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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-१, ब्राह्मण-२

३२८ शतपथ ब्राह्मण
क्रमः सैषा॑ङ्गीना योदी॑ची दिङ् सा मनु॒ष्याणां॒ तस्मान्मानुष॒ऽउदी॑चीनवꣲशामेव
शालां वा विमितं वा मिन्वन्त्युदीची हि मनुष्याणां दिग्दीक्षितस्यैव प्राचीनवꣲ-
शा नादीक्षितस्य ॥७॥ तां वाऽए॒तां परि॑श्रयन्ति । नेद॒भिर्व्वर्षा॒दिति॑ न्वेव वर्षा
देवान्वाऽए॒ष उपा॒वर्त्तते यो दी॑क्षते स दे॒वतानामेको भवति तिर॒ऽइव वै देवा॒
मनु॒ष्येभ्यस्तिर॒ऽइवैतद्यात्परिश्रितं तस्मात्परिश्रयन्ति ॥८॥ तन्न सर्व्व-इवाभिप्रपद्येत ।
ब्राह्मणो॒ वैव राजन्यो वा वैश्यो वा ते हि यज्ञियाः ॥९॥ स वै न सर्व्वेणेव
संव॑देत । दे॒वान्वाऽए॒ष उपावर्त्तते यो दीक्षते स दे॒वतानामेको भवति न वै दे-
वाः सर्व्वेणेव संवदन्ते ब्राह्मणेन वैव राजन्येन वा वैश्येन वा ते हि यज्ञियास्त-
स्माद्यद्ये॒नꣳ शूद्रेण संवा॒दो विन्दे॑दैतेषामेवै॒कं ब्रूयादिममिति विचक्ष्ममिति वि-
चक्ष्वैत्येष उ तत्र दीक्षितस्योपचारः ॥१०॥ अथारणी पाणौ कृत्वा । शालामध्य-
वस्यति स पूर्व्वार्द्ध्यꣳ स्थूणाराममभिपद्येतꣵजुराहेदमगन्म देवयजनं पृथिव्या यत्र
देवा॑सो॒ऽअजुषन्त विश्वे॒ऽइति॒ तदस्य विश्वे॑श्च दे॒वैर्जुष्टं भवति॒ ये चेमे ब्राह्मणाः
शुश्रुवाꣵसो॒ऽनूचाना यद॒ह्नास्य ते॒ऽग्निभिर्याम॒ीजते॒ ब्राह्मणाः शुश्रुवाꣵसस्तद॒ह्नास्य
तैर्जुष्टं भवति ॥११॥ यद्वाह । यत्र देवासो॒ऽअजुषन्त विश्वे॒ऽइति॒ तदस्य॒ विश्वैर्दे-
वैर्जुष्टं भवत्यृक्सामार्भ्याꣳ संतरन्तो यजुर्भिरित्यृक्सामार्भ्यां वै यजुर्भैर्यज्ञस्योदृचं
गच्छन्ति यज्ञस्योदृचं गछानीत्येवैतदाह रायस्पोषेण समिषा मदेमेति भूमा वै रा-
यस्पोषः श्रियै॒ भूमाशिषमेवैतदाशास्ते समिषा॒ मदे॑मेतीषं मदतीति वै तमाहुर्यः
श्रियमश्नुते यः परमतां गच्छति तस्मादाह समिषा मदेमेति ॥१२॥ ब्राह्मणम् १॥ ॥
अपराह्ने दीक्षेत । पुरा केशनश्मश्रुर्व्वपनाद्यात्कामयेत तदश्नीयाद्यद्वा सम्पद्येत
व्रतं ह्येवास्यातो॒ऽशनं भवति यद्यु नाशि॑शिषे॒दपि कामं नाश्नीयात् ॥ १ ॥ ॥ श-
तं १४०० ॥ ॥ अथोत्तरेण शालां परिश्रयन्ति । तदुदकुम्भमुपनिदधति तन्नापित
उपतिष्ठते तत्केशश्मश्रु च वपते नखानि च निकृन्तते॒ऽस्ति वै पुरुषस्यामेध्यं य-

कां० ३, अ० १, ब्रा० १-२, कं० ७-१२ व १-२ शतपथब्राह्मण / ३२६
ठीक) दिशा वह है जहां से देव चढ़े थे। उत्तर की दिशा मनुष्यों की है। इसीलिए मनुष्यों के
मकान या दालान उदीचीन वंश (अर्थात् दक्षिण से उत्तर की ओर जानेवाली धन्नियों के) होते
हैं क्योंकि उत्तर मनुष्यों की दिशा है। केवल दीक्षित के लिए प्राचीन वंश मकान होवे; अदीक्षित
के लिए नहीं ॥७॥
उसको घेर देते हैं कि कहीं वर्षा न हो। कम-से-कम वर्षा में (तो यह होना ही चाहिए)।
जो दीक्षा लेता है वह देवों के निकट आ जाता है, वह देवों में से एक हो जाता है। देव मनुष्यों से
छिपे हुए होते हैं। जो घिरा होता है वह भी छिपा हुआ होता है। इसलिए उसे घेर लेते हैं ॥८॥
इसमें सब कोई न घुसे; केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य ही। क्योंकि यही यज्ञ के
अधिकारी हैं ॥६॥
वह सबसे बात न करे। जो दीक्षा लेता है वह देवों के समीप हो जाता है, वह देवताओं में
से एक हो जाता है। देवता सबसे नहीं बोलते; केवल ब्राह्मण से, क्षत्रिय से और वैश्य से। क्योंकि
यही यज्ञ के अधिकारी हैं। यदि शूद्र से बोलने की आवश्यकता पड़े तो (द्विजों से ही) एक को
कहे- "इससे ऐसा कह दो ! इससे ऐसा कह दो।" दीक्षित पुरुष के लिए यही उपचार है ॥१०॥
अब दो अरणियों को हाथ में लेकर शाला को पसन्द करता है और पूर्व की ओर के
विशेष आसन पर बैठकर यह यजुः पढ़ता है- "एदमगन्म देवयजनं पृथिव्या यत्र देवासोऽअजुषन्त
विश्वे" (यजु० ४।१)- "हम पृथिवी के उस यज्ञ-स्थान पर आये हैं जिसको सब देवताओं ने पसन्द
किया।" इस प्रकार यह सब देवों तथा वेदज्ञ ब्राह्मणों द्वारा पसन्द हो जाती है। और जिसको
वेदपाठी ब्राह्मण आँखों से देख लेते हैं वह उनको पसन्द हो जाती है ॥११॥
और जब वह कहता है- 'यत्र देवासोऽअजुषन्त विश्वे' (जिसको सब देवों ने पसन्द
किया) तो सब देवता उसकी खातिर उसको पसन्द कर लेते हैं। अब वह पढ़ता है- "ऋक्
सामाभ्या॑ सन्तरन्तो यजुर्भिः" (यजु० ४।१) - "ऋक्, साम और यजुओं द्वारा तरते हुए।" ऋक्
साम और यजुः द्वारा ही यज्ञ को पूरा करते हैं, इससे उसका तात्पर्य है कि मेरा यज्ञ पूर्णता को
प्राप्त हो। अब कहता है- "रायस्पोषेण समिषा मदेम" (यजु० ४।१) - "धन और पुष्टि को
पाकर आनन्द मनावें।" 'रायस्पोष' का अर्थ है 'बहुतायत' (भूमा)। बहुतायत ही 'श्री' है। इस
प्रकार वह आशीर्वाद देता है। वह कहता है- 'समिषा मदेम' (इष अर्थात् ओज के साथ)
क्योंकि जो कोई श्री वाला हो जाता है या बड़प्पन को प्राप्त होता है उसको लोग कहते हैं कि
यह इष अर्थात् ओज को पाकर प्रसन्न हो रहा है। इसलिए कहा- 'समिषा मदेम' ॥१२॥
अध्याय १—ब्राह्मण २
अपराह्न अर्थात् दोपहर के बाद दीक्षा दे। केश और दाढ़ी मुंड़ाने से पहले जो मन चाहे
या जो मिल सके उसे खा ले, क्योंकि इसके पीछे व्रत ही उसका भोजन होता है (अर्थात् दूध
आदि) परन्तु यदि खाना न चाहे तो न खावे ॥१॥ [१४००]
अब शाला के उत्तर में स्थान घेरते हैं। उसमें जल का एक घड़ा रखते हैं। इसके पास
नाई बैठता है। अब (यजमान) बाल और दाढ़ी मुंडवाता है और नाखून कतरवाता है, क्योंकि
पुरुष का वह भाग अमेध्य या अपवित्र समझा जाता है जहाँ पानी नहीं पहुँचता। उसके बाल,

त्रा॒य्या॒यौ नो॒पति॑ष्ठन्ते कॆशश्म॒श्रौ च॒ वाऽअ॑स्य नखॆ॑षु चापो॑ नो॒प॑तिष्ठन्ते तद्यत्कॆ-
शश्मश्रु॑ च॒ वप॑ते नखा॑नि च॒ निकृ॒न्तते॑ मॆध्यो॑ भूत्वा दीक्षा॒ऽइति॑ ॥२॥ तद्धै॑के ।
सर्व॑ऽए॒व व॑पन्ते सर्व॑ऽए॒व मॆध्या॑ भूत्वा दी॑क्षिषामहा॒ऽइति॒ तदु॒ तथा॒ न कु॑र्याद्यद्धै
कॆशश्म॒श्रु च॒ वप॑ते नखा॑नि च॒ निकृ॒न्तते तदे॑व मॆध्यो॑ भवति तस्मा॒त् कॆशश्मश्रु॑
चैव वपे॑त नखा॑नि च॒ निकृ॒न्तेत॑ ॥३॥ स वै नखा॑न्ये॒वाग्रे॑ निकृ॒न्तते । दक्षि॑णा-
स्यैवाग्रे॑ स॒व्यस्य॒ वाऽअग्रॆ॒ मानु॑षेऽथै॒वं दॆव॒त्राङ्गुष्ठयो॑रे॒वाग्रे॑ कनि॒ष्ठिकयो॑र्वा॒ऽअग्रॆ॒
मानु॑षेऽथै॒वं दॆव॒त्रा ॥४॥ स दक्षि॑णमेवाग्रे॑ गोदा॒नं वि॑तारयति । सव्यं॒ वाऽअग्रॆ॒
मानु॑षेऽथै॒वं दॆव॒त्रा ॥५॥ स दक्षि॑णमेवाग्रे॑ गोदान॒मभ्यु॑नत्ति । इ॒मा आपः॒ शुमु॑ मे
सन्तु दॆवी॒रिति॒ स यदा॑हेमा॒ आपः॒ शुमु॑ मे सन्तु दॆवी॒रिति॒ वज्रो॒ वाऽआपो॒ वज्रो
हि वाऽआप॒स्तस्मा॒द्यने॑ता य॒न्ति नि॒घ्नं कुर्व॑न्ति यत्रो॑प॒तिष्ठ॑न्ते निर्द॒हन्ति॒ तद्यदॆत॑मॆ-
वैतद्वज्र॑ꣳ शमयति॒ तथो॒ ह्यैनमेष वज्रः॑ शान्तो॒ न हि॑नस्ति तस्मादाहेमा॒ आपः॒ शु-
मु मे सन्तु देवी॒रिति॑ ॥६॥ अथ दर्भतरु॒णकम॒न्तर्द॑धाति । ओष॑धे त्राय॑स्वेति॒ वज्रो
वै क्षु॒रस्तथो॒ ह्यैनमेष वज्रः॑ क्षु॒रो न हि॑नस्त्यथ क्षु॒रेणा॒भिनि॒दधा॑ति स्वधि॑ते मैनꣳ
हिꣳसी॒रिति॒ वज्रो॒ वै क्षु॒रस्तथो॒ ह्यैनमेष वज्रः॑ क्षु॒रो न हि॑नस्ति ॥७॥ प्र॒क्ष्योद-
पात्रे प्रास्य॑ति । तूष्णीमेवोत्त॑रं गोदान॒मभ्यु॑नत्ति तूष्णीं दर्भतरु॒णकम॒न्तर्द॑धाति तू-
ष्णीं क्षु॒रेणा॒भिनि॑धाय प्र॒क्ष्योद॒पात्रे प्रास्य॑ति ॥८॥ अथ नापि॒ताय॒ क्षु॒रं प्रय॑च्छति ।
स केशश्म॒श्रु व॑पात स यदा॑ केशश्म॒श्रु वप॑ति ॥९॥ अथ स्नाति । अमेध्यो॒ वै पु-
रुषो॒ यदनृ॑तं वद॑ति तेन पूतिरन्तरतो मेध्या वाऽआपो॑ मेध्यो भूत्वा दीक्षा॒ऽइति॑
प॒वित्रं॒ वाऽआपः॑ पवित्रपूतो दीक्षा॒ऽइति॒ तस्मा॒द्ध स्नाति॑ ॥१०॥ स॒ स्नाति॑ । आ-
पो॑ऽअ॒स्मान्मा॒तरः॑ शुन्धयन्त्वित्यॆत॒दाह॒ शुन्धयन्त्विति घृ॒तेन॑ नो घृत॒प्वः॑ पुनन्त्विति
तद्य॑त् सपूतं यं घृ॒तेनापुनं॒स्तस्मा॑दाह घृ॒तेन॑ नो घृत॒प्वः॑ पुनन्त्विति॒ विश्वꣳ॒ हि रि॒प्रं
प्र॒वह॑न्ति देवी॒रिति॒ यद्वै॒ विश्वꣳ॒ सर्वं॒ तद्यद॒मेध्यꣳ॒ रि॒प्रं तत्सर्वं॒ क्स्माद॒मेध्यं॑ प्र॒व-

का० ३, अ० १, ब्रा० २, कं० २-११ शतपथब्राह्मण / ३३१
दाढ़ी और नाखूनों में जल नहीं पहुँच सकते । इसलिए बाल और दाढ़ी मुँडवाते हैं और नाखून
कतरवाते हैं कि जिससे वह शुद्ध होकर दीक्षा ले ॥२॥
कुछ लोग सब बाल मुँडवा देते हैं जिससे सम्पूर्ण शुद्ध होकर दीक्षा लें । परन्तु ऐसा न
करे, क्योंकि बाल और दाढ़ी मुँडवाने और नाखून कतरवाने से भी शुद्ध हो जाते हैं। इसलिए केश
और दाढ़ी ही मुँड़वावे और नाखून कतरवा ले ॥३॥
पहले नाखून कतरवाता है । पहले दाहिने हाथ के । मनुष्यों में पहले बायें हाथ के नाखून
कतरवाने का रिवाज है, परन्तु देवों में इस प्रकार (अर्थात् दाहिने हाथ के पहले कतरे जाते हैं) ।
पहले दोनों अँगूठों के । मनुष्यों में पहले कनिष्ठिका अँगुली के नाखून कतरने का रिवाज है, परन्तु
देवों में इस प्रकार (अर्थात् पहले अँगूठों के नाखून काटना चाहिए) ॥४॥
पहले दाहिनी मूँछों में कंघी करता है। मनुष्यों में पहले बायें में की जाती है। देवों में
इस प्रकार (अर्थात् पहले दाहिनी मूँछों में) ॥५॥
पहले वह दाहिनी मूँछों को भिगोता है यह मन्त्र पढ़कर - "इमा आपः शमु मे सन्तु
देवीः” (यजु० ४।१) - "ये दिव्य जल मेरी शान्ति के लिए हों।" ऐसा वह क्यों कहता है कि
ये दिव्य जल मेरी शान्ति के लिए हों ? जल वज्र हैं। वस्तुतः जल वज्र हैं। इसलिए ये जल
जिधर को बहते हैं उधर को गड्ढा कर देते हैं, और जहाँ पहुँचते हैं वहाँ वे भस्म अर्थात् नष्ट
कर देते हैं। इसलिए इस प्रकार वह वज्र को शान्त करता है। इस प्रकार शान्त हुआ वज्र
उसको हानि नहीं पहुँचाता । इसीलिए कहा कि - 'ये दिव्य जल मेरी शान्ति के लिए हों' ॥४॥
अब दर्भ की बालों के साथ रखता है यह मन्त्र पढ़कर - "ओषधे त्रायस्व” (यजु० ४।१) -
“हे ओषधि, तू रक्षा कर।" क्षुरा वज्र है। इस प्रकार यह क्षुरारूपी वज्र उसको नहीं हानि
पहुँचाता । इसलिए वह क्षुरे को यह पढ़कर चलाता है - "स्वधिते मैनँ॒ हिंसीः" - "हे क्षुरे,
इसको मत हानि पहुँचा।" क्योंकि क्षुरा वज्र है और इस प्रकार यह वज्ररूपी क्षुरा हानि नहीं
पहुँचाता ॥७॥
काटकर पानी के पात्र में डालता है। बायीं तरफ के बालों को मौन होकर भिगोता है
और मौन होकर ही उनपर दर्भ रखता है और मौन होकर ही क्षुरा चलाता है और बाल काट-
कर जल के पात्र में छोड़ देता है ॥८॥
अब क्षुरा नाई को दे देता है। (नाई) बाल और दाढ़ी मूंडता है। जब केश और दाढ़ी
मुँड जाते हैं - ॥६॥
तो स्नान करता है। पुरुष अपवित्र है क्योंकि झूठ बोलता है। इसलिए उसका भीतरी
अंश अपवित्र है। जल पवित्र है। 'पवित्र होकर दीक्षा लूँ।' जल पवित्र है। 'पवित्र होकर दीक्षा
लूँ' इसलिए स्नान करता है ॥१०॥
वह यह मन्त्र पढ़कर स्नान करता है - "आपोऽअस्मान् मातरः शुन्धयन्तु” (यजु० ४।२
या ऋ० १०।१७।१०) - "जल माताएँ हमको शुद्ध करें।" इससे तात्पर्य है कि वे शुद्ध करें। अब
कहता है- “घृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु” (ऋ० १०।७७।१० या यजु० ४।२) - "घी को पवित्र
करनेवालें हमको घी से पवित्र करें।" जो घी से पवित्र होता है वह वस्तुतः पवित्र हो जाता है।
इसलिए वह कहता है कि 'घी को पवित्र करनेवाले हमको घी से पवित्र करें।' "विश्वं॒ हि
रिप्रं प्रवहन्ति देवीः” (यजु० ४।२) - "ये दिव्य पदार्थ सब दोष को दूर कर देते हैं।" 'विश्व'
का अर्थ है 'सब', 'रिप्र' का अर्थ है 'अमेध्य' या अपवित्र । वे उससे सब अपवित्र दोषों को दूर

३३२ शतपथ ब्राह्मण
ह॒त्ति तस्मादाह॒ विश्वं॒ हि रिप्रं प्र॒वह॑त्ति दे॒वीरिति॑ ॥ ११॥ अथ प्राङिवोद॒ङ्-
ङ्ङ्उत्क्रा॑मति । उद्भि॒दाभ्यः शुचि॒रा पू॒त एमीत्यु॒द्वाभ्यः शुचिः पूत एति ॥ १२॥ अथ
वासः परिधत्ते । सर्वत्वा॑यैव स्वामे॒वास्मिन्नेतत्त॒चं दधाति या ह वाऽइयं गोस्त्व-
क्पुरुषे हैषाग्रऽआस ॥ १३॥ ते देवा अब्रुवन् । गौर्वाऽइ॒दं सर्वं बिभर्ति हन्त
येयं पुरुषे त्वग्व्येतां दधाम तयैषा वर्षंत्तं तया हि॒मं तया घृ॒णिं तितिक्षिप्यत
ऽइति॑ ॥ १४॥ तेऽवहाय॒ पुरुष॑म् । गव्येतां त्वचमदधुस्तयैषा वर्षंत्तं तया हि॒मं
तया घृ॒णिं तितिक्षते ॥ १५॥ अवक्षितो हि वै पुरुषः । तस्मादस्य यत्रैव वा च
कुशो वा यद्वा विकृन्तति तत एव लोहितमुत्पतति तस्मिन्नेतां त्वचमदधुर्वास
एव तस्मान्नान्यः पुरुषाद्वासो बिभर्त्येताँ ह्यस्मिंस्त्वचमदधुस्तस्मात्तु सुवासा एव
बुभूषेत्स्वया त्वचा समृध्याऽइति तस्मादुप्यश्लीलं सुवाससं दिदृक्षन्ते स्वया हि त्व-
चा समृद्धो भवति ॥ १६॥ नो ह्यन्ते गोर्नग्नः स्यात् । वेद ह गौरूकमस्य त्वचं
बिभर्मीति सा बिभ्यती त्रसति त्वचं मऽआदास्यतऽइति तस्माद् गावः सुवासस-
मुपेव निश्रयन्ते ॥ १७॥ तस्य वाऽएतस्य वाससः । अग्नेः पर्यासो भवति वा॒योर-
नूकादो नीविः पितॄणाँ सर्पाणां प्रघातो विश्वेषां देवानां तन्तव आरोका नक्ष-
त्राणामिव हि वाऽएतत्सर्व्वे देवा अन्वायत्तास्तस्माद्दीक्षितवसनं भवति ॥ १८॥
तद्वाऽअहतं स्यात् । अयातयामतायै तद्वे नि॒ष्टेष्ट्वे ब्रूयाद्यद्देवास्यात्रामिध्या कृ-
णत्ति वा वयति वा तदस्य मेध्यमस॒दिति यद्युऽअहतं स्यादद्भिरभ्युन्नेन्मेध्यमस-
दित्यथो यदिदं स्नातवस्यं निष्षितमपल्पूलनकृतं भवति तेनो हापि दीक्षेत
॥ १९॥ तत्परिधत्ते । दीक्षांतपसोस्तनूरसीत्यदीक्षितस्य वाऽअस्यैषायै तनूर्भवत्य-
थात्र दीक्षांतपसोस्तस्मादाह दीक्षांतपसोस्तनूरसीति तां त्वा शि॒वाँ शग्मां परि॑-
दध॒ऽइति तां त्वा शिवाँ साध्वीं परिदधऽइत्येवैतदाह भद्रं वर्णं पुष्यन्निति पाप
वाऽएषोऽग्रे वर्णं पुष्यति यममुमदीक्षितोऽथात्र भद्रं तस्मादाह भद्रं वर्णं पुष्य-

कां० ३, अ० १, ब्रा० २, कं० ११-२० शतपथब्राह्मण / ३३३
कर देते हैं। इसीलिए कहता है कि 'ये दिव्य पदार्थ सब दोषों को दूर कर देते हैं' ॥११॥
अब उत्तर-पूर्व की ओर चलता है यह मन्त्रांश पढ़कर—"उदिदाम्यः शुचिरा पूतऽएमि"
(यजु० ४।२)—"मैं शुद्ध-पवित्र होकर इनसे चलता हूँ।" वस्तुतः वह शुद्ध और पवित्र होकर
इनसे चलता है ॥१२॥
अब वह कपड़ा पहनता है, सर्वत्व अर्थात् पूर्णता के लिए। मानो वह इस प्रकार अपनी
ही खाल ओढ़ता है। जो गाय के ऊपर का यह चमड़ा है वह पहले मनुष्य के ऊपर था ॥१३॥
देवों ने कहा—'वस्तुतः गाय इस (पृथिवी) पर सभी को धारण करती है। यह जो
पुरुष के ऊपर खाल है उसे गाय पर रख दें। इससे वह वर्षा, शीत और गर्मी को सह लेगी' ॥१४॥
उन्होंने पुरुष की खाल खींचकर गाय के ऊपर रख दी। इससे वह वर्षा, शीत और गर्मी
को सह लेती है ॥१५॥
पुरुष की खाल खींच ली गयी है। इसलिए जहाँ कहीं कुश या और कोई चीज छिद
जाती है वहीं खून निकल आता है। इसलिये उस चमड़े को ऊपर रख दिया। इसलिए मनुष्य के
सिवाय और कोई कपड़े नहीं पहनता। क्योंकि उसी के ऊपर वह चमड़े के समान रख दिया गया
है इसलिए उसे वस्त्रों से विभूषित होना चाहिए, जिससे वह अपनी ही खाल से ढक जाय।
इसलिए एक भद्दे आदमी को भी कपड़े में ढकना चाहते हैं क्योंकि वह अपने ही चमड़े से ढका
होता है ॥१६॥
उसको गाय के सामने नंगा नहीं होना चाहिए। क्योंकि गाय जानती है कि मैं इसी का
चमड़ा ओढ़े हूँ और वह डरकर भागती है कि यह कहीं अपना चमड़ा न ले ले। इसलिए भी जो
कपड़े पहने होता है उसी के पास गायें भली-भाँति जाती हैं ॥१७॥
अब इस कपड़े का ताना अग्नि का होता है और बाना वायु का। पितरों की नीवि, सर्पों
का प्रघात (आगे का किनारा), तन्तु विश्वेदेवों का, और छिद्र नक्षत्रों के। इसमें सभी देवतागण
शामिल हैं। इसलिए यह दीक्षित का कपड़ा होता है ॥१८॥
यह वस्त्र (यथासम्भव) अहत (=न मारा हुआ) अर्थात् पत्थर पर न पीटा हुआ,
(बे-धुला हुआ) होना चाहिए, जिससे पूरा ओज प्राप्त हो। (अध्वर्यु प्रतिप्रस्थातृ को) आदेश
देवे कि उस वस्त्र को पीटे जिससे यदि अपवित्र स्त्री का कता या बुना भाग हो तो वह निकल
जाय और वस्त्र पवित्र हो जाय। यदि वह नया हो तो उस पर जल छिड़के जिससे वह पवित्र हो
जाय। या ऐसे कपड़े से दीक्षा ले जो अलग रक्खा रहता हो और स्नान के पश्चात् ही पहना
जाता हो। वह (किसी तीक्ष्ण खार आदि में) डुबोया हुआ न हो ॥१९॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर पहनता है—"दीक्षातपसोस्तनूरसि।"—"दीक्षा और तप का तू
शरीर या ढकना है।" इससे पहले वह अदीक्षित का शरीर था। अब दीक्षा और तप का हुआ।
इसलिए कहा कि 'तू दीक्षा और तप का शरीर है।' अब कहता है—"तां त्वा शिवां शग्मां
परिदधे।"—"मैं तुझ कल्याणकारी और शुभ (कपड़े) को धारण करता हूँ।" 'शग्मां' का अर्थ है
'साध्वी' (उत्तम) को। अब कहता है—"भद्रं वर्णं पुष्यन्।"—"भद्रवर्ण का पोषण करनेवाला।"
जो वर्ण अदीक्षित होने की अवस्था में धारण किया गया वह पापयुक्त था। अब भद्र है। इसलिए
कहा कि 'भद्रवर्ण का पोषण करनेवाला' ॥२०॥