पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 698, कुल 726 में से
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को प्रिय मानना ही छोड़ दो और यह निश्चय कर लो कि परम
प्रीति तो अपने आत्मा में ही होती है। ऐसा निश्चय करके दिन
रात इसी आत्मप्रेम की ओर को देखते रहो। जो तो किसी प्रकार
के आग्रह में आकर इस पक्ष को न छोड़ेगा, उसे अनेक योनियों
में घूम घूम कर इस का प्रायश्चित करना पड़ेगा। जो तो आत्मा
को ही निरतिशय प्रेम का पात्र समझ कर सदा आत्मा की ही
सेवा में लगा रहता है, उसके प्रिय आत्मा के नष्ट होने का प्रसंग
कभी भी नहीं आता। यहां तक सिद्ध हो चुका कि परम-प्रेम का
स्थान होने से यह आत्मा परमानन्दरूप है। देखा जाता है कि—
ज्यों ज्यों प्रीति बढ़ती जाती है त्यों त्यों सुख भी बढ़ता जाता है।
राजा को अपने उपकरणों में अधिक प्रेम होता है तो उसे सुख
भी अधिक ही मिलता है।
अब एक विचार उठता है कि—यदि चैतन्य की तरह सुख
भी इस आत्मा का स्वभाव होता तो वह भी सब बुद्धिवृत्तियों में
आना ही चाहिए था। इसका समाधान यह है कि सब स्वभावों
का आना आवश्यक नहीं होता। देखते हैं कि दीपक उष्ण और
प्रकाश दो रूप का होता है, उसकी प्रभा जब किसी मकान में
फैलती है तब उसकी उष्णता नहीं फैलती। इसी प्रकार चैतन्य की
ही अनुवृत्ति होती है सुख की नहीं होती। एक विचार यह भी
है कि—जैसे एक पदार्थ में गन्ध, रूप,रस और स्पर्श सभी होते
हैं, परन्तु एक एक इन्द्रिय इन में से एक एक को ही ग्रहण कर
सकती है, सब को नहीं, इसी प्रकार चैतन्य और आनन्द दोनों
की ही अनुवृत्ति होती तो है, परन्तु अशुद्ध मन से केवल चैतन्य
का ही भास होता है, आनन्द का नहीं होता। सात्विकवृत्ति बड़ी
निर्मल होती है, इस कारण उसमें चैतन्य और सुख दोनों ही