश देता है। इसीलिए आँखों में प्रकाश
है॥२१॥
अब जाप करता है, "अच्छिन्नस्य ते देव सोम सुवीर्यस्य रायस्पोषस्य ददितारः स्याम"
(यजु० ७।१४) - "हे सोम देव, तेरे न नष्ट होनेवाले, वीर्यवान् धन के हम दाता होवें।" इस
कर्म का यह आशीर्वाद है। इस आशीर्वाद को देता है ॥२२॥
श्रौषट् कहकर कहता है-- 'प्रातःसवन के चमकीले, मीठे सोमोँ को इन्द्र के लिए प्रेरित
करो।' वषट्कार होने पर अध्वर्यु आहुति देता है। उसके पीछे चमसाध्वर्यु ॥२३॥
ये आगे खड़े होकर आहुति देते हैं। ये दोनों आहुतियाँ यज्ञ की आँखें हैं। इस प्रकार
आँखों को आगे रखता है। इसीलिए तो आँखें आगे होती हैं ॥२४॥
ये यूप के दोनों ओर खड़े होकर आहुति देते हैं। यूप नासिका के समान है। नासिका के
दोनों ओर आँखें होती हैं ॥२५॥
वषट्कार कहकर ये दोनों आहुतियाँ मन्त्र पढ़कर दी जाती हैं। इनमें यह विशेषता है कि
इनके पश्चात् पूरे सवन की आहुतियाँ दी जाती हैं। इनके पीछे पूरे सवन की आहुतियाँ इसलिए
दी जाती हैं कि ये आहुतियाँ प्रजापति की प्रत्यक्षतम आँखें हैं। सत्य चक्षु है, सत्य प्रजापति है।
इसलिए इनके पीछे पूरे सवन की आहुतियाँ दी जाती हैं ॥२६॥
वह इस मन्त्र से आहुति देता है, "सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा स प्रथमो वरुणो मित्रो
ऽअग्निः ॥ स प्रथमो बृहस्पतिश्चिकित्वाँस्तस्मा ऽ इन्द्राय सुतमाजुहोत स्वाहा" (यजु० ७।१४,
१५) - "सबके ग्रहण करने योग्य यह पहली संस्कृति है। वह पहला वरुण, मित्र और अग्नि है।
वह पहला चेतनावा बृहस्पति है। उस इन्द्र के लिए निचोड़े हुए सोम की आहुति दो" ॥२७॥
'सा प्रथमा, स प्रथमः' यह कहकर वह जो आहुति देता है वह सदा सींचे हुए वीर्य के
समान है। आँखें पहले होती हैं इसलिए वह 'सा प्रथमा, स प्रथमः' ऐसा कहकर आहुति देता
है ॥२८॥
अब वह आदेश देता है, 'होता का चमसा आवे, ब्राह्मण का, उद्गाता का, यजमान
का, सदस्यों के, होताओं के, अध्वर्युओं के। इन चमसों को शुद्ध सोमरस से भरो।' यह सब