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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-१, ब्राह्मण-४

वापू॒र्यतेऽर्धमासः स दे॒वा योऽप॒क्षीय॑ते स पि॒तरो॒ऽहरे॑व दे॒वा रात्रिः पि॒तरः॑ पू-
र्वा॒ह्णो दे॒वा अ॑परा॒ह्णः पि॒तरः॑ ॥ १ ॥ ते वाऽए॒तऽऋतवः॑ । दे॒वाः पि॒तरः॑
स यो ह्ये॑वं वि॒द्वान्दे॒वाः पि॒तर॒ इति॑ ब्रूयात्य॒ ह्वास्य दे॒वा दे॒वहू॑यं गच्छ॑न्त्या पि॒तरः॑
पि॒तृहू॑यमवन्ति हैनं॑ दे॒वा दे॒वहू॒त्येऽव॑न्ति पि॒तरः॑ पि॒तृहू॑ये य ए॒वं वि॒द्वान्दे॒वाः पि॒-
तर॒ इति॑ ब्रू॒यति॑ ॥ २ ॥ स यत्रोद॒गावर्त॑ते । दे॒वेषु॒ तर्हि॑ भवति दे॒वांस्तर्ह्य॑भिगो-
पायत्यथ॒ यत्र॑ दक्षि॒णावर्त॑ते पि॒तृषु॒ तर्हि॑ भवति पि॒तॄंस्तर्ह्य॑भिगोपायति ॥ ३ ॥ स
यत्रोद॒गावर्त॑ते । त॒र्ह्य॒ग्नीरा॒दधीताप॑हतपाप्मानो दे॒वा अप॑ पा॒प्मान॑ꣳ हते॒ऽमृ॑ता
दे॒वा ना॒मृत॑त्वस्याशास्ति॒ सर्व॒मायु॑रेति॒ यस्त॒र्ह्याध॑त्तेऽथ॒ यत्र॑ दक्षि॒णावर्त॑ते॒ यस्त॒-
र्ह्याध॑त्ते॒ऽनप॑हतपाप्मानः पि॒तरो॒ न पा॒प्मान॒मप॑हते॒ मर्त्याः॑ पि॒तरः॑ पु॒रा ह्वायुषो॑
म्रियते॒ यस्त॒र्ह्याध॑त्ते ॥ ४ ॥ ब्रह्म॑ वै वस॒न्तः । क्ष॒त्रं ग्री॒ष्मो विशे॑व व॒र्षास्तस्मा॑द्ब्रा-
ह्म॒णो व॑स॒न्त आद॑धीत॒ ब्रह्म॒ हि व॑स॒न्तस्तस्मा॑त्क्षत्रियो ग्री॒ष्मऽआद॑धीत क्ष॒त्रꣳ
हि ग्री॒ष्मस्तस्मा॒द्वैश्यो॑ वर्षा॒स्वाद्॑धीत विड्ढि वर्षाः॑ ॥ ५ ॥ स यः का॒मये॑त । ब्रह्म-
वर्च॒सी स्या॒मिति॑ वस॒न्ते स आ॒दधी॑त॒ ब्रह्म॒ वै व॑स॒न्तो ब्रह्मवर्च॒सी है॒व भ॑वति
॥ ६ ॥ अथ॒ यः का॒मये॑त । क्ष॒त्रꣳ श्रि॒या य॒शसा॑ स्या॒मिति॑ ग्री॒ष्मे स आ॒दधी॑त क्ष॒त्रं
वै ग्री॒ष्मः क्ष॒त्रꣳ है॒व श्रि॒या य॒शसा॑ भवति ॥ ७ ॥ अथ॒ यः का॒मये॑त । ब॒हुः प्र॒ज-
या प॒शुभिः॑ स्या॒मिति॑ व॒र्षासु॒ स आ॒दधी॑त वि॒ड्डै व॒र्षा अन्नं॒ विशो॑ ब॒हुरे॑व प्र॒जया॑
प॒शुभि॑र्भवति य ए॒वं वि॒द्वान्व॒र्षास्वाध॑त्ते ॥ ८ ॥ ते वाऽए॒तऽऋतवः॑ । उ॒भय॑ऽए॒वा-
प॑हतपाप्मानः सू॒र्य ए॒वेषां॑ पा॒प्मनोऽप॑हन्तोत्य॑त्रेवैषामु॒भये॑षां पा॒प्मान॒मप॑हन्ति त-
स्मा॒द्यदै॒वैनं॑ क॒दा च॑ य॒ज्ञ उप॒नमे॒दथा॒ग्नीरा॒दधी॑त न श्वःश्व॒मुपा॑सीत को हि म-
नु॒ष्य॑स्य॒ श्वो वे॑द ॥ ९ ॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ ॥
यदु॑क॒रस्य॒ श्वोऽग्न्याधेय॑ꣳ स्यात् । द्वि॒वेवा॒श्नीयान्मनो ह वै दे॒वा म॑नु॒ष्य॑स्या-
जानन्ति तेऽस्यैत॒च्छ्वोऽग्न्याधेयं॑ वि॒दुस्तेऽस्य॒ विश्वे॑ दे॒वा गृ॒हानाग॑च्छन्ति ते॒ऽस्य गृ॒हे-

कां० २, अ० १, ब्रा० ३-४, कं० १-६ व १ शतपथब्राह्मण / २०१
आधा मास बढ़ता है (अर्थात् शुक्ल पक्ष) वह देवों का है और जो घटता है (अर्थात् कृष्ण पक्ष)
वह पितरों का है। दिन देवों का है, रात पितरों की। फिर दिन का दोपहर से पूर्व का भाग देवों
का है, पिछला भाग पितरों का ॥१॥
अब ये ऋतुएँ देवों और पितरों की हैं। जो मनुष्य इस रहस्य को समझकर देवों और
पितरों को बुलाता है उसका देव-निमंत्रण सुनकर देव आ जाते हैं और पितृ-निमंत्रण सुनकर
पितर। जो मनुष्य देव और पितरों को जानकर बुलाता है उसकी देव देव-निमंत्रण में और पितर
पितृ-निमंत्रण में रक्षा करते हैं ॥२॥
वह (सूर्य) जब उत्तर की ओर होता है तो देवों में होता है और देवों की रक्षा करता
है, और जब दक्षिण की ओर होता है तो पितरों में होता है और पितरों की रक्षा करता है ॥३॥
जब (सूर्य) उत्तरायण हो तो अग्न्याधान करे। (सूर्य के द्वारा) देवों का पाप नष्ट हो
गया। उसका भी पाप दूर हो जायगा। देव अमर हैं। इसलिए जो इस समय अग्न्याधान करता
है उसको अमरत्व की आशा तो नहीं हो सकती, परन्तु वह पूर्ण आयु को प्राप्त हो जाता है।
परन्तु जो दक्षिणायन सूर्य में अग्न्याधान करता है उसका पाप नहीं छूटता, क्योंकि पितरों का
पाप नहीं छूटा। और वह आयु से पहले मर जाता है क्योंकि पितर अमर नहीं हैं ॥४॥
वसन्त ब्राह्मण है, ग्रीष्म क्षत्रिय, वर्षा वैश्य। इसलिए ब्राह्मण वसन्त में अग्न्याधान
करे क्योंकि वसन्त ब्राह्मण है। इसलिए क्षत्रिय ग्रीष्म में अग्न्याधान करे क्योंकि ग्रीष्म क्षत्रिय
है। इसलिए वैश्य वर्षा में अग्न्याधान करे क्योंकि वर्षा वैश्य है ॥५॥
जो इच्छा करे कि मैं ब्रह्मवर्चसी हो जाऊँ वह वसन्त में अग्न्याधान करे, क्योंकि वसन्त
ब्राह्मण है। वह निश्चय करके ब्रह्मवर्चसी हो जाता है ॥६॥
जो चाहे कि मुझे शक्ति, श्री और यश प्राप्त हो वह ग्रीष्म में अग्न्याधान करे, क्योंकि
ग्रीष्म क्षत्रिय है। उसे शक्ति, श्री और यश मिलेगा ॥७॥
और जो चाहे कि बहुत सन्तान तथा पशु हो जायँ, वह वर्षा में अग्न्याधान करे, क्योंकि
वर्षा वैश्य है। अन्न वैश्य है। जो इस रहस्य को समझकर वर्षा में अग्न्याधान करता है, उसके
बहुत सन्तान और पशु होते हैं ॥८॥
(कुछ का मत है कि) ये दोनों प्रकार की ऋतुएँ (देव-ऋतु और पितृ-ऋतु) पापों से
युक्त हैं। सूर्य इनके पापों का दूर करनेवाला है। जब वह चमकता है तो इनके पाप नष्ट हो
जाते हैं। इसलिए जब कभी यज्ञ की इच्छा हो तभी अग्न्याधान कर ले। कल के ऊपर न डाले
क्योंकि कौन जानता है कि कल क्या होगा ? ॥६॥
अध्याय १—ब्राह्मण ४
जिस दिन के अगले दिन अग्न्याधान करना है उस दिन (यजमान और उसकी स्त्री)
दिन में ही भोजन करे, क्योंकि देव मनुष्यों के मन को जानते हैं। वे जानते हैं कि अगले दिन
अग्न्याधान होगा। इसलिए सब देव घर मे आ जाते हैं। वे उसके घरों में ठहर जाते हैं

२०२ शतपथ ब्राह्मण
षूपवसन्ति स उपवसथः ॥१॥ तन्न्वेवानवकॢप्तं यो मनु॒ष्ये॑ध्नन्त्संस्तु पूर्वोऽश्नीयादथ
किमु यो दे॒वेध्नन्त्संस्तु पूर्वोऽश्रीयात्तस्माद् दिवैवाश्नीयात्तद्यद्यपि काममेव नक्तमश्री-
यान्नो ह्य॒नाहि॑ताग्नेर्व्रतच॒र्या॑स्ति मानुषो ह्ये॑वैष तावद्भवति यावद॒नाहि॑ताग्निस्त-
स्माद्य॒पि काममेव नक्तमश्रीयात् ॥२॥ तद्धैकेऽन्नमुपबध्नन्ति । आग्नेयोऽग्ने॑रग्ने॑रेव
सर्व॒त्वायति॒ वद॑न्तस्तदु तथा न कुर्याद्य॒द्यस्या॒ज्ञः स्यादग्नीध्र ए॒वैनं॑ प्रातर्दद्यात्तेनेव
तं काममाप्नोति तस्मादु तन्नाद्रियेत ॥३॥ अथ चातुष्प्राश्यमोदनं पचन्ति । इ॒-
न्द्रा॒ग्न्यनेन प्रीणीम इति यथा येन वाहनेन स्यन्त्स्यन्त्स्यात्तत्सुहितं क॑र्तवे ब्रूया-
दे॒वमे॒तदिति॒ वद॑न्तस्तदु तथा न कुर्याद्यद्य॒ऽअस्य ब्राह्मणाः कुले वसन्त्यृ॒त्विजश्चा-
नू॒त्विज॑श्च तेनैव तं काममाप्नोति तस्मादु तन्नाद्रियेत ॥४॥ तस्य सर्पिरासिचनं कृ-
त्वा॒ । सर्पिरासिच्या॒न्त्येति॑स्तिस्रः समिधो घृतेनान्वज्य समिद्धतीभिर्घृतवतीभिर्ऋग्भि-
रभ्यादधति शमीगर्भमेतदारुंम इति वद॒न्तः स यः पुरस्तात्संवत्सरमभ्यादध्यात्स ह॒
तं काममाप्नुयात्तस्मादु तन्नाद्रियेत ॥५॥ तदु होवाच भाल्लवेयः । यथा वाऽअन्य-
त्करिष्यन्त्सोऽन्यत्कुर्याद्यथान्यद्विद्यित्सोऽन्यद्वे॒द्ये॒थान्येन प॑थे॒ष्यन्त्सोऽन्येन प्रति-
पद्येतेवं तद्य॒ एतं॑ चातुष्प्राश्यमोदनं पचेदुपराद्धिरेव सेति न हि तद्वकल्पते य-
स्मिन्न॒ग्नावा॒ग्न्या वा साम्ना वा यजुषा वा समिधं वाभ्यादध्यादाहुतिं वा जुहुयाद्यत्तुं
दक्षिणा वा कु॒रेयुरनु वा गमयेयुर्दक्षिणा वा ह्येतत् हरन्त्यन्वाहार्यपचनो भवि-
ष्यतीत्यनु वा गमयन्ति ॥६॥ अथ जाग्रति जाग्रति देवाः । तद्देवानेवैतदुपार्वर्त-
ते स स॑देवत॒रः श्वास्तनस्तपस्वितरोऽग्नीऽआधत्ते तद्यद्यपि काममिव स्वप्यानो ह्य॒-
नाहिताग्नेर्व्रतचर्यास्ति मानुषो ह्ये॑वैष तावद्भवति यावदनाहिताग्निस्तस्माद्यद्यपि का-
ममेव स्वप्यात् ॥७॥ तद्धैकेऽनुदिते मथित्वा । तमुदिते प्राञ्चमुद्धरन्ति तदु तदुभे
ऽअहोरात्रे परिगृह्णीमः प्रा॒णोदा॒नयोर्मन॑सश्च वाचश्च प॒र्याप्त्या॒ऽइति॒ वद॑न्तस्तदु त-
था न कुर्यादु॒भौ हैवास्य तथाऽनुदितऽआहितौ भवतोग्नुदिते हि मथित्वा तमु-

का० २, अ० १, ब्रा० ४, कं० १-८ शतपथब्राह्मण / २०३
(उपवसन्ति)। इसलिए इस दिन को उपवसथ (उपवास) कहते हैं ॥१॥
यह अनुचित है कि ठहरे हुए मनुष्यों के भोजन करने से पूर्व वह भोजन कर ले। इससे
भी अधिक अनुचित यह है कि ठहरे हुए देवों के भोजन करने से पूर्व भोजन कर ले। इसलिए उस
दिन, दिन में ही भोजन करना चाहिए। परन्तु यदि इच्छा हो तो रात में भी भोजन कर सकता
है। क्योंकि अभी अग्न्याधान नहीं किया, इसलिए व्रत-चारी तो है नहीं। जब तक अग्न्याधान
नहीं करता उस समय तक मनुष्य रहता है। इसलिए इच्छा हो तो रात में भी भोजन कर
ले ॥२॥
कुछ लोग बकरे को बांध लेते हैं। बकरा अग्नि का है, और यह काम अग्नि के सर्वस्व
अर्थात् पूर्ति के लिए किया जाता है। परन्तु उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। जिसके पास बकरा
हो वह प्रातःकाल अग्नीध्र (आग्नीध्र) को दे दे, उसी से काम चल जायगा। इसलिए इस प्रथा
का आदर न करे ॥३॥
अब वह चार मनुष्यों के योग्य ओदन (चातुष्प्राश्य भात) पकाते हैं (और कहते हैं कि)
'हम इसके द्वारा छन्दों को प्रसन्न करते हैं।' जैसे जिस वाहन (बैलों की जोड़ी) को जोतना
चाहें उनको पहले से अच्छी प्रकार खिलाने-पिलाने की आज्ञा देते हैं। परन्तु उसे ऐसा नहीं करना
चाहिए। चूंकि ब्राह्मण उसी के कुल में रहते हैं, चाहे वे ऋत्विज हों, चाहे ऋत्विज न हों,
इसलिए इसी से उसका काम निकल जाता है। इसलिए इस (प्रथा) का आदर नहीं करना
चाहिए ॥४॥
उस (भात) में घी के लिए गड्ढा करके उसमें घी छोड़कर अश्वत्थ की तीन समिधायें
घी में भिगोकर 'समिधा' और 'घी' वाली तीन ऋचाओं* से उनको अग्नि पर रख देते हैं, यह
कहकर कि शमीगर्भ (शमी वृक्ष के भीतर उत्पन्न हुए अश्वत्थ की लकड़ियों से अग्नि निकाली
जाती है) का फल इसी से मिल जाता है। परन्तु उसको यह फल तभी मिलता है जब वह
निरन्तर सालभर तक अग्न्याधान से पहले ये तीन आहुतियाँ देता रहे। इसलिए इस प्रथा का
आदर नहीं करना चाहिए। [अर्थात् जो फल शमीगर्भ में उत्पन्न हुई समिधाओं से होता है वह
अश्वत्थ की तीन समिधाओं को भात में भरे हुए घी में भिगोकर चढ़ाने से होता है। परन्तु
याज्ञवल्क्य इसको केवल एक अंश में मानते हैं] ॥५॥
इस पर भाल्लवेय का कहना है कि 'चातुष्प्राश्य' भात पकाना उसी प्रकार अनुचित है
जैसे कोई एक कार्य की इच्छा करे और करे दूसरा, या एक बात कहना चाहे और कहे दूसरी,
या एक मार्ग से जाना चाहे और जाये दूसरे से। यह ठीक नहीं है कि जिस अग्नि में ऋक्, यजु
या साम से आहुति चढ़ावें उसी अग्नि को या तो दक्षिण में ले जाये या बुझा दे। परन्तु अन्वाहार्य-
पचन (भात पकाने) के लिए या तो यह इस भाग को दक्षिण को ले जाते हैं या बुझा देते हैं।
(इसलिए यह कार्य अनुचित है) ॥६॥
अब वह जागरण करता है। देव जागते रहते हैं। इसलिए वह इस प्रकार देवों के निकट
हो जाता है और अधिक देवता बनकर, श्रान्त बनकर और तपस्वी होकर अग्न्याधान करता है।
परन्तु यदि उसकी इच्छा हो तो सो भी रहे, क्योंकि अग्न्याधान करने से पहले तो व्रतचारी होता
नहीं। जब तक अग्न्याधान नहीं किया तब तक वह साधारण मनुष्य है और इच्छा के अनुसार
सो सकता है ॥७॥
कुछ लोग सूर्योदय से पूर्व अग्नि को मथकर सूर्योदय के पश्चात् पूर्व की ओर (गार्हपत्य
से आहवनीय की ओर) ले जाते हैं जिससे रात और दिन दोनों का काम निकल आवे तथा प्राण
उदान और मन वाणी का भी। परन्तु उसको ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि जब सूर्योदय के

  • समिधा और घी वाली तीन ऋचाएँ यह हैं--
    १. समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम्। आस्मिन् हव्या जुहोतन ॥
    २. सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन। अग्नये जातवेदसे ॥
    ३. तं त्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि। बृहच्छोचा यविष्ठ्य ॥ —यजु० ३१, २, ३

२०४ शतपथ ब्राह्मण

दिते प्राञ्च॒मुद्ध॑रति स य उ॒दित॑ऽआहव॒नीयं॒ मन्ये॑त्स ह॒ तत्पूर्या॒न्नुया॑त् ॥ ८॥ अ-
र्ह॒र्वे दे॒वाः । अन॑पहतपाप्मानः पितरो न पाप्मान॑मप॒हते॒ मर्त्याः पितरः पुरा
ह्यायु॑षो म्रियते योऽनु॑दिते मन्य॑त्यपहृतपाप्मानो देवा अप पाप्मानं॑ ह॒तेऽमृ॑ता
दे॒वा नामृ॑तत्वस्या॒शास्ति॒ सर्व॒मायु॑रेति॒ श्रीर्देवाः श्रियं गच्छति॒ यशो॑ दे॒वा यशो॑ ह
भ॑वति॒ य ए॒वं वि॒द्वानु॑दिते मन्य॑ति ॥ ९॥ तदाहुः । यन्न॒ऽऋचा न साम्ना॑ न यजु॑षा-
ऽग्नि॒राधीय॑तेऽथ॒ केना॑धीयत॒ऽइति॒ ब्रह्म॑णो ह्यै॒वैष ब्रह्म॑णाधीयते॒ वाग्वै ब्रह्म॒ तस्यै॑
वाचः स॒त्यमे॒व ब्रह्म॑ ता वा॒ऽएताः स॒त्यमे॒व व्याहृतयो भव॑न्ति॒ तद॒स्य स॒त्येनै-
वाधीयते ॥ १०॥ भूरिति॒ वै प्र॒जाप॑तिः । इ॒माम॑जनयत॒ भुव॒ इत्य॒न्तरि॑क्षं॒ स्वरिति॑
दि॒वमे॒ताव॒द्वाऽइ॒दं सर्वं॒ याव॑दि॒मे लो॒काः सर्वे॑णैवाधीयते ॥ ११॥ भूरिति॒ वै प्र-
जाप॑तिः । ब्रह्म॑ाजनयत॒ भुव॒ इति॑ क्ष॒त्रं॒ स्वरिति॒ विश॑मे॒ताव॒द्वाऽइ॒दं सर्वं॒ याव॑-
द्ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं विट् सर्वे॑णैवाधीयते ॥ १२॥ भूरिति॒ वै प्र॒जाप॑तिः । आ॒त्मान॑मजनयत
भुव॒ इति॑ प्र॒जां॒ स्वरिति॑ प॒शूनि॒ताव॒द्वाऽइ॒दं सर्वं॒ याव॑दा॒त्मा प्र॒जा प॒शवः॒ सर्वे॑-
णैवाधीयते ॥ १३॥ स वै भूर्भुव॒ इति॑ । ए॒ताव॑तैव गार्हपत्य॒माद॑धात्यथ॒ यत्सर्वे॑-
रादध्यात्केनाहवनीय॒माद॑ध्याद्वे॒ऽअन्त॑रे परिशि॒नष्टि॒ तेनो॑ऽए॒तान्य॑यातयामानि भ-
व॑न्ति॒ तैः सर्वैः प॒ञ्चभि॑राहवनीय॒माद॑धाति॒ भूर्भुवः॒ स्वरिति॒ तान्य॒ष्टाव॒क्षरा॑णि स॒-
म्पद्य॑न्ते॒ऽष्टाक्ष॑रा वै गाय॒त्री गाय॒त्रम॑ग्नेश्छन्दः॒ स्वेनै॒वैन॑मेतच्छन्द॑साधत्ते ॥ १४॥ दे-
वान्हु वाऽअ॒ग्नीऽआधास्य॑मानान् । तानसु॒ररक्ष॑सानि ररन्धु॒र्नाग्नीर्निर्मिनिष्यते॒ नाग्नी
आधास्य॒ध्वेऽइति तद्य॒दर॑क्षंस्तस्माद्रक्षांसि ॥ १५॥ ततो दे॒वा ए॒तं वज्रं॑ ददृशुः ।
यदृक्षं॒ तं पु॒रस्ता॑दुदञ्च॒मुदय॑स्तस्याभयेऽना॒ष्ट्रे नि॒वाते॑ऽग्नि॒रद्यायत॒ तस्माद्य॒त्राग्निं मन्थि-
ष्या॑न्त्स्यात्तदृक्ष्य॑मनिवर्ते ब्रूयात्स पूर्वे॑णोप॒तिष्ठ॑ते व॒ज्रमे॒वैतदु॒द्धूय॑ति तस्या॑भयेऽना॒ष्ट्रे
नि॒वाते॑ऽग्नि॒र्नाधीयते ॥ १६॥ स वै पूर्ववा॒ट् स्यात् । स ह्य॑परिमितं वी॒र्य॑मभिवर्धते
यदि पूर्ववाहं न विन्देदपि य एव कश्चाश्वः स्याद्यद्यश्वं न विन्देदप्यनड्वानेव

कां० २, अ० १, ब्रा० ४, क० ८-१७ शतपथब्राह्मण / २०५
पश्चात् पूर्व की ओर ले जाते हैं तो दोनों अग्नियां सूर्योदय के पूर्व की ही हो जाती हैं। सूर्योदय
के पश्चात् आहवनीय को मथने से भी यही कार्य निकल सकता है ॥८॥
देव दिन हैं। पितर पाप-शून्य नहीं हैं, (अर्थात्) सूर्य ने पितरों के पाप छुटाये नहीं;
इसलिए जो सूर्योदय से पूर्व अग्नि को मथता है वह पापों से मुक्त नहीं होता। और पितर अमर
नहीं हैं इसलिए वह जो सूर्योदय से पूर्व अग्नि को मथता है, पूर्ण आयु से पूर्व मर जाता है। जो
पुरुष इस रहस्य को समझकर सूर्योदय के पश्चात् अग्नि को मथता है, वह पापों से छूट जाता है
क्योंकि देव पापों से मुक्त हैं। और यद्यपि अमर नहीं होता तो भी पूर्ण आयु को अवश्य प्राप्त
होता है क्योंकि देव अमर हैं। श्री को प्राप्त होता है क्योंकि देव श्री हैं। यश को प्राप्त होता है
क्योंकि देव यश हैं ॥९॥
इस पर कुछ लोग कहते हैं कि यदि ऋक्, साम और यजुः से अग्न्याधान न किया जाय
तो किससे किया जाये ? (इसका उत्तर यह है कि) यह अग्नि ब्रह्म की है इसलिए ब्रह्म से ही
इसका आधान होना चाहिए। वाणी ब्रह्म है। उसी वाणी का यह (अग्नि) है। ब्रह्म सत्य है
और इन व्याहृतियों में सत्य है। इसलिए सत्य के द्वारा इसका आधान होता है ॥१०॥
प्रजापति ने 'भू' से इस (पृथिवी) को उत्पन्न किया, 'भुवः' से अन्तरिक्ष को और 'स्वः'
से द्यौलोक को। ये जो तीन लोक हैं उतना ही जगत् है। इसलिए 'सब' से ही आधान किया
जाता है ॥११॥
प्रजापति ने 'भू' से ब्राह्मण उत्पन्न किये, 'भुवः' से क्षत्रिय और 'स्वः' से वैश्य। ये जो
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हैं इतना ही सब जगत् है, इसलिए 'सब' से ही आधान किया जाता
है ॥१२॥
प्रजापति ने 'भू' से आत्मा को, 'भुवः' से प्रजा को और 'स्वः' से पशुओं को उत्पन्न
किया। ये जो आत्मा, प्रजा और पशु हैं उतना ही यह सब जगत् है, इसलिए 'सब' से ही आधान
किया जाता है ॥१३॥
वह 'भूर्भुवः' से गार्हपत्य अग्नि का आधान करता है। यदि सब (तीनों व्याहृतियों) से
आधान करता तो आहवनीय का आधान किससे करता ? इसलिए दो अक्षर (स्वः) छोड़ देता
है। इससे (शेष तीन अक्षर) अधिक प्रभावशाली हो जाते हैं। इन पाँचों अक्षरों से अर्थात्
'भूर्भुवः स्वः' से आहवनीय का आधान करता है। इस प्रकार आठ अक्षर हो जाते हैं। गायत्री में
भी आठ अक्षर होते हैं। गायत्री अग्नि का छन्द है। इस प्रकार वह (अग्नि का) आधान
(अग्नि के ही) छन्द से करता है ॥१४॥
देवों ने अग्नियों का आधान करना चाहा। असुर और राक्षसों ने उनको रोका (और
कहा कि) 'अग्नि उत्पन्न न होगी', 'अग्नि का आधान मत करो।' चूंकि उन्होंने रोका (अरक्षन्)
इसलिए 'रक्ष' धातु से उनका नाम राक्षस पड़ा ॥१५॥
तब देवों ने इस वज्र अर्थात् 'अश्व' को देखा। उन्होंने उसको सामने खड़ा कर लिया
और उसके भयरहित, शत्रुरहित संरक्षण में अग्नि को उत्पन्न किया। इसलिए जहाँ अग्नि को
मथना हो वहाँ अश्व को ले जाओ, ऐसा (अध्वर्यु अग्नीध्र को) बोले। वह सामने खड़ा होता
है, वज्र को उठाता है और उसके भयरहित और शत्रु-शून्य संरक्षण में अग्नि उत्पन्न होती
है ॥१६॥
इसको पूर्ववाट् (पूर्व को चलनेवाला या शायद अगुआ या युवा घोड़ा) होना चाहिए,
क्योंकि इसमें अपरिमित वीर्य होता है। यदि पूर्ववाट् अश्व न मिले तो जैसा अश्व मिले वही
सही। यदि अश्व न मिले तो अनड्‌वान (बैल) ही ले ले, क्योंकि यह (अग्नि) बैल का बन्धु

स्यादे॒ष ह्ये॑वानडु॒हो बन्धुः॑ ॥ १७॥ तं यत्र॒ प्राञ्चं॑ हर॒न्ति । त॒त्पुर॒स्ताद॒श्वं नय॑न्ति
तत्पुर॒स्ताद्दे॒वैत्तन्नाष्ट्रा रक्षारंस्यप॒घ्नते॒त्यथा॑भयेनाना॒ष्ट्रेण॒ हर॑न्ति ॥ १८॥ तं वै तथै॒व
हरे॒युः । यथै॑नमे॒ष प्रत्य॒ङ्ङुपाच॑रे॒देष वै य॒ज्ञो यद॒ग्निः प्रत्य॒ङ् ह्यैवै॒नं य॒ज्ञः प्रवि॑शति
तं क्षिप्रे॒ यज्ञ॒ उप॑नमत्यथ यस्मात्परा॒ङ् भव॑ति परा॒ङ् ह्यै॑वास्माद्य॒ज्ञो भ॑वति स यो॑
हैनं॒ तत्रानुव्याहुरेत्परा॑ऽस्माद्य॒ज्ञोऽभू॒दितीश्व॒रो ह॒ यत्तथै॑व स्यात् ॥ १९॥ ए॒ष उ॑
वै प्रा॒णः । तं वै तथै॒व हरे॑यु॒र्यथैनमे॒ष प्रत्य॒ङ्ङुपाच॑रेत्प्रत्य॒ङ् ह्यैवै॒नं प्रा॒णः प्रवि॑-
शत्यथ॒ यस्मा॑त्परा॒ङ् भव॑ति परा॒ङ् ह्यै॑वास्मात्प्रा॒णो भ॑वति स यो॑ हैनं॒ तत्रानुव्या-
हुरेत्परा॑ऽस्मात्प्रा॒णोऽभू॒दितीश्व॒रो ह॒ यत्तथै॑व स्यात् ॥ २०॥ ॥ शतम् १०० ॥
॥ अ॒यं वै य॒ज्ञो योऽयं पव॑ते । तं वै तथै॒व हरे॑यु॒र्यथैनमे॒ष प्रत्य॒ङ्ङुपाच॑रेत्प्रत्य॒ङ्
ह्यैवै॒नं य॒ज्ञः प्रवि॑शति तं क्षिप्रे॒ यज्ञ॒ उप॑नमत्यथ॒ यस्मा॑त्परा॒ङ् भव॑ति परा॒ङ् ह्यै॑-
वास्माद्य॒ज्ञो भ॑वति स यो॑ हैनं॒ तत्रानुव्याहुरेत्परा॑ऽस्माद्य॒ज्ञोऽभू॒दितीश्व॒रो ह॒ य-
त्तथै॑व स्यात् ॥ २१॥ ए॒ष उ॑ वै प्रा॒णः । तं वै तथै॒व हरे॑यु॒र्यथैनमे॒ष प्रत्य॒ङ्ङुपा-
चरेत्प्रत्य॒ङ् ह्यैवै॒नं प्रा॒णः प्रवि॑शत्यथ॒ यस्मा॑त्परा॒ङ् भव॑ति परा॒ङ् ह्यै॑वास्मात्प्रा॒णो भ॑-
वति स यो॑ हैनं॒ तत्रानुव्याहुरेत्परा॑ऽस्मात्प्रा॒णोऽभू॒दितीश्व॒रो ह॒ यत्तथै॑व स्यात्त-
स्मा॒डु तथै॒व कु॑र्युः ॥ २२॥ अथा॑श्वमा॒क्रम॑यति । तमा॒क्रम॑य्य॒ प्राञ्च॒मुन्न॑यति॒ तं पुन॑-
रा॒वर्त॑यति तमुद॑ञ्चं॒ प्रमु॑ञ्चति वी॒र्यं वाऽअश्वो नेद॒स्मादि॒दं परा॑ग्वी॒र्यमसदिति॒ त-
स्मात्पुन॑रा॒वर्त॑यति ॥ २३॥ तमश्व॑स्य प॒दऽआ॑धत्ते । वी॒र्यं वाऽअश्वो वी॒र्ये॑ऽह्वेनमे-
तदा॒धत्ते॒ तस्मा॒दश्व॑स्य प॒दऽआ॑धत्ते ॥ २४॥ स वै तूष्णीमे॒वाग्रऽउप॑स्पृशति । अथो-
द्यहृत्यथो॑प॒स्पृश॑ति भूर्भुवः॒ स्वरित्ये॒व तृतीये॑ना॒दधा॑ति त्रयो॒ वाऽइ॒मे लो॒कास्तदि-
माने॒वैतल्लो॒कानाप्नो॒त्येतमृकम् ॥ २५॥ अथै॒दं द्वि॒तीय॑म् । तूष्णीमेवाग्रऽउप॑स्पृशत्य-
थोद्य॒ह्य॑ति भूर्भुवः॒ स्वरित्ये॒व द्वि॒तीये॑ना॒दधा॑ति यो वाऽअ॒स्यामप्रति॑ष्ठितो भार॒मु-
द्यच्छ॑ति॒ नैनं॑ शक्नोत्यु॒द्यन्तुं॒ स॑ ह्नं॒ वृणा॑ति ॥ २६॥ स यत्तूष्णीमुप॒स्पृश॑ति ।

कां० २, अ० १, ब्रा० ४, कं० १७-२७ शतपथब्राह्मण / २०७
है ॥१७॥
और जब वह इस (अग्नि) को पूर्व की ओर ले जाते हैं तो आगे-आगे घोड़े को ले जाते
हैं। इस प्रकार आगे-आगे चलकर वहदुरात्मा राक्षसों को हटाता चलता है। और वे इस (अग्नि)
को (आहवनीय तक) बिना भय और बिना शत्रु के ले जाते हैं ॥१८॥
इस (अग्नि) को इस प्रकार ले जायें कि उसका मुंह (यजमान की ओर) रहे। यह अग्नि
ही यज्ञ है। यजमान की ओर ही यज्ञ प्रवेश होता है, उसी की ओर यज्ञ शीघ्र झुक जाता है। और
जिसकी ओर से यह (अग्नि) मुंह फेर लेता है उसकी ओर से यज्ञ भी मुंह फेर लेता है। यदि
कोई किसी को दुर्वाक्य कहे कि यज्ञ तुझसे मुंह फेर ले तो उसका ऐसा ही हो जाय ॥१९॥
यह (अग्नि) प्राण है। इस (अग्नि) को इस प्रकार ले जाये कि इसका मुँह (यजमान
की ओर) रहे, क्योंकि उधर से ही प्राण घुसता है। यदि (अग्नि) किसी से मुंह फेर लेता है तो
प्राण भी उससे मुंह फेर लेता है। यदि कोई किसी से दुर्वाक्य कहे कि प्राण तुझसे मुंह फेर ले तो
ऐसा ही हो जाय ॥२०॥
यह जो पवन है वही यज्ञ है। इस (अग्नि) को इस प्रकार ले जायें कि उसका मुंह
(यजमान की) ओर रहे, क्योंकि इसी की ओर यज्ञ प्रवेश होता है, इसी की ओर झुक जाता है।
जिसकी ओर से यह (अग्नि) मुंह फेर लेता है, उसकी ओर से यज्ञ भी मुँह फेर लेते हैं। यदि
कोई किसी से दुर्वाक्य कहे कि यज्ञ तुझसे मुंह फेर ले तो ऐसा ही हो जाय ॥२१॥
यह (अग्नि) प्राण है। इस (अग्नि) को इस प्रकार ले जाये कि इसका मुँह (यजमान
की ओर) रहे, क्योंकि इधर से ही प्राण घुसता है। यदि (अग्नि) किसी से मुंह फेर लेता है तो
प्राण भी उससे मुंह फेर लेता है। यदि कोई किसी से दुर्वाक्य कहे कि प्राण उससे मुंह फेर ले तो
ऐसा ही हो जाय। इसलिए अग्नि को हम इस प्रकार ले जायें ॥२२॥
अब (अध्वर्यु) अश्व को (आहवनीय की ओर) ले जाता है। जब वह वहाँ पहुँच गया
तो वह उसे पूर्व की ओर ले जाता है। (बायीं ओर से दाहिनी ओर) घुमाता है और पश्चिम-
मुख खड़ा कर देता है। अश्व वीर्य है। वह अश्व को फिर इस प्रकार घुमाता है कि वीर्य उसकी
ओर मुंह न मोड़े ॥२३॥
वह अग्नि को अश्व के पद-चिह्न पर रखता है। अश्व वीर्य है। इस प्रकार वीर्य में वह
इस अग्नि को रखता है। इसीलिए अश्व के पद-चिह्न में वह अग्नि को रखता है ॥२४॥
पहले वह चुपके से (अग्नि से पद-चिह्न को) छूता है। फिर वह उसको उठाता है और
फिर छूता है। फिर तीसरी बार रख देता है यह मन्त्रांश पढ़कर—'भूर्भुवः स्वः' (यजु० ३।५)।
तीन ही लोक हैं। इस प्रकार वह इन लोकों को प्राप्त होता है। यह अग्न्याधान की एक विधि
है ॥२५॥
दूसरी विधि यह है कि चुपके से पहले छुये, फिर उठावे, फिर दूसरी बार में ही 'भूर्भुवः
स्वः' से आधान कर दे। बिना भूमि पर पैर जमाये जो बोझ को उठाता है वह उठा नहीं सकता।
बोझ उसको दबा देता है। इसलिए वह पहली बार पैर जमा लेता है, फिर बोझ उठाता है। पहली
बार अग्नि से पद-चिह्न को छूना पैर जमाने के तुल्य है ॥२६॥
यह जो चुपके से छूना है मानो इस पृथिवी में पैर जमाता है और आधान करता है। अब