शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-४, ब्राह्मण-४
वानप्रत्येकै॒कमे॒वाᳪ॒शुरेक॑धनाना॒माप्या॑यते दश॑-दश वा तुभ्य॒मिन्द्रः॒ प्याय॑ता॒मा त्वमि॒-
न्द्रा॑य प्याय॒स्वेतीन्द्रो॒ वै य॒ज्ञस्य॑ दे॒वता॒ सा यै॒व य॒ज्ञस्य॑ दे॒वता॒ तामे॒वैतदाप्या॑यय-
त्या॒ त्वमिन्द्राय प्याय॒स्वेति॒ तदे॒तस्मिन्नाप्या॑यनं दधात्याप्या॑यया॒स्मान्त्सखी॒न्त्सन्त्या मे॒-
धयेति॒ स यत्स॒नोति॒ तत्तदा॑ह॒ यत्सन्त्ये॑त्यथ॒ यदनु॑ब्रूते॒ तडु॒ तदा॑ह॒ यन्मे॒धयेति स्व॒-
स्ति ते॑ देव सोम सुत्यामशी॒येत्येका॒ वाऽए॒तेषामा॒शीर्भवत्यृत्विजां॑ च॒ यज॑मानस्य
च य॒ज्ञस्योदृचं॑ गहेमेति य॒ज्ञस्योदृचं॑ गछानी॒त्येवैतदा॑ह ॥ १८॥ अथ॒ प्रस्त॑रे॒ निह्व॑-
वते । उ॒त्तरत॒उपचा॑रो॒ वै य॒ज्ञोऽथै॒तद्दक्षिणेनान्वित्याप्या॑ययन्त्य॒भिर्वै य॒ज्ञस्तद्य॒ज्ञं
पृ॒ष्ठतः कुर्वन्ति॒ तन्मिथ्या॑कुर्वन्ति दे॒वेभ्य॒ आव्र॑श्च्यन्ते य॒ज्ञो वै प्र॒स्तर॒स्तद्य॒ज्ञं पुन॒रार॑-
भन्ते॒ तस्यो॒ हैषा प्राय॑श्चित्तिस्तथो॒ हैषामेतन्मिथ्या॑कृतं भवति॒ न दे॒वेभ्य॒ आव्रि॑-
श्च्यन्ते॒ तस्मा॒त्प्रस्त॑रे॒ निह्व॑वते ॥ १९॥ तदाहुः । ऋ॒क्ते निह्नुवी॒राᳪ॒शनक्ताᳪ॒ऽइत्य॑नृ-
क्ते ह्येव नि॒ह्नुवी॑र॒न्ननु॒प्रकरण॒ᳪ ह्ये॑वा॒क्तस्य॑ ॥ २०॥ ते निह्व॑वते । दृष्टा रायः प्रेषे
भगा॒यऽऋ॒तमृ॑तवा॒दिभ्य॒ इति॑ स॒त्यᳪ॑ सत्यवा॒दिभ्य॒ इत्ये॒वैतदा॑ह नमो॒ द्यावा॑पृथि॒-
वीभ्या॒मिति॒ तदा॑भ्यां॒ द्यावा॑पृथि॒वीभ्यां॑ नि॒ह्व॑वते ययो॒रिद॒ᳪ सर्व॒मधि॑ ॥ २१॥ अथा-
तृ॒ समु॑ह्य॒ प्रस्त॑रम् । अ॒ग्नीन्म॒द्वत्त्याऽऽहु॑ति॒ मुद॑तीत्य॒ग्नीदाह॒ ताभि॑रे॒हीत्युप॑र्युप॒-
र्य॒ग्निमति॑हरति॒ स यन्नानु॒प्रह॑रत्येतेन॒ ह्येत ऊर्ध्वान्यहानि॑ प्रचरि॒ष्यन्भव॑त्यथ॒ यदु॑-
पर्युप॒र्य्यग्निमति॑हरति॒ तद्देवा॒स्यानु॑प्रहृतभा॒जनं॑ भवति तम॒ग्नीधे प्रय॑छति तम॒ग्नीन्नि॒द-
धाति ॥ २२॥ ब्राह्मणम् ॥ ४ [४. ३.] ॥ ॥
ग्री॒वा वै य॒ज्ञस्योप॒सदः॒ शिरः॑ प्र॒वर्ग्यः॑ । तस्मा॒द्यदि॑ प्र॒वर्ग्यवा॒न्भव॑ति प्र॒वर्ग्ये॑ण
प्र॒चर्या॒थोपसद्भिः॑ प्रचरन्ति॒ तद्ग्री॒वाः प्रति॑दधति ॥ १॥ तद्याः पूर्वा॒ह्नेऽनु॑वा॒क्या भ॑व-
न्ति । ता अ॒परा॒ह्ने या॒ज्या या या॒ज्यास्ता अनु॑वा॒क्यास्तद्व्यति॑षजति॒ तस्मा॑दि॒मानि॑
ग्री॒वाणां॑ प॒र्वाणि॒ व्यति॑षक्तानी॒मान्यस्थी॑नि ॥ २॥ दे॒वाश्च॒ वाऽअ॑सु॒राश्च॑ । उ॒भये॑
प्राजाप॒त्याः पस्पृ॑धिरे॒ ततो॒ऽसुरा ए॒षु लो॒केषु पु॒रश्च॑क्रिरे॒ऽयस्मयी॑मि॒वास्मिँल्लो॒के
का० ३, अ० ४, ब्रा० ३-४; कं० १८-२२ व १-३ शतपथब्राह्मण / ४०६
ध्यायस्व” (यजु० ५।७)-"इन्द्र तेरे लिए पुष्ट हो और तू इन्द्र के लिए पुष्ट हो।" इन्द्र यज्ञ का
देवता है। इस प्रकार वह इस यज्ञ के देवता की पुष्टि करता है। 'इन्द्र के लिए तू पुष्ट हो' ऐसा
कह उसमें पुष्टि का निर्धारण करता है। "आप्याययास्मान्त्सखीन्त्सन्ध्या मेधया" (यजु० ५।७)-
“हम मित्रों को लाभ और बुद्धि से भरपूर कर।" जो उसको लाभ मिलता है उसके लिए वह
कहता है 'सन्ध्या' (लाभ से) और जो वह पाठ करता है उसके लिए कहता है 'मेधया' (बुद्धि
से)। "स्वस्ति ते देव सोम सुत्यामशीय" (यजु० ५।७)-"हे देव सोम, तेरे लिए स्वस्ति हो और
मैं सोम भोग को खाऊं।" यजमान और ऋत्विज का एक ही आशीर्वाद होता है अर्थात् यज्ञ के
अन्त को पा जावें। इसके कहने का तात्पर्य यह है कि मैं यज्ञ के अन्त को प्राप्त कर लूं ॥१८॥
अब वे प्रस्तर पर प्रायश्चित्त करते हैं। यज्ञ में उत्तर की ओर उपस्थित रहना चाहिए
था, परन्तु सोम की पुष्टि करने के लिए दक्षिण की ओर जाना पड़ा। अग्नि ही यज्ञ है, और
यज्ञ की ओर पीठ कर लेनी पड़ी। यह मिथ्याचार हो गया और देवों से वियोग हो गया। प्रस्तर
भी यज्ञ का ही भाग है। इसलिए प्रस्तर को छूकर फिर यज्ञ की प्राप्ति होती है। यही उस
मिथ्याचार का प्रायश्चित्त है। इस प्रकार मिथ्याचार का निवारण हो जाता है और देवों से
वियोग नहीं होता। इसलिए प्रस्तर पर प्रायश्चित्त किया जाता है ॥१९॥
इस पर प्रश्न उठता है 'अक्त (घृत-युक्त) प्रस्तर पर या अनक्त (जिस पर घृत न लगा
हो) प्रस्तर पर ?' उत्तर यह है कि अनक्त पर ही, क्योंकि अक्त को तो अग्नि के समर्पित किया
जाता है ॥२०॥
वे इस मन्त्र को पढ़कर प्रायश्चित्त करते हैं— "एष्टा रायः प्रेषे भगायऽऋतमृतवा-
दिभ्यः" (यजु० ५।७) - "इच्छित धन शक्ति के लिए मिले, ऋतवादियों के लिए ऋत।" इसका
अर्थ यह है कि सत्यवादियों के लिए सत्य । "नमो द्यावापृथिवीभ्याम्” (यजु० ५।७) - "द्यौ और
पृथिवी के लिए नमस्कार ।" इस प्रकार वे द्यौ और पृथिवी के लिए प्रायश्चित्त करते हैं जिन पर
सबकी स्थिति है ॥२१॥
अब प्रस्तर को उठाकर वह कहता है— 'अग्नीध्र, क्या जल खौल गया ?' अग्नीध्र कहता
है—'हाँ, खौल गया।' 'इसको यहाँ ले आओ।' वह (प्रस्तर को) अग्नि के पास ले आता है।
वह प्रस्तर को आग में इसलिए नहीं डालता कि अगले दिनों में उससे काम लेना है; और आग के
ऊपर इसलिए ले आता है कि वह अग्नि में डालने के लगभग बराबर हो जाय। वह इस अग्नीध्र
को दे देता है और अग्नीध्र इसको (सुरक्षित) रख देता है ॥२२॥
अध्याय ४—ब्राह्मण ४
उपसद यज्ञ की गर्दन है। प्रवर्ग्य सिर है। इसलिए यदि यज्ञ प्रबर्ग्य के साथ किया जाता
है तो प्रबर्ग्य के पीछे उपसद करते हैं। इससे गर्दन अपने स्थान पर आ जाती है ॥१॥
पूर्वाह्न में अनुवाक्य होते हैं और अपराह्न में याज्य । जो याज्य हैं वही अनुवाक्य हैं।
इस प्रकार वह जोड़ों को मिला देता है जैसे गर्दन की हड्डियाँ और जोड़ मिले होते हैं ॥२॥
देव और असुर दोनों प्रजापति की सन्तान लड़ पड़े। तब असुरों ने इन तीनों लोकों में
अपने लिए किले (पुर) बनाये—लोहे का इस लोक में, चाँदी का अन्तरिक्ष में और सोने का
र॒जताम॒न्तरि॑क्षे हरि॑णीं दि॒वि ॥ ३ ॥ तद्वै देवा॒ अस्पृ॑णवत । तऽए॒ताभिरुप॒सद्भि॒रु-
पासी॑दंस्तद्युदुपासी॑दंस्तस्मादुप॒सदो॒ नाम॑ ते पुरः प्रभि॒न्दन्नि॒माँल्लो॒कान्प्राज॑यंस्तस्मा-
दा॒ह्युरूपस॒दा पुरं॑ जयतीति॒ यदु॒होपा॑सते तेने॒मां मानुषीं॒ पुरं॑ जयति ॥ ४ ॥ ए॒ता-
भि॒र्वै दे॒वा उप॒सद्भिः॑ । पुरः॑ प्रभि॒न्दन्नि॒माँल्लो॒कान्प्राज॑यंस्तथो॒ ऽए॒वैष ए॒तन्ना॑ष्ट्रो॒त्रा-
स्मा॒ऽअ॒स्मिँल्लो॒के कश्च॒न पुरः॑ कुरुत॒ऽइमा॑ने॒वैतँल्लो॒कान्प्रभि॑नत्ती॒माँल्लो॒कान्प्रज॑यति
तस्मादुप॒सद्भि॑र्यजते ॥ ५ ॥ ता वाऽआज्य॑हविषो भवन्ति । व॒ज्रो वाऽआज्यं॒नेते॑न
वै दे॒वा वज्रे॑णा॒ज्येन पुरः॑ प्रभि॒न्दन्नि॒माँल्लो॒कान्प्राज॑यंस्तथो॒ ऽए॒वैष ए॒तेन॒ वज्रे॑णा-
ऽज्येने॒माँल्लो॒कान्प्रभि॑नत्ती॒माँल्लो॒कान्प्रज॑यति तस्मा॒दाज्य॑हविषो भवन्ति ॥ ६ ॥ स वा
ऽअ॒ष्टौ कृत्वो॑ जुह्वां गृह्णाति । च॒तुरु॑पभृत्यथो॒ऽइत॑रथा॒ऽअथ॒तुरेव कृत्वो॑ जुह्वां गृ-
ह्णीयाद॒ष्टौ कृत्व॒ उप॒भृतीति॑ ॥ ७ ॥ स वाऽअ॒ष्टावेव कृत्वो॑ जुह्वां गृह्णाति । चतु॒रु-
पभृति॒ तद्व॑ज्रमभिभा॒रं करोति तेन॒ वज्रे॑णाभिभा॒रेणे॒माँल्लो॒कान्प्रभि॑नत्ती॒माँल्लो॒का-
न्प्रज॑यति ॥ ८ ॥ अ॒ग्नीषोमौ॒ वै दे॒वाना॒ꣳ सयुजौ॑ । ताभ्या॒ꣳ सार्धं गृह्णाति विप्लव
ऽए॒काकिने॒ऽन्यत॑रमेवा॒धार॒माघा॑रयति य॒ꣳ स्रुवे॑ण प्रति॒क्राम॑ति वा॒ऽउत्तर॒माघा॑र-
माघा॒र्याभि॑जित्या॒ऽअभि॑जयान्यीति तस्माद॒न्यत॑रमेवा॒धार॒माघा॑रयति य॒ꣳ स्रुवे॑ण ॥ ९ ॥
अथाश्राव्य॑ न होता॑रं प्रवृणीते । सीद॒ होत॒रित्ये॒वाहो॑पविशति होता होतृष-
दन॒ऽउप॑विश्य प्रसौति प्रसूतॊऽध्व॒र्युः स्रुचा॒वाद॑त्ते ॥ १० ॥ स आहातिक्रामन्न॒ग्नयेऽनु॑-
ब्रूहीति॑ । आश्रा॒व्याहा॒ग्निं यजेति॑ वषट्कृते जुहोति ॥ ११ ॥ अथाहा॑ सोमा॒यानु॑ब्रू-
हीति॑ । आश्रा॒व्याह॒ सोमं॑ यजेति॒ वषट्कृते जुहोति ॥ १२ ॥ अथ यदु॒पभृत्या॒ज्यं
भव॑ति । तत्समानयमान आह विष्णवे॒ऽनु॑ब्रूहीत्याश्रा॒व्याह॒ विष्णुं॑ यजेति॒ वषट्-
कृते जुहोति ॥ १३ ॥ स यत्समानत्र तिष्ठ॑ञ्जु॒होति॑ । न य॒थेदं प्रच॑रत्संचरत्यभि-
जित्या॒ऽअभि॑जयानीत्यथ यदे॒ता दे॒वता॒ यज॑ति व॒ज्रमे॒वैतत्संस्करोत्य॒ग्निमनीकं॒ सो-
मं॒ शल्यं॒ विष्णुं॑ कुल्मलं॒ ॥ १४ ॥ संवत्सरो हि वज्रः॑ । अ॒ग्निर्वा॒ऽग्रः॑ सोमो रा-
का० ३, अ० ४, ब्रा० ४, कं० ३-१५ शतपथब्राह्मण / ४११
द्यौलोक में ॥३॥
अब देवों की जीत हुई। देवों ने इन किलों को उपसदों के द्वारा घेरा (उपासीदन्);
उपासीदन् से 'उपसद' नाम पड़ा। उन्होंने किलों को तोड़ डाला और लोकों को जीत लिया।
इसलिए कहते हैं कि 'उपसदों के द्वारा किले जीते जाते हैं।' वस्तुतः घेरा डालकर ही मनुष्य के
किले जीते जाते हैं ॥४॥
देवों ने इन उपसदों के द्वारा ही किलों को तोड़ा और लोकों को जीत लिया। (यजमान
भी) ऐसा ही करता है। यह सच है कि कोई उसके विरुद्ध अपने किले नहीं बनाता। वह इन्हीं
लोकों को भेद देता है। वह इनको जीत लेता है। इसीलिए उपसदों के द्वारा यज्ञ करता है ॥५॥
ये आहुतियां घृत की होती हैं। घी वज्र है। इस वज्र-घी से देवों ने किलों को तोड़कर
इन लोकों पर विजय पाई। इसी प्रकार यह यजमान वज्र-घी द्वारा इन लोकों का भेदन करता
है, इन लोकों को जीतता है। इसलिए ये घी की आहुतियां दी जाती हैं ॥६॥
वह आठ बार जुहू में भरता है और चार बार उपभृत् में। कुछ उलटा भी करते हैं
अर्थात् चार बार जुहू में और आठ बार उपभृत् में ॥७॥
वह आठ बार जुहू में भरता है और चार बार उपभृत में। इससे वह वज्र के आगे के
भाग को भारी कर देता है। वज्र के इस भारी भाग से इन लोकों को तोड़ देता और इन पर
विजय प्राप्त कर लेता है ॥८॥
देवताओं में अग्नि और सोम का जोड़ा है। इनके लिए एक-साथ लेता है। विष्णु के
लिए अकेली। एक ही आघार देता है जो स्रुवा में भरी जाती है, क्योंकि जब पीछे की आघार दे
देता है तो चल देता है यह कहकर कि 'जीतकर विजयी बनूं।' इसलिए स्रुवा से एक ही आघार
देता है ॥९॥
श्रौषट् कहने के पीछे होता का वरण नहीं करता। इतना ही कहता है कि 'हे होता,
बैठ।' होता अपने स्थान पर बैठ जाता है। अब वह अध्वर्यु को प्रेरणा करता है और अध्वर्यु दो
चमचे भर लेता है ॥१०॥
(वेदी के दक्षिण की ओर) जाते हुए वह (होता से) कहता है 'अग्नि को आवाहन
कर।' और श्रौषट् कहकर कहता है 'अग्नि की स्तुति कर।' और वषट्कार के पीछे आहुति दे
देता है ॥११॥
अब कहता है—'सोम का आवाहन कर।' फिर श्रौषट् कहकर कहता है—'सोम की
स्तुति कर।' फिर वषट्कार के पीछे आहुति दे देता है ॥१२॥
अब उपभृत में जो घी होता है उसको (जुहू के बचे घी में) मिलाकर कहता है—'विष्णु
का आवाहन कर।' फिर श्रौषट् कहकर कहता है 'विष्णु की स्तुति कर।' फिर वषट्कार के पीछे
आहुति दे देता है ॥१३॥
वह एक ही स्थान पर खड़ा रहता है। और जैसा चलना-फिरना चाहिए, चलता-फिरता
नहीं। इसका कारण यह है कि वह सोचता है कि 'जीतकर विजयी बनूं।' इन देवताओं के लिए
आहुति इसलिए देता है कि वज्र बना सकूं। अग्नि को वज्र का 'अनीक' या सिरा बनाता है,
सोम को शल्य और विष्णु को कुल्मल (ये वज्र के भाग हैं) ॥१४॥
संवत्सर ही वज्र है। अग्नि दिन है और सोम रात तथा बीच का भाग विष्णु। इस
४१२ शतपथ ब्राह्मण
त्रिरथ॒ यदु॑त्तरेण तद्वि॒श्चरे॒तद्वै परि॒प्लवमानꣳ सं॑वत्स॒रं करोति ॥ १५॥ सं॑वत्स॒रो
वज्रः॑ । ए॒तेन॒ वै दे॒वाः सं॑वत्स॒रेण॒ वज्रे॑ण पुरः॒ प्रभिन्द॒न्त्रिमांल्लो॒कान्प्राज॑यंस्तथो
ऽ॒ह्यै॑ष ए॒तेन सं॑वत्स॒रेण॒ वज्रे॑णे॒मांल्लो॒कान्प्र॒भिनत्तीमांल्लो॒कान्प्र॒जयति॒ तस्मा॑दे॒ता
दे॒वता॒ यज॑ति ॥ १६॥ स वै॑ ति॒स्र उप॒सद॒ उपे॑यात् । त्रयो वाऽऋ॒तवः॑ संवत्स॒रस्य॑
संवत्स॒रस्यै॒वैतद्रू॒पं क्रि॑यते संवत्स॒रमे॒वैतत्स॒ꣳस्करोति द्विरे॒कया प्रचरति द्विरे॒कया
॥ १७॥ ताः षट्स॒म्पद्य॑न्ते । षड्वाऽऋ॒तवः॑ संवत्स॒रस्य॑ संवत्स॒रस्यै॒वैतद्रू॒पं क्रि॑यते सं-
वत्स॒रमे॒वैतत्स॒ꣳस्करोति ॥१८॥ यद्यु॑ द्वाद॒शोप॒सद॒ उपे॑यात् । द्वाद॑श॒ वै मासाः॑ सं-
वत्स॒रस्य॑ संवत्स॒रस्यै॒वैतद्रू॒पं क्रि॑यते संवत्स॒रमे॒वैतत्स॒ꣳस्करोति द्विरे॒कया प्रचर॑ति
द्विरे॒कया ॥ १९॥ ताश्चतुर्वि॑ꣳशतिः सम्पद्य॑न्ते । चतुर्वि॑ꣳशति॒र्वै सं॑वत्स॒रस्यार्ध॑मासाः
संवत्स॒रस्यै॒वैतद्रू॒पं क्रि॑यते संवत्स॒रमे॒वैतत्स॒ꣳस्करोति ॥२०॥ स य॒त्सायम्प्रा॒तः प्रच॑-
रति । त॒या ह्ये॑व॒ सम्प॑त्सम्पद्य॑ते स यत्पूर्वाह्णे॒ प्रचर॑ति तद्यु॒ध्यत्यथ॒ यद॑पराह्णे॒ प्र-
चर॑ति सु॒जितमसदित्यथ॒ यज्जु॒होतीदं वै पुरं॑ यु॒ध्यन्ति॒ तां जि॒त्वा स्वाꣳ सतीं॑ प्रप-
द्यन्ते ॥ २१॥ स यत्प्रचर॑ति । तद्यु॒ध्यत्यथ॒ यत्सन्ति॑ष्ठते तज्जयत्यथ॒ यज्जु॒होति स्वा-
मे॒वैतत्स॒तों॑ प्रपद्यते ॥ २२॥ स जु॒होति । य॒या द्विरे॒कस्या॒ह्नः प्रच॑रिष्य॒न्भव॑ति॒ या
ते॑ऽअग्नेऽयःशया॒ तनूर्व॑र्षिष्ठा गह्वरे॒ष्ठा । उग्रं वचो॒ऽअपा॑वधीत्त्वेषं॒ वचो॒ऽअपा॑व-
धी॒त्स्वाहेत्ये॒वꣳरू॑पा हि सासीद॒यस्मयी हि सासी॑त् ॥ २३॥ अथ॑ जुहोति । य॒या
द्विरे॒कस्या॒ह्नः प्रच॑रिष्य॒न्भव॑ति या ते॑ऽअग्ने॒ रजः॑शया तनूर्व॑र्षिष्ठा गह्वरे॒ष्ठा । उग्रं॑
वचो॒ऽअपा॑वधीत्त्वेषं॒ वचो॒ऽअपा॑वधी॒त्स्वाहेत्ये॒वꣳरू॑पा हि सासीद्रज॒ता हि सासी॑त्
॥ २४॥ अथ॑ जुहोति । य॒याद्विरे॒कस्या॒ह्नः प्रच॑रिष्य॒न्भव॑ति॒ या ते॑ऽअग्ने॒ हरिशया
तनूर्व॑र्षिष्ठा गह्वरे॒ष्ठा । उग्रं वचो॒ऽअपा॑वधीत्त्वेषं॒ वचो॒ऽअपा॑वधी॒त्स्वाहेत्ये॒वꣳरू॑पा
हि सासीद्ध॑रिणी हि सासीद्यद्यु द्वादशोप॒सद॒ उपे॑याच्च॒तुर॒ह्नेकया प्रच॑रेच्चतु॒रहू-
न्नेकया ॥ २५॥ अथातो व्रतोपसदामेव । परोऽव॑र्त्ति॒र्वाऽअ॒न्या उप॒सदः॑ प॒रोऽक्षीर-
कां० ३, अ० ४, ब्रा० ४, कं० १५-२६ शतपथब्राह्मण / ४१३
प्रकार वह वर्ष के चक्र को बनाता है ॥१५॥
संवत्सर वज्र है। इसी संवत्सर वज्र के द्वारा दोनों देवों ने किलों को तोड़ा और इन
लोकों को जीता। इसी प्रकार यह भी इसी संवत्सर वज्र की सहायता से इन लोकों को तोड़ता
और इन लोकों को जीतता है। इसीलिए वह इन देवतों का यजन करता है ॥१६॥
तीन उपसदों को करे। संवत्सर में तीन ऋतुएँ होती हैं। इस प्रकार संवत्सर का तद्रूप
आ जाता है। इस प्रकार वह संवत्सर को बनाता है। वह प्रत्येक क्रिया को दो बार करता
है ॥१७॥
यह छः के बराबर हो जाते हैं। वर्ष में छः ऋतुएं होती हैं। इस प्रकार वर्ष का तद्रूप हो
जाता है। वह इस प्रकार वर्ष को बनाता है ॥१८॥
या बारह उपसदों को करे। वर्ष में बारह मास होते हैं। इस प्रकार वर्ष का तद्रूप हो
जाता है। वह इस प्रकार वर्ष बनाता है। वह प्रत्येक क्रिया को दो बार करता है ॥१९॥
इस प्रकार चौबीस हो जाते हैं। वर्ष में चौबीस अर्द्धमास होते हैं। यह संवत्सर का रूप
हो जाता है। इस प्रकार वह संवत्सर को बनाता है ॥२०॥
वह सायं-प्रातः इसलिए करता है कि इसी से सम्पूर्णता आती है। प्रातःकाल की क्रिया
का अर्थ है जय, सायंकाल की क्रिया का 'सुजय' और आहुति का अर्थ है कि जीतकर किले को
अपना समझकर भीतर घुस जाना ॥२१॥
उपसदों के करने का अर्थ है युद्ध करना, क्रिया के पूर्ण होने का अर्थ है विजय पाना,
और आहुति देने का अर्थ है किले को अपना करके उसमें घुस जाना ॥२२॥
वह दिन में दो बार इस मन्त्र से आहुति देता है— "या ते ऽ अग्नेऽयःशया तनूर्वर्षिष्ठा
गह्नरेष्ठा । उग्रं वचोऽपावधीत् त्वेषं वचोऽपावधीत् स्वाहा" (यजु० ५।८)-"हे अग्नि, यह
जो तेरा लोहे का शरीर है, गहरे में बैठा हुआ, इसने (शत्रु की) उग्र वाणी को मार डाला,
तीक्ष्ण वाणी को मार डाला।" वह ऐसी ही थी। वह लोहे के समान थी ॥२३॥
अब दिन में दो बार इस मन्त्र से आहुति देता है— "या ते ऽ अग्ने रजःशया तनूर्वर्षिष्ठा
गह्नरेष्ठा । उग्रं वचोऽपावधीत् त्वेषं वचोऽपावधीत् स्वाहा" (यजु० ५।८)-"हे अग्नि, यह
जो तेरा चांद का शरीर है, गहरे में पैठा हुआ, इसने उग्र वाणी को मार डाला, तीक्ष्ण वाणी को
मार डाला।" इसका ऐसा ही रूप था। चांदी का रूप था ॥२४॥
अब दिन में दो बार इस मन्त्र से आहुति देता है— "या तेऽग्ने हरिशया तनूर्वर्षिष्ठा
गह्नरेष्ठा । उग्रं वचो अपावधीत् त्वेषं वचो अपावधीत् स्वाहा" (यजु० ५।८) - "हे अग्नि, यह
जो तेरा सोने का शरीर है, गहरे में पैठा हुआ, इसने उग्र वाणी को मार डाला, तीक्ष्ण वाणी को
मार डाला।" इसका ऐसा ही रूप था। सोने का रूप था। अगर वह बारह उपसदों को करे तो
हर एक को चार दिन करना चाहिए ॥२५॥
अब व्रत-उपसदों को लीजिये। कुछ उपसद चौड़े होते जाते हैं और कुछ तंग, जिनमें