पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३३
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३३
[विषय सुख में से निकल कर] परम सुख में डूब जाती है
[उस समय जीव की बुद्धि स्वरूप सुख में विलीन हो जाती
है। यों निद्रा से पहला सुख विषय सुख है। निद्रा आ जाने
पर मिलने वाला सुख स्वरूप सुख है।]
जागद्व्यावृत्तिभिः श्रान्तो विश्रम्याथ विरोधिनि ।
अपनीते स्वस्थचित्तो ऽनुभवेद् विषये सुखम् ॥४३॥
[ऊपर की बात को तीन श्लोकों में विस्तारपूर्वक यों समझो
कि] जागते समय जो अनेक व्यापार यह जीव करता है,
उनसे थक कर जब मृदुशय्या आदि पर विश्राम लेता है, तब
उसके अनन्तर [दुःखदायी व्यापारों से मिलने वाले] विरोधी
दुःखों के हटा दिए जाने पर, जब वह स्वस्थचित्त हो जाता है,
[जब इसका मन व्याकुल नहीं रह जाता] उसी समय शय्या
आदि विषयों से मिलने वाले सुख का साक्षात्कार यह किया
करता है।
आत्माभिमुखधीवृत्तौ स्वानन्दः प्रतिबिम्बति ।
अनुभूयैनमत्रापि त्रिपुट्या श्रान्तिमाप्नुयात् ॥४४॥
[विषयों को उपार्जन करता करता तंग हो कर जब उस
दुःख को हटाने के लिए कोमल शय्या पर लेट जाता है, तब इस
की बुद्धि अन्तर्मुख हो जाती है,] अन्तर्मुख हुई उस बुद्धिवृत्ति
में [सामने रखे हुए दर्पण की तरह] स्वरूपभूत जो आनन्द
है वह प्रतिबिम्बित हो जाता है। [बस इसी को 'विषयानन्द'
कहते हैं] परन्तु इस समय इस विषयानन्द को अनुभव करते
हुए भी त्रिपुटी के रहने के कारण जीव को श्रम होता ही है।
२९
४३४ पञ्चदशी
तच्छ्रमस्यापनुत्त्यर्थं जीवो धावेत् परात्मनि ।
तेनैक्यं प्राप्य तत्रत्यो ब्रह्मानन्दः स्वयं भवेत् ॥४५॥
[उसके बाद यह होता है कि] उस उपर्युक्त श्रम को हटाने
के लिए वह जीव परमात्मा में को दौड़कर चला जाता है।
वहां जाकर उस ब्रह्म के साथ एकता किंवा तादात्म्य को पाकर
वह जीव स्वयं भी सुषुप्ति के समय प्रकट होने वाला ब्रह्मानन्द
हो जाता है। [तभी तो कहा है कि सता सोम्य तदा सपन्नो भवति
(छा० ६-८-१) हे सोम्य उस समय सत् से सम्पन्न हो
जाता है]
दृष्टान्ताः शकुनिः श्येनः कुमारश्च महानृपः ।
महाब्राह्मण इत्येते सुप्त्यानन्दे श्रुतीरिताः ॥४६॥
शकुनि, श्येन, कुमार, महाराजा और महाब्राह्मण ये पांच
दृष्टान्त सुप्त्यानन्द को सिद्ध करने के लिए श्रुति ने दिये हैं।
शकुनिः सूत्रबद्धः सन् दिक्षु व्यापृत्य विश्रमम् ।
अलब्ध्वा बन्धनस्थानं हस्तस्तम्भाद्युपाश्रयेत् ॥४७॥
जीवोपाधिमनस्तद्वद् धर्माधर्मफलाप्तये ।
स्वप्ने जाग्रति च भ्रान्त्वा क्षीणे कर्मणि लीयते ॥४८॥
[स यथा शकुनिः सूत्रेण बद्धो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतन
मलब्ध्वा बन्धनमेवोपाश्रयते एवमेव खलु सोम्य तन्मनो दिशं दिशं
पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपाश्रयते प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः
(छा० ६-८-२) बालक लोग खेल के लिए सूत्र में बुलबुल
आदि पक्षियों को बाँध कर हाथ आदि पर बैठा लेते हैं उसको
ध्यान में रख कर इस श्रुति में कहा गया है कि]—सूत्र से
बंधा हुआ पक्षी, इधर उधर कुछ उड़ कर वहां ठहरने का