पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context४३४ पञ्चदशी
तच्छ्रमस्यापनुत्त्यर्थं जीवो धावेत् परात्मनि ।
तेनैक्यं प्राप्य तत्रत्यो ब्रह्मानन्दः स्वयं भवेत् ॥४५॥
[उसके बाद यह होता है कि] उस उपर्युक्त श्रम को हटाने
के लिए वह जीव परमात्मा में को दौड़कर चला जाता है।
वहां जाकर उस ब्रह्म के साथ एकता किंवा तादात्म्य को पाकर
वह जीव स्वयं भी सुषुप्ति के समय प्रकट होने वाला ब्रह्मानन्द
हो जाता है। [तभी तो कहा है कि सता सोम्य तदा सपन्नो भवति
(छा० ६-८-१) हे सोम्य उस समय सत् से सम्पन्न हो
जाता है]
दृष्टान्ताः शकुनिः श्येनः कुमारश्च महानृपः ।
महाब्राह्मण इत्येते सुप्त्यानन्दे श्रुतीरिताः ॥४६॥
शकुनि, श्येन, कुमार, महाराजा और महाब्राह्मण ये पांच
दृष्टान्त सुप्त्यानन्द को सिद्ध करने के लिए श्रुति ने दिये हैं।
शकुनिः सूत्रबद्धः सन् दिक्षु व्यापृत्य विश्रमम् ।
अलब्ध्वा बन्धनस्थानं हस्तस्तम्भाद्युपाश्रयेत् ॥४७॥
जीवोपाधिमनस्तद्वद् धर्माधर्मफलाप्तये ।
स्वप्ने जाग्रति च भ्रान्त्वा क्षीणे कर्मणि लीयते ॥४८॥
[स यथा शकुनिः सूत्रेण बद्धो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतन
मलब्ध्वा बन्धनमेवोपाश्रयते एवमेव खलु सोम्य तन्मनो दिशं दिशं
पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपाश्रयते प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः
(छा० ६-८-२) बालक लोग खेल के लिए सूत्र में बुलबुल
आदि पक्षियों को बाँध कर हाथ आदि पर बैठा लेते हैं उसको
ध्यान में रख कर इस श्रुति में कहा गया है कि]—सूत्र से
बंधा हुआ पक्षी, इधर उधर कुछ उड़ कर वहां ठहरने का