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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 726 में से

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पृष्ठ 125

['द्वैत के रहते रहते अद्वैतज्ञान कैसे हो सकता है' इसका
समाधान यह है कि ] ईश्वर का बनाया हुआ द्वैत तो अद्वैत के
ज्ञान में बाधा नहीं डालता । उसको ही तो मिथ्या समझने से
अद्वैत ज्ञान की उत्पत्ति हुआ करती है । इस कारण वह तो अद्वैत
ज्ञान की उत्पत्ति में किसी प्रकार की बाधा नहीं डाल सकता ।
प्रत्युत गुरुशास्त्रादिरूपी जो द्वैत है वह तो अद्वैत ज्ञान का साधक
होता है । इसके अतिरिक्त ईश्वर के बनाये हुए आकाशादि
रूप द्वैत को हम क्षुद्र संकल्प वाले लोग हटा भी तो नहीं सकते
हैं [क्योंकि वह सत्य संकल्प है । उसका संकल्प हमसे नहीं
तोड़ा जा सकता ] इन हेतुओं से उस बिचारे द्वैत को रहने दो,
उससे द्वेष मत ठानो ।
जीवद्वैतं तु शास्त्रीयमशास्त्रीयमिति द्विधा ।
उपाददीत शास्त्रीयमातत्त्वस्यावबोधनात् ॥४३॥
'शास्त्रीय' और 'अशास्त्रीय' भेद से जीव का बनाया हुआ
द्वैत भी दो प्रकार का होता है । उसमें से तत्व का ज्ञान होने
तक शास्त्रीय द्वैत को तो पकड़े ही रहना चाहिये ।
आत्मब्रह्मविचाराख्यं शास्त्रीयं मानसं जगत् ।
बुद्धे तत्त्वे तच्च हेयमिति श्रुत्यनुशासनम् ॥४४॥
प्रत्यग्रूप ब्रह्म का विचार या श्रवण आदि जिसको कहते हैं
वह शास्त्रीय मानस जगत् [द्वैत ] कहाता है। जब तत्व का [पूरा
पूरा] परिज्ञान हो चुके तब तो उस शास्त्रीय द्वैत का परित्याग कर
ही डालना चाहिये । यह बात श्रुति ने कही है ।
साधक लोग तत्व के समझ में आजाने पर भी शास्त्रवासना
में उलझे न रहकर ब्रह्माभ्यास को बढ़ाते जायें यही इसका भाव है ।