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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 114

९६ पञ्चदशी
'एकमस्य साधारणं द्वे देवानभाजयत् त्रीण्यात्मनेऽकुरुत पशुभ्य
एकं प्रायच्छत्' ( बृ० १-५-२ ) इस वाक्य में उन सातों अन्नों
का विनियोग यों किया गया है कि—उनमें से एक तो मर्त्यान्न
है। दो देवताओं के अन्न हैं। एक पशुओं का अन्न है। शेष
तीन को उसने केवल आत्मा के लिये रख लिया है।
व्रीह्यादिकं दर्शपूर्णमासौ क्षीरं तथा मनः।
वाक् प्राणश्चेति सप्तत्व मन्नाना मवगम्यताम् ॥१६॥
व्रीह्यादिक, दर्श, पूर्णमास, दुग्ध, मन, वाक् तथा प्राण ये
सात अन्न कहाते हैं।
ईशेन यद्यप्येतानि निर्मितानि स्वरूपतः।
तथापि ज्ञानकर्मभ्यां जीवोऽकार्षीत्तदन्नताम् ॥१७॥
ईश्वर ने यद्यपि इनका स्वरूप ही बनाया था। परन्तु
इनका अन्नपन अर्थात् भोग्याकार तो जीव ने ही बना लिया
है। उसने ज्ञान और कर्म के सहारे से इन व्रीही आदि प्राणान्त
पदार्थों को अपना अन्न किंवा भोग्य बना डाला है।
जब उस जीव को देवताध्यान आदि विहित ज्ञान तथा
परस्त्रीध्यानादि प्रतिषिद्ध ज्ञान होता है, जब यह जीव यज्ञादि
विहित कर्म और हिंसा आदि प्रतिषिद्ध कर्म कर बैठता है तब
ईश्वर की बनाई ये सब वस्तुयें उसके भोग के साधन बन जाती
हैं। फिर ये चीजें भोग्य बन कर उसके काम में आने लगती
हैं। यदि उस जीव को वैसा ज्ञान न हो और उस ज्ञान से वह
जीव वैसे-वैसे कर्म न करे तो ये वस्तुयें उसकी भोग्य किंवा
उस के अन्न कदापि न बनें। इसी से कहा गया है कि
ईश्वर ने तो इनका केवल स्वरूप ही बनाया था। अपने